Wednesday, March 31, 2010

मतलब क्‍या है फिर देखने का, सुनने का?

कुछ बिम्‍ब, कोई स्‍वर अंदर अवचेतन में कहीं गड़ा रह जाता है, क्‍यों गड़ा रह जाता है? जैसे यही फ़ि‍ल्‍म के अंत का यह बैकग्राउंड स्‍कोर की सीधी सरल पुकार, मगर कैसी गहरी मार.. कहां से सरलता में चला आता और फिर किस अमूर्तन में छोड़े जाता, क्‍यों?

Saturday, March 27, 2010

काम न करने की एक बेमतलबी का चित्र..

फ़ोन पर आदमी खुद से बात कर रहा है, कैसे करें बताओ?

फ़र्श पर तीन साल की बच्‍ची बुक्‍का फाड़े रो रही है, मानो आज रुदन-दिवस हो और वह पहले पुरस्‍कार की अपनी दावेदारी पेश कर रही हो. आदमी पहले बरजियाये, फिर रिरियाये इशारों से बच्‍ची को देखता है, कि ज़रा चुप हो जा, मेरी मां, तेरा बाप सोचने की कोशिश कर रहा है, मगर लड़की रुदन-तालाब की और हिंसक गोताख़ोर हो सकने की प्रामाणिकता बताने लगती है. आदमी की इच्‍छा होती है कि वह भी सिर हाथों में लिए अपनी किस्‍मत को रोने लगे, लेकिन हाथों में सिर की जगह उससे घुटने घेरकर वापस सोचने लगता है इतना, इतना, इतना कितना करने को है, कैसे करेंगे समझाओ. आंख खुलते ही दिखता है माथे पर कितने काम चढ़े हैं, कब करेंगे, कैसे करेंगे? और बच्‍ची है कि रोये जाती है. जैसे कमरे के दरवाज़े पैरों पर सिर गिराये बड़ी-बड़ी आंखें ऊपर उठाये कुत्‍ते का अपलक तककर पूछे जाना है कि ऐसा कौन काम है जिसकी सोच में मरे जाते हो, और मुझसे नहीं करवाते हो? बच्‍ची का चीख़ना दिखता है और मेरा चुप बैठे रोना नहीं दीखता?

आदमी हारकर जोर से आवाज़ लगाता है ये गुड़ि‍या क्‍यों रो रही है, इसे हटाओगी यहां से? मैं कुछ काम करुंगा, कैसे करुंगा?

रसोई के फ़र्श पर क्लिपर्स से निस्‍संग नाख़ून काटती औरत निस्‍संग बनी रहती है, आदमी का सवाल बेमतलब बाजू गिरता है, जैसे पड़ोस के आंगन पका कटहल धप्‍प से गिरा है ज़मीन पर, और गिरा पड़ा है, बेमतलब. जबकि संभवत: बेमतलबता के बोध में थकी फ़र्श पर बैठी रोती बच्‍ची अब खड़ी होकर रोने लगी है. जबकि कुत्‍ता अब भी बैठा हुआ ही अपनी चोटखायी अकुलाहट को शो-केस कर रहा है. आदमी की इच्‍छा हो रही है किसी को पीट दे, या कम से कम फ़ोन पटक दे, दोनों नहीं करता, भुनभुनाता बिछौने से नीचे बच्‍ची के नज़दीक आता है, बच्‍ची के पेट में अपना सिर लड़ाता है, ‘गुड़ि‍या चॉकलेट खाएगी? आं, गुड़ि‍या पप्‍पा के संग बाहर जाएगी?’

अभी तक जो बह रहा था बच्‍ची की आंख से ही बह रहा था, अब नाक के गिर्द भी कुछ सजीला कारोबार शुरु हुआ है, बच्‍ची अब रोने की जगह हिचकियों में लौटकर एक मंदताल में नाक सुड़कती है, बाप के भारी सिर से खुद को छुड़ाने की और अपने रोने की प्रामाणिकता जताने की गरज में एक बार फिर प्रलयंकारी हिचकियों के भारी ऑर्केस्‍ट्रेशन पर लौटती है. आदमी लंबी सांस खींचकर निहायत पिटी नज़रों बच्‍ची को तकता है, अलबत्‍ता सोच अभी भी अपने ही स्‍वार्थ की रहा है, इतना कितना करेंगे, कैसे करेंगे, कब करेंगे?

अब कुत्‍ता भी अपनी आरामदेही से उठकर, आदमी के बाजू, बच्‍ची के पास चला आया है, और जि़म्‍मेदारी से बच्‍ची के पैर चाटने लगा है. बच्‍ची वापस जिम्‍मेदारी से भां-भां रोने लगी है..

Friday, March 26, 2010

दु:स्‍साहसी दिबाकर बहादुर!

फ़ि‍ल्‍म देखे अब कुछ चौबीस घंटों से ज्‍यादा हुआ, उस देखे पर कुछ लिखना चाह रहा था, मगर दिमाग में जो बेचैनी तनी है, उसका वाजिब संगठन नहीं हो पा रहा, लगता है जो भी लिखूंगा, वह अधूरा, अपर्याप्‍त होगा, 'नये' सिनेमा की बुनाई का जो एक 'डिज़ाइन' दिबाकर ने 'ओय लकी, लकी ओय' के बाद 'एलएसडी' में गढ़ लिया है, उसकी धार को, उसके अलग-अलग चमकदार तत्‍वों की ठीक-ठीक पहचान करने से मैं रह जाऊंगा, तो बेहतर है ऐसी लिखाई में स्‍वयं को फंसाने, फ़ि‍ल्‍म को गिराने से फ़ि‍लहाल बचाये रखूं.. अभय का कहना है फ़ि‍ल्‍म में जितना है, मैं उससे कहीं ज्‍यादा उसमें पढ़ ले रहा हूं. ऐसे ख़याल से मुझे थोड़ा ऐतराज़ है. हो सकता है अपनी पसंद में मैं ज़रा अतिशयता की तरफ़ खिंचा चला गया होऊं, मगर अगर वह किसी तरह की भावुकता है, तो इस वक़्त मुझे एम्‍बैरेस नहीं कर रही. यही इतना सोचना भर अपने में बहुत खुशी दे रहा है कि 'ओय लकी..' की एक्‍सेसिबल सफलता के बाद दिबाकर सहूलियत और कन्‍वेन्‍शन के आसान रस्‍ते के पीछे दौड़े नहीं गए, होलसम फैमिली एंटरटेनमेंट का राष्ट्रीय पुरस्‍कार जीतनेवाले नौजवान फ़ि‍ल्‍मकार ने अपना होलसम और एंटरटेनिंग होना भुनाना नहीं शुरु कर दिया, अगली छलांग एक ऐसी दिशा में लगाई, जिसका शीर्षक भले ही कितना भी सनसनीखे़ज हो, फ़ि‍ल्‍म कुछ भुनाती और एंटरटेन तो किसी तरह से, कतई नहीं करती है. दरअसल मनोरंजन के प्रचलित हिंदी सिनेमाई प्रतीकों को वह सिर के बल खड़ा करके हमारी मध्‍यवर्गीय सामाजिक उदासियों और बीमार समय का एक अंतरंग, डिस्‍टर्बिंग डॉक्‍यूमेंटशन बनाने लगती, बनती जाती है. देखिए, मोह में मैं फिर फ़ि‍ल्‍म पर बात करने लगा, जबकि मैंने खुद से अभी ज़रा दरकिनार बने रहने का वादा किया हुआ है..

