Friday, July 30, 2010

पहाड़े पहाड़े एक पॉडकास्‍ट..

कुछ मौके होते हैं, आदमी का चुप रहना बेहतर. जितना मैं हो सकता हूं, या नहीं हो पाता हूं, उतना चुप रहने की कोशिश करता भी हूं. मगर यह भी सही है कि बहुत सारा आदमीपन फिर भी कहीं छूटा रह ही जाता है. दो रात पहले उस एक गली में छूटता और डेढ़ दिन पहले फिर अपनी कोई एक बदजुबानी में.. ख़ैर, तो मुंह खुल ही जाता है (और फिर बेहया, बदजुबां खुला ही रहता है) और लरबोरियां अपने को गाने, सुनाने लगती ही हैं..

तो अच्‍छी चाय और अच्‍छे ऑर्गेनिक नमकीन की संगत में ऐसा ही कुछ गाये जा रहा हूं, पी. बी. जाने क्‍यों कैसा आनंद है वैसा ही कुछ बोलाये भी जा रही हैं.

कोई ग़लती और फूहड़ता हुई हो तो मैं और सिर्फ़ मैं ही उसका जिम्‍मेदार हुआ.

जो अच्‍छा है वह खास बबुनी प्रत्‍यक्षा और उनके नेक़ इरादों के लिए..

पठन-पाठन के थकेलों की तकलीफ़..

थक गया हूं. पस्‍ती की एक खास स्थिति में अंग के इधर और उधर, सब किधर पिराते रहने का जो एक दर्दभरा अहसास बनता है न, वैसा ही कुछ. और इस थकनन में मैं अकेले नहीं हूं. अब्‍बास, लल्‍ली, चतुरानन और रामकीरत भी खड़े हैं. इधर-उधर खड़े हैं, मगर खड़े हैं. थके हुए. गाल खुजाते हुए. सिर झुकाये. सिर्फ मुनिया ही है जो चुपाये रहती है, कोंचने पर भी कुछ कहने, कमिट करने से अपने को बचाती है. मगर उसकी चुप्‍पी की संगत में आधा घंटा बैठ जाइए, विदाऊट डाऊट देख लीजिएगा कि वह भी थकी हुई है. कोई बंबे वाला होता तो वैसे भी दू मिनट में बोल ही देता कि सब साले, थकेले हैं!

अब्‍बास को डेढ़ घंटा पहले फोन करके सवाल किये, का मियां, हिन्‍दी में अच्‍छा नवका क्‍या पढ़ रहे हो? अब्‍बास एक मिनट चुप रहने के बाद जवाब दिये नवका होगा, मगर अच्‍छा है कुछ? है तो हमको खबर नहीं है, आपको है तो बता दीजिए, हम पढ़ने लगें?

छोटका बाबू विष्‍णु से पूछे तो बोले अरे, कैसे नहीं हैं, ब्रह्मा हैं, उनको चंपानन पुरस्‍कार मिला है? महेशो हैं, उनको पहले ही मिल चुका है! अपराजेय आनंद है, आनंदविथी है, आदि अनादि, और भी जाने क्‍या-क्‍या. आनंद लेना सीखिए, लेते-लेते आनंद लेने की आपको तमीज आ जाएगी?

खुद से घबराये हमने रामकीरत को डांटकर कहा साले, जरा तुमसे उत्‍साहित होते नहीं बनता, विष्‍णु होते रहते हैं, जरा साहित्यिक अनुराग का ककहरा उधारी लेकर जीवन धन्‍य नहीं कर सकते?

बाथरुम में कहीं छुपाके रखे थे, वहां से बीड़ी सुलगाये लौटे और तब रामकीरत ने ठंडे मन जवाब दिया, भइय्या, बह्मा, बिस्‍नु, महेस का तेलबंदी का कहानी का हम बेकीरत आदमी कौ ची करेगा, कर सकेगा, आपै बताइये? हमरे मन में मीठे आंच की कौनो अगरबत्ती जलनी चाहिए, नहीं जलती हो तो जबरिया भजन गाने लगें? गायेंगे तो आप उसे मन की मोहब्‍बत में घुला अनुराग बुलाइएगा?

लल्‍ली बरसात का पानी में लेसराया साड़ी समेट रही थी, मने असमंजस था कि कड़ाही में चूड़ा भूज लें कि पाव भर पकौड़ी छान लें, उखड़े मन छनछनाई बोलीं, तुमलोक को सरम नहीं लगता कि इसके और उसके पीछे साहित्तिक अलता सजाते चलते हो? सोहर गाते हो तो अइसा जेमें दू आना के जलेबी जेतना भी मिठास नहीं है, और हमरे छिनके मन को अपने बभनई में उलझाते हो? हमरे बिस्‍वास को? हमरे मन के अंतरंग के अनुराग को?

लाल, पीला और ओकरे बाद चूल्‍हा से कड़ाही उतारकर सगरे नीला हुई अंगना में लल्‍ली लौटीं तो फिर वइसे ही फैले-फैले बमगोला दागे-दागे बोलीं, आदमी एगो किताब हाथे में लेके बिछौना में ढेमलाता है तो काहे खातिर, कि मन के गहिरे कवनो रागवन के सफरी में निकले, कि ना? कि छुच्‍छे सब्‍दसंग्रह और ज्ञानसंचय से सिरफुटव्‍वल खेलत फिरे जी?
भागो तूलोक हियां से, तूलोक का पीछे दू पैसा का पकौडियो बरबाद करे का जी नहीं है!

अब्‍बास को फोन पर मैंने दीदिया का किस्‍सा सुनाया, मियां बाबू, अपनी पुरानी आदत के मुताबिक तीन मिनिट चुपाये रहने के बाद बोले कौन नवका बात बोल रहे हैं, ई सब सुन-सुन के भी अब मन मुरचाइल हो गया है, और थकाइये मत!

कहने का मतलब जल्‍दी ही हम अपनी पुरनकी, पहचानी थकनवस्‍था में लौट आये. अब्‍बास, लल्‍ली, रामकीरत वहां पहले से लौटे हुए थे ही्. मुनिया का भेद अभी भी साफ होना बाकी था. मगर फिर, मुनिया हमेशा की नन-कमिटल रही..

Sunday, July 25, 2010

बाहर, ऑलमोस्‍ट..

बाहर निकल रहा हूं. नहीं, इसलिए नहीं कि कमरे में पानी इकट्ठा हो गया है. जो बाहर हुआ है उस पर ज़रा नज़र चली जाएगी की उम्‍मीद में. या अगर नहीं हुआ है तो उस पर. कहीं तो नज़र जाती रहेगी ही. बेचारी नज़रों का क्‍या है उड़-उड़कर कहां-कहां चली जाया करती है. उड़-उड़कर मैं नहीं जा पाता तो बीच-बीच में किसी तरह बस्‍ता बांधकर यहां और वहां पहुंच जाने की कोशिश करता हूं. कि शायद वहां से कहीं और आगे पहुंचना संभव हो सके. तीन कदम आगे. या तीन लाख वर्ष जैसा ही कुछ. उम्‍मीद करने में हर्ज क्‍या है. उम्‍मीद न करुं तो आपसे कभी मिलना न हो पाएगा. न आपका कभी भाषा के पार मुझे पहचान पाने की कोई सहूलियत, सूरत बनेगी.

