Friday, January 28, 2011

बिना शीर्षक..



पानी में दूर कहीं एक मस्तूंल हिलती डोलती, रहेगी
दूर किसी कवनो और रेगिस्तान मैं सिहरता, कांपता, रहूंगा
जंगली झील में नीलपाखी कवनो एक दबे स्वर मंत्र उच्चारती, होगी पुकारती
सुबह के धुलते आसमान में उम्मीद एक निस्संग सपने की तरह झरती, खुद को होगी संवारती
मुंह छुपाये मुस्काती, कानों में भीतर तक गड़ता कुछ छोड़ जाता अश्लील बुदबुदाये जाती
कोई बुढ़ईन मुंह में सख्त सुपाड़ी तोड़ती, हथेली की टूटी लकीरें जोड़ती
लहराये चला जाता साइकिल सवार कोई बच्चा ऐंठे सारे सिनिसिज़्म भरभराये फोड़ता
शब्द, ताज़ा छने पाग-नहाये बुनिया के माफिक मुंह में महक की दिलकारी बसाये जाते
लिखना, अनन्त तक की एक अंतहीन लड़ाई में लघुकाय उत्साही सिपाहियों-सा बरछी-भाला चमकाये
उठाये, लदर-फदर भगाये भगलेल हंसिल हंसुल भागे आते, गहरे कहीं भरी आंखें, आत्मा भरे जाते.

Thursday, January 27, 2011

फ़ि‍ल्‍मी पफ्स उर्फ़ द स्‍टेट ऑफ़ नेशन्‍स..

वेंडर्स की एक पुरानी जर्मन फ़िल्‍म है द स्टेट ऑफ़ थिंग्‍स, जीवन और सिनेमा का बड़ा मार्मिक उन्‍वान है, संभव है खुद वेंडर्स ने अर्से से फिर न देखी हो. अर्से से मैं भी जिधर देखना था उधर कहां देख पा रहा हूं. (क्‍यों रहा हूं, इज़ इट अ नेशनल एलमेंट? इसीलिए जयपुर में साहित्यिक जीवन देखने गए छोटे-बड़े सब, साहित्‍य भूलकर, देसाई की किरण पामुक के मुख पर कैसी आभा छोड़ रही है- या कि नहीं छोड़ पा रही है?- के निहारन सुख में लोटने, आत्‍मा पर साहित्यिक कीच पोतने लगते हैं? इसीलिए जो स्‍टेट है मेरे इनर स्‍लेट की वह इतनी सावर, माउथ में फाउल-टेस्‍टेड होती चलती है? ओ मर्सिफुल सॉड, गॉड, हैव अ लिटिल ऑन अस पिटीफुल, विल यू?). कांट लाइफ़ बी अ लिटिल लाइक किल-बिल वॉल्‍यूम वन्‍स टाइटल ट्रैक? इतनी कामना हमें लालसाओं का लालची कंट्री-ढोल, तबलचीख़ां बनाये डालेगी?

कहां जाये जाता है जीवन? अंतरंग मार्मिकताओं में किसी तरह सेंटिमेंटली एजुकेट करता है हमें? हम होते रहना चाहते हैं एजुकेट? फटी आंखों जिज्ञासा, जुगुप्‍सा, चेतनता की बीहड़ों में दिखती रहती है दुनिया? कि बाबू जे अख़्तर का ‘ओ पालनहारे, संझा, और फिर सकारे’ का फकत भजन सूझता चलता है? मुझे ज़रा दिखता है तो फिर पता नहीं क्‍यों घबराकर सर पर मन चढ़ाये नज़र और मन का कुंदन फोड़ने स्‍टेट ऑफ़ द नेशन्‍स इन द स्‍टेट ऑफ़ सिनेमा देखने पहुंच जाता हूं. मगर वहां भी लंबी पगड़ंडी (पाक डंडी) पर पसरे ओरहानी बाग़ में कहीं कोई किरण कहां दिखती है. अंधेरों का प्‍लैटोनिक ब्‍लू नाइट जैज़ परफार्मेंस दिखने लगता है. अर्जेंटिना में मुस्‍कराकर झुंझलाते हुए ढेरों बेरोज़गार चेहरे दिखते हैं, मगर सब पर भारी कहीं एक उदास कुत्‍तारुप दिखता रहता है. यूक्रैन में सर के बल खड़ी खुशी दिखती है, और इतना अंधेरा दिखता है कि हर अंधेरी ख्‍वाहिश पर दम फूटने लगे!