वैसे यह देखकर अच्‍छा लग रहा है कि दिबाकर की फ़ि‍ल्‍म के बहाने फ़ि‍ल्‍म पर बात करनेवाले गद्य की बुनावट भी 'अफेक्‍टेड' और 'एफेक्‍टेड' हो रही है. इमोशनल अत्‍याचार के गिल्‍टी प्‍लेज़र्स से झट बहुत आगे जाकर 'एलएसडी' एक बीहड़, गंभीर, सामाजिक विमर्श के मैदान में हिंदी सिनेमा को खींचे लिए गई है, इससे आगे की हिंदी सिनेमाई यात्रा इससे आगे की यात्रा ही होगी, वह दुबारा लौटकर बिपाशा बसु के 'बीड़ी जलाय ले' वाले लटके-झटकों पर खुद को न्‍यौछावर नहीं करने लौटेगी, और करती दिखेगी तो सिर्फ़ यह बताने के लिए कि बतौर सिनेमाई दर्शक व्‍यस्‍क होने की हमें तमीज़ नहीं, और सिनेमा पर हमारी सारी अकुलाहटें अंतत: महज चवन्‍नी छाप ही हैं..

ज़रा ठहरकर फिर कभी लिखूंगा, दिबाकर पर, 'एलएसडी' पर, फि‍लहाल इतने से ही काम चलाइए, और समझदार सिनेमा और अपने तकलीफ़देह समाज की संगत को ज़रा समय देने के नाम पर जाकर फ़ि‍ल्‍म देख आइए, इतना भर ही इस पोस्‍ट का मक़सद है. और हां, इसे याद रखकर फ़ि‍ल्‍म देखने जाइएगा कि वह आसान मनोरंजन नहीं है. दरअसल फ़ि‍ल्‍म इस लिहाज़ से भी कुछ लाजवाब है कि वह जहां कहीं किन्‍हीं छोटे हिस्‍सों में आसान मनोरंजक होने की कोशिश करती है, वहां-वहां वह खुद को छोटा करती है, और जहां सीधे, निर्मम बात करती है, फट से एक ऐसी ऊंचाई पर चली जाती है, जहां से ऐक्‍टरों की कास्टिंग और उनके आपसी इंटरऐक्‍शन को वापस हिंदी सिनेमा के इकहरेपने पर लौटालना कतई नामुमकिन होगा..

सोच रहा हूं यह फेनोमेनन दरअसल है क्‍या, कलकत्‍ते की बजाय, वाया दिल्‍ली हिंदी सिनेमा का एक बंगाली पुनर्जागरण? हिंदी सिनेमा की एक ऐसी पैकेजिंग जिसमें सिनेमा और हिंदी- सबका एक पुनर्संस्‍कार जैसा कुछ हो जाए? मैं अभी भी सोच रहा हूं..

Wednesday, March 24, 2010

धुलियाये लैंडस्‍केप में..

जाने कैसी आवारा गोधुलि बेला है, खुले उजाड़ मैदान के एक छोर टहलते हुए लगता है मानो ग़लत पते पर आ गए हों. जैसे मैदानी नाटकीय फैलाव के किसी कोने रेज़्ड प्‍लेटफ़ॉर्म पर कोई तेलुगू बाई का राजस्‍थानी नाच हो सकता था, या प्रतापगढ़ की किसी बिसराई नौटंकी का रिपीट शो, मगर सन्‍नाटों की अधबनी कविता पसरी हुई है, इमैजिन्‍ड अतीत का मेला उखड़कर मानो हार्डकोर फ्यूचर के एक रंगहीन कैनवास में डिसॉल्‍व हो गया है. इट कुड हैव बीन द लास्‍ट पिक्‍चर शो इन द वाइल्‍डरनेस, बट इट इज़ नॉट..

व्‍हॉट इज़ इट? अ सेट फॉर अ ग्राफ़ि‍क स्‍टोरी? या साऊथ का कोई फ़ि‍ल्‍ममेकर डेढ़ सौ जूनियर आर्टिस्‍टों के साथ इस बियाबान में रौमेंटिक डुयेट शूट करने आएगा, बांस की बल्लियों और लोहे की खपच्चियों पर भारी बत्तियां लगेंगी, लाउडस्‍पीकरों के अर्द्धस्‍वप्निल शोर में मैं उचाट अकेलेपने के सुकोमल, टीसकारी गल्‍प भूल जाऊंगा? ओह, कैसे-कैसे विचार. वह भी इस आवारा गोधुलि बिलो बुली बेला में?

जुसेप्‍पे होता तो उससे पूछता कि नहीं, तुम घटक की ‘अजांत्रिक’ और राय के ‘जलसाघर’ की तो रहने ही दो, शहरी आधुनिक-गल्‍प ‘साधु और शैतान’ को भी भुलाये रखो, महमूद की ही एक और फ़ि‍ल्‍म थी, अरुणा ईरानी के साथ, ‘गरम मसाला’, उसकी कुछ याद है तुम्‍हें? या फ्रंचेस्‍को रोज़ी की ‘साल्‍वातोरे जुलियानो’.. पता नहीं क्‍यों है कि ये सारी छवियां घूम-घूमकर माथे पर गिर रही हैं, क्‍यों गिर रही हैं, कुछ तुम्‍हें सूझता है?