वैसे सूरत हम बनाना कब चाहते हैं. सूरत बनाने की सोचते में हाथ कांपते हैं. हाथ कांपना ठहर जाने के बाद भी देर तक मन का कांपना बना रहता है. वैसे में हम चाहने लगते हैं अच्‍छा हो कोई सूरत न ही बने. जैसा, जो भी अपना सा रूप लिए हम अपने से में बने रहें.

अपने से में हम बने ही रहते हैं. उसी बने रहते में फिर बाहर भी निकल आते हैं. कम से कम मैं तो निकल ही आ रहा हूं. तीन लाख वर्ष आगे शायद न पहुंच पाऊं, तीन कदम ही आगे निकल चलूं. आप शायद दिल्‍ली में दीखें, मुस्‍करायें और जीवन- ज़रा सा, ज़रा सा और कम बुरा बन सके? या बेहतर? दिल्‍ली आपको सुहाती न हो तो हम कहीं और बाहर मिल लेंगे, मैं पहाड़ पर बारिशों में घिरा कहूंगा हूं यहीं कहीं, आप जोर-जोर से कहियेगा कहां कहां? फिर हम हंसने लगेंगे. हंसी न आये तो भी उसकी एक कोशिश कर लेंगे. यकीन मानिए ऐसी बुरी बात न होगी. यूं भी एक कोशिश कर लेने में कोई हर्ज नहीं. बीच-बीच में बाहर निकल ही जाना चाहिए. बाहर बारिश होती हो तैसे में भी. नहीं, आप हमारे साथ इत्तफाक़ नहीं रखते? (इत्तेफाक़ में नुक्‍ता लगाने के हद तक भी नहीं?) निकलना अच्‍छा ख़याल नहीं? लेकिन मैं तो ऑलमोस्‍ट पैर बाहर रख चुका हूं, दोस्‍त? फिर मोड़ लूं, ज़रा सी उम्‍मीद बांधे हूं उस पर फिर पानी गिर जाने दूं?

आप ज़रा सा अच्‍छा नहीं सोच सकते? अपने खातिर न सही, मेरे ही लिए? बार-बार बस्‍ता बांधना आपको हंसी-खेल लगता है? जबकि बाहर बरसात हो रही हो? जबकि मैं बाहर बरसात में खड़ा होऊं? हंसते हुए बेहयायी से, बेमतलब, चीख़ता फिर रहा होऊं कि देखो, निकल रहा हूं?

Thursday, July 22, 2010

छोटे लाल

खिड़कियों के शीशों पर छोटी बूंदें बजती रहती है सारी रात. जैसे जेब में ज़रा सा पैसा बजता है. जैसे मेरे ज़रा से शब्‍द. ताव खाते रहते हैं. शब्‍दों से दूर खड़ा मैं कभी देख पाता हूं कि बज रहा हूं. अपने लघुकायपने में सारंगी जैसा सिरजने की कोशिश सा करता कुछ. सन्‍नाटे में छोटी आवाज़ें घन्-घन् घूमती कोई पुकार बुनती रहती हैं.

देर तक रोता रहा बच्‍चा कभी चौंककर कान लगाये सुनता है.

कि यह क्‍या है जिसका बजना मेरे विलाप से भी ज़्यादा भीषणतर बनता चलता.

छोटी बातें हैं. ज़रा ज़रा सी की. जैसे एक चूहे का बड़े कमरे में चले आना. छोटी गिलहरी का पीपल की नोंक पर पहुंच जाना. छोटों की बड़ी बातें. छोटी बड़ी बातें.

रॉकेट सिंह: सेल्‍समैन ऑफ़ द ईयर’ में छोटेलाल मिश्रा का फैल जाना. बड़े पुरी का और छोटे होते हुए जाना. शिमित अमीन की स्क्रिप्‍ट की छोटी ग़लतियों का फ़ि‍ल्‍म की बड़ी विफलता में बदल जाना.

मिस्‍टर एंड मिसेस 55’ के आखिर में नायिका का एयरपोर्ट पहुंचना छोटी ही बात होती है. मगर उसके मतलब बड़े बन जाते हैं. जैसे ‘गाइड’ के आखिर में मरते राजू के पास रोज़ी का लौट आना.

जैसे आपकी ज़रा सी हंसी. और मेरा चुप बने रहना.

या मेरे चुप बने रहने पर आपका हंसने लगना.

छोटी ही बातें हैं. जैसे आलोक राय की छोटी किताब. शम्‍सुर्रहमान फ़ारुकी की. पतली. मगर कितनी सारी हंसी है जिसमें. या चुप्‍पी. बीच फांक कटे समूचे आधे-आधे गांव.

(एक और किताब हुई. प्रैस से नई और ताज़ा-ताज़ा आई. बाबू विजय शर्मा की. 'दिमाग़ में घोंसले' छोटी ही है. मगर घोंसले बड़े हैं.)

बड़े भूगोल का वह भी कैसा छोटा इतिहास बना रहा. द ग्रेट आर्क. राष्‍ट्रीय विरासत की महत्‍वपूर्ण थाती हो सकता था, नहीं हो सका. महाराष्‍ट्र के छोटे हिंगनघाट में विलियम लैंब्‍टन की एक छोटी सी समाधी है, बड़ा राष्‍ट्र एक बड़े नायक को बिसराये छोटा बना रहा.

मैं भी सोचता एक छोटा अर्थभरा वाक्‍य लिखूं. मगर फिर उस छोटे से जूझते में दिखता अपनी बेचैनियों में भी हम बड़े छोटे ही रहते रहे.

Monday, July 19, 2010

न खत्‍म होने वाली बारिश की उस रात..

माधव मत आना उस रात, तीन पाये और चार ईंटों पर टिके तखत की इस दुनिया का सब सन्‍तुलन तोड़ जाओगे, मैं आईने के सामने खड़ा सी‍टी बजाने से फिर कतराता फिरुंगा, वैसे भी उस रात न खत्‍म होने वाली बारिश बरसती होगी, छत के टपरे से ज़्यादा दिलों पर बजती, किसी और घर रात काट लेना, माधव, यहां मत आना. मेरी हर बात पर हंसने लगते हो, ईश्‍वर के लिए उस रात बख्‍शना. उन लड़कियों के नाम जो तुमसे जाने कैसे दु:ख पाती रहीं, दु:खकातर छूटी फिर ताउम्र मुंह चुराती रहीं, छत के मुंडेर के वे मोर जिनका जीना तुम हराम किये रहे, बच्‍चों का ग्राइप वॉटर चुराते, पूजाघर के मिश्री के ढेलों से अपनी गिनती सजाते उन सब के नाम मत आना माधव, उस रात मत आना. इस उम्र में आकर अब कुछ चीज़ें हैं जिसका सामना करने से डरता हूं, ख़ास तौर पर जब पूरी रात बरसात बरसती रहे.