अमरीका में गहरी गरीबी और जाड़े के कंटीले तीर दिखते हैं, मन से छूटकर गिरा पोखरे में अपने कलेजे का ख़ून दिखता है. फिनलैण्‍ड में पैसे के पीछे सबकुछ खत्‍म हुआ अनर्गल जीवन का गाढ़ा, भयावह अवसादी राग दिखता है. रुमानिया और बेल्जियम में जीवन नहीं उसके नाम पर चल रही कोई कॉमेडी दिखती है. फ्रांस में एक घर दिखता है तो वह घर की बजाय जीवन का मर्सिया-गीत की तरह बजता हमें अपने पंजों पर खड़ा कर जाता है. मैं चंदा को रोककर गाना चाहता हूं ‘चंदा ओ चंदा, किसने चुराई तेरी मेरी निंदिया’ तो चंदा मुझे टोककर कहती है तुम वही हो जो ‘सावन-भादो’ के तीसरे दिन के शो में मिले थे? तुम घर से पैसे चुराकर गए थे, मैं खुद को चुराके गई थी? बट, स्‍वीटहार्ट, वी आर नॉट द सेम पीपुल, आर वी? मैं अपने बच्‍चों की चोरी बचाती फिरती हूं, तुम ‘रॉयल टैनेनबॉम्‍स‘ के पीछे भागते फिरते हो, नहीं?

सिनेमा के अंधेरों में जीवन दिखता रहता है, जीवन के उजालों में जीवन कहां दिखता है, ओ चंदा, अरे चंदा.

Thursday, January 13, 2011

एक इंटरव्‍यू, एक किताब..

अर्थ संबंधी चिंताओं की बातचीत दिलचस्‍प भी हो आमतौर पर ऐसा होता नहीं. मास्‍को के सामाजिक आंदोलन व वैश्‍वीकरण अध्‍ययन केंद्र के डायरेक्‍टर बोरिस कागारलित्‍स्‍ मगर एक दिलचस्‍प बातचीत किये ले जा रहे हैं. संदर्भ वैश्विक अर्थ संकट का रुसी परिप्रेक्ष्‍य में आकलन है. श्री कागारलित्‍स्‍की से बातचीत पिछले दिनों दिल्‍ली में फ्रंटलाइन पत्रिका के लिए लॉरेंस सुरेंद्र ने की, जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं. धीरज धरके कोशिश करें पूरी बातचीत पढ़ डालें.

रुस से अलग हिंदुस्‍तानी अर्थसंसार पर आठ निबंधों का संकलन है हाल में छपी पेंग्विन से अंग्रेजी की इस किताब में, लेखक हैं अमित भादुड़ी, लगे हाथ इस समीक्षा पर भी एक नज़र मार लें.

(फ्रंटलाइन से साभार)

Tuesday, January 11, 2011

अपनी तरह से..



अपनी तरह से च्‍युंटा ठुमकता होगा

किसी क्षण आपौ गुनगुनाते होंगे

लरजकर बजता मैंओ ठनठनाता हूंगा

अपनी तरह से.


अपनी तरह से चिड़ि‍या लड़खड़ाती होगी

प्रेम के दो बोल का भटकौआ सुरीला, छकाती

आपको बुलाती, दुश्‍मन के दुआरे दुरदुराये

हाथ फैलाये मुझको पहुंचाती, अपनी तरह से.


