Monday, December 19, 2011

आंवड़ा का अचार कैसे न खायें..

सबसे आसान तरीका है आनेवाले यूपी के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का कार्यकर्ता राहुलजी गांधीजी के सिपाही हो जायें, मुंह में लोहे के चनों का ऐसा स्‍वाद उतरेगा कि आंवड़े के अचार से यूं ही मज़े-मज़े बच जायेंगे. या और आसान है गंभीरली मेरा ब्‍लाग पढ़ने लगें, ऊपर से नीचे तक पोस्टों‍ का अर्थ भेदने में जुट जायें, देखें, अर्थ तरसकर बाहर आता है कि हरमखोर आंवड़े का अचार! दूसरा तरीका है वीसा को धता बताते, फ्रांस में कुसकुस, या इज़राइली कब्‍जे के लेबनानी समुंदरी तीरों पर नमक का स्‍वाद खोजने निकल चलें, जैतुन की नस चटकाती हवाओं में आंवड़ा, अमरुद, आंवले का मुरब्‍बा, मुंह के अन्‍य सब सारे स्‍वाद चट बेमतलब हो जाएंगे, आत्‍मा में सिर्फ़ एक टीस की जगह और हारी, दीवार पर सर पटकती उम्‍मीद बची रहेगी, यकीन न हो तो अभी आजमाकर देखिए. तीसरा, सबसे आसान रास्‍ता है, हाथ के सारे काम छोड़ भागकर बंबई चले आइये, फुसफुसाकर मेरे कान में गुनगुनाइए: “तुम अपना रंजो-ग़म अपनी परेशानी मुझे दे दो”, और आपका हुक्‍म मैं अपने सिर-आंखों लेता, तड़ जुगलबंदी में गाल बजाना शुरु कर दूं, “मेरे दु:ख अब तेरे, तेरे सुख अब मेरे, मेरे ये दो नैना, चांद और तारे तेरे, तेरे!”, इतने में जैसाकि सहज स्‍वाभाविक है आपकी चेतना लौट चुकी होगी, और घबराहट में जो आपका दम फूलेगा, उतने में तो आंवड़े के गंवार अचार की भुरकस निकल चुकी होगी, शर्तिया.

आंवड़ा का अचार न खाने के इन तीन मुख्‍य तरीकों से अलग तैंतीस और तिहत्‍तर दूसरे तरीके हैं, सबसे आसान और मुफ़्ति‍या फिर वही है कि लौट-लाटकर मेरा ब्‍लाग पढ़ते रहें, अनंतर मन में प्रेममय धीरज और आत्‍मा में मेरे प्रति विनम्र श्रद्धा धरें (प्रेम तो धरें ही), आपके आंवड़े के अचार (और आपका) काम बहुत आसानी से तमाम होगा, मेरा विश्‍वास करें. विश्‍वास भय और आशंका की सौत और विजयभावी की अनुचर ठहरी. मन में विश्‍वास हो तो मनुष्‍य सात समंदुर पार कर जाता है (मनुष्‍य होना, और बने रहना, ज़रूरी है. मनुष्‍यत्‍व आपसे छूट रहा हो तो अपने से छुपाते हुए धीमे-धीमे मन में गुनगुनाते रह सकते हैं, मन में है विश्‍वास, पूरा है विश्‍वास, हम होंगे क़ामयाब एक दिन, आंवड़े का अचार छूटेगा पीछे, एक दिन!). बंगला के नवारुण भट्टाचार्य का पतला उपन्‍यास है, मुनमुन सरकार का अनुवाद है, हरबर्ट, राधाकृष्‍ण ने निन्‍यानबे में छापा था, अभी इस महंगाई के दौर में भी पचास टाका में उपलब्‍ध है, घर में ज़रूर होगा (नहीं होगा तो मालूम नहीं फिर आप मनुष्‍य कैसे होंगे), निकालकर पढ़ने लगिए, सत्‍तर के दशक की शुरुआत के अंतरंग चित्र उतारती, किताब के ढेरों पन्‍ने हैं कलकतिया जीवन के भेद और पुलिसिया गोलियों से पैदा हुए छेद में आपको ऐसे नचाये रहती है कि आंवड़ा, किम्‍बा उसका अचार, बेमतलब पड़ा रहता है. जैसे बुल्‍गाक़ोव की इतनी पुरनकी किताब है, मास्‍टर और मारगरिटा, उस शुरुआतीये दौरे में ही, जहां वाम-प्रभुओं को मुंह चिढ़ाती सारी बामपंथी जिरह-बीरमर्श, सर के बल खड़ी हो जाती है, और किताब के खत्‍म होने के बहुत-बहुत बाद तक फिर आपके मन, और मन के बाहर समाज के जीवन में, सर के बल ही खड़ी रहती है! किताबें क्‍यों ऐसे, इतनी, गड़बड़ि‍यां कर जाती हैं? चेतन (चहुंपा) भगत सर्वसुलभ होता है और मांदेलस्‍ताम की कहो तो क्रॉसवर्ड का बच्‍चा चौंककर पूछता है, मांदेल हू? क्‍या दुनिया है, ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्‍या है? ऐसे ही नहीं है कि हारकर सिर नवाये मैं क्रॉसवर्ड के बच्‍चे पर हाथ छोड़ने से खुद को बचाता, बुदबुदाता हूं, ठीक है, बाबू, रहने दे मांदेलस्‍ताम, मेरी कविताओं की किताब ही बाहर कर, लड़का घबराकर दो कदम पीछे करके कहता है, अज़दक हू? जबकि मेरी कोई एक सिंगल किताब तक छपी नहीं होती है, राधाकृष्‍ण और राधाकुमुद वाले ही नहीं, कविता कोश के वाचस्‍मति तक मुझसे अपने को बचाते चलते हैं? और दोष बेचारे हमेशा आंवड़े के अचार के सर मढ़ा जाता है? यूं ही नहीं है कि आप आंवड़े के अचार से घबराये हुए हैं.

घबराने की बात नहीं है. मुंह पर रुमाल धरे रहें, आंवड़े का अचार क्‍या कोई माई का लाल आपके मुंह में सवार होने की कोशिश न करेगा. और आसान है कि इस बमचख से निकल कर जिशु संतानों के मोहल्‍लों की तरफ निकल लें, उधर इन दिनों केकों का जलवा है, आंवड़ों की कोई नहीं सोच रहा. चुप्‍पे किसी सुलक्षणा गोम्‍स के बाजू खड़े हो जाइए, कंधा सटाये हारी, नीची (नीच नहीं!) नज़रों से मनुहार करिये, सुलच्‍छना, का रे, लगता है तोरा बिन हम्‍मर जीबन और जोबन के काज नै होगा? अब और केतना साल इंतजार करें, सलम, क्रिसमस तक हम फेरा नै ले सकते हैं, का बोलती है? देखिए सुलक्षणा गोम्‍स का बोलती है. उसकी बजाय उसका ब्‍वॉयफ्रेंड बोलने चला आये तो अपने वाला आंवड़ा का अचार उसीके मुंह में ठेल दीजिए, और रहीं सुलक्षणाजी गोम्‍सजी तो उन्‍हें चार ज़रा ठोसवाला सुनाके हुआं से चुप्‍पे से सरक लीजिए! मेरी वाली उमर में धंसे हों, यानी शादी की उमिर निकल चुकी हो तब और आसान है, सुलक्षणा बेबी से मुस्कियाये साफ़ बता दीजिए कि का रे, अब तो बॉयफ्रेंड और हस्‍बैंड के टंटे नहीं है, न तुमरे पुत्ररतन को स्‍कूल पहुंचाये और घर लावे की हम्‍मर जिम्‍मेदारी है, फिर काहे ला फुटानी फेर रही है? डैरेक्‍ट खाएगी चार लात तब गाएगी हमरे साथ? ऐं, बेबी?

एतनो के बावजूद आंवड़े के अचार से पिंड नहीं छूट रहा तो सबसे छुपाके रॉकस्‍टार के अंधारे में घुसके लैपटाप का उजियारा फैला लीजिए, चूंकि मेरी अभी चढ़ी नहीं हैं, तब तक अदमजी गोंडवीजी की ही कुछ कबित्‍त का स्‍वाद लीजिए, टाइम्‍स नाऊ और एनडीटीवी वाले तो ये सुनायेंगे नहीं, लोकल केबल पर कहीं कोई बताये भी तो हमेशा खतरा रहेगा कि दू मिनिट के बाद आंवड़े के अचार का विज्ञापन चालू कर दे! या उससे आगे येहो रस्‍ता बचता है कि बेचारे देबानंद की दीवानी कहानी के रोमानी कंधे पर खामखा अपनी तिलकुट चिमरख लादने का ऐसा क्रूर खेल खेले लगें कि बेचारा देवेनंद घबराकर आंबड़ा के अचार खा लेवे, चट हुएं सारी कहनिये खतम होय जाये! उसके अनंतर अच्‍छा होगा मैं इतमीनान से जुसेप्‍पे को जिरह में खींचे दुखी होता रहूंगा, आप शर्मिला और राजिंदर कुमार की सुरमई देखे-देखे सिर फोड़ना.. दुनिया तब्‍बो रहेगी, आंबड़ा का अचार खाये वाला कोई नै रहेगा!

Sunday, December 18, 2011

आंवड़ा का अचार कैसे खायें..

हमेशा की तरह मुंह पर अंगोछा लपेटे जैतराम का जवाब होगा आवंड़ा का अचार वैसे ही खाएंगे जैसे अमरुद और अनार का खाते हैं. हद्द अमदी है भई ई जैतराम, सब समय मुंह पर अंगोछा फेरे रहता है, मंजी महतो हाथ का छोटका हथौड़ी चमरख बंडी का पाकिट में खोंसते, कान की बीड़ी को सुक्‍खल होंठ में खोंसते गरमी निकालते हैं, ई आप अंगोछा काहे ला फेरे रहते हैं, भाई साहेब? राज के चहुंपे हुए डकैत हुए, आपका माथा पर सरकार दू लाख का ईनाम रखे है? अरे, अरैनी का अंसारी का जनानो तक अब मुंह पर बुरका नहीं रखती फिर आप फलतुए काहे ला छुपा-छुपावन का रहस्‍सबाद खेल रहे हैं, भाईजानी? आंवड़ा के अचार को अमरुद और अनार से जोड़ रहे हैं, अरे? खाये का छोड़ि‍ये, कबहूं देखे हैं अमरुद और अनार के अचार? जवाब तीन दिन बाद आता है, सियाबुर्ररहमान मनिहारीवाले बंद मदरसे के पिछवाड़े नीम के पेड़ से दतुअन तोड़ते, सुरती से करियाये मुंह से कमल-वचन बोलते हैं, देखे भी हैं और खाये भी हैं, और अमरुदे का नहीं, परवल का, भिंडी का, अऊर तो अऊर, अन्‍नानासो का खाये हैं, मगर ऊ बात नहीं है जौन अंवड़े के अचार में है!

ए मियां मोहम्‍मत, हियां खाये के बात नै हो रही थी, कैसे खायें के हो रही थी, उत्‍तर के कहानी को दक्खिन नै ठेलो, हं?

कटोरा भर सूजी के हलुआ लै लीजिए, अऊर एक छोट कटोरी में आंवड़ा के एगो छोट अचार.. या फिर तश्‍तरी में जरा-जरा जरल भिंडी के गरम भुजिया सजाइए, मेहरारु से तीन गो ताजा फुलका सेंकाइये, भिंडी में फेर के मुंह में कौर रखिए, अऊर पीछे-पीछे एक तनि-सी कटनी अंवड़े के अचारे का काटिये, देखिए, मुंह में कइसन आनन्‍न उतरता है!

चिरंतनकाल के नारसिसिस्‍ट हताशाबादी इशार्दुलआलम सबकुछ सुनकर भी कुछ नहीं सुन रहे, पेट में भूख की घूमड़ पलटकर लहर खाती है, जैसे कस्‍बाई सांझ में छतों पर ताज़ा जले चूल्‍हों का धुआं नदी बनकर धीरे-धीरे आसमान में उतरता है, दबी आवाज़ ललियाने, गुनगुनाते सबको झुठलाने लगते हैं: ये बातें झूठी बाते हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं, तुम इशार्दुल का नाम न लो, क्‍या इशार्दुलवा सौदाई है.

लब्‍बोलुबाब के? अताउद्दसमद पूछे हैं.

राधामनि के नवके घर के लिए बगान से कटी लकड़ी लादे बैलगाड़ी आई है. हांकेवाले बच्‍चे से बिष्‍टु महतो सवाल करते हैं किसके बागान का है रे? लकड़ी कौन? घर के अंदर से कोई औरत भागी बाहर आती है और बाहर के जमावड़े पर नज़र जाते ही उसी तेजी से फिर भीतर लौटती है. कुएं के पास पंडित राधामोहन का सबसे छोटा बेटा हाथ में तीन अंडे सहेजे, साथ लगी बिल्‍ली की संगत में असहज होता, अंतत: हवा में पैर लहराकर खुर्राता है, ज्‍जा! बिल्‍ली सामने के पैरों को जमीन पर दाबकर ब्रूस ली वाला पोज़ लेती, गुर्राये जवाब देती है, म्‍याऊं.

लब्‍बोलुबाब ये कि आंवड़े का अचार कैसे खायें की जगह कैसे न खायें? ठीक है, चलिए, इसी पे बिचार-प्रजनन कीजिए, ज्ञानदान दीजिए?

Wednesday, December 14, 2011

नीली रात किताबी बात, बहकी-बहकानियां..

इस रेस्‍तरां से यह बाहर का दरवाज़ा कहां खुलता है? सुख की यह सीढ़ी कहां पहुंचाती है, या सपनीला एक महीन जाल बुनती चलती है, कहीं से निकलकर कहीं पहुंचती है तो वहां भी यही सूचना पट्टी लगी दिखती है: “फॉलो दिस मार्क टू रीच नोव्‍हेयर” ? जुसेप्‍पे, प्‍लीज़, यार, इस तरह हम भागते न रहें, ठहरो, पहचानने दो यह निशान किस एयरपोर्ट की तरफ़ जाता है, व्‍हॉट अ मेस दिस जर्नी हैज़ बीन; लंबी चूल और कान में बुनकी वाले ओ भाई साब, यहां जो अभी ज़रा देर पहले आपलोगों की सभा हो रही थी, वो अधेड़ बेसहारा औरत अपने मुल्‍क के बिकते जाने की बाबत जो धारदार प्रवचन पेल रही थी, किस ज़बान में और किस मुल्‍क के मुल्‍लाओं और उनके अर्थशास्‍त्र का क्रियाकर्म पढ़ रही थी, बतायेंगे, हमें कुछ रास्‍ता दिखायेंगे आप? साहित्‍य में इकॉनमी और इकॉनमी में कविता ढूंढ़ते-ढूंढ़ते मैं भटक गया हूं, जुसेप्‍पे की बुद्धि तक अकड़ गई है? मालूम नहीं किस मुल्‍क के बिके हुए पहाड़ी मैदानों से भागते किस भंवरी रेगिस्‍तानों में हम गोते लगा रहे हैं, इज़ इट टेकिंग अस एनीव्‍हेयर एट ऑल? ओ भाई साब? ओ मिस्‍सी, ओ सिस्‍टर जमैका?