माधव मत आना उस रात, फुसफुसाकर मंत्र सा मैं पढ़ता हूंगा दीवारों पर, अचार के सूने बयाम मुस्‍कराते होंगे, टूटे बकल का बेल्‍ट नम हवा में कांपकर फुफकारता, और तुम लापरवाही से दरवाज़े के भीतर पैर धरोगे, घुटने तक गीली पतलून गंदगी में औंचाये, हाथ पटकते बे-लजाये, जैसे उम्र के इतने वर्ष बीते का कोई ख़याल ही नहीं, कि जैसे ज़िंदगी तो शुरु हुई अभी एकदम अभी, कि हकबकाया मैं गुस्‍से से ज़्यादा शर्म में नहाया लरज़ता फिरुंगा कि तुम्‍हें मना किया था, मगर माने नहीं तुम, कि मैं कोई मज़ाक का कैलेंडर नहीं जिसे तुम जब कभी झांकने चले आओ, कांख से छेड़ने आंख से झाड़ने की निरर्थक कहानियां बनाओ. हां, निरर्थक.

माधव मत आना उस रात मैंने कहा था तो कोई मतलब रहा होगा. रिक्‍शे पर कपड़ों के नीचे छिपी किसी पैर की उंगलियां दिखी होंगी, किसी ने एक नाम कहा होगा या ग़लती से हमने खुदी को किसी ख़ास नज़र देख लिया होगा, कुछ बात रही होगी माधव, कोई छुटा तागों में उलझा तिनका और वह सनसनाती रात, कि बरसने की आवाज़ों से मैं एकबारगी चौंक गया हूंगा, कि अचानक पानी के चमकते तीरों में एक पगडंडी खुल गई होगी, मुसलाधार में चीखा किसी का सुन पड़ा होगा, जबकि हक़ीक़त में सिर्फ़ बरतन कोई फ़र्श पर गिरा होगा, लेकिन मैं दहल गया हूंगा, ख़यालों की सब सिटकिनियां चढ़ा ली होंगी. और इस तरह ख़यालों के तहखाने में और गहरे गिरा हूंगा.

माधव मत आना उस रात कहता-कहता मैं थक गया हूं माधव. तुम्‍हें मालूम है तीन जोड़ी मोज़े और चार कमीज़ों को तहाकर सहेजने की मुझे फुरसत नहीं, विटामिन और तकिये के नीचे कहां धरा था क्रॉसिन की गोलियां बटोरने की तो हर्गिज नहीं, मैंने कितने वक़्त से तुम्‍हें चिट्ठी लिखी नहीं और राज्‍य परिवहन निगम की बस की खिड़की से बाहर क्‍या नज़ारा दिखता है उसकी तो सपने में भी याद नहीं. तुम समझ सकते हो माधव मैं कितना संभलकर चलता हूं, पैर दुबारा किसी हाल ग़लत न पड़ें की संजीदगी में सिर से पैर तक बस इतने में ही यकीं रखता हूं, तुम आकर फिर मुझे सपना दिखाओ, बताओ जीवन कैसा अनोखा है और हम मन की नाव और मोहब्‍बतों के गांव पर बैठे इस घनेरे से बाहर के अजाने अंधेरों में कूद पड़ें, ओफ़्फ़, माधव इन ज़रा सी रुपल्‍ली के चप्‍पलों को चटकारते, मेरा दिया चाय उतारते ऐसे ख़याल कहां से आते हैं तुम्‍हारे भेजे, इक ज़रा सी शर्म नहीं आती?

माधव मत आना उस रात क्‍योंकि न खत्‍म होनेवाली बारिश से अलग वह कोई और रात भी होगी तो भी मैं इसी तरह डरा अपने कोने मिलूंगा, बेमतलब घुटने की थपकियां बजाता, पड़ोसी के कोई सस्‍ता चुटकुला सुनाता. मैं नहीं चाहता कि तुम फिर बताओ हम क्‍यों भागे थे घर से या बस की छत पर उस आवारा रात एक कुंजरिन की मोहब्‍बत में हम क्‍यों पिटे चार शोहदों से, और कुंजरिन का गरबीला चेहरा देखकर पिटे भी खुश रहे थे. तीन-तीन दिनों तक भूखे रहकर हम बेहयायी से हंसते और कड़कड़ाती ठंड में सिर्फ़ सपनों की आंच पर तपते रहते. तुम्‍हें याद है माधव केया घोषाल भाग जाना चाहती थी तुम्‍हारे साथ मगर तुम थे जो नंबरी पक्‍कमख़ां, हाथ जोड़कर केया से माफ़ी मांग ली थी कि क्‍यों अपना बेड़ा गर्क करना चाहती हो लड़की, टूटी नाव के हम किसी और सफर पर निकल रहे. ओह, पागल माधव भाभी के गहने चुराकर मैं आया था तुम्‍हारे पास याद है? मैं कुछ भी याद नहीं करना चाहता माधव, यह भी नहीं कि मैं हर समय क्‍यों तुम्‍हें इतना याद करता हूं.

माधव मत आना उस रात, तीन पाये और चार ईंटों पर टिके तखत की इस दुनिया का सब सन्‍तुलन टूट जायेगा, मैं आईने के सामने खड़ा सी‍टी बजाते हुए कैसा मूर्ख लगूंगा मैं नहीं देखना चाहता. वैसे भी उस रात न खत्‍म होने वाली बारिश बरसती होगी, छत के टपरे से ज़्यादा हमारे दिलों को बजाती. और तुम्‍हारे चेहरे पर हमेशा की सजी वह कमसिन हंसी और महकती हरकतों में बिजलियां लपकतीं, मैं कातर होकर फिर बहकने लगूंगा, बारिश के नगाड़ों पर हम फिर सारी सारी रात सपना बुनते, मैं खुद को निश्‍छलता से हंसता देख चौंकता फिरुंगा, सब गड़बड़ा भरभरा जायेगा माधव, हमारी ज़हीन इतनी संगीन दोस्‍ती के नाम पर ही मत आना माधव, क्‍योंकि तुम भी जानते हो मैं सिटकिनी चढ़ाये पूरी रात दरवाज़े से देह सटाये तुम्‍हारे कदमों की राह तकूंगा. इसीलिए मत आना. उस रात किसी भी रात दोस्‍त.

Saturday, July 17, 2010

कितने जुग में रोमकथा..

विकास कहता है ’रोम वाज़ नौट बिल्ट इन अ डे’. एक दिन तो दूर यहाँ एक साल में भी अपनी रौमहर्षककथा बिल्ड हो रही है इसमें भयानक संदेह है. कितने दिन में होगी? क्योंकि होनी तो है. और कोई सुर्जप्रकाश सूरज की रोशनी की तरफ़ उंगली पकड़ के लिये तो जा नहीं रहा. सत्रह दिशाओं में मन भागता है, अहा कैसी तो हर्षीली बयार बहती है, मगर सत्रह की जगह सात काम तो कुछ वाज़िब तरीके से होते चलें? ढाई ही सही, आं? व्यासजी ने कितने दिन में महाभारत निपटा लिया था? हमको अपना यह सकारथ निपटाने में फिर इतना समय क्यों लग रहा है? जबकि मैं किसी की गांठ से बंधा हूँ और ना ही मेरा कंप्यूटर मेरे कंधे पर गिरा पड़ा है. यह अपनी स्वर्णकथा हो क्यूँ नहीं रही है? आप सब तो चिरकुट हैं ही, इस लाघव को सोचने कहने में क्या संकोच? मगर मैं क्यों इस तरह से चिरकुट हुआ जाता हूँ? कि सन्नास्थिति में खुद को तकता सन्न पड़ा रहूँ, कि स्वर्णकथा कह सकने का काम फिर मुल्तवी पड़ा रहे?