लेकिन जुसेप्‍पे होगा नहीं कि मेरे सवाल का जवाब देगा. मैदान के एक छोर से छूटे पाड़ों की तरह दूसरे तक भागते धूल और अपनी किशोर वय की ऊर्जा में नहाये कुछ सिरफिरे अपने में मस्‍त बच्‍चे होंगे, जिनसे कुछ देर तक हकबक उन्‍हें तकने के बाद चीख़कर मैं सवाल करुंगा, और वे अपने जवाबी चीख़ों में उसे अनसुना करते रहेंगे..

बकरी और जलावन की लकड़ि‍यों के साथ गांव लौटती एक बुढ़ि‍या होगी जो दूर से मुझे घूरती आती नज़दीक आकर ठिठक जाएगी, बिना मेरे प्रस्‍तावना के मेरे सवालों के जवाब के लिए स्‍वयं को प्रस्‍तुत करेगी, बदले में यह छोटा शर्त लादेगी कि मुझे उसके जीवन की प्रेम-कहानियां सुननी पड़ेंगी.. मैं चौंककर तीन कदम पीछे हट जाऊंगा कि तुम यह क्‍या कह रही हो, काकी? प्रेम कहानियां तो अब मैं अपनी तक नहीं सुन पाता, फिर तुम्‍हारी किस कदर सुनूंगा?..

बुढ़ि‍या इसका जवाब देने की जगह बकरी के मुंह से लकड़ी छुआने लगेगी, मानो मोहब्‍बत से घास खिला रही हो. बकरी बेवकूफ़ लकड़ी चबाने भी लगेगी, मानो सचमुच घास खा रही हो! मैं सिर थामने के बाद सिर पीट लूंगा, या मुझे लगेगा कि मैंने पीट लिया है. जैसे गोधुलि बेला के अजाने लैंडस्‍केप में टहलते होने का अहसास होगा, जुसेप्‍पे से चार बातें और किशोर वय के लौंडों पर दूर से चीख़ लेने की एक भोली, बेवकूफ़ाना ज़ि‍द होगी, हक़ीक़त में सिर्फ़ सन्‍नाटों की एक अधबनी कविता भर ही होगी, जिसे उंगलियों पर घुमा-घुमाकर मैं बीतती सांझ का घनघनाना सुनता होऊंगा.. मगर वह तंबूरी ज़ोरबा क्विन के पैरों के नीचे की थिरकती दुनिया होगी..

Tuesday, March 23, 2010

क्‍या होगा गरमी का असर होगा?

बहुत गर्मी झेलते रहने के बाद अभी झेलने को और गर्मी रहेगी. जैसे काफी कुछ पढ़ते रहने के बाद भी काफी कुछ पढ़ने को बचा, मुंह बिराता अपने में निस्‍संग बुदबुदाता दिखेगा. आलिफ़ बे से छूटे हुए फ़ैलन की डिक्‍शनरी लजाती और शास्‍त्रीयता से बाज आये बाबू हमें आलोक राय के ज़ि‍रह चमकाते दिखेंगे. तरबूज के कटे हुए फांकों की ख़बर होगी कि आसपास ही कहीं हैं, है ख़बर है का भन् भन्र पंखा बेमतलब घूमता होगा, मगर मुंह तक पहुंच जायें की हर वक़्त चुकाई होगी, जैसे की-बोर्ड पर डोलती उंगलियां हमेशा तैयार हैं के दिलफ़रेब इशारे अच्‍छा अभिनय करती होंगी, मगर उड़ाकर कहीं लिये जायें की वाजिब कलम टाइप उंगली-घिसाई नहीं होगी. फिर हकलाये, अलबलाये तीन कदम बायें, चार फीट आगे अझुराये कहां से किधर ठीक-ठीक शुरु होगा, होगा? ठीक-ठीक तो बाद में फरियाते बैठेंगे, सरकार, बेठीके शुरु होगा? हे फ़कीर मोहन सेनापति, हे गुरु गुणग्राही इनविजिबल सिटी के जनकैया श्री श्री कालबलि कल्विनो कृपालु महाराज, देह और आत्‍मा की टंकी से रोज़ टप्-टप् पेट्रोल चू रहा है, मालिक, कवने करखाने में जा रहा है, हमरे हाथ क्‍यों नहीं आ रहा है, बताइयेगा, पहेली? बुझाइयेगा? अंधेरे बंद कमरों की तरह वृतांते वृतांत है, अंत कहीं है? पंथ? कोई सा उंगली पकड़ा दीजिए, मन बझा रमा रहे का गाना, सुनवा दीजिए? मगर काहे, उसके पहिले ही माथे कोई सेंटेनियल पटकवा दीजिएगा, कहीं से उठवाकर कहीं औरे लटकवा दीजिएगा, फिर कातर कलम कइसे नहीं रोवेगी, की-बोर्ड औंजाके कइसे नहीं अरबरायेगा, कंपूटरजी हैंगिंग गार्डन में घबरायेगा?

Thursday, March 18, 2010

दायें या बायें..


जीवन के ट्रैफिक में मैं कहीं उलझा रह गया था, मौका अभय बाबू ने मार लिया था, मेरे देखने का छींका आज टूटा, उसी मीठी जलेबी का एक छोटा सा मजमून है..

Wednesday, March 17, 2010

संध्‍याराग के बाद अब मैं क्‍या गाऊं, नहीं, मम्‍मा, तुम बताओ!

टैरेस पर इतने लोगों को देखकर सोहा घबरा गई. ज्‍यादातर अनजाने चेहरे. पहली बात दिमाग में यही आई कि चुपचाप उल्‍टे पैर वापस लौट जाए. (उसी पल दिमाग में ब्‍लौंडी का बैलून भी पॉप-अप हुआ, ‘हां, लौट आओ वापस और आकर मेरा जीना हराम करो, राइट?’ ब्‍लौंडी का तकिया-कलाम है. सोहा घर में है मतलब ब्‍लौंडी का जीना हराम कर रही है. पता नहीं कहां से सीख लिया है पागल ने. किसी दिन उसे घुटने के नीचे दबाकर सोहा सवाल करना चाहेगी कि तुझे जीना हराम का मतलब मालूम भी है, इडियट?’ मगर नैचुरली, ऐन उसी मौके कमरे में मम्‍मी चली आएगी और चेहरे पर हॉरर के एक्‍सप्रेशन के साथ सवाल करेंगी, ‘तुम कर क्‍या रही हो? आर यू ट्राइंग टू चोक यूअर ब्रदर्स ब्रीदिंग?’ फिर सोहा बेवकूफों की तरह मां को देखेगी और चिढ़के उसके मुंह से निकलेगा, ‘यस! वन ऑफ़ दीज़ डेज़ आयम गोइंग टू!)

