Thursday, January 27, 2011

फ़ि‍ल्‍मी पफ्स उर्फ़ द स्‍टेट ऑफ़ नेशन्‍स..

वेंडर्स की एक पुरानी जर्मन फ़िल्‍म है द स्टेट ऑफ़ थिंग्‍स, जीवन और सिनेमा का बड़ा मार्मिक उन्‍वान है, संभव है खुद वेंडर्स ने अर्से से फिर न देखी हो. अर्से से मैं भी जिधर देखना था उधर कहां देख पा रहा हूं. (क्‍यों रहा हूं, इज़ इट अ नेशनल एलमेंट? इसीलिए जयपुर में साहित्यिक जीवन देखने गए छोटे-बड़े सब, साहित्‍य भूलकर, देसाई की किरण पामुक के मुख पर कैसी आभा छोड़ रही है- या कि नहीं छोड़ पा रही है?- के निहारन सुख में लोटने, आत्‍मा पर साहित्यिक कीच पोतने लगते हैं? इसीलिए जो स्‍टेट है मेरे इनर स्‍लेट की वह इतनी सावर, माउथ में फाउल-टेस्‍टेड होती चलती है? ओ मर्सिफुल सॉड, गॉड, हैव अ लिटिल ऑन अस पिटीफुल, विल यू?). कांट लाइफ़ बी अ लिटिल लाइक किल-बिल वॉल्‍यूम वन्‍स टाइटल ट्रैक? इतनी कामना हमें लालसाओं का लालची कंट्री-ढोल, तबलचीख़ां बनाये डालेगी?

कहां जाये जाता है जीवन? अंतरंग मार्मिकताओं में किसी तरह सेंटिमेंटली एजुकेट करता है हमें? हम होते रहना चाहते हैं एजुकेट? फटी आंखों जिज्ञासा, जुगुप्‍सा, चेतनता की बीहड़ों में दिखती रहती है दुनिया? कि बाबू जे अख़्तर का ‘ओ पालनहारे, संझा, और फिर सकारे’ का फकत भजन सूझता चलता है? मुझे ज़रा दिखता है तो फिर पता नहीं क्‍यों घबराकर सर पर मन चढ़ाये नज़र और मन का कुंदन फोड़ने स्‍टेट ऑफ़ द नेशन्‍स इन द स्‍टेट ऑफ़ सिनेमा देखने पहुंच जाता हूं. मगर वहां भी लंबी पगड़ंडी (पाक डंडी) पर पसरे ओरहानी बाग़ में कहीं कोई किरण कहां दिखती है. अंधेरों का प्‍लैटोनिक ब्‍लू नाइट जैज़ परफार्मेंस दिखने लगता है. अर्जेंटिना में मुस्‍कराकर झुंझलाते हुए ढेरों बेरोज़गार चेहरे दिखते हैं, मगर सब पर भारी कहीं एक उदास कुत्‍तारुप दिखता रहता है. यूक्रैन में सर के बल खड़ी खुशी दिखती है, और इतना अंधेरा दिखता है कि हर अंधेरी ख्‍वाहिश पर दम फूटने लगे!

अमरीका में गहरी गरीबी और जाड़े के कंटीले तीर दिखते हैं, मन से छूटकर गिरा पोखरे में अपने कलेजे का ख़ून दिखता है. फिनलैण्‍ड में पैसे के पीछे सबकुछ खत्‍म हुआ अनर्गल जीवन का गाढ़ा, भयावह अवसादी राग दिखता है. रुमानिया और बेल्जियम में जीवन नहीं उसके नाम पर चल रही कोई कॉमेडी दिखती है. फ्रांस में एक घर दिखता है तो वह घर की बजाय जीवन का मर्सिया-गीत की तरह बजता हमें अपने पंजों पर खड़ा कर जाता है. मैं चंदा को रोककर गाना चाहता हूं ‘चंदा ओ चंदा, किसने चुराई तेरी मेरी निंदिया’ तो चंदा मुझे टोककर कहती है तुम वही हो जो ‘सावन-भादो’ के तीसरे दिन के शो में मिले थे? तुम घर से पैसे चुराकर गए थे, मैं खुद को चुराके गई थी? बट, स्‍वीटहार्ट, वी आर नॉट द सेम पीपुल, आर वी? मैं अपने बच्‍चों की चोरी बचाती फिरती हूं, तुम ‘रॉयल टैनेनबॉम्‍स‘ के पीछे भागते फिरते हो, नहीं?

सिनेमा के अंधेरों में जीवन दिखता रहता है, जीवन के उजालों में जीवन कहां दिखता है, ओ चंदा, अरे चंदा.

5 comments:

  1. cinema does show the face of the society. I really love this medium, than anything else.

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  2. @सिनेमा के अंधेरों में जीवन दिखता रहता है


    आपकी केनवस सरीखा रंगीन है ये जीवन.

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  3. आपकी पोस्ट हमेशा ही बेहतरीन होती है और यह भी बेमिशाल है. ...... सुन्दर पोस्ट के लिए आभार.

    समय मिले तो यह भी देखें और तदनुसार मार्गदर्शन/अनुसरण करें. http;//baramasa98.blogspot.com

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  4. पढ़ लिया है. समझ रही हूँ. आपसे कुछ सवाल पूछने हैं? ये कुछ फ़िल्में इतना उदास क्यों कर देती हैं? इतनी विरक्ति क्यों भर देती हैं?

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  5. @मुक्ति काकी,
    एगो सवाल हमकौऊओ पूछे का है. जे बताइये आप. जयपुर के साहित्यिक मेले की रपटीली रिपोर्टिन में आप देखती हैं ओरहान पामुक का तत्‍व नहीं लौक रहा है, किरण देसाई की संगतई पर जनबल लहकी गिरी जाये रही है, सो आपके अंतर में उदासी की बरसात नै करता?

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