हाथ में भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था पर नज़र फिरवाती आठ लेखों की एक पतली किताब है, और लेख मेरी तरह टेढ़े नहीं, फिर भी मैं (किताब के शीर्षक ‘द फेस यू वर अफ्रेड टू सी’ के असर में?) कांप रहा हूं, जुसेप्‍पे की आस्‍तीन खींचता, मेले में ज़ि‍द्दी हारे बच्‍चे–सा हास्‍यास्‍पद हो रहा हूं, भले आदमी से गिड़गिड़ाकर चिरौरी करता हूं, “प्‍यारे, ये क्‍यों मुझ पर डेविड बी के ज़्यां क्रिस्‍तोफ़ वाले एपिलेप्टिक दौरे छूटते रहते हैं, आफ्टर ऑल, आई अम नॉट लिविंग फ्रॉम द पेज़ेस ऑफ़ अ ग्राफ़ि‍क नॉवल, अम आई?” जुसेप्‍पे मेरे गंदे नाख़ूनों की जकड़ से अपने रिलेटिवली साफ़ आस्‍तीन छुड़ाता दूसरी दिशा में मुंह फेरे बुदबुदाता है, “मैंने तुमसे कहा था हनीफ पर इतनी मुहब्‍बत कुरबान मत करो, बट यू नेवर लिसन टू मी, बट्ट एंड भट्टी एंड ऑल, दे आर नॉट पंजाबी ऑर उर्दू स्‍पीकिंग पीपल फ्रॉम रियल लाइफ़. उनकी स्‍मार्ट वन लाईनों की सारी होशियारी, और फक्‍डअपपने की बेक़रारी अंग्रेजी लिटररी एस्‍टैबलिशमेंट के मन-रंजन के लिए है, पाकिस्‍तानी पीपल से किसी डायरेक्‍ट गुफ़्तगू, सच्‍ची साहित्यिक संगीनी के कंपैशन की कामना लिये नहीं.. मैं और दस लाइनें कहूंगा, मगर क्‍या फ़ायदा, तुम कहोगे मैं देव डीओं के अंधेरों और एलिस भ‍ट्टी को एक पटरी पर उतार रहा हूं?”

“ओ शटअप्, जुसेप्‍पे, जस्‍ड सडअप!” बिना हाथ की आस्‍तीन छोड़े मैं भागता जाने कहां चला आया था, कहां? जिस पिछवाड़े मसूद के ताऊस चमन की मैना बसती थी, या राल्‍फ़ रसेल और खुर्शीदुलइस्‍लाम ग़ालिब के बहाने गाते थे? या खड़खड़ाती साइ‍कल की सवारी बदलकर पैदल गरम पगड़ंडी पहचानते साइनाथ गरीबी का नक़्शा जानते थे?

बाजू में कहीं बुढ़ाये पिल्‍जर के जीवट का वीडियो चल रहा है, उनींदे, अधमुंदी आंख मैं नेट पर दानियेल यर्गिन के पोथे पर सरसरी नज़र फेरता हूं, स्‍टैंडर्ड ऑयल, शेल, रॉयल डच की दुनिया जानकर मैं दुनिया जान लूंगा, जुसेप्‍पे? ईराक से अमरीकी फौजों के हटने के कूट नाटक में हम राजनीति का ‘र’ जान पा रहे हैं? कविताई विरोध के महीन बीस साल गुज़ारकर इरानी सिनेकार ही, अपना संसार ठीक से पहचान पा रहे हैं, आं जुसेप्‍पे?

मगर जुसेप्‍पे कहीं नहीं है, सिर्फ़ मैं हूं, जाने किस मुल्‍क के किस कस्‍बे में बैठा, उडुपी की इडली कुतरता ब्राइसन के ऑस्‍ट्रेलियाई पन्‍नों से गुज़र रहा हूं, ‘तिलिस्‍म-ए-होशरुबा’ कह रही है मुझसे गुज़रो, मुझसे, मैं चिढ़कर नज़रों के एक थप्‍पड़ से उसे नवाजता झींकता हूं, “तिलिस्‍म में उतरकर जान जायेंगे, कहां जा रहे हैं? बोल?”

Saturday, December 3, 2011

फूलों का तारों का..

भागते-भागते मैं अपना हिसाब दुरुस्‍त कर लेना चाहता था; मतलब मेरे पैरों के हिस्‍से किसी सूरत नॉर्थ स्‍टॉर के जूते आयेंगे, या अबे ओय, फिर एक साल बीएससी (या, करोना?) के नीले हवाई चप्‍पलों पर काटना होगा (ठीक है नीला मत लेना, भूअरका खरीदवा लेना, अब खुश?”) की सोचकर गिरा-गिरता जाता. जबकि सच्‍चाई थी गिरते रहने को भले उम्र के बहुत छुटपने से बनी रहती हो, भागने की जगहों का कोई बहुत चौड़ा या लम्‍बा भूगोल था नहीं. ज़रा-ज़रा और ज़रा-सी जगह नज़र आती, मगर उतनी ही ज़रा देर में फिर नज़र नहीं भी आती. रिक्‍तस्‍थान भभ्‍भड़ के साथ फिल-अप होता चलता. पलक झपकाये के तत्‍क्षणोपरांत के पलक खोले के पल में अभी के रिक्‍तस्‍थान पर तभी बच्‍चे गिल्‍ली-डंडा खेलते नज़र आते. या लड़कियां साइकिल सीखतीं. और किसी तरह जो लड़कियां भजन व सोहर और सूरन का अचार बनाने और स्‍वेटर का पैटर्न सीखने में फंसी रह गईं तो वैसी ही तेज़ी से काकी और अंकल लोग खुरपी चलाते व फावड़ा घुमाते खुले दालान को भंटा और भिंडी के बगान में बदल देते! कहने का मतलब असल भागने की जगहें लगभग नहीं के बराबर थीं. जो था वो भय और तनावों का मैदान था. या बीएससी का हवाई चप्‍पल पाने की खुशी. नीले रंग वाला. बहुत पैर पटकने पर उसके बाजू भूरे का ऑप्‍शन निकलता.

सीमाबद्ध संसार में मेरा पैदाइशी हरामीपन होगा कि मगर मैं फिर भी भागता रहता. क्‍लास की अपनी सीट से भाग जाता. खाने की थाली, आंगन की जाली, और अमरुद के पेड़ के अनघने पत्‍तों की आड़, जहां एकदम गुंजाइश न रहती, वहां-वहां तक से भागता रहता. चावल की बोरियों में पकने को छुपाकर रखे शरीफे और पूजा वाले तखत के सिंदूर-नहाये पौने तीन रुपये के चिल्‍लर के बीच से भागता. भागकर मालूम नहीं मैं कहां निकल जाना चाहता था. क्‍योंकि उन दिनों मुझे केप टाउन और कैंसास सिटी का ‘क’ भी नहीं मालूम था. बम्‍बई का ‘ब’ मालूम था, लेकिन फिर, सिर्फ़ उतना ही मालूम था; ‘धर्मयुग’ के ढब्‍बूजी का काला कोट दिख गया था, ‘फिल्‍मी कलियां’ पर नवीन निश्‍चल और रेखा ‘सावन-भादों’ में नहाये अभी नहीं दिखे थे! और इस अभागे के भागे में ऊपर से नुनकी परेशान किये रहती. उसकी शिकायतों का रिकार्ड ‘उपकार’ के महेंद्र कपूर के ‘कस्‍मे वादे प्‍यार वफ़ा के, वादे हैं वादों का क्‍या’ पर भारी बना गूंजता रहता. दायें-बायें शिकायत बोलती डोलती रहती, झूले में पींग लेती भी याद करते रहने से बाज नहीं आती, “भैया, तू हमको ऊ फरीदा जलाल वाला फिलिम नै दिखाये न?” मैं ट्रांजिस्‍टर पर बजते वेस्‍ट इंडीज़ की जीत की कमेंट्री के पीछे छिपकर भाग निकलना चाहता, मगर तब तक किसी और सवाल का कांटा पीछे से उछलकर मुझे फांस लेता, “हमरे पहिलके बच्‍चे की पैदाइश के बखतो तू नै आये, भैया, तोरा कवनो ममता नै छू गया है, भैया, आं?”

नुनकी के तीरों से तार-तार मेरी कनपटियों पर फिर दीवाली में छोड़े पगलाये राकेटों की सूं-शां की बहकदार बारिश गूंजने लगती! सत्‍पथी आंटी के अमरुद के पेड़ से कूद मैं दास अंकल के छत पर छलांग लगाने के बाद वहां से फटे कंठ नुनकी के चिथड़े उड़ाता, चिल्‍लाता, “अबे, हरमखोर की बहिन, अबहीं ले जया भादुड़ी के बियाहो नै हुआ अऊर तू महतारियो बन गईं? सीन में चुप्‍पे पीछे बने रहने को बोले तो तब से डैलग पे डैलग ठेल के नाक में दम कर दी है रे, हरामी?”

नुनकी अभी बहुत छोटी थी उसे कुछ समझ नहीं आता. मेरा गुस्‍सा भी. मुझे भी नहीं आता शायद जभी मैं इस तरह भागता फिरता. मां पीठ फेरे अपने बाल काढ़ती होती, सुनंदा मौसी होतीं जो चिरौरी करतीं कि आ, बाबू, हमरी गोदी में लेट जा, दिनभर सगरे घामा घूमने से तोरा माथा खौराया हुआ है!

मैं दास अंकल की छत पर से ही मां को सुनाता सुनंदा मौसी से ज़ोर-जोर से कहता, “सरमीला टैगोर एतना प्‍यार से गाती है बड़ा नटखट है किस्‍न कन्‍हैया, तू कब्‍बो हमरा बास्‍ते गाई है? हम नै आऊंगा, ज्‍जा!”

किस दुनिया में खोई नुनकी जैसे इशारा पाते ही उल्‍टा-सीधा गुनगुनाना शुरु कर देती है, “मेरा चन्‍ना है तू, मेरा सूरज है तू, तू हमरे आंखी का तारा है तू,”

मेरी इच्‍छा होती है वहीं से बम फेंककर नुनकी को शेख मुजीबुर्ररहमान के बंग्‍लादेश में फोड़मफोड़ कर दूं, मगर बदकार पर कवनो हमरे गुस्‍से का रियेक्‍सन है? प्रेम से अब एक नवनका गुनगुना रही है, “फूलों का तारों का सबका कहना है, एग हजारों में हमरी बहिना है, भैया, ई वाला नै गाओगे? एगो हाली गा दो न, पिलीज?”

(बाकी)

Thursday, December 1, 2011

जेब में ब्‍लेड और आंखों में फटिहारापन..

इसे उनका समय के अंधकूप में छिपे रहना कहो या बड़े संसार के प्रति उनकी शाश्‍वत की उदासीन लापरवाही, उनका यथार्थ था कि वह बाहरी यथार्थ से कटे हुए थे. मध्‍ययुग के बाद सामाजिक गतिशीलता में जो अचानक उछाल आया, नई यात्राओं और नये लक्ष्‍यों के रास्‍ते खुले, बाज़ार की ज़रुरतों में नई गोलबंदियां हुईं, अलक्षित-रक्षित समाजों की सुरक्षा के पुराने कवचबंध टूटने लगे. पियराये पन्‍ने के पुराने लेटरप्रेस में छपा कोई आदिकालीन पुर्चगाली पाठ था जिसे पढ़ते-पढ़ते तोमासिनो अनुवाद करता चल रहा था. मैं झपकियों में जाग-जागकर सो रहा था. पैसेंजर ट्रेन छुक-छुक की मंथरगति में कहीं जाने का भ्रम बुन रही थी, हालांकि मैं जानता था हम कहीं नहीं जा रहे. तोमास से वही मैंने कहा. या नींद में लगा मुझे कि मैंने कहा है, क्‍योंकि दुबारा आंख खुलने पर उसके चेहरे पर चिंता नहीं दिखी, निश्चितभाव वह अपने कथापाठ में ही डूबा था. मेरे कान में फिर से वह अप्रीतिकर लोरी बजने लगी, लगातार तीन पीढ़ि‍यों से बाहरी शत्रुओं से लड़ते-लड़ते मादी समुदाय का हौसला पस्‍त हो चुका था. उनके जंगल, उनकी आजीविका, ढोर, डेरे, सबकुछ नष्‍ट हो चुका था, और ज़ि‍न्‍दा रहने की इकलौती सूरत यही बची थी कि हमलावरों के आगे वे हथियार डालकर समझौता कर लें. मगर मादियों में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि बाहरी शत्रु के आगे उन्‍होंने कभी हथियार डाला हो, सिबोला जानती थी और पेट से थी इसीलिए घबराई हुई थी. वह मादी परम्‍परा का असम्‍मान नहीं करना चाहती थी मगर पेट में पल रहे अपने शिशु की रक्षा भी करना चाहती थी. और उस अजन्‍मे शिशु की रक्षा का सिर्फ़ एक तरीका था कि सिबोला मादियों का जीवन नरक किये उनके शत्रुओं की शरण में चली जाये.

सफ़र की थकान का असर होगा होटल पहुंचते ही तोमासिनो बिस्‍तरे पर निढाल हो गया, जबकि मेरी आंखों में असमंजस, अविश्‍वास और साज़ि‍श के घेरे घूम रहे थे! जाने कंठ की प्‍यास थी या दीवार पर अचानक तैरती कोई परछाई दिखी थी, मुझपर बेचैनी का जैसे बुखार सा चढ़ रहा था, हालांकि इसका पक्‍का भरोसा भी था कि इस भंवर को भेद कर मैं सच्‍चाई तक किसी न किसी तरह पहुंच ज़रूर जाऊंगा. मगर साथ ही फिर ऐसी बदहवासी क्‍यों छा रही थी. औंधे मुंह बिछौने पर गिरा मैंने अपनी जेब की सारी चीज़ें अपने बगल निकालकर रख दिया और अंधेरे में हथेली से उन्‍हें टटोलता रहा. तकिये में मुंह धंसाये उस तस्‍वीर को साफ़ करने की कोशिश करता रहा जो उजाले में अदृश्‍य बनी हुई थी, फिर मैं एकदम से घबराकर उठ गया.

तोमास की नाक बज रही थी. धीमे से हाथ बढ़ाकर मैंने अपने कोने की बत्‍ती जला दी, झोले का सामान बिस्‍तरे पर उलटकर एक-एक चीज़ की जांच करने लगा. तीनों पैंट बारी-बारी से पहनकर देखा, वे मुझपर बराबर आ रहे थे की बात से लगातार विस्मित होता रहा. बाथरुम की उलट-पुलट में भी किसी नयी या अजीब चीज़ के हाथ न आने पर मेरी परेशानी बढ़ गई. बिस्‍तरे के कोने पर बैठे कुछ देर सोचते रहने के बाद खिड़की के परदे की ओट से मैंने बाहर होटल के अंधेरे को पढ़ने की कोशिश की, कि कुछ नज़र आ जाये, कोई एक इशारा. मैं क्‍या खोज रहा था?

जेब में दो ब्‍लेड और सौ रुपये का एक नोट खोंसे, होटल के रिसेप्‍शन के लड़के की नज़र बचाकर मैं एकदम से बाहर निकल आया. सड़क पर किसी एक भी संदिग्‍ध व्‍यक्ति के न मिलने से अब मुझे सचमुच हैरानी हो रही थी. कहीं ऐसा तो नहीं कि हम रास्‍ता भटक गए थे? ग़लत होटल में चले आये थे? लेकिन तोमास फिर मुझे सिबोला की कहानी क्‍यों सुना रहा था? दांग वान से उसका क्‍या संबंध था? ऐसे किसी भी संबंध में मैं ख़ामख़्वाह क्‍यों उलझ रहा हूं? कुछ कदम आगे एक रिक्‍शावाला मिला, रात के सवा दस बज रहे थे मगर जब उसने भी कोई हुज्‍जत नहीं की तो मैं सचमुच डिस्‍टर्ब होने लगा.

आधे घंटे में मैं वापस स्‍टेशन की इमारत की पुरानी छतों के नीचे टहल कर रहा था. स्‍टेशन से गुज़रनेवाली सब रेलों के आने-जाने की मैंने सिलसिलेवार पड़ताल की. फिर बाजू के फाटक से होता हुआ पीछे की एक गली में निकल आया. एक आधा गिरे टीन की आड़ में दो कमउम्र लड़के गांजा पी रहे थे, या छुपकर दूसरा नशा कर रहे थे, उनकी बुझी आंखों में हल्‍की चमक का अंदाज़ होते ही मैं ख़बरदार हो गया. हथेली में ब्‍लेड कसे मैं किसी भी हरामीपने के लिए तैयार था, मगर नशेड़ी लड़कों का हौसला पिटा हुआ था, वह एकदम से डरकर पीछे हो लिये, मैं तीर की तरह अंधेरे में आगे निकल गया.