सुर्ज का प्रताप बरगद के नीचे मेरे पीढ़ा पर आकर कब बैठेंगे? बैठेंगे प्रभु? या मेरा रोम रोम कुंठित करने वाला यह रोम जाने कितने दिनों में बिल्ड होगा.

तारे कितने सारे तारे..

लिख रहा हूं. कि अभी लिखूंगा. या पहले का कुछ छुटा रहा होगा, जिसकी छिटकन सहोरने कीबोर्ड तक फिर खिंचा आया? मगर अटकी हुई बारिश के बीच के सूखे की वह ज़रा सी बात जैसी बात दरअसल थी क्‍या? यूकिलिप्‍टस के नंगे पेड़ पर गीले पंख झाड़ता किसी कौवे का चित्र था, कि नयी बनती इमारत के बाहर बांस के खांचों में किसी मजूर के छुटे गमछे का ख़याल?

किताबों के नाम थे, या मन के भीतर दबे पहचाने चेहरे गुमनाम? सोचता हूं, और फिर बिनसोचे लिखे जाता हूं.

तुम्‍हें याद है, प्रियवर चेतनकुमार? नहीं, चेतनकुमार फ़ि‍लहाल चश्‍मे के पीछे आंखें मुंदे खुद को भूले हुए. याद करना तकलीफ़ बढ़ाना है. मगर तब नहीं याद करना नहीं याद करने की तकलीफ़ बढ़ाना नहीं?

बाबा भूपिंदर बोल गए रहे ‘मेरी आवाज़ ही पहचान है’. जिस तरह की थी पहचानी होती ही. मगर जिनके टेलीविज़न पर आवाज़ नहीं, हमारी वाली पॉडकास्‍टों की शान नहीं, वे न पहचाने जायेंगे? भूपिंदर जी जो आप बोल गए रहे वह न्‍यायसंगत रहा? आपने दूसरी तरफ़ एक बोल दिया था ‘रैना बीती जाये..’ बीतती होगी आपकी सुश्री एम की संगत में, हमारे दर कहां बीतती है? अभी तक नहीं बीती. जितने वर्षों भी पहले जो आपने किया रहा, ये जेनराइलेज़ंश आपके सही नहीं ठहरे.

क्‍या तो वो ‘किनारा’ का गाना था, ‘एक ही ख़्वाब देखा है मैंने’? अच्‍छी सी आवाज़ पर बेमतलब से धरम प्रा और हेमा अम्‍मा चहकते से डोलते रहे, आपको अच्‍छा लगा था भूपिंदर साहब? यही ‘रुत जवां, रुत जवां’ के हसीन ख़्वाब ठहरे?

मैं ‘आख़ि‍री ख़त’ की तो नहीं ही सोचना चाहता. इतने अंतराल पर इंद्राणी मुखर्जी और राजेश खन्‍नायी रोमान के ख़याल अब सिर्फ़ वहशतनाक़ ही हो सकते हैं. ऐसे ख़याल इस नीम सुबह की महीन रौशनी भूपिंदर की आवाज़ के सहारे भी नहीं बचाई जा सकती. मगर मैं कुछ और, किन्‍हीं और ख़यालों की लिख रहा था, क्‍या लिख रहा था? रात की चौथी चाय पीते हुए मैं क्‍या सोच रहा हूं?

भूपिंदर साहब ने अब तक चाय पी ली होगी? सुबह की पहली? मैंने बिना चैताली के चार कप चला लिये हैं तो मिताली ने अब तक एक कप भी न सजाया होगा?

मगर यह सुबह-सुबह भूपिंदर की सोचने का क्‍या तुक है? और न सही, तारों की ही सोचता. सारी रात छुपे रहे, शरीर सुभो ही नज़र आते? लेकिन जैसे रात को नींद नज़र नहीं आती, सुबह बेहया तारे शरमाये फिरे-फिरे रहते हैं. मैं चाहकर भी चेहरे पर वो मुहावरा नहीं चिपका सकता, वही, ‘आंखों के आगे तारे नाचने लगे’. क्‍योंकि मेरे नहीं नाच रहे. ज़्यादा मैं ही नाचता रहता हूं. जबकि नौ मन क्‍या, नौ छंटाक तेल भी नहीं होता. और मैं राधाकुमार तो नहीं ही होता!

तो ये चक्‍कर क्‍या है जो मैं लिख रहा हूं? कि सिर्फ़ चक्‍कर ही है, और जो लिखना है वो अभी आगे लिखा जाना है?

वेरी फ़नी. मीनिंग नॉट फ़नी एट ऑल.

मगर ये सुबह तारे जाते कहां हैं? रीयली, कुछ मेरे आंखों के आगे नाचने के बाद फिर नहीं जा सकते थे?

ओ जानेवाले हो सके तो लौट के आना..’ लेकिन अब ये अचानक मुकेश को क्‍यों बुलाने लगता हूं? भूपिंदर साहब को ये किसी तरह से अच्‍छा लगता होगा? मनुष्‍यमन में यह सतत का विस्‍थापन क्‍यों है? जबकि परम्‍परा हमेशा समर्पण की रही है. जबकि भूपिंदर ने ‘छोड़ दो आंचल ज़माना क्‍या कहेगा’ गाया भी नहीं है.

मैं क्‍या कह रहा हूं. ‘तारे ओ कितने सारे तारे..’ वो कौन सा गाना था, जिसपर तारे नहीं बच्‍चे ठुमकियां लगाया करते थे?

Friday, July 16, 2010

इंटरनेट के तार पर स्‍वगत सार्वजनिक साहित्यिक चिंता..

लिख चुके के बाद का हिन्‍दी का लेखक फिर अपने लिखे के पाठक खोजेगा. बाबू, ज़रा पढ़ लीजिए? महाराज, कृपा कीजिएगा? क्‍योंकि अख़बार के तो जो सरकार हुए उनका क्‍या ही कहें, उन सजीले, रंगीले मंचों पर विचारों के जो गहरे, गर्वीले तीर छूटते हैं मालूम नहीं उन्‍हें कितना तीर समझा जाये. विचार तो क्‍या ही समझा जाये. समझा जाये? उससे अलग फिर पत्रिकाएं हैं (हैं? कहां हैं?) कभी त्रैमासिक का शरदांक तो कभी एक घबराया, जल्‍दी में तैयार किया विशेषांक निकल जाता है. जिनकी कुछ उस अंक में सामग्री प्रकाशित हुई होती है वो शंख बजाकर कूदने लगते हैं कि हिन्‍दी साहित्‍य कुम्‍हलायी, लजायी किस जिस भी दिशा में जो पड़ी थी, अब कैसी भागती किस दिशा को मुड़ी जा रही है. उनकी मोड़ों पर कहीं कोई कैंची चलाता, सवालों में हकलाता दीख जाता है तो नवांकुर रणबांकुर भाई लोग हतप्रभ अपनी दिशा कितना तो अच्‍छा दौड़ते हुए अच्‍छा-अच्‍छा लग रही थी का प्रमाणपत्र गिड़गिड़ाने की ज़ि‍द तक गालियां देते हुए मांगने लगते हैं.