खंभे के पास एक टेबल पर खाली बोतल और सफेद प्‍लास्टिक कप्‍स रखे थे, सोहा उसके बाजू जाकर खड़ी हुई और इधर-उधर टी के लिए देखने लगी. टी पर गुस्‍सा आ रहा था कि उसने पहले बताया क्‍यों नहीं कि इतने लोग आ रहे हैं. वह बैगी का पाजामा और ‘डोंट पिन यूअर होप्‍स ऑन मी’ के स्‍लोगन का एक घिसा हुआ टी-शर्ट पहने हुए थी, मानो नीचे गली में ब्रेड और अंडे खरीदने के लिए निकली थी और वहां से सीधे टी के टैरेस पर चली आई हो! (दिमाग में ब्‍लौंडी के बैलून ने इम्‍मीडियेटली अनाउंस किया, ‘कमॉन, दीद, तुम ड्रेस-अप होके आती तो भी क्‍या फर्क पड़ने वाला था, नो बडी वॉज़ गोइंग टू फाइंड यू अट्रैक्टिव एनीवेज़! शाम को फील्‍ड में लड़के बड़ी लड़कियों के बारे में कितनी गंदी बातें करते हैं, लेकिन तुम्‍हारे बारे में बात करते उनको मैंने कभी नहीं सुना!')

इस ब्‍लडी बैल ब्‍लौंडी का इलाज क्‍या है, है? सोहा सोचती और फिर उसे लगता कि उसका यह सब सोचना भी फिजूल है. मीनू ब्‍लौंडी से दो साल छोटी है, स्‍टैंडर्ड टू में पढ़ती है, वह तो ब्‍लौंडी की तरह हर तीसरे मिनट स्‍मार्ट दिखने के कंपल्‍शन का शिकार नहीं, लेकिन अभी तब की तो बात है, मेहता आंटी के घर बच्‍चों की पार्टी थी, ब्‍लौंडी बाथरुम बिना फ्लश किये बाहर आ रहा था, आंटी वहीं दरवाज़े के पास थीं, उनके टोकने पर जवाब मीनू ने दिया था, ‘ही ऑल्‍वेज़ डज़ दैट, आंटी, नो पॉयंट ट्राइंग टू करेक्‍ट हिम!’ फिर इसके पहले कि ब्‍लौंडी आकर उसका मुंह नोंच ले, लड़की ने मुस्‍कराते हुए इनोसेंटली आनसर किया था, ‘बट मैं भी बेड वेट कर देती हूं, एवरी वन इन अवर हाउस..’

रात में मम्‍मी के काम से घर लौटने पर ब्‍लौंडी ने अपने सिर में उंगली घुमाते हुए मीनू के जवाब की नकल, कि कैसे उसके घर में हरेक का स्‍क्रू ढीला है, का डेमो दिया था, मम्‍मी दुखी होकर सोहा को देखती रही थीं जैसे अपने भाई-बहन के पागल होने के लिए अकेली वह रेस्‍पॉंसिबल है!

तीन लड़कों का एक ग्रुप है, आपस में हंसते हुए बात कर रहे हैं, उनमें एक चेक शर्ट पहने लड़का है, बीच-बीच में सोहा की तरफ़ स्‍माइल करते हुए ऐसे देख रहा है मानो उनकी पहचान हो. सोहा थकके चेहरा घुमा लेती है. क्‍या करे, घर लौट जाए? लेकिन सोहा मम्‍मी से झगड़ा करके निकली है कि वह ग्‍यारह बजे से पहले लौटेगी नहीं! पराग पूरे-पूरे दिन घर से गायब रहता है, मम्‍मी उससे हिसाब क्‍यों नहीं लेती, सिर्फ सोहा को ही घर में बंद रहने की क्‍यों जरुरत है?

और ऐसे मौकों पर जैसा आजकल सोहा और मम्‍मी के बीच होता है, मम्‍मी ज़हर का घूंट पियी नज़रों से उसे घूरती रही. सच्‍चायी है सोहा भी मम्‍मी से झगड़ा कर-करके थक जाती है. सुबह-शाम जब भी उनके चेहरे की तरफ देखो, जैसे बारह बजे हुए. पराग से शिकायत करो तो वह मुंह पर चादर तानकर कहता है प्‍लीज़, सिस्‍टर, लीव मी अलोन!

सोच-सोचकर कभी सोहा का दिमाग चल जाता है. पराग से हो नहीं सकती, मम्‍मी से पॉसिबल नहीं, फिर किसके साथ बैठकर सोहा मन की बात करे? ब्‍लौंडी और मीनू के साथ? क्‍योंकि पापा के साथ तो कर नहीं सकती! पूरी दुनिया को उल्‍टा-पुल्‍टा कर ले तब भी इट वोंट बी पॉसिबल एनी मोर, टू हैव पापा अराउंड एंड हैव अ वर्ड विद् हिम, एंड दैट्स अ फैक्‍ट! सोहा ने सोचा और उसके दिल पर टप्-टप् आंसू के बूंद गिरते गए..

(जारी..)

Wednesday, March 10, 2010

संझा एन्‍सांब्‍ल..

