Monday, February 28, 2011

इच्‍छालोक से लौटकर, घर..

बाबूजी घर से तीन दिन लापता रहकर लौट आये थे. नंगे पैर लौटै थे. चप्‍पल किसी भागाभागी में छूट गया था या कोई चोरी कर लिये था सच बताने में बाबूजी लजा रहे थे. पैर की उंगलियों पर सूखा कादो चढ़ा था, कान-हाथ पर सफर की दूसरी गंदगी. एकदम्‍मे घिन्‍नाये वाला रुप. बाबूजी की जगह कोई और होता तो अम्‍मा पहले रसोई से बाहर खड़ा करती तब आगे बात करती. जबकि अभी एकदम आंख के आगे पाके मुंह पर साड़ी दाबे रोने लगी थी. संजु और पायलिया आपस में झगड़ने लगीं कि बाबूजी के कान-हाथ के सफाई कौन करेगा. अविश्‍वास में घबराकर श्‍याम भागा शंखो के घर के पीछे अमरुद के पेड़ पर चढ़ गया, सोच में सर धंसाये कि दुनिया की सारी मार्मिक घटनायें उसी के घर क्‍यों घटती हैं! श्‍याम का डबल जबकि देर तक अमरुद के पत्‍तों के बीच फुसफुसता रहा था कि दुनिया की सारी मार्मिक घटनाओं से क्‍या मतलब है उसका. वह जानता भी है दुनिया क्‍या है या मार्मिकता? अपने डबल को अनसुना करके श्‍याम अमरुद के पत्‍तों पर हाथ पटकता रहा जब तक बुईया आंटी पेड़ के नीचे आकर बंगला-हिंदी में हल्‍ला नहीं करने लगीं, ‘तुम पियारो खायेगा कि हामारा वृक्‍खो गिरायेगा?’

इतने सारे सहजन के पेड़ हैं फिर भी मन हर समय हरा नहीं रहता. हरे तोते की आंख मुंदी रहती है. हरा रंग कहता है मैं नीले और पीले से गुज़रकर आया हूं, जानते हो?

नहीं जानता है श्‍याम. श्‍याम का डबल भी सिर्फ़ मनमोहन देसाई के ‘सच्‍चा-झूठा’ के राजेश खन्‍ना वाले खेल जानता है, बड़ी दुनिया के बड़े इशारों को कहां पहचानता है. बीस वर्ष बाद भी पहचानेगा कौन जानता है.

कहते हैं जंगल में कोई मोर आकर नाच जाता है जॉनी वॉकर समेत उसे कोई देख नहीं पाता, युसूफ़ ख़ान समेत ज़्यादा लोग अपनी-अपनी मधुमतियों में अझुराये रहते हैं, मोर देखने की बात दूर, किसी को उसकी याद तक नहीं रहती.

यह काफी बाद में पता चला कि ‘पिक्‍चर पोस्‍ट’ में किशोर साहू की फोटो देखकर बाबूजी का दिमाग चल गया था, और वह इच्‍छालोक के रॉयल एनफ़ि‍ल्‍ड पर अपने पीछे घर से भागी ‘गाईड’ की वहीदा बिठाये संपेरों की बस्‍ती घुमाने, नाच दिखाने गए थे! संपेरों की बस्‍ती के नाम से ही अम्‍मा के झुरझुरी छूटने लगा. पायल बिना एक शब्‍द बोले चुप्‍पै अम्‍मा के ओट जाकर खड़ी हो गई. बाबूजी शर्मिंदगी में सिर झुका लिये, श्‍याम दौड़कर पीछे वाले कमरे गया और झटके से अलमारी के दोनों पल्‍ले खोलकर वहां चुपचाप सर झुकाये थरथराता खड़ा रहा. रसोई की बल्‍ली का दीमक-खाया बुरादा था झड़कर अम्‍मा के लाल ब्‍लाउज़ की उधड़ी सिलाई वाली बांह पर इकट्ठा हो गया था, देर से संजु देख रही थी कि जाकर अम्‍मा के बांह से झाड़ देगी, वह भूलकर उसने ज़ोर से हाथ की संड़सी भींच ली, पिक्‍चर पोस्‍ट, चित्रलेखा, फिल्‍मी कलियां सबसे एकदम भरपूर नफ़रत करने लगी. (‘दिल दिया दर्द लिया’ के पोस्‍टर की वहीदा जबकि अभी भी आसमान की तरफ मुंह उठाये उत्‍फुल्‍ल हंस रही थी. रेडियो पर कॉलगेट के बाद अब ‘लाईफ़ब्‍ऑय है जहां तंदरुस्‍ती है वहां’ का लहकदार विज्ञापन बज रहा था).

