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Jan 5, 2011

लिफ़ाफ़े में जीवन..

तलुआधन और पैरों को किन्‍हीं अनखरीदे ‘अच्‍छे’ जूतों की उम्‍मीद की दुकान के पिछवाड़े बचाये लिये जाऊंगा. दुनिया देखने का आनन्‍द जो है किसी भी क्षण ज़ि‍बह हो जानेवाली अभागी बकरी की आंखों में देखकर पाऊंगा. बकरी कभी पाएगी तो सूखे घास चबायेगी, वर्ना उजबकों की जान तकती अपने आख़ि‍र की घड़ी गिनती पगुरायेगी. बिलासपुर कभी बार्सेलोना नहीं होगा का ‘मेरा’ गाना बिना समझे गाये, हकलायी गुनगुनायेगी. मैं आधा गांव आधा शहर किन्‍हीं अधूरे भूगोलों में गुज़र करता, बिना नज़र के प्रेम से कहीं बाहर गये दमिश्‍क, त्रिपोली की सफ़री थकान लिये लौटता फिरुगा. शर्मिन्‍दगी में नहाये, सिर झुकाये हंसता बेवक़ूफ़ी की चुहल करता दिन सजाता, अनसजे दिनों किसी गुमनाम कवि की चार पंक्तियां पढ़कर गहरे हैरत करता, तीन सौ वर्षों पुरानी किसी करियाई नाव की सवारी में मालूम नहीं छोड़ता या घर लौटता फिरुंगा (चरमराती नाव के छीजते पटरों पर जो कई चोटघने रहस्‍यभरी लकीरों में घिरे चेहरे दीखेंगे, एक अजीब उनमें खुद कहीं मैं भी दिखूंगा, फुसफुसाकर ज़ि‍रह की ज़िद करता कि दोस्‍त, जब वाजिब देश नहीं तो सच कहो, वाजिब घर पाओगे कहीं?). पानी और समय के अंधेरों में दूर दूर, कहीं दूर बाजा बजता, लगातार सुन पड़ने के भरोसे में देर-सबेर संगीत नज़दीक आयेगा की उम्‍मीद बुनी, बनी रहेगी.

गहरायी रात के कोहरे घिरे आएंगे, संगीत कुहरीला हुआ जाएगा. बाजा दूर बना रहेगा.

9 कमेंट:

Satish Chandra Satyarthi said...

हर कौमा के बाद एंटर बटन दबा देते तो अच्छी कविता बन जाती.... :)

दीपक बाबा said...

जब वाजिब देश नहीं तो सच कहो, वाजिब घर पाओगे कहीं?

इत्ता तो समझाए दिए हैं आप ........ ...... और वाजिब घर क्या, वाजिब देश न होने से वाजिब समाज, मित्र, यार, परिवार - बच्चे कुछ भी नहीं पा सकते......

सागर said...

हमारे लिए तो अंतिम लाइन ही प्रसाद है !

डॉ .अनुराग said...

ओर जीवन !!!फिर अगले दिन यक्ष प्रशन सा

Poorviya said...

ek baar main samajh nahi aata hai----

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

आजकल ’अनसजे’ में भी असान्जे दिखता है.. :-।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बहुत खूब, बिना एंटर मारे भी यह कविता ही है।

अनूप शुक्ल said...

जब वाजिब देश नहीं तो सच कहो, वाजिब घर पाओगे कहीं?

यही सोच रहे हैं!

mukti said...

हमरे लिए भी अंतिम लाइन प्रसाद है...
बकिया तो ऐसा लगा कि हरहराती नदिया में किसी छोटी सी नैया में बैठे बहे जा रहे हैं, बिना चप्पू-पतवार के, तैरना जानते नहीं और चाहते भी नहीं...ऐसी मुक्त पद्यात्मक गद्य की बरसाती नदी में बहना...
मज़ा आ गया !