पहचान की वह जाने कैसी रेल होगी जिसके खटर-खटर बेमेल म्‍यूज़ि‍कल मुगालतों में दिल बहलता होगा, कभी सुन पड़ती होगी कोई दबी-दबी सी चीख़, मगर बेख़याली की बेसबब कहानी थी सा भूलकर उसे फिर कोई लतीफ़ा सुनता होगा, कोई जो आकर चुपके बताये कभी कि जनाब, यह ज़ि‍न्‍दगी आपकी ही है जो पकती जाती यूं ही बेमतलब, सख़्त होता एक शरीफा खराब? तो चोटखायी नज़रों इशारा करने वाले हमराज़ को हैरत में तकता होगा. जैसे याद करते हों समाज में रहने की गर्ज की तर्ज पर लोग बारहा भरने को वक़्त पूछ लेते होंगे कहां से आए, कहां जाते, भाई साब. जिसका वैसा ही वक़्त भरने को सूझता होगा कुछ एक बेहूदा सा जवाब. वर्ना तो सोचने लगने जैसा सोचने पर सन्‍न हुए जाते होंगे कि क्‍या बतायें कहां से आए किधर जाते, हाथ को हाथ सूझे तो देखें दिल पर खुदी क्‍या बात, आपको बतायेंगे कभी, अच्‍छे दोस्‍त, पहले खुद को ही टटोलकर करीब लायें?

हाय, बरसाती कंपकंपाती सांझ में लिसड़ाये कपड़ों सी क्‍या दुरदुराई, लुटी कहानी है, वह कौन था जिसकी संगत की मोहब्‍बत में आए थे शहर, और वह कौन है जिसकी संगदिल मोहब्‍बत में तकते हैं रात, दिन का ताला खोलते हैं, सारे-सारे दिन बजता रहता है फ़ोन, कभी बोलते, क्‍या हैं उसका नाम? कभी जो फुसफुसाकर गाया था किसी ने कानों में, और जिसे आप छोड़ आए थे किसी काली रात एक काली नदी की कोख में, कि शहर में दाखिल होना, आना है खाली हाथ?

शहर में सांझ ढलती होगी, फांके गिराती धूल उड़ाती, रसोई में ठिठकी कोई औरत बिलखती हंसती, तालबद्ध मवेशी अंधेरों के किन भूगोल थिरकते, मन उमड़ता नई इमारते बनती होंगी, अपहचानी आवाज़ों के आततायी शोर में एक पुलिस लॉरी साइरन बजाती, रोते बच्‍चे को सुलाती होगी, सीढ़ि‍यों के अंधेरे में भेदभरा कोई चेहरा दुभाषिया खुद को मेरा होना बताता होगा, भय में लोग चीख़ते होंगे देश, वर्ना तो जागे में बेहोश बेरहमी से रेतते खुद को चैन से बंसी बजाने के सुभीते सपनों में सुलाते होंगे, चौंककर अचानक कभी फिर सगेज़ाद को दुश्‍मन और माथे गिरते क्रेन को खूबसूरत मेम बुलाते, घबराहट में कभी बुदबुदाते हुए प्‍यार और मुझको यार कहकर छकाते, मैं अपने को बचाता, फिर हारा हुआ आता, खुद को शहर में लौटाता होऊंगा..

Tuesday, March 9, 2010

बच्‍चा और बेहयायी..


‘भाग जाऊंगा हाथे नहीं आऊंगा, फिर?’

बच्‍चा मुंह बनाये पूछेगा, मैं मुंह बनाये सोचूंगा, ‘भाग जाओगे तुम्‍हीं पछताओगे, सुबही उठोगे, मुट्ठी में चवन्‍नी नहीं पाओगे, फिर?’

ना!’ चिढ़के बच्‍चा पैर पटकेगा, ना ना ना! धम्‍म् धम्‍म् ज़मीन पर, चोट छाती लगेगी. चव्‍न्‍नी बचाता मैं अदद छाती नहीं बचा पाऊंगा.

चार कदम दूर भागा, बच्चा चिंहुकता पलटेगा, जैसे नफ़रत का ककहरा सीखता हो, ‘कब्‍बो बात नहीं करुंगा, साथ नहीं करुंगा, फिर?’

बेहयायी का पाठ बना थेथर मैं गाल बजाऊंगा, ‘नहीं करोगे तुम्‍हीं पछताओगे, हमारे साथ फिर कहीं नहीं जाओगे, बुनिया तुम्‍हें भूल जाएगी, कनिया बुलाके अपनी गोदी नहीं लुकायेगी?’

बच्‍चा भां भां रोने लगेगा मैं फां फां हंसने. खींचकर बच्‍चा मुट्ठी चलाएगा, भींचकर जीता हुआ मैं हारा जाऊंगा..

Sunday, March 7, 2010

रेल पर सवार औरत..

औरत कहती है मैं कभी तुम्‍हें दु:ख देने का सबब नहीं बनना चाहती, मगर मान लो ऐसा मौका बना कि तुम्‍हें तक़लीफ़ हुई, तब? मेरे बाबत ग़लत फ़ैसला सुनाओगे? अपनी नज़रों मुझे नीचे गिराओगे? आदमी देखता रहता औरत की तरफ़, चुपचाप सुनता. औरत के रोओं, पैर के नाख़ूनों पर एक खुशी की लकीर खिंची जाती कि वह देखती किस मुहब्‍बत से देखता है उसे आदमी, मगर फिर यह सोचकर दिल भारी होने लगता कि मन में इतने सारे फूल खिलते हैं, हमेशा वह करीने से सजाया बागान नहीं होता, और जब नहीं होता तो उस जंगली-वन में जाकर वह भूल जाती है कि वह कौन है, हसरतों के पहाड़ पर क्‍या खोजने आई है, तब?

आदमी देखता है औरत पास बैठी है, मगर उसके साथ नहीं है. उसके केश, उसकी उंगलियां पहुंच की ज़द में हैं लेकिन उसका होना ख़यालों के किसी और समय में, भाषा की किसी अपहचानी लिपि में सामने खुला हुआ है. मानो रेल के एक ही डिब्‍बे में आमने-सामने बैठे हों लेकिन उनके मन के स्‍टेशनों की लम्बी दुरियां हों, उन फ़ासलों में जाने कितने जंगलों, पहाड़ों का भराव हो? आदमी असमंजस की बड़ी तक़लीफ़ में है, मगर झाड़-पोंछकर खुद को बुहारता है, मुस्‍कराकर कहता है, ‘तुम्‍हें नज़रों से गिराकर फिर मेरे खड़े होने की कोई कहीं जगह होगी?’