वह कोई सरकारी अस्‍पताल था, या ऐसी ही कोई बदहाल जगह. कमरों के भर जाने के बाद मरीज गलियारे और बरामदों तक ठेल दिये गए थे. फ़र्श पर लेटा एक बूढ़ा कराहता दीखा. उसके चेहरे से ज़ाहिर था वह ज्यादा दिन बचेगा नहीं. मगर बिजली के बल्‍बों की फीकी, मुरझाई रौशनी में सब चेहरे कमोबेश उसी मुर्दई में नहाये दिख रहे थे. अचानक कहां से एक नर्स निकल आई, मुझसे पूछने लगी मैं किसे खोज रहा हूं. हथेली में ब्‍लेड कसे मैं मुंह सिये एकदम मुर्दा हो गया!

कौन है यह नर्स, इसे किसने भेजा था मेरी सूराग में? मैं इस चेहरे को पहचानता हूं, ये होंठ, ये आंखें मैंने पहले देख रखी हैं!

मैं बताता क्‍यों नहीं किसकी खोज में आया हूं? नर्स नाराज़ हुई मेरे माथे चढ़ी आ रही है. हथेली में कसे ब्‍लेड को उंगलियों से उसकी पन्‍नी से अलग करता हूं.

कौन, कौन? नर्स चीख़ती है.

मैं मन ही मन बुदबुदाता हूं, सिबोला, लीलामाला, सुखोमोनी, प्रकट गूंगा बने रहता हूं.

नर्स के हल्‍ले-गुल्‍ले में और लोग बाहर निकल आये हैं, मैं घिर गया हूं.

मेरी रीढ़ में घबराहट की झुरझुरी दौड़ती है. पसीने से भीज रही उंगलियों से सरककर ब्‍लेड नीचे ज़मीन पर गिरता है. और तभी तोमासिनो के झिंझोड़े जाने से मेरी आंख खुलती है. हमारी पैसेंजर रेल उसी स्‍टेशन पर आकर ठहरी है जहां से गुज़रनेवाली रेलों का ज़रा पहले मैंने हिसाब-किताब किया था!

(ऊपर की चिचरीकारी: अजय कुमार)

Tuesday, November 29, 2011

दीना शंकर त्रिभुवन मुरारी एबोम इंद्रजीत

उन ज़मानों की बात है जब ज़ि‍या उल हक़ और एलीस भट्टी के पीछे मोहम्‍मद हनीफ़ की रूह अभी फ़ना हुई नहीं थी. पृथ्‍वीराज पाकिस्‍तान से निकल लिये थे, गो पाकिस्‍तान के विधिवत ऐलान होने में तब भी अभी समय था. दुनिया में मेरे आने में तो था ही. पाकीज़ा औरंगाबाद-बंबई मार्ग पर मुझे ‘ठाड़े रहियो ओ बांके यार’ के संगीन इशारों से असमंजस में नहीं डाल रही थी, जैसाकि ‘जाने भी दो यारो’ का विनोद डिमैलो को ‘थोड़ा खाओ थोड़ा फेंको!’ के पाठ पढ़ाकर ह्यूजली कन्‍फ्यूज़ कर रहा था. जवाहरलाल ने तेजी से सपने देखना शुरु कर दिया था लेकिन अभी पंचवर्षीय योजनाओं के फ़रेब में गिरे नहीं थे. अलबत्‍ता गांधी की लाख लेक्‍चर व पर्चेबाजियों के बावजूद गांव गिरे ही हुए थे, और आनेवालो वर्षों में कांग्रेस के काफी ऊपर उठ जाने के उपरांत भी, वहीं नीचे, गिरे ही रहे. हालांकि नेहरू की दुलकी दौड़ में शहरों ने बाजी मार ली, गांव खेत रहे कहना ज़्यादा वाजिब होगा. लेकिन साथ ही, इस प्रसंग में कुछ नहीं कहना भी उतना ही वाजिब होगा. आई-पॉड तो दूर अभी स्‍टीव जॉब्‍स ने रेडियो की सूरत भी नहीं देखी थी. रेडियो के लिए फ़ि‍राक़ का लिखना ‘ग़रज़ कि काट दिये ज़ि‍न्‍दगी के दिन ऐ दोस्‍त, वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में’ और उसे तब रेडियो पर अपनी बिगड़ी आवाज़ में मेरा गुनगुनाना भी बाकी था. मैंने पहले कहा ही, अभी मैं बाकी था. छोटे, तीन कमरों के क्‍वार्टर को जो मैंने बहुत बाद घर की सूरत में पहचाना, वह तब साल का जंगल और साम्‍भर और बारहसिंहों का ठिकाना था. या ऐसी ही किन्‍हीं अन्‍य जंगली जानवरों का[1].

गांव और जंगलों के अंधेरों से घबराये लोग तब तेल की रोशनी पर टिके कलकत्‍ता में ज़ि‍न्‍दगी की खोज में भागे आते और थियेटर-कंपनी की तारिकाओं के छलावेभरे चकमक के पीछे, बड़ाबाज़ार की जगमग रौशनियों के नीचे गुम होते रहते. जिनकी धोती की गांठ में अभी कुछ सिक्‍का-धन होता वो मुन्‍नीलाल, या तपोधन मईती के ठेके पर ग़म ग़लत करने पहुंचते, वर्ना ज्‍यादों की कथा यही होती कि वे अपनी शांतिपुरी धोतियों के घेरों में उलझे फड़फड़ाते रहते, रास्‍तों की भटकन कहीं उन्‍हें पहुंचाती न होती. दीना, शंकर, त्रिभुवन, मुरारी को नहीं ही पहुंचा रही थी. अलबत्‍ता मुरारी के कुरते की जेब की सुनहली पन्नियों में सिहजा, अभी एक का एक टंका सुरक्षित बचा पड़ा था. मगर सुखोमोयी राखाल स्‍ट्रीट के उस तेलियाये पथ की तेलियायी रौशनी में मित्रगणों के चेहरे से रौनक लापता थी, इसलिए कि जिले-ज्‍वार का चिरसंगी बिंदेश्‍वर संध्‍या के रसअनुसंधान की उनकी यात्रा में उनके संग नहीं आया था?

“बिंदेस्‍सरजी ने एकदम्‍मे दग़ा दे दिया!” त्रिभुवन होंठों से बाहर आ रहे जर्दा की पिचकारी सड़क के बाजू उड़ाते हुए बोले.

“वो अभी पहिले गाये से फुरसत पाय लें, ‘रात की रात कभी मेरा घर, तेरा रैनबसेरा होता’?” शंकर हाथ का लाल रुमाल लहराते आंखों ही आंखों मुस्‍कराकर चुटकी लिये.

तो मित्रगण समझ रहे थे कि बिंदेश्‍वर अब उनके साथ नहीं आ सकता था? क्‍योंकि अब वह अपने वश में नहीं था, रात और उसके अकेलेपने का साथी था? और उसके साथ-संग के लिए बाबुलबाला की ठुमरी का कोई एक ग्रामोफ़ोन रेकॅर्ड नहीं था, दरअसल सस्‍ते दारु की पव्‍वेवाली बोतल तक न थी!

फ़ि‍राक़ साहब होते तो गुनगुनाकर घाव सहलाते, ‘तरके-मोहब्‍बत करने वालो, कौन ऐसा जग जीत लिया, इश्‍क़ से पहले के दिन सोचो कौन बड़ा सुख होता था’, मगर जैसा मैंने पहले कहा ही, यह फ़ि‍राक़ साहब के गोरखपुर, लखनऊ, कानपुर की महीन सवारियां, कारगुज़ारियों से पहले का क़ि‍स्‍सा है. फिर बिंदेश्‍वर तब यूं भी उर्दू नहीं जानते थे, और बाद में भी हमेशा किबला कमज़ोर ही रहे. बंग्‍ला के छोटे-मोटे सरल पद टेढ़े स्‍वर गुनगुना लिया करते थे. छाती पर कटार चलवाने का काम भी, अल्‍ला-कसम, उसी रस्‍ते हुआ था! सुनिये, धीरज धरे सुनिये, बात खुलती चलेगी.

पड़ोस के पोखरे से नहा और धोती साफ़ कर, चाटुर्ज्‍या प्रेस की नौकरी से छुट्टी के दिन, बाबू ब्रह्मदेव मिसिर तंग बाईस सीढ़ि‍यों की ऊंचाई तय करके जो उस डेढ़ तल्‍ला के तंग कमरे में पहुंचे तो सांझ के उस झुटपुटे बिंदेश्‍वर को खटिये पर औंधे मुंह लेटा पाया. उठकर बैठे तो जवान का चेहरा लाल हो रहा था. जाने भूख से कि शर्म से. सही है मनुष्‍य निज स्‍वार्थ में अंधा होता है, और प्रेस की नौकरी में रहते हुए ब्रह्मदेव बाबू यूं भी कुछ अंधाये चल रहे थे, मगर मित्र की दशा की जैसी भी, धुंधली ही सही, झलक देखकर स्‍वाभाविक था बेचारे एकदम-से विचलित हो गए, बोले, “ये क्‍या हालत बना रखी है, बच्‍चा? क्‍यों, किसने?”

धीरे-धीरे उसका भी ज्ञान प्राप्‍त हुआ. बिंदेश्‍वर झा के कुम्‍हलाये मुख और कृशकाय स्‍वर से ही हुआ.

खबर हुई झमेले की जड़ में षोडशवर्षीय बंगबाला सांओलीदेबी सरकार थी, जो घटक के सीन में एंट्री से पहले ही उनके प्रथम छोबिचित्र ‘नागरिक’ के नायक-परिवार की नायिका वाला पार्ट खेल गई थी, मतलब तथाकथित भद्र परिवार की तथाकथित होनहार कन्‍या को जीवन की कर्मनाशा नदी ने भद्र समाज से स्‍थान्‍तरित, पददलित, अंतत: बहिष्‍कृत करके झुग्‍गी-झोपड़ि‍यों के अनिश्चित निराश्रय में पटक दिया था. और भद्रकन्‍या (नायिका) गश खाकर सन्‍नभाव नितांत कलाविहीन क्षण निकाल रही थी. फ़ि‍लहाल चाटुर्ज्‍या प्रेस तो नहीं मगर वैसे ही एक अन्‍य बंगभाषी छापेखाने के बाहर लोगों को पानी पिलाकर दो पैसे कमाते हुए जीवन-यापन कर रही थी. अजी क्‍या जीवन-यापन कर रही थी, ऐसे में कितने ही उम्‍दा, पहुंचे हुए किरदार क्‍यों न हों (सांओलीदेबी थी. ठुमरी, दादरा और ख़याल गाती थी, बाकी की संभावनाओं का संसार अभी खुलना बाकी था!) एक बार झुग्‍गी-झोपड़ि‍यों की दुनिया में पैर धरते ही यक्ष्‍मा और टीबी की दुनिया में का अपना अलग ही यक्षगान शुरु हो जाता है. सारी होशियारी सिर के बल खड़ी हो जाती है. बिंदेश्‍वरनाथ की हुई ही, जबकि वह तो उस यक्ष्‍माग्रस्‍त यथार्थ का वास्‍तविक पार्ट भी न हुए थे, पार्ट मात्र सांओलीदेबी का हुए थे, वह भी वेरी-वेरी पार्शियल, क्‍लोस टू प्‍लैटोनिक. ख़ैर, पार्ट हुए सत्‍य यही है. और सत्‍य और स्‍वार्थ की ही तरह आप ज्ञानीजन यह भी जानते हैं कि संवेदना मनुष्‍य को कहीं का नहीं छोड़ती. ग़ालिब छूट सके थे? दिल ही तो है न संगो-ओ-‍ख़ि‍स्‍त दर्द से भर न आए क्‍यों, रोएंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताए क्‍यों, बताइए?

“इस सताए में तुमरी यह दुरदसा हुई है?” बाबू ब्रह्मदेव घबराये पूछे.

चेहरे को उल्‍टी हथेली से रगड़ते हुए बिंदेश्‍वरनाथ झा ने जो सीन इनैक्‍ट किया उसमें नायिका-नायक संवाद की दृश्‍यावली सतावन-प्रसंग का स्‍वयंमेव प्रमाण थी.

नायक (भरे कंठ से): अमीर होता तुम्‍हारी मदद कर सकता, सुश्री सांओलीदेबी, लेकिन ईश्‍वर को, समय, हमारे समाज को स्‍वीकार्य न हुआ मैं किसी रूप तुम्‍हारे कार्य आ सकूं!

नायिका (उससे कहीं ज़्यादह भरे कंठ से): जानती हूं, हृदयसम्राट, मुझे और कष्‍ट से न भरो. मुझे याद है अर्थधनी वह अनोखी घड़ी, जिस दिन तुमने कहा था मुझे देने के लिए तुम्‍हारे पास सिर्फ़ प्रेम है, जो किन्‍हीं कतिपय अल्‍पक्षणों तुमने दिया भी, अपने प्रेम का वह कोमल पुष्‍प-दान! मैं ही मूर्खबाला ठहरी जो उन अमूल्‍य क्षणों का संरक्षण न कर सकी. मेरे जीवन के वे बहुमूल्‍य रत्‍न मेरे आंचल से छूटकर निकल गए, पूजा का वह स्‍वर्णथाल छूटकर जाने किस अतल गुम गया! हा: जीबोन, उस प्रेममणि के विलुप्‍त हुए जाने के बाद भी अन्‍यायी, निष्‍ठुर जीवन तो किन्‍तु तब भी शेष है! (फूट-फूटकर अब क्रंदन-गर्जना करती) और रोज़-रोज़ उस निशेष को मुझे जीते जाना है, तुम्‍हारे प्रेमाभाव में, हे, ओ मेरे हृदयप्राण!

कंपनी थियेटर के किसी भी उज्‍जवलाकांक्षी मंचन से वंचित, ज्येष्‍ठ मास की उस क्‍लांत संध्‍या सड़क पर आवारा टहलते दीना, शंकर, त्रिभुवन, मुरारी कभी नहीं जान सके कि चिरसंगी बिंदेश्‍वर से दूर रहकर उस सांझ वे किस अनूठे नाट्य-प्रस्‍तुति से हाथ धो रहे थे.


[1] . बाद में जंगली आदमियों का हो गया. जंगली जानवर दुम दबाकर जाने किन जंगलों में भाग गए. भगोड़न की उस गौरवशाली परम्‍परा को पुष्‍ट करता हुआ मैं महाराष्‍ट्र के जंगल अर्थात बंबई की तरफ़ निकल आया, जहां मनुष्‍य की शक्‍ल में साम्‍भरों की कमी नहीं थी. आज भी नहीं है.

एक आवारा तिलवा-बंदी

दिनभर जतन किये जिन्‍हें बुहारते रहते हो

रात की गोद में फिर वही संवारते रहते हो


देखा न साथ संगत किये कभू, अमां फिर कौन हैं

जौन दीना शंकर त्रिभुवन मुरारी पुकारते रहते हो


यहां रात-दिन बरसती हैं चोटें, औ' तब्‍बो गुज़र होता है

बस इक तुम्‍हीं हो कि छाती की सीलन उघारते रहते हो


मन भर जाये कह लेना, सुन लेंगे वो दिन हम

अभी कुच्‍छ नहीं जो जागी रातें गुज़ारते रहते हो.


(यह ख़ास मिस बोकारो सुरंदरी के लिए)

Friday, November 25, 2011

बाजना बाजाओ ना ओ गान्‍ना गावैया..

ओ बुल्‍गरिया के गवैया मत आओ येह गली मत गाओ गाना, बाजना तो मत्‍ते बजाना, बिस्‍कुट और चाह पर खिंचता है दिन, भूले कब्‍बो सीढ़ी चढ़ मुस्‍की एक ऩज़र देख जाती है (उस एक्‍के नज़र में हरमख़ोर सत्रह मर्तबे लजाती है), का चाहते हो तुमरे चक्‍कर में ऊहो बंद करे ई घर का पानी-दाना? ना बाबू मत भरो बैगपैपी में हावा (फट्टल चदरा से बाजा ढांके रक्‍खो, गांजा पिये सुत्‍तल) गरीब पे रहम करो, मत छेड़ो हियां दरद के तराना.