अपनी तरह से कुत्ता भूख मारता होगा

पानी औ’ सतुअे में औंजाये, कब्‍बो अघाये

राजाराम डरकारते होंगे, मैं भूख भूलकर

कविता पर हाथ आजमाने लगता होऊंगा

अपनी तरह से.


अपनी तरह से समय औ’ समाजों की यात्रा होती होगी

अपनी तरह से पंचानन पांड़े जीवन का रहस्‍य बूझते

फरियाते होंगे, मुस्‍कराते. वहीं हर तीसरे अधरात

नींद में उचटकर मैं बुदबुदाने लगता होऊंगा लेकिन क्‍यों

लेकिन क्‍यों, अपनी तरह से.

Friday, January 7, 2011

Scarecrow of arsenal, urf this goddamm business of life..

Capitalist modernity, so it appeared, had landed us with an economic system which was almost purely instrumental. It was a way of life dedicated to power, profit, and the business of material survival, rather than to fostering the values of human sharing and solidarity. The political realm was more a question of management and manipulation than of the communal shaping of a common life. Reason itself had been debased to mere self-interested calculation. As for morality, this, too, had become an increasingly private affair, more relevant to the bedroom than the boardroom. Cultural life had grown more important in one sense, burgeoning into a whole industry or branch of material production. In another sense, however, it had dwindled to the window-dressing of a social order which had exceedingly little time for anything it could not price or measure. Culture was now largely a matter of how keep people harmlessly distracted when they were not working.”

Thus spoke Eagletons & Terrys.

Wednesday, January 5, 2011

लिफ़ाफ़े में जीवन..

तलुआधन और पैरों को किन्‍हीं अनखरीदे ‘अच्‍छे’ जूतों की उम्‍मीद की दुकान के पिछवाड़े बचाये लिये जाऊंगा. दुनिया देखने का आनन्‍द जो है किसी भी क्षण ज़ि‍बह हो जानेवाली अभागी बकरी की आंखों में देखकर पाऊंगा. बकरी कभी पाएगी तो सूखे घास चबायेगी, वर्ना उजबकों की जान तकती अपने आख़ि‍र की घड़ी गिनती पगुरायेगी. बिलासपुर कभी बार्सेलोना नहीं होगा का ‘मेरा’ गाना बिना समझे गाये, हकलायी गुनगुनायेगी. मैं आधा गांव आधा शहर किन्‍हीं अधूरे भूगोलों में गुज़र करता, बिना नज़र के प्रेम से कहीं बाहर गये दमिश्‍क, त्रिपोली की सफ़री थकान लिये लौटता फिरुगा. शर्मिन्‍दगी में नहाये, सिर झुकाये हंसता बेवक़ूफ़ी की चुहल करता दिन सजाता, अनसजे दिनों किसी गुमनाम कवि की चार पंक्तियां पढ़कर गहरे हैरत करता, तीन सौ वर्षों पुरानी किसी करियाई नाव की सवारी में मालूम नहीं छोड़ता या घर लौटता फिरुंगा (चरमराती नाव के छीजते पटरों पर जो कई चोटघने रहस्‍यभरी लकीरों में घिरे चेहरे दीखेंगे, एक अजीब उनमें खुद कहीं मैं भी दिखूंगा, फुसफुसाकर ज़ि‍रह की ज़िद करता कि दोस्‍त, जब वाजिब देश नहीं तो सच कहो, वाजिब घर पाओगे कहीं?). पानी और समय के अंधेरों में दूर दूर, कहीं दूर बाजा बजता, लगातार सुन पड़ने के भरोसे में देर-सबेर संगीत नज़दीक आयेगा की उम्‍मीद बुनी, बनी रहेगी.

गहरायी रात के कोहरे घिरे आएंगे, संगीत कुहरीला हुआ जाएगा. बाजा दूर बना रहेगा.