आदमी कहता है सिर्फ़ इतना जानता हूं कि कितने भी दूर निकल जाऊं, लम्‍बे सफ़र से लौटा आऊं, तो उम्‍मीदों से बंधी उस ज़रा सी पोटली के साथ लौटना, तुम्‍हारे पास ही लौटना होगा. और मुझे मेरे गाते में, और रोते में, सुनोगी तो इसीलिए कि तुम्‍हीं को सुना रहा होऊंगा, तुमसे अलग तो ठीक-ठीक मैं खुद से ककहरा भी न कहला पाऊंगा, समझती हो?

***

आदमी शहर और अपने गहरे में उदासीन, आवारा, निस्‍संग घूमता खुद से हारकर ज़ि‍रह करता कि वह इतना आसान है, फिर मन इतना मुश्किल क्‍यों?

मन के एक दूसरे रेल पर सवार औरत आदमी के नज़दीक आकर बुदबुदाती, ‘तुम जानते तुम इतने आसान नहीं, फिर कितना तो सब आसान हो जाता!’ और बेआवाज़ गुज़र जाती.

घर की दीवारों पर, पुरानी तस्‍वीरों के माढ़े, नये तकिये के गाढ़े में आदमी औरत के होने की तस्‍दीक करता, कानों में फुसफुसाहट सुन पड़ती, ‘मैं यहीं हूं! कातरता में लजाया आदमी सवाल करता फिर वह कौन थी जिसे मैंने गुज़रती रेल में देखा?..

आदमी घबराकर फिर देर तक बताता होता कि वह फंस गया, उलझ गया है, औरत बताती कि नहीं, दरअसल वह आसान हो रहा है. आदमी कहता किसी भी क्षण रोने लगूंगा, फिर देखोगी? औरत हंसती कहती तुम अभी-अभी हंसोगे, मैं देख रही हूं..

उसके बाद उसके?

- बच्‍चा बाड़ी फूल सवारी, छप्‍पन रंग के रेलगाड़ी, उसके बाद?

- क्‍या मालूम उसके बाद.. चिड़ि‍या बताती है हियां से उड़के फिर किहां उड़ेगी? नहीं बताती, चाहे जितना भी आंख दिखाओ. जैसे ओस्‍सेलियानी की फ़ि‍ल्‍म ब्रेज़नेव के रुस को कोई सुनहला सपना दिखाती है? आंख दिखाओ चाहे डंडा, पकड़ में आती है? अटकन बटकन, पटकन पटकन, चिरई के पांख, सबर्सिव सपना के आंख.

- छुक छुक, छुक छुक, आयें?..

- आओ, आओ, बायें बायें आना, बचा कर.

- धुक धुक, धुक धुक, उसके बाद उसके बाद?..

- उसके बाद ओसमानिया. ओने बेने दानिया. साइकिल के बास्‍केट में लजाई हुई मुर्गी और इस्‍कूली के बस्‍ता में छुपाईल बैठा गोभी, ऐसे?

- दांती के दरद में टनटनायल टनायल आवे धोबी, वैसे?

- दांत के डाकदर की कुर्सी में, चाहे जितना चाकलेट हो जेबी में, मन तो बोले वोही फुक फुक फुक फुक.

- उसके बाद? नर्स गाना सुनायेगी? अस्‍पताल के लॉनिन में आइसक्रीम लेके आवेगी? सच्‍चा लगेगा? मन को अच्‍छा अच्‍छा?

- रुक रुक रुक रुक.


Saturday, March 6, 2010

घर के खोखे में जो तुझको बिठाकर..

होते हैं तो फिर हुए ही रहते हैं. झमेले. लगता है उनसे पार पाया जा सकता है, मगर फिर यह भी दिखता है कि झेलाइयां पीछे-पीछे ही चल रही हैं, झमेले जो हैं उनका कुछ सदाबहार-सा बना ही रहता है. मतलब कुछ वैसा ही सा.


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Friday, March 5, 2010

सब यादे बिसरा दी, काहे हो, बेबी?

रामजीत राय ब्‍याहता बेबी राय को सखी सकीना का ख़त..

कइसी है, बेबी, देख तू त हमके भुलाइये गई, हं? आज दुकानी पे चन्‍नपरकाश आके एहर-ओहर का कहानी नै छेड़ते तो ईहो खबर कहां ले लगता कि तोरा घरे डेढ़ साल का बबुआ खेल रहा है! (और देख, जलम-जल्‍मांतर का बात करे वाली तू हमको एक हाली खबरो करे लायक न बूझी? हमरा ख़याल ऐसा धूलि बनके तोरा माथा का बाजू ले उड़ गया रे, बेबी? हमरा तरफ़ ले तू अइसन निर्मोही हो गई हो?) खैर, इसी को कहते होंगे जिन्‍नगी का खेला, तोरा है न मोरा है, माया नगरिया में फोकटिया का मेला है! हो खुदा, कइसा त मौका है और देखो, का हम बोल रही हैं! पहिले ई बताव, बबुआ है कइसा? गोर है, सांवर है, केकरा ऊपर गया है? ओह, केतना त करेजा पीराय रहा है कि थोड़ा सुभीता होता त अभीये उड़के तोहरे पास चहुंप जाते, बबुआ के झांकी लेते, अऊर तोहरे हाथ को अपने हाथ में लिए दिल का बात कहके करेजा ठंडा करते, सच्‍चो में, बेबी! तुम हुआं ठेहुना पर अपना सुन्‍नर छौंड़ा को तेल लगा रही हो और हियां जो है दुख का रोज दू गो पहाड़ फूटता रहता है. पूरा सात महीना हो गया, मियां जी का कवनो खबर नहीं, कवनो पुलिया से छलान लगा लिये कि जेहल में हैं, कवनो, कुच्‍छो खबर नहीं. सब पुलिस-थाना करके, रो-हार जब हमको तनि होश हुआ तो जुम्‍मन फूफा का मदद से मकानी का नीचवा का जगह में एगो मनिहारी का छोटा सा दुकानी डाले हैं, वहीये से गुजारा चल रहा है. गुजारा क्‍या चल रहा है कवनो तरह से जिन्‍नगी कट रही है! मन के हाल त मत्‍ते पूछ..