पिट्टल सब राष्‍ट्रीयता के दरदभरा तान, पिटइलों के सोगगीत गान का बाबू अब कवन मतलब है, अट्ठारह के काननबाला अऊर अड़तालीस के बुझव्‍वलबीन सब सड़क अऊ संडास में रनबीर का कपूर साट रहे चाट रहे हैं, तुम झुट्ठे आत्‍मा का चित्‍कार हाहाकार का हिनहिनायन फैला रहे हो, काहे बाबू गाल बजा रहे हो? हमरे माफिक तीन तिलकुट होंगे गंदा बिछौना से भहराकर ज़मीनी कीच पे गिर रहे हैं, मन के बकरी घबराकर दिल के कोना तोड़ सब सुरच्‍छाकवच फोड़ जाने कवन अंधारबन भाग जाती, मिमियाती हेराये रहती दोबार हाथ नै आती है, बकिया कोई अऊर सुनता है जी? सन् उन्‍चालिसे में बूझ लिये थे ई गहिरा रहस्‍स महापरान श्री सूरजकांत, आपको अब्‍बो ले नै बूझ रहा है जी?

Monday, November 14, 2011

धीमे-धीमे, कभी

धीमे-धीमे पानी के अतल में उतरते ही सुन पड़ने लगी पंखे की घरघराहट वह मशहूर, बंद अलमारियों के खुले खुलने लगे दृश्‍यबंध, होंठ भींचे अपनी हिचकियों के बीच मैंने खोल लीं झक्‍क आंखें, चिपचिपाहटों से गुज़रते दीखने लगे जीव-जंतु जिन्‍हें खुले दिन खुली नज़रों देखने की हिम्‍मत न होती कभी बेहोशी में भी भूलकर. दीखी वह औरत जो मेरी ज़ि‍न्‍दगी नहीं मेरे ख़्याल के तवह्हुमात में भरी मुझे घुमाने, डॉक्‍टर दिखाने लिए गई थी, मैं दीखा पागलों की सभा में मरने की सूरतों की एक कार्रवाई क़लमबंद करता, सिर व कंधे खुजाता, एक बहक में सुलगकर दूसरे की फुनगियों पर फुदका गया आंखें मूंदता चौंककर जागता. सरसराते पन्‍नों की गलियों के अंधेरों के पार किताबें दीखीं जिनके बालों में एक उम्र से तेल न पड़ा था, सफ़री झोले में संतरों के ताज़ा छिलके और गंदे नाख़ूनों की पपड़ि‍यां और एक जोड़ी नये मोज़े, सपनों की चंद जवान कमीज़ें दिखीं, अलसाई, जो किन्‍हीं और शहरों में खरीदी किन्‍हीं और शहरों भूल आया था. पान की गुमटी में एक कुम्‍हलाई औरत ज़ि‍द करके हंसती, गंदे दांत दिखाती बताती दिखी कि भैया, तुम्‍हारी बहन नहीं हूं, तुम्‍हारी कोई भी नहीं हूं, तुम ग़़लती से ‘पहचान’ के सेट पर भटके आये दीवाना हो रहे हो, यहां तुम्‍हारा कोई नहीं है, कोई किसी का नहीं है. बकरियों के एक झुंड को ठुमरी सुनाता, रुलाता एक बूढ़ा कसाई दिखा, जासूसी उपन्‍यास से निकली कुछ उदास मछलियां जो ख़ून के सूराग में निकली हाईवे के ट्रैफिक में रास्‍ता भूल गई थीं.

Sunday, November 13, 2011

सैदुल्‍ला, सुधीर और उदास नस्‍लों के अन्‍य क़ि‍रदार..

क्‍लास में फ़र्स्‍ट आने से अलग सैदुल्‍ला की कोई पहचान नहीं थी. उसे फिरोज़ ख़ान, जितेंद्र की फ़ि‍ल्‍मों के नाम नहीं पता थे, ना ही ऑस्‍ट्रेलिया के सबसे डेंजरस बॉलर के बारे में कोई जानकारी थी. जबकि बेनी का बड़ा भाई बैंजो बजाना जानता था, सुदीप्‍तो रथयात्रा के रथ पर घंटे भर के लिए चढ़ा था, संजय गुरुवारा (उसके पापा अस्‍पताल के स्‍टोररुम में काम करते थे) असल ऑपरेशन थियेटर के अंदर जाकर घूम आया था, प्रोबीर मंडल सोनापानी वाले टूर्नामेंट के एक ओवर में दो चौके और दो छक्‍के पीट चुका था. बलविंदर कोहली के घर में रेकार्ड प्‍लेयर था और उसकी मां रसोई में लौकी का कोफ्ता बनाते हुए गुनगुनाया करती, कृष्‍णन साइकिल के राड और कैरियर पर दो लड़कों को बिठाकर पंद्रह मिनट में दीपा टाकीज़ की दूरी नाप लेता, जबकि सैदुल्‍ला के हाथ अभी भी साइकिल चलाते में कांपते थे, देह तनी रहती और तनाव में गोरा चेहरा सुर्ख़ लाल हो जाता और कोई उसके कैरियर की तरफ चढ़ने को लपके, उसके पहले ही वह साइकिल से उतर जाता! सच्‍चाई थी सैदुल्‍ला साइकिल चलाना जानता नहीं था. चमड़े के जूते और दो जोड़ी लाल मोज़ों और क्‍लास में फ़र्स्‍ट आते रहने की कमाई के सिवा सैदुल्‍ला के पास कुछ नहीं था. सैदुल्‍ला कुछ नहीं था. सच्‍चाई थी सैदुल्‍ला से सुधीर को नफ़रत थी.

क्‍लास में मनप्रीत, शंकर और सेक्‍शन बी से सुकांत तीन लड़के थे जो नदी पार पहाड़ि‍यों की दूसरी तरफ़ आदिवासियों का गांव घूम आये थे, निकलने के ठीक पहले सुधीर की हवा निकल गई थी कि भैया को पता चल जाएगा और उसकी पिटाई होगी और वह नदी-पहाड़ और आदिवासियों का गांव घूमने से रह गया था और उसमें सैदुल्‍ला की कोई भूमिका नहीं थी. मगर फिर भी सुधीर किसी को पीट देना चाहता था. अच्‍छा होतो वह सैदुल्‍ला को पीट सकता. हालांकि सुधीर की देह में जान नहीं थी और डील-डौल में सैदुल्‍ला उस पर भारी पड़ता. लेकिन नफ़रत की अपनी ताक़त होती है. और वह शरीरी ताक़त पर हमेशा भारी पड़ती है. नफ़रत की ताक़त में आक्रांत सुधीर दास आंटी के जामुन के पेड़ चढ़कर उसकी फुनगियों तक पहुंच जाता, जबकि सब जानते कि उस ऊंचाई तक पहुंचने के बाद जामुन के पेड़ से नीचे ज़मीन पर लौट आना असंभव है. फिर दास आंटी को ख़बर हुई कि कोई पेड़ पर चढ़ा है तो वह नीचे से बंगला में गालियां देतीं ढेले मारतीं. प‍सलियों में एक ख़ास झुरझुरी महसूस करता सुधीर लेकिन तब दास आंटी की गालियां, ढेले, मौत किसी चीज़ की परवाह नहीं करता क्‍योंकि वह अपने भीतर की नफ़रत और गहरी उदासी से किसी भी सूरत मुक्‍त हो जाना चाहता था! इसीलिए तब बलविंदर की मां के हाथ के बने उसे प्‍याज़ के भजिये भी पसन्‍द नहीं आते, न बलविंदर का चित्रा सिंह की तुम्‍हारी अंजुमन से उठके दीवाने कहां जाते’ सुनते हुए ऐसे मुंह बनाना मानो कोई उसे कान के रास्‍ते करैले की बरफ़ी खिला रहा है, या उसके कंधों में स्‍क्रू-ड्राइवर घुमा रहा है, और उसके बाद सोफ़े के पीछे जाकर खड़े हुए सवाल करना कि “यार, कहां से निकालती है ये ऐसी आवाज़? तू समझ रहा है मैं क्‍या कह रहा हूं? माने परेशां रात सारी है सितारों तुम तो सो जाओ ये ऐसे नहीं गाती..”

बलविंदर उसका इतना गहरा दोस्‍त था क्‍यों नहीं समझता कि जैसे, जहां से भी गाती चित्रा सिंह सुधीर को परवाह नहीं थी.

सुधीर को दरअसल प्रीति जैन की भी परवाह नहीं थी जो सैदुल्‍ला के पीछे-पीछे क्‍लास में नियम से सेकेंड आती और उनका फ़र्स्‍ट और सेकेंड आना कुछ उसी तरह की बकवास कहानी होकर रह गई थी जैसे मनोज कुमार की फ़ि‍ल्‍मों में महेंद्र कपूर के गाने को होना ही होता और किसी भी मैच में ओपन करने के लिए फील्‍ड पर उतरते ही तीसरे ओवर के पहले सुधीर का स्लिप या मिड ऑन के कैच में आउट हो जाना! सुधीर को क्रिकेट और प्रीति दोनों से नफ़रत थी जो साइंस के पीरियड में सैदुल्‍ला को ऐसे देखती जैसे ‘गोपी’ में सायरा बानो दिलीप कुमार को देखती है.

सुधीर जानता था उसकी नफ़रत गहरी गड़बड़ि‍यों का कारण हो सकती हैं तब भी वो सरस्‍वती पूजा के आसपास भैया की नोटबुक प्रीति को दिखाने ले गया था. भैया ग़ज़लों के दीवाने थे और उसके पीछे वैसे ही पागल रहते जैसे राजू और उसके गुट के लड़के किसी के साथ बिना वज़ह मारपीट करने को लेकर रहते. ग़ज़लों के कंसर्ट के लिए भैया दूर और अनजानी जगहों उसी हिम्‍मत से चले जाते जैसे पहले के समयों में लोग लड़ाई के मैदानों में पहुंचते होंगे, कृष्‍णन और प्रोबीर मंडल ‘यादों की बारात’ के पहले दिन का पहला शो देखने पहुंचते थे. भैया की नोटबुक अमानत अली, नय्यरा नूर, क़तील शिफ़ाई, मेंहदी हसन, जगजीत सिंह और जाने किन-किन उस्‍तादों की लिखाइयों से अंटी पड़ी रहती. भैया की अनुपस्थिति में सुधीर नोटबुक उलटता-पुलटता कि कोई गंदी चीज़ पढ़ने को मिले और मज़ा आये. प्रीति को वह ख़ास तौर से ‘सबको हम भूल गए जोशे-जुनूं में लेकिन, एक तेरी याद थी जो भुलाई ना गई’ पढ़ाना चाहता था.

उसके बाद सुधीर की निगाह में नोटबुक आई तो वह प्रीति के पास नहीं, सिहंदेव सर के हाथ में थी और कॉमन रुम में सिंहदेव सर अकेले नहीं, पाणिग्राही, उपाध्‍याय सर और दास, टिग्‍गा आंटी के साथ बैठे थे. सिंहदेव सर जानना चाहते थे आखिर क्‍या सोचकर उसने प्रीति जैन को ऐसी चीज़ दी थी. ऐसे सीधे सवाल का जवाब देना सुधीर को बहुत टेढ़ा लगा था लेकिन कुछ देर चुप रहने, वह किस-किस तरह से पिट सकता है की विहंगम कल्‍पनाओं के बाद उसने निर्दोष तरीके से जवाब दिया था कि वह प्रीति को भैया की अच्‍छी हैंडराइटिंग दिखाना चाहता था!

सिहंदेव सर के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया, अलबत्‍ता रजिस्‍टर चेक करती टिग्‍गा आंटी मुस्‍कराने लगीं. सिंहदेव सर यूं भी चेहरे पर बिना भाव लाये पीटने के लिए, और बहुत-बहुत देर तक पीटते रहने के लिए मशहूर थे, बोले, “तुमको क्‍या लगा तुम जगजीत सिंह का सवाल करेगा प्रीति तुमको चित्रा का जबाब देगा? अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की, तुम क्‍या समझो तुम क्‍या जानो बात मेरी तन्‍हाई की, क्‍यों?” उपाध्‍याय सर अपनी कुर्सी से उठने लगे, सिंहदेव सर के हाथ का स्‍केल उनके हाथ में मचलता रहा, चीख़कर बोले, “अभी बोलता काहे नहीं? दिल को ग़मे हयात गवारा है इन दिनों, पहले जो दर्द था वही है प्‍यारा है इन दिनों, हां, नहीं?”

सुधीर ने मन में हिसाब लगाया सिंहदेव सर से आज जितने स्‍केल खाये से ज़्यादा ज़रूरी है उनके हाथ से भैया का नोटबुक वापस हासिल कर ले, वर्ना भैया स्‍केल नहीं लात और कुहनियों से हिसाब बराबर करेगा, उसे प्रीति से इंतहा नफ़रत होती रही, वह किसी भी सूरत में ऐसी लड़की से कभी, अगले जनम में भी, शादी नहीं कर सकता, उस पर और सैदुल्‍ला पर तरस खाते हुए भी नहीं, बिना थूक गटके सिंहदेव सर से आंख मिलाकर सुधीर ने हिम्‍मत से जवाब दिया, “चित्रा सिंह क्‍या गाई है, कहां से गाई है, मुझे नहीं मालूम, सर, भैया सुनता है, मैं ग़ज़ल नहीं क्रिकेट कमेंटरी सुनता हूं?”

(जारी)

Wednesday, November 9, 2011

जगहदीन के रंग औ' रौशन..

कितनी रौशनी है जगह कितनी है, धीमान? पैरों से एक चक्‍कर लगाना हुआ तो, ठीक से किसी को समझाना हुआ तो, कितनी है कितनी है, जगह कितनी है, धीमान?

नाक की सीध में साढ़े पांच कदम चलता हूं उसके बाद सामने खिड़की खड़ी है, नहीं, उजाला खिड़की में नहीं बिजली की बत्‍ती में पड़ी है, खिड़की तो सामने लगी दूसरी इमारतों की पीठ में जड़ी है (आलमोस्‍ट, खिड़की प्रतीकात्‍मक है, मित्र, जैसेकि इस अभागे मुल्‍क की राष्‍ट्रभाषा है, है है और नहींये है, इज़ंट ईट? इट्स सो फ़न्‍नी ना? इट्स सो फकिंग फ़न्‍नी दैट इट प्रोवोक्‍स माई डोरमेंट प्रोस्‍टेट, एंड हू नोज़ इफ टुमोरो वन विल बी पिसिंग ब्‍लड?), और अब तुम सामने की इमारतों की तो नहीं ही पूछना, उनका होना तो बस मेरे एड्रेस की नाक चढ़ाना और उनकी अपनी कटाना है, उससे ज़्यादा हमारे आपस का क्‍या सम्‍बन्‍ध, इतना यही ना कि हम शहर के आंकड़ों में हैं और वो रोकड़ों में, रोकड़े होंगे तो इमारत मज़बूत होगी ही, बड़ी और महंगी भी, क़ायदे से तो मुझे खुश ही होना चाहिए कि मेरी खिड़की को छेके खड़ी हैं, चिन्‍ता मत करो क्‍या मालूम एक दिन खुश भी होने लगूं, मगर इससे ज़्यादा उनके बाबत कभी जानूं कुछ बता सकूं की हालत में माफ़ करो कभी नहीं रहूंगा, इंसिस्‍ट करोगे तो आऊटलुक, इंडिया टुडे, एचटी के सप्‍लीमेंटों से खोजकर उसके आंतरिक डिज़ाइन की तुम्‍हें फ़ोटो दिखला दूंगा.

ओह, हाऊ डिस्‍ट्रैक्‍टेड यू आर, धीमान? मैं तुमसे तुम्‍हारी रौशनी और जगह पूछ रहा हूं तुम पड़ोस की इमारतों में उलझ रहे हो, आयम नो बायर तुम्‍हारा दोस्‍त हूं, यू रिमेम्‍बर? जस्‍ट अ लिटिल बिट प्रेस्‍ड विद् टाईम!