अम्‍मा की छींट की सूती साड़ी पर किसी भी कोण से रोज तीन तितलियां आके बैठी मिलती हैं, आज सब उड़कर कहीं लुका गई हैं. भौं के बाल दहल रहे हैं, पैर का बिवाय चीख-चीखकर कह रहा है हमको देखे, हमको देखे? अम्‍मा थप्‍पड़ मारकर पीछे खड़ी पायल को परे ठेल देती है, नीचे जमीन तकती बुदबुदाकर मन-कटा बोलती है, ‘हमको तो भूले सो भूले, ई बच्‍चा सब आपके याद नहीं रहा?

बाबूजी क्‍या जवाब देते. जवाहरलाल ने कमला के कौनो, कभी दिया था? बगल के कमरे में जाकर बंद होने की जगह दे पाते? बाबूजी की जगह राममनोहर लोहिया ही होते, अम्‍मा के सवाल का लोहा पिघला पाते?

स्‍टील की थाली में सहजन की तरकारी और तीन रोटियों का तहाकर तिकोना अभी भी बिनखाया छुटा रखा था. गंदा ललके गमछा में गीला हाथ पोंछते बाबूजी भुक्‍खले उठ गये कि इच्‍छा नहीं हो रही, खिसियाये मुस्‍कराने लगे. जबकि अलमारी के दोनों पल्‍ला के बीच खड़ा श्‍याम अबले रो रहा था. खंभे के पास सन्‍न खड़ी पायलिया सोच रही थी खुल्‍ला नल का नीचे जाके तब तक बाल भींजाऊंगी जब ले निमोनिया में प्रान न छूट जायेंगे. बाबूजी भी मुस्कियाते हुए रो ही रहे थे, मगर वह सिर्फ़ संजु जानती थी कि देख रही है.

इतनी सारी कुशवाहा कान्‍त की करुणा में लिसराया घर अचानक कितना घर-मेंटल हो गया था! श्‍याम के डबल की टेंट में पैसे होते तो वह अभी बाहर भागकर राज खोसला की ‘दो रास्‍ते’ का वीसीडी लिये आता, पड़ोस के परिड़ा के घर से चुराये पपीता के फांक काटकर खाते सब बलराज साहनी को ग्रामोफोन पर सहगल का ‘एक बंगला बने न्‍यारा’ गाता सुनते और आंख में आंसू लिये बिना बोले एक-दूसरे को सुना-सुनाके गृहस्‍थी की रसवर्षा में, थोड़ा रोते और थोड़ा हंसते रहते, क्‍या सुनाते? अरे वही चेतनानंद की मदन-मोहनी ‘तुम जो मिल गये हो, जहांsssss मिल गया हैsssssss……’

Sunday, February 27, 2011

लाली लाली हैलमेट के तीन रुपैया वाला मुरझाइल फूल..

