Tuesday, January 11, 2011

अपनी तरह से..



अपनी तरह से च्‍युंटा ठुमकता होगा

किसी क्षण आपौ गुनगुनाते होंगे

लरजकर बजता मैंओ ठनठनाता हूंगा

अपनी तरह से.


अपनी तरह से चिड़ि‍या लड़खड़ाती होगी

प्रेम के दो बोल का भटकौआ सुरीला, छकाती

आपको बुलाती, दुश्‍मन के दुआरे दुरदुराये

हाथ फैलाये मुझको पहुंचाती, अपनी तरह से.


अपनी तरह से कुत्ता भूख मारता होगा

पानी औ’ सतुअे में औंजाये, कब्‍बो अघाये

राजाराम डरकारते होंगे, मैं भूख भूलकर

कविता पर हाथ आजमाने लगता होऊंगा

अपनी तरह से.


अपनी तरह से समय औ’ समाजों की यात्रा होती होगी

अपनी तरह से पंचानन पांड़े जीवन का रहस्‍य बूझते

फरियाते होंगे, मुस्‍कराते. वहीं हर तीसरे अधरात

नींद में उचटकर मैं बुदबुदाने लगता होऊंगा लेकिन क्‍यों

लेकिन क्‍यों, अपनी तरह से.

7 comments:

  1. इस मायाजाली अंतर्जाल में
    मूर्धन्य लिक्खाड़
    जिद्दी धुन पर थिरकन समेटे
    रजाई में कोटर बनाकर
    एक आँख से झाँकते
    जो मन में आ जाय हाँकते

    चाय-पर-चाय गटकते
    सुर्ती पर सुर्ती फाँकते

    दुनिया की टिलीलिली करते होंगे
    अपनी तरह से

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  2. जीवन का सरकना,
    राहों का दरकना,
    बस अपनी तरह से।

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  3. पंचानन पांड़े.the great......

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  4. वाह ! अपनी तरह से कोई ऐसे भी कविता करता होगा. और सिद्धार्थ जी की तरह कोई टिप्पणी देता होगा.

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  5. हम अंजुमन में सबकी तरफ़ देखते रहे
    अपनी तरह से कोई अकेला नही मिला
    आंधी चली तो ……

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  6. अपनी तरह की कविता...
    विलक्षण कविता!!!

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