किसी दूसरे भाई की सूचना आती है कि जिस विशेषांक से आप सारे प्रमाणांक माप रहे हैं, उसके बाजू में साहित्‍य के किन्‍हीं अन्‍य ज्ञान ने एक अलग मार्कशीट तैयार की है, उस पर के बुखार के ताप को मापा? तो बुखार में सुलगता एक रणअंकुर अकबकाया सवाल करता है अरे, सारी लड़ाई हम इस मंच पर घेरे हुए हैं तो किनने किस अज्ञान में कहीं एक दूसरा संधान कैसे खोल लिया?..

कहने का मतलब पचास करोड़ की भाषाई आबादी होगी, पचास पैसे का मैटर करने वाला इस भाषा का कोई वैचारिक मंच नहीं है जिसका लोगों के साहित्यिक-सुधी मन में कोई वास्‍तविक, मार्मिक आदर हो, जिसकी ओर नज़र फेर लोग इस भाषा में विचारगान या मन-मर्म की उड़ान कहां जा रही है की कोई थाह पा सकें. थाह लोग गुटपंथ के पंकों की पाते रहते हैं. किनने किसको कहां लगवा दिया, छपवा दिया. या लात लगाके बहिरवा दिया. ऐसी स्थिति में पहुंचवा दिये, गुरु, कि आगे से ज़बान नहीं खुलेगी टाइप. बिना नामवर के नाम का एक्‍को काम न होवे टाइप. अच्‍छी महीन भाषा का बिसनाथ बाबू गद्य लिखेंगे तब भी पाछे पाछे याद करते रहना ज़रुरी लगेगा कि नामवर के पीछे पीछे हमने भी कामभर तैराकी सीखी. फिर यहां और वहां हजारी बाबू को याद किये रहे. इस याद करते रहने की अगरबत्‍ती जलाये रहने में ही साहित्यिक की प्रतिष्‍ठा है. ऐसी प्रतिष्‍ठाओं वाले, ओह, कैसी तो मार्मिक भाषा और समाज हमारा ठहरा के साहित्‍य की ही फिर निष्‍ठा है.

इससे बाहर मालूम नहीं फिर कहां साहित्‍य विचार भरमार की जगह है, है?

आप लिख लो बत्‍तीस बंद, सवा सौ गांठ सुलझाये चलो, गुरुवर माथे पर हाथ न धरेंगे जब तक, सामाजिकता के पुण्‍य का चरणामृत पाओगे तब तक? ज़्यादा संभावना है नहीं पाओगे, क्‍योंकि गुरुवर के हाथ के नीचे से बाहर के संकीर्ण करीन-कैटरीन भदेस संसारविहार में साहित्‍य की कोई मति, गति ठहरी?

लिख चुके के बाद के हे हिन्‍दी लेखक, अपने लिखे को धोती की गांठ में बांधे, जी-मेल में गांठे, फिर पाठकीय मोहब्‍बत की खोज में किधर, कहां जाओगे? डेस्‍क पर उंगलियां बजाते, बेवज़ह दांत दिखाये कैसे, किस-किस तरह मुरझाओगे?

Thursday, July 15, 2010

रवानी में

रवानी में बसे-धंसे बाबू बहे चलो

मगर यह लरबोर बुझायेगा साथी, सुझायेगा?

नीले आसमान के नीचे तिरी दुनिया
ढीठ समय के सात सुर, हाथ आयेंगे?

गोड़ की डोरी और ख़यालों की लोरी
गुड़ुप, पानी में सर डुबाये
कलेजे में तीली जलाये
भाषा की धधकती चिमनियों के पार
कहीं पहुंचाएंगे?

जाएंगे जाएंगे बाबू, आंख खुली रखो
लरबोरी के पार सुर-सुधा बनायेंगे.

Wednesday, July 7, 2010

ज़ुरू ज़ुरू हो हो हो, हो हो, ज़ुरू..

कभी सोचकर ताज्‍जुब होता है कि अनोखे प्रतिभापुष्‍प पंखुरित होकर अंतत: फिर कहां हेरा जाते हैं. जैसे इसी (फिर, अनोखे, ही) रेकॉर्डिंग को ही लीजिए, सन्र् सत्तर का वो सुहाना समय, अमिताभ की हवा ने अभी हिन्‍दी सिनेसंसार का चेहरा काला नहीं किया था, शंकर जयकिशन वाली सेंसुअस पोंपॉसिटी बची और बनी हुई थी. और आपमें से बहुत भले पैदा न हुए हों, मैं न केवल पैदा होकर पैर मारने लगा था, ज़बान भी मेरी ठीक-ठाक उड़ने लगी थी (किन-किन दिशाओं में उड़ रही थी, उसके बारे में फिर कभी), और यह अपर्णा सेन का सहज सौभाग्‍य ही रहा होगा जो मुझसे दस वर्षीय पुष्‍पांक के अफ़ेयर्स-फेर में पड़ी, और आसपास की दुनिया भुलाये, वहीं पड़ी रहीं. और उससे ज़्यादा सौभाग्‍य बाबू जयकिशन का, कि मुझे अपर्णा की गोद में उसकी साड़ी से मुंह ढांपे (देवानंद की अदाओं से बेतरह अलग) गुनगुनाते सुन लिया और वहीं ज़ि‍द करने लगे कि इस अनोखी आवाज़ को मैं अपनी अनोखी फ़ि‍ल्‍म के टाइटल ट्रैक में यूज़ किये बिना रहूंगा नहीं. अपर्णा दुलार से समझाती रही, मगर मैं कहां जयकिशन के जाल में फंस रहा था? वो तो ज़ि‍या मोइउद्दीन के उर्दू जिरह की मिठास का नशा रहा होगा जिसमें उलझकर रेकॉर्डिंग स्‍टूडियो पहुंच गया और भारतीय टाइटल संगीत को एक नयी दिशा मिल गई, मगर फिर, सवाल उठता ही है कि अनोखे प्रतिभापुष्‍प पंखुरित होकर फिर कहां हेरा जाते हैं? शायद यही चिंता होगी कि आप रेकॉर्डिंग के आखिर में देखेंगे, देख तो दिल की जां से उठता है की तर्ज़ पर मेरे भी आह (उतनी सुरीली नहीं मगर वह अलग बात है) उठ रही है..

Tuesday, July 6, 2010

रात की लोरी

रोज़ इस वक़्त तक नंदन नीलमणि झा रात का खाना निपटा चुकते. घनश्‍याम होटल का सस्‍ता खाना. उसके बाद धीमे-धीमे पौन किलोमीटर की टहल करके खाना पचाते हुए डेरा लौटते. कभी मन में आलस जोर मारता तो टहलना टाल जाते. दोनों हाथों में सर टिकाये, तकिये के सहारे खटिये पर चित लेटे, ट्रांजिस्‍टर से विविध भारती का आनंद लेते. कभी मूड बनता तो गवैये का बोल दोहराते हुए मिलान करते रहते कि सुर में चल रहे हैं या यहां-वहां गड़बड़ हो रही है. इसी दरमियान स्‍टोव जलाकर दूध गरमा लेते, साइकिल को बाहर से लाकर भीतर आंगन में रखते. और फिर आंगन में कटहल और अमरुद के धीमे-धीमे कभी डोल जाते पत्‍तों को निहारते गिलास का दूध खतम करते.