वी आल आर, कैन आई हैव अ स्‍माईल? मेरे यहां तो आई स्‍वेयर सभी कुछ प्रेशर में है, रौशनी का तो पूछो मत, हमेशा बेचारी शरमाई घबराई रहती है (महीने के आखिर रेलायंस एनर्जी है जो बिल बनाते में शरमाता नहीं), मगर इस देश में, जहां अभी भी बिजली बोलने से पहले लोग इंवर्टर बोलते हैं, मैं क्‍यों क्‍या रौशनी की इतनी कहानी बनाऊं, रहती है रौशनी, हाथ की रेखाएं और इतने और उतने भर दिखते दीवारों की गंदगी पढ़ सकता हूं, पलथी मारे पंखे की हवा के नीचे बहल सकता हूं (पलथी मारने जितनी जगह है, और हां, तुम दूसरी हवाओं का मत पूछना, शहर-समुंदर एंड ऑल दैट, मैं सिर्फ़ पंखे की हवा का जानता हूं, बस की खिड़की पर बैठे किसी हवा के झोंके ने उनिंदियाया होगा तो वह बारह वर्षों पहले का क़ि‍स्‍सा है, और ऐसे कुलजमा साढ़े तीन क़ि‍स्‍से होते हैं जीवन में, जैसे समुंदर में नौका-विहार के, उसका सामान्‍यीकरण करके पंखे की हवा से मेरे अंतरंग संबंध को कमतर मत करो, जितना जीवन में मां को और पिता को नहीं जाना, उससे कहीं ज़्यादा इस पंखे की हवा को जानता हूं दैट्स अ फैक्‍ट), इस इतनी ज़रा सी जगह में यह भी सच है कि दीवारों से टकराता रहूं, मगर शहर के शोर, आदमख़ोर में मुंह धंसाने से कम घिनौना दीवारों से सिर भिड़ा लेना लगता है, दोस्‍त, तुम कहोगे, और सही ही कहोगे, उल्टा-सीधा सिकुड़ा संकीर्णयाया जीवन यह जो जी रहा, वाजिब शहरी व सामाजिक आचरण नहीं, मगर तुम्‍हीं बताना, सच्‍ची, शहर और समाज अब हमसे मामूलियों की कहां पकड़ आता है, शहर के बाइस्‍कोप से शहर पहचानने की जगह मेरी धंसन में शहर की तस्‍वीर बुनो, कैन यू? वर्ना तो सब तरफ़ शहर की स्‍थूल सेंसेशनल फ़ि‍ल्‍मी इमेज़री है ही, खरीद के काउंटर हैं धंधों की बाजीगरी है, त्‍यौहारी शोर है, समाज में किसकी दिलचस्‍पी और सामाजिकता का कहां ज़ोर है? आई मीन, कमॉन मित्र, आप हैं कहां खड़े?

धीमान, धीमान? विल यू शट अप एंड गिव मी अ क्‍लि‍यर पिक्‍चर, प्‍लीज़? हैलो हैलो, हू इज़ देयर ऑन द अदर साइड, कैन यू हियर मी?

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(कल अख़बार में दिखी एक ख़बर के अंधियाये अंजोर में)

बेताल सत्‍तीसी, कि बेताल चालीसा?..

बिजली आई. बिजली गई. फिर आई. फिर गई. जसोदा और गोदावरी दोनों बहनें फ्रॉक की बांह की सिलाई के वाजिब तरीके को लेकर सिर-फुटव्‍वल कर रही थीं, अजीजन बी की फुलझड़ी “आग लगे इन हरामिन को!” को सुनकर पटा गईं. अंधेरे में गोदावरी माथे के जुएं टटोलने लगी. सिर पर जसोदा के हाथ का पटका पड़ा, “दुई मिनट चैन से बिठात ना है?”

गोदावरी बहन पर एकदम से पलटवार करना चाहती थी मगर ज़हर का घूंट पीकर रह गई.

जसोदा पंद्रहवें वर्ष में पैर रख रही थी, गोदावरी उससे दो साल छोटी ठहरी. जदुनंदन पंडित की दूसरी पतोहु और अपनी सौतेली मां की दुत्‍कारी दोनों बहनें बिना झगड़े आधे घंटे साथ बैठ नहीं सकती थीं. दोनों बहनें आधे घंटे एक दूसरे से दूर नहीं रह सकती थीं.

बुन्‍नन अंधेरे में मुस्‍करा रहे थे. सधी उंगलियां बटन टांकने में बझी थीं, अनसधी आंखें अजीजन बी की दिशा में घुमी उन्‍हें टटोल रही थीं, मन की खिलन खुदी में सहेजे रखना और संभव न हुआ तो हारकर बोले, “फूफी, तू हम्‍मर बियाह कराय दो!”

इतने में बिजली आ गई. गोदावरी और जसोदा ने एक सुर ताली बजाई. नाक के बीच मोटी ऐनक दुरुस्‍त करती अजीजन बी ने खरखराती लम्‍बी सांस छोड़ी. मशीन के नीचे सीधा करने को पैर किया और तड़पकर फिर उसी सूरत बैठी रहीं!

जाने अब किस निगोड़ी नस ने अपना मुंहजार करम किया! देह का भारीपन ही एक दिन उनकी जान लेगा! नहीं तो चौंसठ की उमिर में कोई दीवार थामकर चलता है? कहीं चार सीढ़ि‍यां चढ़नी पड़ती हैं तो कनपटी लाल हो जाती है, पसीने छूटने लगते हैं. क्‍या करें मुये देह का, सुब्‍हो से लेकर रात तक खटती तो रहती ही हैं, ज़रा खुटुर-खुटुर की धीमी गति में खटती हैं, मगर एक्‍को दिन कहां निकलता है कि खाली बैठी हों? खाली बैठना होता तो इस उमर में इत्‍ती चिथड़े-सी जगह में यह चिथड़ा दरजी दुकान ढोती माथे पर? फिर खुद का उनका खरचा ही क्‍या है, कबूतर की सी तो खुराक है. एक बकरी है घर में, उनसे ज्‍यादा तो वह खा जाती है. हां, रात को कभी बुन्‍नन को रोक लिया तो यह बेशरम ज़रूर उस दिन की रोटियां सधा जाता है. एक बेआसरे बच्‍चे को भरपेट खिलाने की अजीजन बी को दिली खुशी भी होती है, मगर देखो, हरामी की हड्डियों पर पैसे भर का जो मांस चढ़ता हो, और वो हैं कि दो निवालों पर फैली जाती हैं!अजीजन बी ने हिम्‍मत करके अब पैर हिलाने की कोशिश की.

“बियाह होई जाई तS लइका-फइका होइहें, घरे केतना हरियाली आय जाई, ना फूफी? सब तोहार सेवा करिहें!” खुशी में नहाये बुन्‍नन का रेकार्ड जारी था.

“खूब करिहें,” अजीजन बी धीमे-धीमे घुटने और पिंडलियों पर हाथ फेरती रहीं. उनके अपने दो हैं, अल्‍ला के फजल से तंदरुस्‍त हैं, रोजगार से हैं, हाथ की तंगी की तक़लीफ़ नहीं, मोहसिन तो कम अज़ कम, दिखावे को ही सही, बीच-बीच में अपने पास गाज़ि‍याबाद चले आने की बात करता है, मज़हर के मुंह से तो कोई बात ही नहीं निकलती. कितना बखत हुआ जब पिछली मर्तबा हियां आया था, वो बुखार में थीं, नट्टन की पतोह उनकी देखभाल किये रही, कितना टैम हुआ ऊ बात को? अब सब अपनी जिन्‍नगी जीते हैं, बौआ, केकरे पास अब केहू के सेवा करे की फुरसत है, महतरियो खातिर नहीं है!

“लइकन हम्‍में बहुते पसंद हैं, फूफी, बस तू एक बार हम्‍मर बियाह कराय दो, देखS कउने इस्‍पीड से लइकन तोहर आगे सजावत हैं!” अधमुंदी आंखों आसन्‍न खुशी की सोच-सोचकर बुन्‍नन निहाल हुए जा रहे थे.

“और लइकन के खियइबे कहां से रे?” फूफी ने लाल लुकाठी फेंकी.

बेहया बुन्‍नन की खुशी को ज़रा हरज न पड़ा, वैसे ही मुस्कियाये बोले, “का फूफी, हमके रोज रोटी खिवायत हऊ, हम्‍मर लइकन के न खियउबू? ऊ तोहरो तs होइहें!”

अजीजन बी बरसीं, “तू पैदा करे और खियाये के ठेका हम उठाईं? चइली-चइली पीटके तोहर चाम ना उधेड़ दीं?”

गोदावरी व जसोदा द्वय मुंह पर हाथ धरे खी-खी में उमगती रहीं. चइली की चोट की आशंका में बुन्‍नन खिसियाये नहीं, अधमुंदी आंखों मुस्कियाते ही रहे.

गो बुन्‍नन की उम्र अट्ठारह की हो रही थी, बाहर से देखने पर जसोदा से डेढ़ बरस छोटे ही दिखते. सोच-विचारने की उम्र गोदावरी से भी कम थी, और आगे भी मालूम नहीं कब तक ऐसी ही रहे. कौन जानता है शायद हमेशा ही रहे, अजीजन बी सोचीं और हलक में एक उदास घूंट पीकर रह गईं, चइली फेंकने के अपने गुस्‍से पर शर्मिंदा हुईं ऊपरी मन से बात बनाती बोलीं, “और तोसे होनहार के के आपन लइकी दी, बताओ जरा?”

बुन्‍नन उंगलियों से अगले बटन की जगह टटोलते मुस्कियाते रहे, मुस्कियाये-मुस्कियाये सोचते रहे. फूफी गोदावरी की तरफ पलटीं, “तैं करबे रे बियाह बुन्‍नन से?!”

“मियां से हम कब्‍बो बियाह ना कर सकीत हैं,” गोदावरी ने चट सिर झुकाकर गंभीरता से कहा.

जसोदा मुंह पर हाथ धरे हंसती रही, “एक तs मियां, ऊपर से लंगड़, अऊर हमसे तs उमिरो में छोट है, हम्‍मर तs बाते भूल जाओ, फूफी!”

अबकी अजीजन बी से भी मुस्‍कराये बिना रहा न गया, “सुन लेव, मियां जी!”

जसोदा का कसूर था भी नहीं, बुन्‍नन सचमुच उससे उम्र में छोटे लगते थे. फिर बायें पैर में सच्‍चो एकदम ताक़त न थी. ऊपर से कंधे से लेकर पसलियों के बीच तक जली हुई पीठ के साथ बड़े हुए थे. आंखों में उतनी ही रौशनी थी कि ज़ि‍द ठानकर किसी चीज़ को देख लें, मगर फिर घंटों गनगनाता सिर हाथों में लिये बैठे रहने की नौबत भी हो आती थी. ग्‍यारह की उमिर के रहे होंगे जब फसाद में पूरा परिवार उठ गया गया था. यही बहुत था कि पिछाड़े की गली में कमरबंद संभाले तन्‍ने की साइकिल के पीछे भागते उनकी नन्‍हीं जान बच गई थी. अब चूंकि जलती आंधी के चपेटे में पूरा महल्‍ला आया था, थोड़ी कीमत बुन्‍नन को भी चुकानी पड़ी. हाय-तौबा की भगदड़ में किसी जलते ड्राम से टकरा गये, पैर फिसला और गिर पड़े. होश लौटने पर जिस सूरत में खुद को पाया आज तक उसी जली, तबाह को साथ लिये घूम रहे हैं. मगर चेहरे की मुस्‍कान तो आज भी कोई उनसे छीन न सका है. दो मीठी-मीठी बातें करके बुन्‍नन से उनका सिर उतरवा लो, देखो, कैसे खुशी-खुशी अपने हाथ अपना सिर उतारकर आपकी हाथ में धरते हैं!

“ई बकलोल संगे के बियाह करी, केऊ ना करी!” जसोदा दीदी ने अपनी ओर से आखिरी फ़ैसला दिया. गोदावरी बबुनी खी-खी में निहाल होने लगीं, इतने में निगोड़ी बिजली फिर गई.

दुबारा आई तो अपने साथ पांच साल की रौशनजहां मुनमुन सिंह को लिये आई. हमेशा की तरह, चिरकुट कपड़ों और कांथे में लिपटी, मुनमुन की दुलारी गुड्डन रौशनजहां के चंदोवे छाती पर सो रही थी.

मशीन के सामने बच्‍ची पर नज़र जाते ही अजीजन बी का थका चेहरा खुशी में खिल गया, शरारत से हाथ नचाती बोलीं, “का हो, मुनमुन, तू हम्‍मर बुन्‍नन से बियाह करबूs?”

फूफी के सवाल से नन्‍हीं मुनमुन फेर में पड़ गई. आधा दर्जन बेटियों वाले राम इकबाल सिंह के परिवार में हमेशा चिखचिख मची रहती और मुनमुन के लिए अपनी गुड्डन को दो कौर खिलाना, या चैन से एक घड़ी किसी कोने सुला लेना, मुहाल था. उससे बड़ी बहनें हमेशा उसके सिर चढ़ी रहतीं, या वह गुड्डन को सुलाने का जतन करती होती कि मां छुटकी उसके हवाले करके आटा सानने चली जाती, गुस्‍से में मुनमुन का दिमाग ‘फेल’ हो जाता, अभी भी दिमाग फेल ही हुआ है जो वह सबसे जी छुड़ाके भागी आई है, मगर इस भागे में व्‍याह कर ले? अभी, इतनी जल्‍दी? मुनमुन सोचती रही.

सोचकर समझदार पुरइनों सा बोली, “अब्‍भी तs हम्‍म इस्‍कूलो ना गये, कइसे बियाह कइ लें. हां, बुन्‍नन हम्‍मर गुड्डन से बियाह कइ सकत हैं! वइसहो हम्‍में गुड्डन खातिर एगो दुल्‍हा के दरकार रहा.”

जवाब सुनकर बुन्‍नन लाजवाब हो गए. मुनमुन के मुंह का कुछ भी सुन लें, उनकी गोद में चढ़कर बच्‍ची कुछ भी कह दे, उनकी नाक खींच ले, भौं बकोट ले, बुन्‍नन का मन मनभर खुशी में डूब जाता है, और फिर देर तक डूबा रहता है. फूफी इतना भर कह दें, "रौशनजहां, हियां आवs बौआ!" बुन्‍नन के कानों में बरफी और कलाकंद पिघलकर बरसने लगता है. दिक्‍कत यह है कि ऐसे मौक़े बहुत बनते नहीं. मुनमुन फूफी की दुकान के दौरों पर आती भी है तो पीछे-पीछे उसकी खोज में उसकी बड़ी बहनें भी चली आती हैं. फिर कुछ के कुछ की कहा-सुनी में कुछ कटी बातें फूफी को भी सुनना पड़ती ही हैं. ऐसे मौक़ों पर तब बुन्‍नन को अपनी चाहना से फिर शरम लगने लगती है. इसीलिए तो बियाह करके अपने बच्‍चे पैदा करना चाहते हैं. एक नहीं चार-चार मुनमुन होंगे, नाक-आंख काटकर बुन्‍नन को जीना मुहाल कर देंगे! कितना अच्‍छा लगेगा! ओह, सोचकर मन तर जाता है. मगर मुनमुन के भी क्‍या दिमाग है, अपनी गुड़़ि‍या से व्‍याहना चाहती है! कहीं गुड्डन से बुन्‍नन का व्‍याह थोड़ी हो सकता है!

फूफी भी मुनमुन को यही समझाती रहीं. मक़्क़ार मनभर खायेगी परातभर सोएगी, काम एक घेले का ना करेगी, और बच्‍चे तो कवनो सूरत न जनेगी, फिर किस उम्‍मीद आदमी ऐसी दुलहिन घर लाये?

मुनमुन का चेहरा उतर गया. बुन्‍नन उदास हो गये.

गोदावरी के “चकलेट खइबू, मुनमुन?” को अनसुना करके मुनमुन तेजी से बुन्‍नन के गोदी चढ़ गईं, नाराज़गी से बोली, “तs हम्‍म इस्‍कूल न जाईं? अउर कालिच? हमें डाकटर बने का है, गुड्डन के रोज-रोज सरदी पड़त है, ओकर इलाच के करी? हमसे बियाह करे के है ते तs तोके अभी इंतचार करे के पड़ी, करबs?”

