Friday, January 28, 2011

बिना शीर्षक..



पानी में दूर कहीं एक मस्तूंल हिलती डोलती, रहेगी
दूर किसी कवनो और रेगिस्तान मैं सिहरता, कांपता, रहूंगा
जंगली झील में नीलपाखी कवनो एक दबे स्वर मंत्र उच्चारती, होगी पुकारती
सुबह के धुलते आसमान में उम्मीद एक निस्संग सपने की तरह झरती, खुद को होगी संवारती
मुंह छुपाये मुस्काती, कानों में भीतर तक गड़ता कुछ छोड़ जाता अश्लील बुदबुदाये जाती
कोई बुढ़ईन मुंह में सख्त सुपाड़ी तोड़ती, हथेली की टूटी लकीरें जोड़ती
लहराये चला जाता साइकिल सवार कोई बच्चा ऐंठे सारे सिनिसिज़्म भरभराये फोड़ता
शब्द, ताज़ा छने पाग-नहाये बुनिया के माफिक मुंह में महक की दिलकारी बसाये जाते
लिखना, अनन्त तक की एक अंतहीन लड़ाई में लघुकाय उत्साही सिपाहियों-सा बरछी-भाला चमकाये
उठाये, लदर-फदर भगाये भगलेल हंसिल हंसुल भागे आते, गहरे कहीं भरी आंखें, आत्मा भरे जाते.

4 comments:

  1. मन में कई जटिल भावों को जन्म देती हैं पंक्तियाँ.. टिप्पणी में बताना मुश्किल..

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  2. खुरदुरा यथार्थ....अच्‍छी पोस्‍ट...

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  3. सच है की मन की जटिलताका कोई हल नहीं.... पर सच तो ये है की आपकी जटिल बाते मेरे समझ में नहीं आई :(

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  4. अनन्त तक की एक अंतहीन लड़ाई में लघुकाय उत्साही सिपाहियों-
    ***
    सख्त सुपाड़ी तोड़ती, हथेली की टूटी लकीरें जोड़ती
    ***
    सुबह के धुलते आसमान में उम्मीद एक निस्संग सपने की तरह झरती,
    ***
    कितने सुन्दर, सटीक व अनछुए विम्ब...
    "बिना शीर्षक" पूरी रचना ही... worth being quoted है!

    हम क्या कहें, हमारे पास न उपयुक्त भाषा है, न इतना सामर्थ्य कि आपकी लिखी बातों पर कमेन्ट सकें, फिर भी यह दृष्टता तो करते ही रहते हैं जभी तभी, क्षमादान मिलेगा... इसी विश्वास के साथ.

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