कमोबेश रोज़ का यही नियम था और नंदन को शिकायत नहीं थी. मगर आज मन चिनक गया. काम से लौटकर घनश्‍याम होटल खाने नहीं गए. रास्‍ते में पान की गुमटी पर खड़े दिवाकर चौबे ने पीछे से आवाज़ किया तो अनसुना किये साइकिल आगे बढ़ा लिये थे.

नंदन का मन खराब है. मन खराब है से ज्‍यादा पत्‍नी पर गुस्‍सा आ रहा है. घर का जनाना सम्‍भलते नहीं संभल रहा है तो बाहर का अपराध-जगत क्‍या संभलाएगा. जो देखता है सुनता है नंदन नीलमणि झा की हंसी करता है. या नंदन नीलमणि कमसे कम ऐसा ही समझते हैं. सब उस औरत की लीला है!

गलती किये जो शादी किये. ढाई साल की शादी में ढाई महीनो साथ नहीं रही, क्‍या फायदा ऐसी शादी का? कहती है यहां का पानी नहीं पोसाता. साग-तरकारी का स्‍वाद कैसा तो लगता है! दिन-रात पुलिस का कपड़ावालों के बीच मन डेराता रहता है! अरे? फेरा लेते समय तब अकिल चलाते नहीं बना कि पुलिस की वर्दी वाले के घर में जाके रहना होगा? वही मिले थे उल्‍लू बनाये बास्‍ते?

संग नहीं रहने का सब एक से एक बहाना. असल बात है नंदन सीधे आदमी हैं उसी का औरत फायदा उठा रही है. थाना में थाना के लोग उठाते हैं और घर में..

जरा मोह-माया नहीं, ममता नहीं. पता नहीं कैसी औरत है व्‍याह करके नैहर में बसी हुई है. नंदन जब बूढ़े हो जायेंगे तब उनके साथ रहने आएगी? ऐसा कहीं कोई करता है? कभी-कभी तो नंदन कोशिश करते हैं तो याद भी नहीं पड़ता कि चेहरा था कैसा. माने हल्‍के से रुपरेखा का बोध होता है. जोर मारते हैं तो कभी सोये में पिंडली दिखी थी, या उघारे पीठ, आंख और नाक और होंठ, मगर पूरी तस्‍वीर मन में नहीं बन पाती.

कुछ देर तक दायें-बायें करवट कर-करके दु:खी होने के नाटक से मन उकता गया तो नंदन सुबह के लिए भिगाये बूट की तरकारी बनाने की कसरत में जुटे. एक के बाद एक तीन प्‍याज काटे, सरसों के तेल में जीरा का छौंक दिये और उसमें सारा चना उलेड़कर छनौटा चलाते रहे. खूब सारा मसाला डालकर तरकारी बनायेंगे और थाली भर भात के दाबकर भूख का हिसाब सेट कर लेंगे. मगर दस मिनट तक छौंक और मसाले में छनौटा चलाते रहने के बाद दिखा कि तरकारी कहीं नहीं जा रही. भात के साथ जीभ के नीचे तो नहीं ही उतरेगी. घनश्‍याम होटल खाने क्‍यों नहीं गए का गुस्‍सा मन में कुनमुनाते तरकारी उतारकर स्‍टोव पर दूध का टूटा भगौना चढ़ा दिये. चमरख गमछी उठाकर हाथ पोंछ रहे थे तो गंजी के तीनों छेद पर नजर गई. उसके दीखते ही जीवन के दूसरे छेदों का भी तेजी से स्‍मरण होने लगा. सोचकर पारा ऊपर चढ़ने लगा कि कि पुलिस की नौकरी में यहां पैंट का टूटा बटन लगा रहे हैं और वो बदकार नैहर में मजा कर रही है!

और भाभी और मौसी मेरी मदद में खड़ा होने की जगह उसका साथ देती हैं कि अभी बच्‍ची है, उसे अपनी पुलिस की मारपीट से दूर रखो!

अरे, ऐसे ही दूर रहना था तो पास क्‍यों आई पहले? कोई तरीका है? अभी सामने होती तो वो खींचके लप्‍पड़ लगाते कि सारा बच्‍चीपना एक्‍के मर्तबे निकल जाता!

मन में भाव की तीव्रता रही होगी, घूमे हाथ की चोट में स्‍टोव पर धरा दूध का भगौना हवा में लहराता नीचे आ गिरा. हेड कांस्‍टेबल नंदन नीलमणि झा ज़मीन पर गिरे दूध को एकटक देख रहे थे और उन्‍हें विश्‍वास नहीं हो रहा था कि उसे गिराने का काम उन्‍हीं के हाथों संपन्‍न हुआ है.

Friday, July 2, 2010

आता कहां से है, या जाता?

वो आएगा तुम देखना उससे आगे उसकी पीठ का दर्द होगा. कमर, कंधे, पसलियों के दर्द अलग से आएंगे.

तुम पूछना मत कुछ करते नहीं फिर कहां से दर्द की ऐसी संगत-सवारी लिए चलते हो. वो खुद ही चौंककर जाने किसको बताता दीखेगा यह पैर वाला नया है, जबकि ऐसी लम्बी तो मैं कहीं गया भी नहीं.

तुम पूछना, फिर?

वो घबराया ख़यालों के पैर पटकता झींकेगा, क्या मालूम कैसे बताऊं. कहीं गया जैसा अपनी आंख तो देखा नहीं, शायद सपने में गया होऊं. हरे पानी में लहरीले सांप के तैरते देखे का असर हो. धीरे-धीरे पकड़ता पुराना कोई ज़हर हो? खड़खड़गाड़ी पे बोराबंद जिबह जानवरों का कच्ची पगडंडी टप्-टप् रिसता ख़ून, या गुफा गुज़रती रात की रेल मां की गोद से भागे बच्चों का सोये सपनों में बिसुरना हो, शायद? सब होगा, मेरे सच के देखे का कुछ न होगा, ऐसा?

ऑलिवर सैक्स की किताब होगी ‘एन एंथ्रोपोलॉजिस्ट ऑन मार्स’, फुसफुसाकर कहेगी मैं बताऊं कहां से आता है दर्द? मारिया कोर्ती की ‘ओतरांतो’ बीचकटी फड़फड़ायी बतायेगी मैं बताती हूं, मुझसे सुनो. दामोदर दास हाथ की घड़ी हवा में भरते दु:खी होंगे ये माजरा क्या है, हजारी के हज़ार क़ि‍स्से सरियायेंगे, फरियायेंगे कभी? मुंह में दशहरी दाबे चैन से गांव मैं लौटूंगा या नहीं?