बुन्‍नन से चेहरा भिड़ाये मुनमुन बुन्‍नन के कान नहीं खींच रही थी, लेकिन उसके सवाल की गरमी में कान खींचने का सा ही शोर था. उस गरमी में नहाये बुन्‍नन वापस मुस्कियाने लगे. जली पीठ पर मानो किसी ने फूलों की लतरों की छत छवा दी हो, उस नेह-नमी में लगभग लजाते-लजाते बोले, “करब, मुनमुन, करब!”

गोदावरी और जसोदा मुस्‍करा दीं. अजीजन बी चश्‍मा साफ़ करने के बहाने नम आंखें पोंछने लगीं, मुनमुन ताली बजाकर हंसने लगी. कौन पाजी न हंसता?

अबकी बिजली गई तो उस ज़रा सी उजाड़ जगह में अभी भी बहुत रौशनी बची थी..

Sunday, October 30, 2011

गिरती हुई का दौड़ता हुआ..


गरीबी के सैरे में ठिठककर खड़े होने के बाद, फिर तेज़ी से दौड़ लैने का कौशल संदीप पाल ने सीख लिया था. दीपशिखा गोप सीख लेने से बार-बार खुद को बचा ले जाती. बाकी लड़कियां गुट में बैठकर हाथों में मेंहदी रचतीं, दीपशिखा मासी की गाय का सानी करने चली जाती. दीवाली के वक़्त पड़ोस के किसी बच्‍चे को गोद में लिये उसके हाथ की फुलझड़ी से चेहरा रौशन करने की जगह, शोर-शराबे से दूर अस्‍पताल के कैजुअल्‍टी की बेंच पर बैठी समय गुज़ार आती. हाथ की चूड़ी और कान के टॉप में ही नहीं, पूजा-त्‍यौहार में भी दीपशिखा की दिलचस्‍पी नहीं थी, मगर दो दिन उपवास करना ही पड़े तो बिना आवाज़ किये भूखे रह लेने का सहज कौशल था उसमें. संदीप काम से लौटकर दीपशिखा की कहानी मालूम पड़ने पर सन्‍न हुआ उससे कहता, तुमि पूरो पागोल, तुमि जानो तो?”
दीपशिखा ने पहले भी यह वाक्‍य सुना था. यह भी कि उसका व्‍याह नहीं होगा, वह सुंदरी नहीं है. दीपशिखा की छाती में उंगलियों की पोर पर और कांख के सूने नमियों में संगीत बजता था, वह सुनती थी, उसे किसी व्‍याह की क्‍यों ज़रुरत थी? वह गिलहरी की तरह इस ठेर से उस टेर तक चुपचाप दौड़ जाना चाहती थी, देह झाड़कर हड़ि‍यल चेहरे पर धूप की गरमी ले लेना चाहती थी, वह क्‍यों चाहे जो बाकी सब चाहते थे?
मगर संदीप चाहता था, शायद इसीलिए वह इतना दौड़ता दिखता था. दीपशिखा संदीप का दौड़ना सुनकर आंखें मूंद लेती.
गिरती ढलानों पे डेरे थे, कैसे रहस्‍यमयी घेरे, ढलती संझाओं में छुपे जुगनुओं के सबेरे थे.. ऐसी ही कुछ उड़ती पंक्तियां, बेख़्याली में पिरोई तुकबंदियां, माने खालिस बकवास, गुनगुनाता संदीप भागा जाता, दीपशिखा उसका हाथ थामे हंसती बेहाल हुई जाती. हंसते-हंसते थक जाने के दरमियान फिर पूछती, “तार पोर? उसके आगे?” संदीप भागने की बहक में गाल में तर्जनी धंसाये सोचने का अभिनय करता कहता, रात और दिन दीया जले, फिर भी मगर जाने केनो आंधारा है.. हंसती दीपशिखा संदीप को मारने लपकती, “शड्अप! चुप्‍प!” दौड़ते बेहाल दोनों गिर पड़ते. लस्‍तम-पस्‍तम की बेध्‍यानी में पिंडलियों में कहीं ठोकर लगती, या यूं ही कहीं नस खिंचने की तक़लीफ़ में दीपशिखा के मुंह से दबी आह छूटती, “मेरा हुआ!”
“कहां? कैसे?” घूमते आसमान में घूमती दीपशिखा के चित्र को स्थिर करने की कोशिश करता संदीप कहता. साड़ी और साये को ऊपर सरकाती दीपशिखा दर्द टटोलती, कि चोट कहां है. संदीप मुंह बनाकर कहता, “मुझे बस दीख रहा है कि तुम पैरों के बाल कभी शेव नहीं करती.”
दीपशिखा कुहनी से संदीप को परे ठेलकर कहती, “मुझे भी दिखता है तुम्‍हारे नाक की उगी हुई फुंसी. भौं पर कटे का निशान.”
“और कंधे पर? पीठ पर?” संदीप वापस दीपशिखा के नज़दीक आकर मनुहार करता.
“कंधे की खिंची हड्डयां. पीठ पर चोट खाया एक चांद..”
“मगर पसलियों की नुमाइश तुम्‍हीं दिखाती हो, ना की, ना की? बोलो! कितनी बार गिना है मैंने?” हंसते हुए संदीप कहता.
“इसलिए कि तुम्‍हें गिनती का शौक है,” पैरों पर साड़ी गिराती दीपशिखा बोलती, “मुझको नहीं है.” वह ज़मीन पर पेट के बल लेट जाती.
“फिर किसका है?” संदीप दीपशिखा के नज़दीक लेट कर बोलता. अब दोनों एक दूसरे की सांसों की बहक सुन सकते. हालांकि दीपशिखा ज़मीन से लगे अपने गाल पर सोई घासों का जलना सुनती होती, फुसफुसाकर कहती, “मैं सुनती हूं.”
“मगर पैर की उंगलियों पर चढ़ा नेल पॉलिश सुनाई नहीं देता. बांह पर बंधा काला तागा, मेरी बनियाइन का फटा, मासी के पैर के बिवाय, उनके गाय की फटी आंखें, मेरी उंगलियों का कांपना दीखाई देगा, तुम्‍हें सुनाई नहीं दे सकता.”
“मैं सुनती हूं,” घास के अंधेरों में आंखें मूंदकर दीपशिखा बोलती.
ढलान से नीचे रेतभरा एक ट्रक गुज़रता होता. रपटी बकरियों का एक झुंड बेतहाशा सड़क के किनारे भागा जाता, साइकिल की हैंडिल पर मछली का झोला टांगे शंखधर मैत्र ढलती सांझ की लकीर पर लौटते; संदीप की आंखों में वह समूची दुनिया धुंधलके का उजास-सा अस्‍पष्‍ट बनी रहती, सिर्फ़ दीपशिखा की नंगी पिंडलियों के महीन रेशों में घने जाल नज़रों में तैरते रहते.
दीपशिखा विक्षिप्‍त मां के अकेलेपन के सूनसान का बुदबुदाना सुनती. छोटे भाई खोकोन की बहू की निस्‍संग, आत्‍मलीन खुशी का बाजा बजाना, भाई की लापरवाह थकान और किसी सूरत में जो जैसा है, चलता रहे, की तरतीब भिड़ाने की बेचारगी, खुद अपनी जवानी का बेआवाज़ गुज़रते जाना, दीपशिखा सब बिना आवाज़ किये सुनती.
एक तंग छोटे से घर में कितनी खुशी आ सकती है? कहां से आ सकती है?” दीपशिखा उमस नहाई गरदन पर हाथ फिराती कहती.
“उस तंग छोटे से घर में पहुंचकर आखिर तुम्‍हें मैंने खोज लिया, नहीं खोजा? उसे नहीं सुना तुमने?” संदीप कहता और एकदम उदास हो जाता.
संदीप पाल छोटी-मोटी नौकरी करता है, छोटी-मोटी कविताएं करता है, हंसता है तो अच्‍छा लगता है, उदास होने पर किसी बीमारी के असर में है जैसा लगता है. दीपशिखा संदीप से प्‍यार नहीं करती, प्‍यार जैसा प्‍यार दुनिया में किसी से भी नहीं करती, मगर संदीप बीमारी के असर में लगे सो भी नहीं चाहती. दांत दिखाये जवाब देती, “मैं सुनती हूं तुम मुझसे पूरे पांच वर्ष छोटे हो! फिर मुझसे व्‍याहकर वह कुछ भी नहीं पाओगे जो तुम्‍हारी उम्र के तुम जैसे एक होशियार लड़के का पाने का हक बनता है!”
“ऐसा? अच्‍छा? सुन लेती हो ये सब?” संदीप आंख चढ़ाकर चिढ़ा सवाल करता.
दीपशिखा होंठ भींचे मुस्‍कराती सिर हिलाती जवाब देती, हां हां.
दीपशिखा की हड़ि‍यल देह पर के टूटे बटन वाले ब्‍लाउज़ के भीतर किसी रहस्‍यलोक की रक्षा के सरंजाम के बतौर बताने लायक ब्रेसियर जैसा कोई ब्रेसियर नहीं होता. उधड़ी हड़ि‍यल छातियों पर किन्‍हीं चांद-सितारों के रहस्‍यमयी अरमान भी नहीं टंके होते; उन पर संदीप के गिरे चेहरे के घने बालों पर दुलार का हाथ फेरती दीपशिखा कहती, “पूरो पागोल तुमि, यहां कुछ नहीं है तुम्‍हारे लिए, तुम्‍हें क्‍यों नहीं दिखता? ”
किसी चिड़ि‍या के नम होंठों की तरह दीपशिखा की छातियों को अपने मुंह और आंख के सपनों में कैद करता संदीप फुसफुसाता, “मेरी चीख़ तुम्‍हें सुनाई नहीं देती? कुछ सुनाई नहीं देता, तुम बहरी हो!”
आंखें मूंदकर दीपशिखा मुस्‍कराती, “हां, हूं. जैसे तुम पागल हो, इस जनम क्‍या किसी जनम मैं शादी करनेवाली नहीं..”
नीचे कोई बदतमीज गिरहत्थिन फिर बेसुरा गाना शुरु करती, रात और दिन दीया जले..

Wednesday, October 26, 2011

आह रे दिवाला..

दुनिया में कौनो जगह हो, कोई सा भी अवसर हो, उसमें उपस्थित होते ही मोटलकुमारी, सब नियम और सौजन्‍यता गोड़ से एक ओर ठेल, देह के लिए जगह निकालकर तड़ देना लेट लेना खूब जानती हैं. इंची-टेप से लंबाई में चार फुट नौ इंच का जगह का छेका बनता है (चौड़ाइयो में, जल्‍दी ही, मो कुमारी इतना ही बिस्‍तार पा जायें ओ में कौना आश्‍चर्ज नहीं! क्‍योंकि भकोसती तो रहती है हरामखोर, दायां-बायां जो हाथे चढ़ जाये, मूढ़ी-सन्‍देश, चिनिया बदाम, पापड़ी, प्‍याजी, डीम के तरकारी, कोंहड़ा के फूल का पकौड़ी, बीच में नारियल का चटनी धरके पावरोटी, जौनो सामने दीख जाये, मोटलिया खसोट सके! चंदरमोहन तो कहते हैं उन्‍होंने भैंसीन को थरिया के दाल में चोरी से ग्राइप वाटर मिलाके सर्ड़-सर्ड़ पीते देखा है! देखा ही होगा. कवनो ताजुब्‍ब ताजुब्‍ब नहीं. मोटलकुमारी को कलाहांडी के अकाल-पीड़ि‍त एरियो में छोड़ के देख लीजिए, हरामीन छत्‍तीस व्‍यंजन के इंतजाम नै कै लीहिस तो हम्‍मर नाम बदल दीजिएगा! जगह का कइसे कर लेती है जी? मजाक बात है? भभुआ रोड वाला रूट पर, एतना धसर—पसर पसिंजर का बीच, जहां एगो पाद तक धरने का जगह नहीं रहता, हरामीन जाने त कवन टेकनीक से, इसको ठेल उसको ठूल के, कांख के टांख के, बस का भीतरी गोड़ ढुकाये पांच मिनिट नहीं निकलता कि बरोबर बिश्राम वाला मुद्रा में पाइल जाती है! मजाक बात है जी? (भले बकिया सब पसींजर मुर्दाइल हालत में पाया जाये!) कोई जरुरतमंद का बच्‍चा, ढुलकल, तनि मोटलकुमारी का कांधा पे गिरल पड़े, देखिएगा, करेजा का छोर से कइसन दरद-बूड़ल कसाईन ओसांस छोड़ती है, जैसे जीवन-लीला का आजे, अभिये, अंत हो रहा हो! तीन मिनिट बाद, बस के उसी खिड़की पर कवनो चनाजोर गरम वाले को ठाड़ा करवा दीजिए, देखिए, जीवन लीला का आज, अभिये अंत होय रहा है का पार्ट अभिनित करे वाली नायिका कितना फुरती से चनाजोर तौलवा रही है! दुनिया में नवटंकीबाज जनाना का कमी नहीं है, मगर मोटलकुमारी का नवटंकी, फार, फरदेस्‍ट बियांड कंपरीजन!

हरामीन को कवनो निर्दयी पुरुष बियाहे कै के लिये गए होता! कि पल्‍ली का लोग चैन का सांस लेते, पूड़ी और पुआ छानते, छेना का मिठाई खा सकेंगे का सपना देखते. क्‍योंकि मोटलकुमारी के पल्‍ली में रहते तो और केऊ कुच्‍छो खा सके का सोचना सपने ही देखना है. हरामीन के मुंह में कब्‍बो छाला और पेट में कीड़ो नहीं पड़ता. सुबह-सकाली अभी जब पंडिजी का पंजीरी और चरनामृतो तैयार नहीं हुआ होता, कितना लोग दिसा-मैदान से फारिगो नै हुए होते, भकोसनकुमारी तीन दोना दही-बड़ा साफ कै गई होती! और अभी दांत में बड़ा फंसले होता कि सोना माउसी को आवाज दिये बिना बाज नहीं आती, कि का माउसी, रात में तीन कनस्‍तर नीमकी तू बनाई हो और चाय पिये हम कहिंयो अउर जायेंगे?

रे मलेच्‍छकोआंरी, सुधर जा रे? मगर काहे ला सुधरेगी? ई मुलुक तनिको सुधर रहा है?

भैंसीन अभी जो है राजू गनेशन का दोहन कै रही है. बारह साल का छौंवा, बेचारा रजुआ, शोषन में सूखके छोहाड़ा हो रहा है. मोटलकीकुमारी के देह दाबना कवनो हंसी-मजाक है जी? आपके देह के सब ताकत का अंत हो जाता है मगर भैंसीन के देह का नहीं होता! देह का होइयो जाता है तो हरमखोर के इच्‍छा का नै होता! डेढ़ घंटा कंड़वाने, खून चुसवाने के बावजूद मुंह खोलबो करेगी तो यहीये बोलने के लिए कि ओह, बयंका कांधा से केतना दरद उमिड़ रहा है! अउर उधर दायें कमर का नीचे नहीं कांड़ोगे, राजू मुन्‍ना?

जबकि रजुआ गनेशन मथवा में अम्‍मां जवनो नारियल तेल का थापा चढ़ाये होगी, सब सामना का बाल और भौं का जंजाल से बहा-बहाके, नथुना फुलाये, खूंखार एमजीरआर हो रहा होगा, मगर क्‍या मजाल कि भकोसनकुमारी एतनो के बवजूद बाबू बच्‍चा को अपना खूनी चंगुल से निकल जावे दे? न्‍ना! पीठ के बाद अब बीस मिनिट वाला पेटकुनिया वाला करवट लेगी, देह कंड़वाये का स्‍वर्णिक आनंद में बूड़ल, आंखी मुंदल, दरद-नहाया गुनगुनाइन (ओह, केतना कसाईन) शुरु करेगी, ‘रोला के गया सपना मेरा, बइठी हूं कब होगा सबेरा..’

Friday, October 21, 2011

लिंकिन..

फिर चढ़ी धूप. हिला दिल, खुले बोल.

उट्ठेगी हूक, मगर तू संभल के बोल. वो और होंगे जो बोलें दहल के बोल.

स्‍टीवी ज़ुनूं में सुनें कुछ बिना बहलके बोल..?