एक थे साधु भुईंया. जाने किसका खोया कहां से एक अभागा पुरनका लाल हेलमेट पा गए थे, हर बखत माथे चढ़ाये रहते. हेलमेट धारे-धारे मंटू के राशन दुकान से आठ रुपये वाले पेट के दरद का चुरन खरीदते, गिरिधारी के ठेले पर घुघनी खाते. रसिकता में बिसरामपुर की काली बंगाली लड़कियों से ‍गरीब मज़ाक करते, फिर हें-हें करते गुड़ाखू के बदरंग दांत दिखाते. पसलियों के पंजर की ही तरह माथे का लाल हेलमेट हिल-हिल हिलता. कौन जाने साधु भुईंया के प्रेम हो गया था. वही हुआ होगा. जभी तो. एक बार अंड़से टेलर में घुसे, बाजू का पसिंजर हाथ फेंकने लगा, टेलर के कंडक्‍टर बाबू नाराज़ हो गए. हल्‍ला बोलने लगे शंखी खाके घर से चले हो, का जी? सर पर का डराम हटाओ, दायें-बायां लग गया तो जनाना-मरदाना कोईयो इंजर्ट हो सकता है, अबे, आपै से बतिया रहे हैं? कितना किच-कांव हुआ, एगो बुचरुग के हाथ का डंडा से एक छौंड़ी के गोड़ चंपा गया, अगले इस्‍टाप साधु भुईंया धकियाये टेलर के बाहेर फेंका गये, मगर हेलमेट कहां उतारे? नहींये उतारे. मुन्‍ना कि उसकी बहिन कवन तो बोल रहा था कि साधु भुईंया हगने जाते हैं तब्‍बो हेलमेट नहीं उतारते! नहींये उतारते होंगे. आदमी प्रेम में पड़ता है तो उसकी यही दुरगति होती है.

जैसेकि एक थी चंद्रकला, और वो प्रेम में थीवो नहीं, मगर मन लगाने का बलिहारी देखिए! हां, मने लगा था चंद्रकला का, सुख-दुख कवनो मौका हो, लइकी का आंख से भर्र-भर्र आंसू गिरने लगता! सरोजा मौसी की बेटी गौना के बाद ससुरारी जा रही है, चाहे गोदी में बच्‍चा लिये वापस मम्‍मीजी के यहां आ रही है, एक नज़र चंद्रकला को दिखला दीजिए और भर्र-भर्र लइकी के आंख का टंकी चालू. मुबारक के यहां सब एक बंदर पाले थे, कुछ दिन पीछे पगलाकर जवान ने खूब उधम मचाईस, तीन कुत्‍तों ने चांप के रगेद लिया, काट-कूट के बानरजी को जीवन लीला के पार लगा दिया, चंद्रकला देखी तो लगी भां-भां रोने. संपूर्णा के मंगनी के बखत वही आलम. अशोक कहां-कहां हाथ और गोड़ रगड़ के, केकरा-केकरा के पइसा खेला के रेलायंस का चोर कंपनी में तेरह सौ के नौकरी पाये तब्‍बो वही कहानी, चंद्रकला के हाथ के स्टिल गिलास और गाल दोनुए जगह पानीये-पानी..

इसीलिए महापुरुस लोग बोल गए हैं प्रेम करना और मन लगाना दोनों ही बड़ नुकसान वाला चीज है. पब्लिक बड़ हिकारत से देखती है, और बकिया जो नुकसान होता है सो अलग. जैसे एक गाय थी और एक थी उसकी बछिया. गइया रहते-रहते गोड़ पटक के बोलती सुन रे, बाछी, तोरा के देख बड़ हम्‍मर मन जुड़ाता है, ममता में छाती फूल जाती है और सांस भारी होने लगता है, मगर ई रोज-रोज वही चारा-चोकर, बासी रोटी और मुरझाया आवाज में अपना बां-बां हमको सुहाता नहीं, सब छोड़के सोचते हैं पोखरा-पहाड़ पारे कहीं भाग जायेंगे, तू अप्‍पन खयाल रखना, हम्‍मर पीछे-पीछे मुंह डोलाये मत आना, हां? बछिया अपनी बड़ी-बड़ी आंखों, फटी-फटी आंखों अपनी जननी को ताकता और वैसे ही आंखें फैलाये फिर मुंडी हिलाता, गोड़ पटककर बोलता, ‘हम तो आऊंगा, पीच्‍छे से आके बहुत बहुत बहुत दूर आग्गे निकल जाऊंगा, फिर देखता हूं कइसे हमके पकड़ोगी, पकड़ लोगी, मम्‍मीजी?’