तू अपना बोल, बेबी? चन्‍नपरकाश त बोल रहे थे राय साहेब के बहुते ठाठवाला नवकरी है, नीमन पी परकाश एंड कंपनी के कन्‍टेक्‍टरी का जाब में लगे हैं? कवन ई कहीं ऊहे तोहर नइहर वाले परेम परकास तो नै हुए, हं? रैल्‍टी हमको मालूम नहीं, चन्‍नपरकाश से पूछे के ख़यालो नै रहा, बस अइसे ही अंजाद लगाके बोल रहे हैं, वहीये हैं ई बड़का साहेब हो गए? तब त तू बड़ किस्‍मत वाली है रे, बेबिया!

और का बोलें, सखी, केतना त मने लुकाया हुआ बात है, मगर दुकानी में फिर दू गो गाहक आके ठाड़ा हुए हैं, हमरा वेटिन कर रहे हैं, कवने को टिकुली चाहिए होगा, कवने को चूड़ी. सबको पहिरायेंगे हम, हमरे हाथे कोई नहीं पहरायेगा, नहीं? तू अपने घरे सुखी है, हमरा दुख अपना करेजा में थोड़ी लगायेगी..

जोकिन कर रहे थे, सखी, तोहरा से कइसन ईर्ष्‍या अऊर कहंवा के शिकायत..

फुरसत भेटाये त एगो कारट डाल देना, पता के बाजू जोड़े मत भुलाना, बज्‍मी गौरमेंट एंड बियुटी इस्‍टोर, ठीक?

खुदा हाफिज


हरमेशा तोहरे दिल के करीब रहे वाली

सकीना

Thursday, March 4, 2010

एक अनुपयोगितावादी नेक़ सलाह..

जाने क्‍या थे कहां थे मगर समझते थे खुद को जनता का आदमी ठेपी सज्‍जन, सो वही ऊंचा खटराग चिल्‍लाये, दिल में छेद हो जाये का छेदकराग साधे फैलाये, ‘ओ लिखवैये, अबे क्‍यों? सतरह से होते सत्‍तर सात सौ पन्‍ने रंगोगे मगर फिर उसके बाद हज़ार, सात हज़ार क्‍या, बरखुर्दार? हुआं से कहां ओकरे बाद कौन बेड़ा पारोगे, पन्‍नों के माथे टांकोगे सुनहरी चिड़ि‍या, अपने अनोखे इस जनविमुख ज्ञान को कहां गाड़ोगे? क्‍या काम आएगी तोहरी यह लिखाई? लाएगी इन छौंड़ों के चेहरे हंसी, मदनमोहन के पालटिक्‍स में कोई नई अंगड़ाई? बताओ, बताओ, पूछता है जनता का आदमी समझ सके उसे ज़रा उसी आसान ज़बान में समझाओ!’

वही मौका हुआ जब तैयन चचा खखारे, पीछे निवाड़ में हड़ि‍यल पैर रगड़ते बैठे अबकी सीन के फोरग्राउंड में पधारे, ‘सज्‍जन यार, सुनो तुम, करते हो यही टुच्‍ची बातें कि दिल टूटा जाता है. ज़िंदगी डेढ़ बखत की रोटी और हवाई चप्‍पल का फकत टूटा फीता नहीं होती, न बच्‍चे का मदरसे से छूटे पतंग के पीछे भागना और ठेहुना पर घाव साटना मुंह बचाये की कारवाई होती है, बच्‍चे के बास्‍ते बच्‍चा होने का सलीका होता है, मगर तुम दुर्जन क्‍या जानो, बस वही गिनती के तीन पहाड़े पढ़ा जानते हो, तुम्‍हारी किस्‍मत कि कोई नेकबंद अच्‍छी गज़ल पढ़ रहा है, चरनामृत की तरह धरो हथेलियों में इसका तो शऊर तुम्‍हें कभी भला क्‍या होगा जीवन में, मगर भैय्ये, यह काली दाल क्‍यों फैला रहे हो?’


Tuesday, March 2, 2010

ईनारे पर गिरी हुई..

“तौफिकवा था कौन अवाजी लगा रहा था अबहीं दुआरी पर? कौन?”

कांटा लगाकर सहजन सहेजती सहजो जवाब देगी, मगर बुढ़ि‍या के सुनेगा नहीं. दो मर्तबा और कोशिश करके फिर मन ही मन हार मानके, तीन गालियां तेरह साल की मुसम्‍मात बच्‍ची पर खराब करके, वह वापस अपनी कुरती के बटनों को खोलने में जुटी, लेकिन ये उंगलियां एक जगह थिर होकर मदद करें तब न? इस उमर में यही है, हर चीज़ काम हो जाती है. बायें घूमे तो घुमे रहे बायें, दायें का हाथ थामा तो थामे रहो दायां! इसीलिए बुढ़ि‍या बटन लगाती नहीं, लेकिन मालूम नहीं देवकी की पतोह है शरम-लिहाज की मारी कि छोटकी, हंसी-हंसी में हाथ सहलाती या माथे में तेल लगाती कब कुरती का बटन जोड़ जाती हैं, पते नहीं चलता. कौन किसका इतना लिहाज है? कुरती के दो बटनों की ढांपी नहीं रहेगी तो क्‍या होगा, शंकर भगवान अंगना में तांडव करे लगेंगे? एक बार बुढ़ि‍या के मन हुआ मुसम्‍मात को बुलाकर कुरती के बटन खुलवा ले, फिर आवाज़ लगाने के ख़याल से थकान होने लगी, बेवकूफ लड़की आकर मुंह बाये खड़ी रहेगी, मदद की जगह हो सकता है दो नई मुसीबत छोड़ जाये, असल बात है बुढ़ि‍या को सहजो पर भरोसा नहीं. और उससे भी दीगर यह कि मुसम्‍मात लड़की का चेहरा उसे पसंद नहीं.

फिर एकबारगी बुढ़ि‍या को भतीजे जीवनानंद पर गुस्सा आया. कम से कम अब तलक दस मर्तबा उसके कुरते का कोना थामे उसे समझा चुकी हैं चलाये अनर्थ अपने घर में, बुढ़ौती में उन पर अपना धरम-करम न लादे, डरपोक उनके आगे माथा झुकाये ‘हां, काकी, हां, काकी!’ का जाप करेगा और तीन दिन बाद फिर खबर होगी कि फलानी माता के उपवास में आज तरकारी में लहसुन नहीं छोड़ाया है तो हल्‍दी मत खाइये, अदरक से त्रिकुष्‍टु महाराज तिक्‍त होते हैं! एक तो बड़की को जो रुप भेंटाया है. जरा नैन-नक्‍श होता तो जीवनानंद के जीवन की जाने कौन दुर्गति होती! कहीं ऐसा न हो तौफिक गुड़ लेकर आया हो और दरवाज़े आवाज़ लगाकर लौट गया हो? सब अपनी-अपनी में लगी हैं, बुढ़ि‍या की यहां किसको चिंता. हूं, उनको भी नहीं है, किसी की नहीं. कभी-कभी बच्‍चे भी दौड़े आते हैं तो बुढ़ि‍या हवा में हाथ फटकारती है, ‘दुर, दुर!’