Wednesday, October 12, 2011

छोटे शहर में..



दिन की छाती पर सवार
कमअक़्ल क़ाहिली रंगियाती है मंज़र
हरियाये बाइकर्स लड़ि‍याये चूतियामदन
मीसते हैं सैरे, रोज़ का जीवनधन
खरीदारियों के मेहराये ठेलों पर होता
चीकटइयों का बसाइन आधुनिकीकरण
बेमुरव्वत फ़ि‍ज़ाओं में बेहया पादों-सी
धड़धड़ाती छूटती इमारतें, फूटतीं
किसी तीन साला बच्ची का कूकना भी
मोबाइल के कैमरे के क्लिकयाने का बहाना होता
जैसे चमकती, नई सुबह में घर से निकलना
फिरंगी जोगर्स जूतों को आजमाने का
बाप की बूढ़ी भारी, हांफी सांस
सिरे से उठती, पसरती जाती
नाख़ून पर खिंचा भोंथरा चोट दीखता
तुम्हारे खरीदे नये कपड़े दीखते
तुम नहीं दीखतीं
मानो ख़याल थीं कोई
और ख़यालों की इस जगह में कोई जगह नहीं
जैसे लेटे में मैं खुद को भागता देखता
और किसी सूरत अपनी पकड़ नहीं पाता.

Thursday, September 1, 2011

एक तिलकुट डिटेक्टिव स्‍टोरी की गुठली..

एक कहानी का जन्‍म होता है. रांची, पलामू, सतना, मथुरा, अजमेर, मुंगेर, पिथौरा की इतना भर पगडंडियां झांक जाती हैं, भोपाल का ताल औ’ लखनउव्‍वा ढाल चंद स्‍मार्ट वन-लाइनर्स बोल जाता है, सड़क शिलॉंग तक पहुंचती नहीं. ज्ञानपीठ औ’ सरकारी तालियों पे ज़ि‍न्‍दा ढाई अन्‍य साहित्‍यपीठों की धूलसनी अलमारियों में कभी ब्रह्मपुत्र का मैदान, कश्‍मीरी सूनसान खुलता भी है तो साहित्‍य के बियाबान में ही खुलता है, घमासान में हमेशा दो कौड़ि‍या सूचकांक, प्रेमकथा विशेषांक रहते हैं. तीन तिलंगों की तिगड़बाजी एक बूढ़े का प्रलाप और कुलजमा डेढ़ पत्रिकाई प्रताप होता, फकत चार शहर, बहत्‍तर गांवभर के झमेलों, फटे चादरों के मेले में साहित्यिक खेला होता है. एक कहानी का जन्‍म होता है.

नई उम्र के साहित्‍य-धांसू को छेड़कर साहित्यिकी की टोह लीजिए, देखिएगा, चेहरे पर मुर्दनी गिराये खबरदार करेगा, ‘सब गोबर है!’ और फिर उतनी ही निश्चिंतता से, दांत चियारे आत्‍मविगलित सूचना में नहलाये जाएगा, ‘वो सिर्फ़ मेरा है अनूठा, अनुपम है. अपने साहित्‍य में मेरी बड़ी आस्‍था है!’ वैसे ही जैसे शरद पवार की स्‍वयं में और आपकी बीवी की आपके बच्‍चों में है. प्रकाशक की दो आलोचक और सात सरकारी अफ़सरों में है. पाठक की टेलीविज़न और अख़बारों की स्‍थानीय अधिकारियों में है. इस बंदसभा में अनुवाद किसी साहित्‍य-सुगंधी की खोज में नहीं निकलती, दूतावासी सांठ-गांठ की चार कौड़ि‍या कमाइयों के मोह में मिलती है, मरते-मरते बारहा कैसे तो कुजन्‍म होता है. एक कहानी का जन्‍म होता है.

स्‍कूलों के मास्‍टर दल बांधकर साहित्‍य हांक रहे हैं, हालांकि फिर भी सच यही है शालाओं से हिन्‍दी बहरियाई गई है. घर में माएं हांफ-हांफकर बेबी और बाबू लोग से अंग्रेजी संवादालोड़न आजमाय रही हैं. हैरतअंगेज़ कभी जांघ के नीचे छिपी कभी कांख की फुंसी सा निकली आती है हिन्‍दी, नवोदित कवियत्री की अपने नाम तक की हिज्‍जे की ग़लती में, लजाकर मुस्‍कराकर कहती हैं, ‘ओ शिट! क्‍या बताऊं एकदम प्रैक्टिस छूट गई है!’ प्रैक्टिस में होने की प्रैक्टिस लगी रहती है, नंगी हिन्‍दी में कपड़े की कहानी की कहानी तक मुहैय्या नहीं होती. एक कहानी का जन्‍म होता है.

Wednesday, August 31, 2011

तीन बहनें, चेख़ोव की नहीं

नाटकीयता में दौड़ी आकर टीना धम्‍म से पलंग से पर गिरी है. हाथ में मुड़ी-तुड़ी पियराये कागज़ की एक पुरानी किताब. होंठों पर राज़भरी मुस्‍कराहट. टीना से आठ साल बड़ी बीना कनखियों से देखकर मुंह फेर लेती है. पलंग के सिरहाने पीठ टिकाये वह क्‍या तो ज़रूरी कुछ सोच रही थी, छोटी के ड्रामे ने सब क्रम बिगाड़ दिया चेहरे पर ऐसा कुछ भाव. चालीस की देहरी में अकेली, चुपचाप, खाली-खाली (ओह, कितना खाली-खाली!) पैर धरती बीना को वैसे भी नाटकीयता से कोफ्त होती है, थोड़ी देर में सर दर्द करने लगता है. और तो आज यूं भी (दरअसल कल शाम से ही) बरसात की झड़ी लगी हुई है. रसोई में घुसते ही भूख मर जाती है (कितना अंधेरा रहता है हमारी रसोई में, क्‍यों रहता है इतना अंधेरा? बरसात में सभी घरों की रसोइयों में ऐसा ही अंधेरा रहता है? फिर आती है क्‍यों बरसात?). खिड़की पर परदों को पूरी तरह से खींचे नहीं रख सकते. खींचो तो कमरे में अजीब सी महक भर जाती है. और जब से नीना वाले कमरे में सामने की दीवार पर बढ़ी सीलन के फूले चकत्‍ते फूट आये हैं, टीना भाग-भागकर उसके कमरे में चली आती है. इतना बड़ा सायं-सायं करता घर है, ऐसे घर में भी, घंटे भर अकेला रहना मुश्किल!

- अब क्‍या हुआ? जवाब जानने की अनिच्‍छा से बीना पूछती है.

- पहले मेरे हाथ में ये क्‍या किताब है, बताओ!

- नीला बाबू का नाटक है? तू पहले इतना चहकना बंद कर, इट्स सो इरिटेटिंग!

- रॉंग. टेन्सी‍ जी की ‘गिलास मंजरी’ है, तुमने पढ़ा है, दीदी? प्‍लीज़, पढ़ो, इतनी उदासी है, इतनी उदासी कि तुम्‍हारा दिल खुश हो जाये! आनंद आ गया, सच्‍ची!

- रहो आनंद में. मुझे नहीं चाहिए. मैं ऐसी ही खुश हूं.

- ठीक है, मत पढ़ो. अट्ठाइस की टीना सर मोड़कर उसे दीदी के घुटनों पर गिराती, चहकती बोली- वैसे भी तुम्‍हें उदास होने की क्‍यों ज़रूरत है. ऐसा क्‍यों नहीं करते, दीदी, चलो, छाता लेकर नीचे ढलान वाली सड़क तक टहल आते हैं!

- वो भला क्‍यों? बीना को बात-बेबात छोटी का एक्‍साइटेबल होना एकदम भी अच्‍छा नहीं लगता.

- क्‍या, दीदी, थोड़ी देर घर से बाहर निकलोगी, नथुनों में ताज़ी नम हवा जाएगी, और तुम्‍हारा मन करेगा तो ‘पॉम-पॉम’ में ठहरकर हम एक आइसक्रीम भी खा सकते हैं!

- तुम्‍हीं जाकर खाओ आइसक्रीम. मेरा सर दुख रहा है, प्‍लीज़, लेट मी बी. टीना का सर एक ओर हटाकर रखते हुए बीना पलंग से उठ खड़ी हुई. परदे के नज़दीक जाकर रौशनी की ज़रा सी ओट से बाहर झांका, फिर खिन्‍न बेमन टहलती वापस पलंग के पैताने बैठ गई, एक तकिया खींचकर गोद में रखा और छोटी से बोली- अपनी उम्र वाला खोजकर कोई किसी से तू प्रेम-व्रेम करती, मुझ बूढ़ी के पीछे तू अपना समय खराब करती है, व्‍हाई, छोटी? कोई है नहीं तेरी निगाह में?

टीना के चेहरे पर इतनी देर से मुस्‍कराहट बनी थी, बड़ी बहन के सवाल ने उसे जैसे सोख्‍ता-सा सोख लिया. भावप्रवण आंखों में अन्‍यमनस्‍कता के तार खिंच गए, मुश्किल से धीमी आवाज़ बोली- हो सकता है मैं औरों की निगाह में न पड़ती होऊं.

बीना का दिल बैठ गया. प्‍यार से छोटी का गाल हाथ में लेकर बोली- नॉनसेंस! पूरे सांझनपुर में कितनी लड़कियां हैं तेरी तरह?

- नॉट अ सिंगल वन, मुरझाई हंसी हंसती टीना ने जवाब दिया, मुझसे पांच साल पहले सबकी शादी हो गई, सब अब बच्‍चों की मांएं हैं!

- शट अप! आज के ज़माने में कोई उम्र देखता है? इंटेलिजेंस से जज करते हैं. और तू इतनी फुल ऑफ लाइफ है! तेरा और नीना दोनों का हिसाब मुझे समझ नहीं आता, रियली, छोटी!

- नीना दी ने तो तय कर लिया है शादी नहीं करेंगी! कोई घोड़ी पर आकर प्रोपोज़ करेगा तो भी नहीं, जल-विभाग की क्‍लर्की में जितना जैसे बनेगा करेंगी, बट दैट्स इट.

- नॉनसेंस. ये सब बकवास उसने तुझसे कहा है?

***

नीना रोज़ सात से पहले घर लौट आती है आज आठ के बाद लौटी है. रात के खाने में टीना का हाथ बंटाती वहीं रसोई से बीना आवाज़ लगाती है,

- नीना, सुन रही है? तुम्‍हारे ऑफिस में वो जो साहनी है तू उससे शादी क्‍यों नहीं कर लेती?

नीना नहाकर बदले कपड़ों में बैठक के सोफे पर आकर ढेर हो गई है. थोड़ी देर बाद एक पैर से स्‍टूल खींचकर उस पर दोनों एड़ि‍यां जमाती है.

बीना- क्‍यों? मुझे तो अच्‍छा ही लगता है. ज्‍यादा बकबक की आदत भी नहीं.

आंखों को पंजों से मूदकर नीना जवाब देती है- फिर आप ही कर लो उससे शादी.

- फिर हमलोग तब साहनी की साली हो जाएंगी, नहीं, नीना दी? साली होने के ख़याल से टीना को इतनी हंसी आती है कि हाथ से सब्‍जी का कलछुल छूटकर फर्श पर गिर जाता है. बीना हाथ का आटा झाड़ती, पैर पटकती रसोई से बाहर निकल आती है.

बीना- तुम लोगों से एक सिंपल बात करना संभव नहीं. हर चीज़ मज़ाक हो जाती है! खाओ तुम लोग, मेरा मन नहीं, मेरे सर में दर्द हो रहा है!

***

शादी की बात नीना को मज़ाक लगती है. एक वक्‍त था जब नहीं लगती थी. मगर तब बुआ और पापा दोनों ज़ि‍न्‍दा थे, और चौंतीसवें से पैर निकालकर पैंतीसवें में जाने से वो बहुत पहले का किस्‍सा था. तब नीना जवान थी! एक जगह से उठकर ज़रा दूरी के दरमियान जाते में भी उसे महसूस होता कितनी जवान है वह. तब किस हुमस के साथ प्रेम करना चाहती थी वह, और उसी अधिकार-बोध से प्रेम की कामना करती थी. बिछौने में पैर से चादर एक ओर फेंककर उनींदे में बीना का कंधा झिंझोड़कर उसे जगा देती, उससे ज़ि‍रह करने लगती- दीदी, तुम दिल्‍ली क्‍यों नहीं चली चलतीं, इस तरह यहां समय गुजारते रहने में क्‍या तुक है, दीदी? आई नो शरद भैया के यहां हमलोग बोझ होंगे, मगर तो क्‍या? थोड़े दिन होंगे, रहने का फिर कहीं इंतज़ाम निकल आएगा, तुम हाथ-पैर चलाओगी, कहीं किसी कॉलेज में तो कुछ निकल ही आएगा, एडहॉक ही सही, दीदी, प्‍लीज़, लाइफ में सॉलिड कुछ होगा, इस सांझनपुर में मैं तुम्‍हें रहने नहीं दूंगी, हमारे जीवन में कुछ बड़ा होना है, विराट, यस?

एक बार किसी तरह कांख-कूंखकर बीना ने दिल्‍ली निकलने का मन बनाया भी था, मगर तभी पापा के अटैक हुआ था, तब तक बुआ भी नहीं बची थीं (बचीं भी होतीं तो सिर्फ़ उनके सहारे दीदी पापा को छोड़कर दिल्‍ली निकल जाती, असंभव), दिल्‍ली बिना आवाज़ कैंसल हुआ. नीना की शादी की एक कमज़ोर सी कोशिश हुई, और बनते-बनते बात फिर उतनी ही आसानी से टूट भी गया (उड़ती सी खबर उन तक पहुंची थी कि लड़के का यूं भी मनीषा नाम की किसी लड़की से अफ़ेयर चल रहा था, जयपुर पढ़ाई करने गई थी, शादी की बात की भनक मिलते ही भागी आई और लड़काजान के बड़े करम किए!). दुबारा शादी-प्रसंग नहीं उठा. न नीना ने उठने दिया. जल विभाग की क्‍लर्की से बचे समय में पापा के पीछे आधी-आधी रात जगी रहती. उनके तलुए सहलाती, बालों में तेल की मालिश करती. वो हाथ झटकते तो डांटकर उन्‍हें चुप करा देती. सुबह-सुबह टीना को उठाकर कहती चल, पापा के कमरे में बैठकर उनको कोई गाना सुना!

फिर आनंद सरुप. इंश्‍युरेंस की कोई शिकायत लेकर पानीटंकी थाने गई थी, वहीं मुलाकात हुई. सज्‍जन और मितभाषी. ऐसे पुलिसवाले से मिलकर नीना को ताज्‍जुब हुआ था. इंश्‍युरेंस का कन्‍फ्यूज़न मगर फिर जल्‍दी ही सुलट गया तो एक बार दुबारा शुक्रिया कहने थाना गई, फिर बीच-बीच में मिलना. जानकर अच्‍छा लगा कि शिक्षित भी हैं. आठ-नौ महीनों की पहचान के बाद खबर हुई कि शादीशुदा हैं, एक तीन साल की बच्‍ची भी है. नीना को काठ मार गया. पुलिसवाले को बहुत जलील किया, नाखून से गाल नोंचा, गालियां दीं, कमरे में थूककर निकल आई थी. मगर मन शांत नहीं हुआ, सज्‍जन पुरुष से मिलना बंद नहीं कर सकी थी, वो तो सरुप साहब का खुद ही आंगनडेरा तबादला हुआ तब जाकर कहीं उस कहानी पर परदा गिरा.

***

रात के ढाईएक बजे नीना पानी पीने के लिए उठी तो दिखा दीदी के कमरे की बत्‍ती जल रही है, आंखों पर हाथ धरे उठंगी बैठी हैं. पानी का गिलास हाथ में थामे नीना वापस लौटी, कमरे में झांककर बोली- सरदर्द कमा?

बीना ने हाथ के इशारे से उसे भीतर बुलाया, अपने नज़दीक बिठाकर बोली- मेरी बात तुझे ऐसी बुरी क्‍यों लग जाती है? तू सुखी रहे ऐसा सोचना मेरा गलत है? बोल.

