Dec 31, 2010

जय हो.. गुलज़ार वाला नहीं..

आज की रात, या दिन ही, कैसे गुज़र जाने दें? 'अन्‍नदाता' के अनिल धवन की तरह गाने में डूबकर सुहाना सोचने लगें? मगर वह फिर सलिल चौधुरी की रसभरी में सराबोर भरे रहना भले हो, अनिल धवन के फटियाले रोमान में बंधे रहना न होगा? जबकि दुनिया असांज के विधान और स्‍टीग लार्सन के नये रोमानों में परिभाषित हो रही हो? पिछले दो दिनों में मिलेनियम ट्रिलजी की एक, दो, तीन, तीनों फ़िल्‍में देखी और देखकर थोड़ा सनसनीखेत हो रहा था कि एक यह भी है अपेक्षाकृत साफ़-सुथरे 'लोकतंत्रीय' स्‍वीडन की बेरोक-टोक यातनादायी पापलीला. अफ्रीका वाला खेला तो हमें कापुचिंस्‍की ढंग से 'सूरज की छांह में' दीखा और समझा ही गए हैं. समझना चाहें तो भारतीय माया हमें नीरा रडिया और ए (अद्भुत) राजा समझा ही रहे हैं, दीगर बात है कि हम उनके बीटवीन द लाइन्‍स पढ़ने की जगह मनमोहन और मौंटेक‍ सिंह की सार्वजनिक माया पढ़कर ही भारतीय यथार्थ का उन्‍वान करते रहना चाह रहे हैं. दुनिया रंग रंगीली? सच्‍ची म? कितनी? रात एक ऑस्‍ट्रेलियन फ़िल्‍म देख रहा था, मन फिर से घबराकर सलिल चौधुरी गुनगुनाने को उद्धत होने लगा..

सवाल रहता ही जाता है कि कैसे गु़ज़ारें, दिन या रात जो भी, बेल्जियन 'आठवां दिन' वाला लौमहर्षक वायवीय जीवन जीने लगें? मगर पड़ोस फ्रांस में फिर सीनियर शाब्रोल की 'कॉमेडी आफ़ पावर' दिखना बंद हो जायेगी?

बाबू असांज आप कुछ रास्‍ता सुझाते हैं? अदरवाइस हम‍ पिटवैयों के पास पुराना अमीर खुसरो वाला भजन है ही, 'बड़ी मुश्किल है डगर पनघट की'..

जय हो नवका साल, तोहार स्‍वागत है हरमख़ोर..