ऐसे ही मौकों पर मम्‍मीजी गइया आंटी के अकिल काम नहीं करती, सोचती हैं ममता के मारी घर छोड़के भागे वाली गइयों के बारे में जाने महापुरुसों ने कुछ क्‍यों नहीं बोला, और बोला है तो सब इतना गलत क्‍यों बोला है..


(ऊपरी के इस्‍कैच: गया के तीन रुपइया वाला सस्‍ता इस्‍टाकिंग से)

Friday, February 25, 2011

अच्‍छा होने के खतरे..

नाक में जीत के पूर्वाभास की नसैनी सटाये, या आह्लादकारी अफीम की पिनक में हरियाये, वर्ल्‍ड कप के गड्ढे में गिरे अच्‍छा हो इस लिंक पर नज़र न ही डालें (क्‍योंकि अभी अप्रैल भर किरकेट-हरियाली के सिवा यूं भी दुनिया में उन्‍हें और कुछ नज़र नहीं आने वाला.. इस्‍लामी जगत की तानाशाहियों की जो ख़बरें खंगाल रहे हैं उनसे अलबत्‍ता कातर मनहारी गुज़ारिश ज़रुर है कि एक नज़र इधर, अपने गिरेबान में भी डालें.. भूल गई होगी तो शायद फिर कुछ-कुछ गोरख पाण्‍डेय की कविताएं याद आने लगें.. याद करने में बड़ी ज़िल्‍लत हो रही हो तो आकर मेरी आंखें देख जायें, सहुलियत के लिए फिर मैं गुनगुना भी लूंगा: ये आँखें हैं तुम्हारी / तकलीफ़ का उमड़ता हुआ समुन्दर / इस दुनिया को / जितनी जल्दी हो बदल देना चाहिये.

(पोस्‍ट से लगी तस्‍वीर पलामू के 34 वर्षीय ललित मेहता की है, बंगलौर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई किये व अपने सूखाग्रस्‍त जिले में पानी लाने की कोशिशों में भ्रष्‍ट अधिकारियों की ओर उंगली उठाने के एवज में उन्‍हें अपनी जान गंवानी पड़ी. फोटो: तहलका)

Thursday, February 24, 2011

मोहब्‍बत रफी के लगले एगो मूचिकल पाल्‍टी..

जोति भौजी के जान मुंह में आ रहा है. सात हालि आंख और ओंठ बनाके इनके देख-देख इसारा की हैं, मगर ई हैं इधर देखिए नहीं रहे हैं, जाने किधर आंख फंसाये हैं, कवन फूल कि बाती में मन अझुराये हैं! जरा देर पहिले गाय के गाल से गाल सटाये गाये रहे थे, ‘एक हसीन साम को दिल मेरा खो गया..’, अब छत के खपरा पे नचनिया नाच खेल रहे हैं! लाजे भौजी के बुझा रहा है कहीं कोना कंबली ओढ़ के लुका जायें. मगर गरदन के ठेपी चैन कहंवा लेये दे रहा है? अब ई दुसरका कवन वाला गाना छेरे हैं रे, पुतुलिया?

पुतुलिया चुनमुन के गोदी में झुलाये आंख फैलाये खबर करती है, ‘आज कहो तो बढ़के मोड़ दूं बकत के धारे, दिल पुकारे, आ रे, आ रे..’

हे भगवान, चंदन किरिया, इनके अकिल के का हुआ है? सुबहीये से.. हाथे मंजन पकड़ाये तो चिंहुके बोले लगे, ‘देवाने का नाम त पूछो, धाम त पूछो? दुकानी का अड्रिस पूछो,’ अरे? मंजन का पहिलहीं भांग पी लिये हैं का जी? हमरा उंगली खींचके बहके लगे, ‘अइसन त मोरी तकदीर नै थी तुमसा जो कोई महबूप मिले, दिल आज खुसी ले पागल है ऐ जाने बफा तू खूब मिले!..’ दइया गे दइया..