मगर तौफिक आकर लौटेगा नहीं. जानता है वह इंतज़ार कर रही हैं. कलकत्‍ता से हाजी साहेब लौटे हों, और खाने के बाद बुढ़ि‍या की जीभ पर खजूर के गुड़ के तीन टुकड़े गिनकर चढ़े और गलें नहीं, यह आजतक तो नहीं ही हुआ है. हाजी साहेब की गाड़ी गांव लौटे इसका मतलब ही होता है बुढ़ि‍या के हिस्‍से दो भेली गुड़ आयें. अब उस पर जीवनानंद बो को जितना भी मुंह फुलाना हो, फुलायें, उसके मुंह के फेर में बुढ़ि‍या गुड़ से मुंह फेरने से तो रही. अलबत्‍ता कभी-कभी चाहती ज़रूर है कि खामख्‍वाह तनाव न तने, सबकुछ चुप्‍पे-चुप्‍पे निपट जाये, सांप भी मरे और लाठियो न टूटे! आखिर घर में अरवी के पत्‍ते की अच्‍छी तरकारी बड़की ही बनाती है, देवकी के पतोह का, या छोटकी के हाथ में वो स्‍वाद कहां? निमकी-टिमकी भी सोचो तो जीवनानंद बो कितना माहिर तैयार करती है, सोचकर बुढ़ि‍या एकदम-से भावुक हो गई. किसी तरह देह पर चार लोटा गिरा चुकने के बाद साड़ी का फेंटा बांधना क्‍या नई मुसीबत होगी उस तक़लीफ़ को भूली, पिछली मर्तबा कब था जो चंद्रमा की बहु खास तौर पर उन्‍हीं के लिए मिठाई बनवाकर भिजवाई थी, और उस मिठाई के रस कितना तो वह सुखाई थीं, कुछ उसी तरावट में था बुढ़ि‍या मीठे-मीठे तैर रही थी, जभी वह छोटी नामुराद घटना हुई, कि उल्‍टा धरे खाली कड़ुए के तेल की कटोरी पर एकदम-से पैर पड़ा और ‘हां, हां!’ करतीं देवकीनंदन की दूसरी स्‍त्री, सुचित्रा देवी, जन्‍म 1891, ग्राम-धुरनहा, बिछलतीं, संभलतीं, ईनार की फिसलन पर ढेर हुईं..

हिंदी में लिखना..

स्‍फूर्ति की सजीली, कंकड़ीली सड़क पर लहकते दौड़ते, बेपरवाह कि गहरे घाव लगेंगे, लेकिन हम घाव से खुद को न लगायेंगे, के दूसरे छोर फिर दिखता क्‍या है? भागने की बहकी बदहवासी में खोज लेने का अर्थसघन सुख मिलता है? गहरे तानों की देर-देर तक स्‍वरबंध बनते रहें का सुरबहार बुनता है? फर्र फर्र उड़े उड़ते हैं ढेरों काग़ज़, विचार-पुर्जियां, भीतर घिर्र घिर्र की कोई चकरी घूमती है अस्थिर, गुपचुप, अनवरत, असमंजस के लहरीले रेशमी परदे लहराते हैं, जमा होते ज़ि‍न्‍दगी के चीथड़ों की गिनती गिनवाते, भूलना नहीं लिखते हो हिन्‍दी में का पहाड़ा रटवाते, माथे एक ज़ाहिल गंवार मास्‍टर की हिंसा, कोई नुकीला डंडा बरसाते.

कोई लिखवैया होता अपनी मेज़ पर झुका आत्‍मा की आग में झुलसता, अपनी चौंध में चमकाये, बीहड़ अंतरंगता में खुद को पाये हुए, पाविच, पावेल, या कोई इब्‍ने संगीन, पूछता मैं हिन्‍दी के हाशिये की एक गुमनाम दस्‍तख़त, एक ज़रा-ज़रा सी की गुफ़्तगू का एक भोला सवाल मासूम, कि हुज़ूर, मेहरबानी कीजिए, जंगलगे ताले की कुंजी दीजिए, खुद को आग में चमकाने और ज़ि‍न्‍दगी के चीथड़ों से बचाने का अदबी राज़ क्‍या है, बड़ा बिगड़ा चावल चढ़ा है बटुली में, आप ही इसको सींझिये?

पिटे गदहे से गिरे चिनकते धोबी पर हंसता मित्र सन्‍नायेगा, अरे, अजब आदमी हो, मुंह में रसभरा गुजिया दबाये हिन्‍दी का हिलगा ब्‍लूज़ गा रहे हो? लिखना तकिये के नीचे धरी, एक वो क्‍या तो है जो कहते हैं की ज़रा इतनी सी, मोहब्‍बत की बागबानी है, उसे खमखौव्‍वा समूचा जीवन बता रहे हो? कौन निर्मल हो कहां के बरुमा कि ऐसा बचकाना, बेहूदा गा रहे हो?

घबराया अपने से चिढ़ा, कतराया मैं लिखने पर लौटूंगा, सुध में बेसुध कि हुलेबेक की ज़बान और तारांतिनो की तान में नहीं लिख रहा, न चिनुआ अचेबे की रातभर जलती अंग्रेजी हो रहा हूं, एक बेमतलब सिलसिले में जाने क्‍या है का कोई एक अपहचाना भूगोल बुन रहा हूं, या शायद पुरानी किसी न रिलीज़ होनेवाली फ़ि‍ल्‍म का गाना है, या अप-इन-द-एयर किसी मकड़जाल का हुलुलु फ़साना, कट रहा हूं, और फिर-फिर शब्‍द जोड़ रहा हूं, पीछे-पीछे, हाय, नये चीथड़े उधेड़ रहा हूं.