कोने कहीं गिलहरी चुपके भारी माथा अपना बाहर ठेले बुदबुदायेगी, दर्द-दर्द के इतने दीवाने बनते हो, कभी मेरा गाना सुनने की फ़ुरसत बनती है? मैं जो सगरे दिन भागी भागी फिरती हूं, ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर अपनी बेहया जिजीविषा में इतना भारी यह माथा पटकती हूं.

गिलहरी की अनसुना किये वो सिर थामे ढहा दीखेगा, कि इस वक़्त तुम जाओ यहां से दामोदर दास, मैं वो नहीं हूं तुम जिस किताब की खोज में आये हो. तुम पूछना फिर तुम सपनों की कह रहे थे?

हां, वो फिर संभलकर बैठेगा. आजू-बाजू सब दर्द, बैठेंगे. पीली दीवारों का घिसा पुराना कोई आहाता दिखता है. ईंट-गिट्टी लिए बच्चे कुछ अपना खेल सजाते. मुंह उठाये गाय कोई अपने बछड़े को आवाज़ देकर बुलाती. गली में दरवाज़े के बाहर धरा कोई कोयले का चूल्हा , सांझ की छत पर बेल की तरह चढ़ता धुआं दीखता. पीली साड़ी में एक औरत झरोखा झांककर पूछे, को हैं? केकरा खोजे आए हैं? हारे मन उतरती रात छाती धंसी मुंह का आंचल दांत दबाये बिना बोले बिना सुने कहे देखो, यही अरमान साजकर आये थे, और हाय, दरवाजा के बाहिर ठाड़ा रुके हैं अभी तलक!

फिर वो हारकर कहेगा पता नहीं यह कहां कहां क्यूं जाना होता है. जैसे चाय की दूकान की मेज़ पर वह जाने कैसी किसकी फोटो देखी, किसी गरीब डकैतों के गिरोह की बेसबब गिरफ़्तारी की हिंसक तस्वीर सा वह समूह चित्र जैसे लगे मेरी अपनी भूली खुद की हो. सफ़ेद एम्बेंसैडर के पीछे दौड़ते बच्चे दीखें, जैसे पहली बार जहाज दिखा हो के पीछे दौड़ते हों, फिर अचानक ग़ायब हों स्कूल के अंधेरे में छुप जायें. एक औरत चीख़कर कहती मैं तेल गिराकर जान दे दूंगी और उस परिवार का तबादला हो जाता और वर्षों सपने में भी न दिखती और एक दिन सचमुच के आग में घिरी जलती कोई और ही औरत की शक्ल में सामने आती, हदसकर चीख़ती मुझे बचा लो भइय्या और मैं सलीके से सवाल करता तुम्हें पहचानता हूं?

तुम कहना कि ये कहानियां कभी पीछा नहीं छोड़ेंगी, वो सिर गिराये कहेगा मगर दर्द जाता कहां है.

(यह ख़ास प्रियंकर और मनीष के लिए)

Thursday, July 1, 2010

जिस जगह रहता हूं..

किताबों से निकलकर फिर किताबों में लौट आऊंगा
पहाड़ी चढ़ान पर भहरायी दौड़ती भेड़ें लौटती हैं जैसे
गड़रिये की बंसी औ’ अपनी गले की घंटी सुनती
खोजती चली आतीं बेरूप, लंगड़ सौदागर के ठीये

कभी अचक्‍के अंधेरे आंखें खोले घबराया
ज़ोर-ज़ोर से बुलाता दीखूंगा तुम्‍हारा नाम
या फिर उतनी ही फुर्ती से संभलकर
फुसफुसाकर माफ़ी मांगता, कि ग़लती हुई

कभी देर रात अचानक निकल जाऊंगा बाहर
जैसे एकदम सूरज निकलने से पहले की सुबह हो
कि दुनिया में और दृश्‍य होंगे, खाना रांधती
औरत औ’ रोते बच्‍चों के बीच खड़ा कैसा चिंतित दीखूंगा
मतलब कहीं से कहीं घूमता, कुछ गहरे पहचानने की
कोशिश करता जैसा कुछ, मगर बाहर फिर वही
उलझे हरफ दीखेंगे, उनको सुलझाने की जहमत में उलझा मैं

खोज लोगे मुझे की गफलत में खोजते
मिलने कभी आना मत, क्‍योंकि मिलूंगा
कहीं कोई जगह तो ज़रूर होगी घर नहीं होगी
वहां सांसों का बजता सुनो तो वह मेरी
नहीं अदद उन कुछ किताबों की ही होंगी.

गाल के काटे..

दलिद्दर के सौ तीखे तीर गड़ते रहते हैं फिर क्‍या बात होती है आवाज़ में चमक आ जाती है, अपनी हंसी में चमकने लगता हूं? अचानक जुसेप्‍पे पकड़ में आया तो मैं कुछ ऐसा ही चमकता खुद को दीखा होऊंगा, उसी खुशी में लरजता जुसेप्पे की कुहनी थामे अभी बेचारा कुर्सी पर ढंग से बैठा तक नहीं था, उसका चैन हराम करते मैंने सवाल किया, ‘‍कैसा पागलपन है जुसे, क्‍यों इस तरह मन में बरखा-बहार बरसने, आत्‍मा मह्-मह् महकने लगती है?’

’मालूम नहीं कैसा है, मगर है पागलपन ही,’ सस्‍ती कुर्सी खींचकर जुसेप्‍पे ने उस पर अपनी थकी देह गिराई, बोतल की ठेपी खोलकर गटगट पानी पीने लगा, ‘बच्‍चों सी खुशी का ऐसा बुखार तुम्‍हीं पर चढ़ता देखता हूं, मेरे मन में तो समूचा सूनसान है. उन व्‍योतो कांप्‍लेतो![1]

मुंह बनाकर मेरे बुरा मानने की एक्टिंग पर जुसेप्‍पे ने हंसते हुए मेरे लिए लाया किताबों का पैकेट बाहर किया. हमेशा की तरह शातिर जुसे, कि बच्‍चे की तरह भागा-भागा मैं पैकेट खोल किताबें देखने लगूं, उसके कहे की कड़वाहट भूल जाऊं..

सेई उना इदियोता त्रेमेंदो, लो साई?[2]’ चिल्‍लाकर मैंने अपना फ़ैसला सुनाया और जल्‍दी-जल्‍दी पैकेट की कलाई फाड़कर भीतर के तोहफ़े की जांच में जुट गया. ओहोहो, एक उन्‍नीसवीं सदी के आखिर में ब्‍युनेस आयरस में छपी मोटे जिल्‍द की बच्‍चों की तस्‍वीरों वाली किताब है, एक दूसरी अफ्रीका का सांस्‍कृतिक इतिहास है, तीसरी.. एक ग्राफिक कथा जो मैंने जाने कितने वर्ष पहले सिर्फ सपने में देखी थी और जिसकी बाबत जुसेप्‍पे को कभी कहा भी नहीं था, बदमाश उसे लिये आया है, कहां से खोजकर लाया है? और ऐसे में फिर मेरी हंसी करता है कि मैं बच्‍चे की तरह खुश होता हूं, क्‍यों होता हूं?

जुसेप्‍पे ने मेरे हाथ से किताब अलग करते हुए कहा इस पागलपने में बाद में लौटना. चलो, पहले बाहर की कुछ हवा खाकर लौटते हैं.