चौबे जी का नीम का नीचवा राजिन्‍नर चाचा सैकिल थामे केकरा से त बतिया रहे हैं, सुनेंगे त का सोचेंगे इनका सुझा रहा है? ठेहुना पर थप-थप हिला रही है मगर पुतुलियो के ध्‍यान चुनमुन में नहीं है, मुंहे-मुंह चाचा के गवनई गोनगोना रही है, ‘जब तोसे नजर टकराई सलम, जज्‍बात के एगो तोफान उट्ठा, तिनके की तरह हम बह निकली, सैलाप मोरे रोके ना रुका..’

सब दिलकुच्‍चन के मजा कर रहे हैं अऊर उधर रसोई में बिलार मौसी आके चुनमुन के दूध सब सफ्फा कर गईं!

और ओसारे में कवन है दरवाजा खड़खड़ा रहा है, जमादार जी हैं का? ‘पाहुन दू गो बीड़ी दीजिएगा?’

देवार का दूसरिका ओर से जनारदन के काकी पूछ रही हैं, ‘हे जोति, घेंवड़ा में ईमली डालते हैं, हो?’

भौजी का चेहरा उतिर गया है, ऊ का जानें घेंवड़ा में इमली डालते हैं कि नहीं, ऊ तो अभी घरे का मोहब्‍बत के कीर्तन फरिया लें, ‘जिया ओ जिया ओ जिया बोल दो, दिल के परदा खोल दो..’

डायरी, पंजर-पंजर

खिड़की पर हाथ हिलाये मुस्काता, मैं दिखाता था मंजर. शर्मिन्दगी में सिर नवाये वो बोले, बंजर.

बंजर? इज़ इट?

हम गिरे, इस ज़रा औचक घड़ी भाषा में ही गिरे. पीछे धीरे-धीरे रात गिर रही थी, जीवन बहुत पीछे कहीं गिरा था. स्मृतियां जाने किस मोड़ गिरी थीं (व्हॉट स्मृतियां? आर दे स्टिल अराउंड, व्हेयर?).

मुस्काने की बात नहीं थी, मगर मैं दांत बाये, हाथ हिलाये रहा, धीमे भाषा में लौटता, कहने लगा, अपने समझने में चलने. देखिए, ऐसा है वो जी, खुरदुरे पैरों की तब कहां थी खबर, बचपने के भोलेपन में हमने समझा था जीवन तितली का पर होगा, बच्चे के गोद में खुली कॉमिक किताब-सा रंगों-भावों का भंवर, गाल पर गीत व हर सम्भाल में कविता होगी.

फ़ि‍ल्मी चक्कर में किस्सा कुर्सी की टुटही टांग हुए पंजर-पंजर हिलेंगे, टिटिहरी स्‍क्रि‍प्‍ट की टिनहा कहां बानी, के-हानि, हीं-कहां-हीं-कहां कहानी हुए जाएंगे, आप टहलते बंजर बोल बोल जाओगे, कब कहां थी खबर..

Wednesday, February 23, 2011

वह आदमी बस से उतरकर



वह आदमी बस से उतरकर अभी जो
उस इमारत गया बस इतना
दिखने की उसकी सिर्फ़
इतनी ही कहानी है मेरे पास
एक घर के अंधेरों में दाखिल होकर
उसने क्या तरतीब पाई होगी
समय औ’ स्पेस में सहजता बुनता
बीमार मां को नहलाया होगा
जीवन-संगिनी को बहलाया, बेज़ारी
में किया नंगा होगा, कि देर रात
मध्य-पूर्व और पच्छिमी एशियाई
ख़बरों के बीटवीन द लाईन्स में उलझा
उलझता, स्वयं नंगा हुआ होगा
होता होता होता रहा होगा
गांव औ’ शहर औ’ सपनों में विस्थापित
उनींदे चौंककर आदमी मर्तबा जागता है, सिहरता
जानता है कुछ ज़रा चीनो-अरब उसके हिस्से
का भी होगा, सड़कों पर गुज़रते, मरते
लोगों के ख़ून में कुछ उसकी आत्मा़
भी जाया होती होगी, मरती और
जिये जाती, जिये, जिये जिये
सांस रोककर आवाज़ें सुनता
कि यह किसका मुल्क है किसकी लड़ाई
ज़बान में विस्थापित किस भाषा में आदमी
ज़ि‍न्दा खड़ा हो जाये, भरपूर
गिरा आदमी कभी होता है खड़ा
अपनी समूची इज़्ज़त में, ज़बान में?