हाथ का गिलास बाजू के स्‍टूल पर रखकर बहन के बगल लेटती नीना ने कहा- मैं सुखी हूं दीदी.

बीना दुलार से उसके सर पर हाथ फिराते हुए बोली- मालूम है, मगर थोड़ी और सुखी हो सकती थी, नहीं?

बहन से सटी नीना आंख मूंदकर बुदबुदाई- थोड़ा और सुख जैसा शायद सचमुच की दुनिया में कुछ होता नहीं दीदी, तुम बताओ, होता है?

***

तीनों बहनें चेख़ोव की ‘तीन बहनें’ नहीं थीं, मगर हो सकती थीं, जैसे जीवन में थोड़ा और सुख हो सकता, नहीं? ला, तारा ला, लारल्‍ला. कितना अच्‍छा होता मैं वॉयलिन बजाना जानता होता, या सितार ही. ज़्यादा नहीं तो थोड़ा ही, एकदम थोड़ा जितना ही?

Monday, August 22, 2011

सीढ़ियों पर..

हालांकि रोज़ का चढ़ना-उतरना था, तामकार के पैर सीढ़ि‍यों पर ढंग से नहीं पड़ रहे थे. जैसे मन में तरतीब नहीं बन रही थी. इतनी ज़रा देर में वह भूल चुका था कि आखिर ऐसी कौन ज़रुरत बन पड़ी थी जिसके दबाव में वह अचानक घर लौटा आया था. बीच दिन घर लौटकर कहीं उसने बड़ी गलती तो नहीं की? औरत तकिये पर उठंगी लेटी टीवी ताकती रहेगी, या पैर के नाखून काटती, उस चुपचाप के घरेलु संगत में तामकार क्‍या करता बैठा रहेगा? हो सकता है टीवी देखती थोड़ी देर बाद उसकी ओर पलटकर औरत उससे और तरह की बात छेड़ दे? घरेलुपन की आड़ में यूं ही तामकार के घुटने पर हाथ रख दे, उसके साथ बाहर कहीं घूम आने की ज़ि‍द करे? तामकार ने मन बनाना शुरु किया कि दरवाज़े से अंदर घुसते ही वह चीखकर औरत को खबरदार कर देगा कि आज शाम से घर में सब्‍जी बनाने की दरकार नहीं है. और रोज़-रोज़ वह रस्‍सी पर कपड़े सूखते देखने से थक गया है, डिटर्जेंट के पैसे और पानी क्‍या पेड़ पर उगते हैं? कई बार हुआ है कि तामकार की सुपरस्‍टोरों में अचानक नज़र गई और लोगों को उसने चार डिब्‍बे डिटर्जेंट, दो बोरी चावल की खरीदारी करते देखा और घबराकर एकदम से एक ओर हट गया है. ये कौन लोग हैं और कितना पैसा है इनके पास जो इतनी मात्रा में खरीदारी करते हैं. झोला-झोला फल, कौन खाता है इन्‍हें? कैसे? सीढ़ि‍यों पर एक बार फिर तामकार के पैर लड़खड़ा गए.

कोई बच्‍चा निर्ममता से पिपिहरी बजा रहा था. जालियों से बाहर लाई मुर्गी कसाई के हाथ में फड़फड़ा रही थी. लता मंगेशकर लीना चंदावरकर वाला गाना गा रही थी, ‘’जाने क्‍यों लोग मोहब्‍बत किया करते हैं,’’ और ऐसी ही दूसरी ऊटपटांग आवाज़ें. अंधेरी, संकरी सीढ़ि‍यों पर हारकर बैठते तामकार ने सोचा मुझे खबर नहीं, मगर आज ज़रूर किसी त्‍यौहार का दिन है! किसी बात की मुझे खबर क्‍यों नहीं रहती? कहां फंसा रहता है दिमाग? किसी छोटे स्‍टेशन के बाहर गुमटी पर बदरंग होता ‘’मेहबूब की मेंहदी’’ का पोस्‍टर आंखों के आगे घूम गया. ‘’गहरी चाल’’, ‘’बंधे हाथ’’ और राजेश खन्‍ना की ‘’मेरे जीवन साथी’’. नीचे के फ्लोर पर धड़ाम से कोई दरवाज़ा खुला. कोई बूढ़ी खखारी. तामकार ने उठने की कोशिश की मगर शरीर ने साथ नहीं दिया. सीले मोज़े के भीतर चींटियां चलती महसूस की, गरदन के ऊपर, बाईं कान के पीछे. बालों में धूल की किरकिराहट. आखिर इस हालत तक वह पहुंचा कैसे, सुबह तक तो सही था, साफ-सुथरा? इस तरह तो वह किसी सूरत में बची हुई चालीसेक सीढ़ि‍यां तय करने से रहा. उसे स्‍ट्रेचर की ज़रूरत है. या कोई गिलास भर पानी पिला दे. दरवाज़े के उधर जो वह स्‍त्री बैठी है, उसकी मां, औरत, बहन, जो भी, गिलास भर पानी लिये इतनी ज़रा-सी सीढ़ि‍यां उतरकर इस दुर्गम क्षण में उसे बचा लेने नहीं आ सकती? मगर तामकार को फिर अपनी कमज़ोरी, प्‍यास, ‘’गाइड’’ के देवानन्‍द के सूखे, पपड़ाये होंठों में जाकर उलझती लगी और यह सोचकर एकबारगी उसका मन बैठने लगा कि कुछ घंटों पहले, सुबह दरवाज़े, उस घर से बाहर निकलने के साथ ही वह अपने जीवन की सब उम्‍मीदों से भी बाहर निकल चुका है, और दुनिया की कोई ताक़त अब उसे उसके अंत से नहीं बचा सकेगी! मन में इस ख़याल के आते, और आकर एकदम से भीतर धंसते ही तामकार की पसलियों में एक ठंडी लहर दौड़ गई, भौं पर पसीने की बूंदें उभर आईं. पूरी जान से दीवार का सहारा लेकर उसने उठने की कोशिश की और भरभराकर वापस सीढ़ि‍यों पर बैठ गया.

तामकार ने मुंह खोलकर कुछ कहने की कोशिश की. शायद अपने अंत से पहले वह कुछ बातें साफ़ करके जाना चाहता था. लेकिन इसी बीच सूती की बदरंग साड़ी में कोई सांवली हड़ि‍यल बूढ़ी सामने चली आई. कोयले के इंजन से नहायी हवा में किसी गुमनाम हाल्‍ट पर ठहर गई पैसेंजर रेल पर चढ़ी बूढ़ी के हाथों में बासी पूड़ि‍यों और सूखे आलू का दोना था. अपने अकेलेपन की घबराहट में, संभवत: सिर्फ़ आश्‍वस्‍त होने की गरज से ही, उसने तामकार से उसका मुल्‍क पूछा था.

भौं पर की पसीने की बूंदें पोंछते तामकार ने तक़लीफ़ और कुछ शर्म से जवाब दिया था कि उसे अपने दादा या दादी किसी का भी नाम याद नहीं.. उसने तेज़ी से फिर माफ़ी मांगी, कि उसका दिमाग काम नहीं कर रहा. शायद थोड़ी देर में उसे याद पड़़े. तब संभवत: चालीस सीढ़ि‍यों के उधर दरवाज़े के पार बैठी स्‍त्री कौन है और तामकार से उसके क्‍या संबंध हैं का जवाब भी उसके माथे में साफ़ उभरकर आये.. फिर कुछ ठहरकर तामकार ने जवाब दिया कि उसका नाम महेश बिष्‍णु सरमा नहीं, न ही मिशा है, जैसाकि कुछ लोग उसके संबंध में गलतफ़हमी फैलाने की कोशिश कर रहे हैं..

साठ के दशक के किसी बेमतलब शहर के किसी बदरंग मकान का छत था जिस पर हाथ में गुलेल थाम वह बच्‍चा चिड़ि‍यों के पीछे भाग रहा था. एक बेहया गोरैया थी अपना सर फूटने से बचाने के लिए कहीं भाग जाने की बजाय छत पर यहां से वहां उड़-उड़कर बैठ रही थी. पड़ोस की छत से स्‍लीवलेस ब्‍लाउज़ में श्‍लथ, एक भीमकाया अधेड़ महिला ने डांटकर बच्‍चे से सवाल किया वह किसका बेटा है, बच्‍चे ने जवाब देने की जगह अपने गुलेल का पत्‍थर दागा. यही आखिरी तस्‍वीर थी जो सीढ़ि‍यों पर भहराये गिरे मिशा की आंखों में कौंधकर अटक गई, उसके बाद वह फिर नहीं उठा.

(जारी)

Monday, August 15, 2011

कितने तो, छुटकन, काम निपटाने हैं..

कितने तो. कितने कितने कितने, आह्, कितने तो. काम, छुटकन, निपटाने हैं. तुम्हारे गोद में सर गिराके आंख मूंदनी नाक बजाना है. मुंदी आंखों सांस गिनते तुमसे तक़दीर पढ़वानी है, मन के महानगर के अरबों तुम्हें क़ि‍स्से सुनाने हैं. कान खुदवाना, गोड़़ दबवाना, गरदन के रोंओं पे हाथ फिरवाना है, तुमसे, ओह, कितने तो! धूल के बादल और सीलन-सागर में बाल्ज़ाक व बाख़ का ब बचाये रखना और पेत्रार्क व पिरमोद गंगुली का नेह दुलराये रखना, नाक से नाक सटाये तुम्हें तुमसे छुपाये रखना है, आह, कितने तो! हां, एक और, अम्मां को टहलाना है, बबुनी को कांधा चढ़ाना, मगर पहिले भीड़ में उनके ठिकाना पाना है, इंशा जी के साइकिल चढ़कर मोम्मद रफ़ी जी के गांव जाना है, आह्, कितने तो..

Thursday, August 4, 2011

घबराहट और मैं..

माफ़ कीजिए हो सकता है मैं आपको घबराया हुआ लगूं, जबकि सच्‍चाई में होऊंगा नहीं, तो इसे लेकर कृपया किसी तरह का मन में तनाव न पालें, मेरी घबराहट प्रकट व प्रच्‍छन्‍न्‍ा रुप से दीखे भी तो उसे लेकर उसे लेकर आश्‍वस्‍त रहें, राजी-खुशी, हंसते रहें, इतनी आपसे विनम्र विनती है, मेरी घबराहट घटाने में उससे मदद ही मिलेगी, हालांकि मैं उस तरह से घबराता कतई नहीं ही होऊंगा जैसा आप समझ रहे होंगे, फिर भी. कहने को एक बात कह रहा हूं. ऐसा कुछ अजीब भी नहीं, लोगों में विविध-विभिन्‍न विकार होते ही हैं, कोई एक पूरा मनुष्‍य कहां मिलता है? किसी महात्‍मा से अकेले में आंख से आंख मिलाकर पूछकर देखिए, देखिएगा महात्‍मा नज़र बचाकर शर्मिंदगी में क्‍या जवाब देते हैं! कि जो आंखों के देखे दिखता है वही सच नहीं होता. वही और उतना. सच की एक समूची दुनिया होती है. हमेशा प्रकट हो, हमारी पहचान में पड़े, ऐसा कहां होता है, हो पाता है? यही या ऐसा ही कुछ. वक्‍तव्‍य व मंतव्‍यों की ऐसी लबरी से अलग महात्‍मा में आप अन्‍य घालमेल भी पायेंगे. धीरज धरे देखना चाहें तो. असल दिक्‍कत यही है कि हमने दुनिया में और कुछ जो भी भले पा लिया है, धीरज से हाथ धो बैठे हैं. और इस तरह अंततोगत्‍वा इस समझ से भी कि धीरज के खो जाने के अनंतर हमारे अन्‍य कैसी भी प्राप्तियों का कोई कैसा भी अर्थ नहीं. स्‍वाभाविक है ऐसी प्रतीति से मनुष्‍य में घबराहट की उत्‍पत्ति होती है वह घबराया दिखता है, जैसे आप मुझे देखते हुए मेरी अन्‍य सारी लाक्षणिकताओं से ऊपर केवल मेरा घबराना लक्षित करने में उलझते जाते हैं, जबकि सच्‍चाई है जैसा मैंने पहले कहा भी, मेरी घबराहट मनुष्‍यगत लघु किंचित एक विकार मात्र है, जैसे कुछ लोग हैं किंचित लंगड़ाकर चलते हैं, कुछ खास तरीके से एक ओर को ज़रा पैर उठाकर, कुछों में गरदन एक तरफ गिराकर फोटो खिंचवाने की प्रवृति होती है तो कुछों में बेहयायी की हद तक दांत दिखाते रहकर फोटो उतरवाने की. हिंदी के अनकादमीय विज्ञ प्रबंधकार भगवान सिंह ने इतिहास की ललित पुस्‍तक लिखी भी है, अपने अपने राम’. समाज का यह स्‍पष्‍ट दायित्‍व बनता है कि वह सबको उनके निज के समझ (व असमंजस) के अंधेरों में उनकी आवश्‍यकता (व रुचिनरुप) अपना राम चुनने का हक़ दिलवा सके. राम की जगह कोई श्‍याम चुनना चाहे तो इसके लिए वह भी रामपंथी-सा ही उन्‍मुक्‍त व स्‍वतंत्र महसूस करे. हिन्‍दी फिल्‍मों के शीर्षक (व कथ्‍य) की तरह ‘सामर्थ्‍य और सीमा’ (लेखक: बीसी वर्मा) के बंधनों के जकड़ाव का अनुभव न करे. जैसे बिना घबराये- केवल अपनी ओर चढ़ी आपकी नज़रों में इशारा पाकर- मैं किंचित (व सांघातिक) घबराहट का तत्‍क्षण अनुभव करने लगता हूं!

जबकि वास्‍तविकता ऐसी कतई है नहीं. वह सिर्फ़ मेरे चेहरे का भाव भर है. जैसे राजेश खन्‍ना का हेयर-स्‍टाईल (व ऊटपटांग अभिनय) था, ‘परिचय’ में जितेंद्र का शिक्षित व सभ्‍य और ‘मेरे अपने’ में ‘कोई होता मेरा अपना’ गाते हुए श्‍याम (विनोद खन्‍ना) का दुखी दिखना था, उनका उनके जीवन की वास्‍तविक चिंताओं (व दुविधाओं) से दूर-दूर का भी संबंध नहीं. जैसे घबराहट से मेरा नहीं है. एकान्तिक व चिंतन के गहन-क्षणों में मैं कहां से एक समर जैकेट लहा लूं (किम्‍बा जापानी नवयौवना प्रेयसी) की सोचता हूं, या कसौनी में किसका कॉटेज कब्जिया लूं की सोचता भीतर ही भीतर खौलने लगता हूं, घबराहट की मेरे पास फुरसत नहीं होती. फुरसत होती ही है तो मैं सिमोन और श्‍यूस्‍टर को ईमेल पर ईमेल भेजकर हड़काते, डराते हुए कृतार्थ करता हूं कि मेरी अनलिखी पुस्‍तक पर बीस लाख का वह अडवांस वह कब भेज रहे हैं (“जब सचमुच किताब लिख ली जाएगी तब ही भेजोगे, हरामखोरो, तो तुम्‍हारे उस पैसे का मैं घेंवड़े का अचार डालूंगा, पाजियो? आर यू गाइस एस गुड पब्लिशर्स एस आई अम सम डंबऐस राइटर ऑर व्‍हॉट, अबे चिरकुटप्रसादो, इस खुशहाली, दलाली के समय में मेरे बीस लाख दांत में भींचे हो, छोड़ नहीं रहे, अबे शरम नहीं आती अपने को प्रकाशक, अगुवा धावक कहते हो?”), ईमेल इतना लंबा हुआ जाता है जितना लंबा जेम्‍स जॉयस के ‘यूलीसीस’ का अंतिम वाक्‍य भी न हुआ होता, थिरकते, सुलगते अपने नथुनों की आंच में मैं बारहवीं सिगरेट बाल लेता हूं, मगर चिड़चिड़ाता, गुस्‍साता, घबराता कहां हूं, नहीं हूं, वह सिर्फ़ आपकी पिटी हुई नज़रों को लगता है.