नुक्‍कड़ पर कबाब की एक गुमटी है, वहां चुपचाप शरीफ़ बच्‍चे की तरह पीठ पर हाथ बांधे मैं जुसेप्‍पे का तश्‍तरी में कबाब लिये खाना देखता रहा. जुसेप्‍पे के हाथ-मुंह धो चुकने पर सवाल किया, ‘तुम्‍हारा मन क्‍यों बुझा हुआ है?’

दो सौ कदम आगे एक ज़रा खुला मैदान है, हम टहलते वहां पहुंचे तब जुसेप्‍पे से खबर हुई कि गांव में उसकी बुआ के नाम कुछ ज़मीन है जहां बचपन में कभी-कभी वह छुट्टि‍यां मनाने जाया करता था, बीसेक सालों से उस दुनिया से संबंध टूटा हुआ था. अभी दो महीने पहले किसी अदालती कागज़ की ज़रुरत पड़ी तो बूढ़ी फुआ की गुजारिश से गांव जाना हुआ था, मन पर उसी सफ़र की चोटे हैं.

मैंने पूछा, ‘ऐसा क्‍या हो गया गांव में?’

‘कुछ नहीं हुआ,’ जुसेप्‍पे ने धीमे से कहा, ‘पहले जो किसानी करनेवाले बीस घर थे, पहचानी दुनिया में होने का अहसास था वो पूरी दुनिया बदल गई है. सांझ के धुंधलके दो घरों में बत्तियां जल रही थी, बाकी पूरे गांव में अंधेरा. सूनसान. बाकी के घर बिके हुए हैं. मिलान के पैसेवालों के हाथों, कुछ विदेशियों ने खरीदा है, कि साल के हफ्ते-दस दिन कभी गांव की खुली हवा में आकर समय गुजार जायेंगे के ख़याल से. किसानी गांव में अब सिर्फ़ एक परिवार करता है, फन्‍नीमारा का पोता. बचपन में उसके साथ खेला करता था मैं. अबकी अपनी खेत की पगडंडी पर आठ-दस गायों को हांककर घर लौटता मिला तो उसके चेहरे की झुर्रियां देखकर मुझे परेशानी हो रही थी. इसी उम्र में वह बूढ़ा हुआ जा रहा है..’

उस पार्कनुमा मैदान में तीन-चार लड़कियों का समूह कहीं से खी-खी करता हमारे पास चला आया था. लड़कियां गुजर गईं तो फिर जुसेप्‍पे ने अपनी बात बढ़ाई, ‘सोचो चालीस हेक्‍टेयर की ज़मीन है लेकिन शाम को फन्‍नीमारा की बैठक में घर की बनी वाईन पी रहा था तो विन्‍से मेरे सामने हाथों में सिर लिये बैठा वही गाना गा रहा था जिसे योरोप के किसी देहात में चले जाओ तुम्‍हें हर जगह सुनने को मिलता रहेगा.’

‘मतलब?’

‘यही कि घर में दो सौ गायें हैं, पहले जब सिर्फ तीन और चार हुआ करती थी तब जीवन में ज्‍यादा चैन था. अब इतने खरचे बढ़ गए हैं कि कभी खतम ही नहीं होते. विन्‍से बता रहा था उसकी घरवाली गांव की कौंसिल की नौकरी में न होती तो उनके घर का खर्चा चलाना मुश्किल हो जाता..’

‘मगर मेरी समझ नहीं आता कि चालीस हेक्‍टेयर की ज़मीन के बावजूद किसान के जीवन में खाने के लाले हों?’ मैंने बेचैनी से सवाल किया और जुसेप्‍पे का मुंह देखने लगा.

‘बड़ा महीन दुश्‍चक्र है तुम तथाकथित डेवलपिंग देशों में अंतर्राष्‍ट्रीय मदद के खेल के चश्‍मे से उस फांस को समझने की कोशिश करो. अमीर मुल्‍क डेवलपिंग देशों से कहते हैं आपकी हम मदद करेंगे मगर आपको अपने यहां पहले ये-ये स्‍ट्रक्‍चरल एडजसमेंट करना होगा. मतलब आर्थिक संस्‍थाओं व नीतियों में खास-खास बदलाव लाने होंगे कि आपके यहां एफ्फि‍सियेंसी बढ़ाने के सीधे बहाने के पीछे दरअसल बाहरी पूंजी को आपकी अर्थव्‍यवस्‍था में सपरकर फैल सकने और अपनी जड़ मजबूत करने का सुभीता बने. विकास के लिए ज़रूरी है कहकर डेवलपिंग देश की सरकारें यह सब बदलाव हंसते-हंसते करती ही हैं. अब ऐसी अंतर्राष्‍ट्रीय मदद जो विदेशी, बाहरी पूंजी की मुश्किलों को आसान करने की पीठ पर बैठ कर आपके मुल्‍क में घुसी है, वो लॉंग रन में फिर आपके देश की अर्थव्‍यवस्‍था का भला करनेवाली है या विदेशी, बाहरी पूंजी की, ए क्‍वेस्‍तो ऐ कैच-22 देल्‍लो स्‍वि‍लुप्‍पो मिस्तेरियोज़ो![3]

बात कुछ मेरे समझ आई कुछ नहीं आई. जुसेप्‍पे को सामने पाकर ऐसा चहका-चहका सा मन था अब कैसा मलिन, मुरझा-सा गया. गनीमत है एक जवान मां गोद में एक डेढ़ साल की प्‍यारी बच्‍ची लिए हमारे नज़दीक से गुजर रही थी, मन की चोट भूलने के लिए मैंने चिल्‍लाकर बच्‍ची से कहा, ‘अभी तुम्‍हारा गाल काट लूंगा फिर समझोगी, हां!’

बच्‍ची की जवान मां के जाने किस बात का गुस्‍सा था, मुझ पर गरजती बोली, ‘काटकर दिखाओ अभी तुम्‍हारे खिलाफ़ सैक्‍सुअल हैरेसमेंट का केस ठोंकती हूं!’

जवान औरत की बात सुनकर जुसेप्‍पे हंसने लगा, औरत को सुनाते हुए जोर से बोला, ‘बच्‍ची की बजाय इनके गाल काटो तो शायद तब केस न ठोंकें!’

औरत का चेहरा एकदम शर्म से लाल हो गया. लगा जैसे उस लाल में जुसेप्‍पे को सिर से पैर तक अभी इसी वक़्त हजम कर जायेगी. अच्‍छा हुआ मां की मुसीबत में जाने कब बच्‍ची मौका पाकर गोद में उछली और लपककर वही मेरा गाल काट गई. जुसेप्‍पे अब और जोर-जोर से हंसने लगा था. औरत ने बच्‍ची को पीछे खींचकर खिसियानी आवाज़ में दांत दिखाते हुए मुझे इत्ति‍ला दी, ‘बच्‍ची ने सच्‍ची का नहीं काटा है, एंड एनीवे, बच्‍ची इज़ अबव लॉ!’


[1] . a complete void.

[2] . you’re a big idiot, you know that?

[3] . and this is the catch 22 of the mysterious development.