बसंत की इस अलसायी हवा में
नाक की नोक पर बारूद की गंध नहीं
न रसोई की रस्सी पर ख़ूनसनी कमीज़
कोई पसराती, सूने सुन्नाट रात की ख़ामोशी
अजाने ज़मीनों अजानी उम्मीदों की कोई
बदज़ुबान लोरी है बेहयायी में गाती, गाये जाती
एक अदद जोड़ी हाथ हैं, पैर हैं
कल दोपहर तक की खुराक भर
का ही आत्मविश्वास है उससे ज़्यादा
सच पूछिये आदमी की पहचान
की तमीज नहीं है, तक नहीं है
भाषा की पुरानी पड़ रही पट्टी में ज़रा
कुछ नया गांठने की गिरह कर रहा हूं
भाषा से बाहर खड़ा, नई
नागरिकता की जिरह कर रहा हूं.

Tuesday, February 15, 2011

बुच्‍चन कहां है?..

फुआ के होस गुम है. पड़ोस में पंडा बो के हाते दू मुट्ठी मेथी सरहेजने गई थी, बुच्‍चन गेट का जाली में गोड़ फंसाये ‘सैकिल-सैकिल’ खेल रहा था, पल्‍ला का नीचे मेथी दाबे लौटी हैं तो गेट से बुच्‍चनवा गायब है. घर नहीं, न जनार्दन के टंकी ठाड़ा है, नहींये रामनाथ के गुमटी का आगा लउक रहा है. सुबहै-सुबहै मुफ्त का दू मुट्ठी मेथी पाये का सब सुख भुला उजरा गया, लजाईल फुआ ‘लापता’ बुच्‍चन खोज रही हैं. लजाये का मामलै है. भौजी का जिम्‍मा, जगलल आंख का आगा सुबही का उजाला में ओझिल हो गया! पांच साल की दीदी के तीन लप्‍पड़ पड़ा है, दू हाली झोंटा का खिंचाई हुआ है, बुचना के बेचारी घबराईल खोज रही है. क्‍या होशियारी है, पांचे साल के उमिर में छौंड़ी घबराये सीख लीहिस है! मगर अढ़ाई साल के बुच्‍चन फरार होये नहीं सीख लिया है?

गोलगप्‍पा का ठेला पर, टाली के बाहिर कोयले का रेला पर, दीनामोहन के दुकानी, जदुनंदन भुइयां के खटाली, बुच्‍चनवा के कहीं पता नहीं है. फुआ के माथा तपा रहा है. हवाई चप्‍पल का भीतरी गोड़ दमक रहा है. फूफा आधा घंटा में कंपौंडर के हियां से लौटेंगे तो खुलल मुंह उनको क्‍या बोलेगी, कि माड़-भात खाके चौधरी जी के सैट पर जाइये, हमरा माथा मत गरमाइये? दीदी नंगे गोड़ रुपाली सेनगुप्‍ता के इस्‍कूल के बाहिर मरम्‍मत के गिट्टी पर जाके खड़ी हो गई है. इस्‍कूल का अहाता में बच्‍चा लोक के शोर है, आसमानी में चम-चम धूप का अंजोर, मगर दीदी मनै-मनै डेराई हुई है. काहे डेराई है क्‍योंकि बुचना हेरा गया है? न्‍न्‍ना, बुचना नहींयो हेराया होता, कवनो दुसिरका बहाने, तीन लप्‍पड़ का परसादी और झोंटा-खिंचव्‍वल तो दीदिया तब्‍बो पाती? रोटी में गुड़ लपेट के दू गो रोटी सुबही खाई थी अऊर एतना ही देरी में चेहरा मेहरा गया है. बुच्‍चना चट देना कहीं लउक जाये तो उसके चार चटकन मारके दीदिया अपना फेशियल दुरुस्‍त कै ले, मगर बुचना एतना ईजीली भेंटाये वाला लइका है? नंगे पैर के नीचे गिट्टी गोड़ में तप रहा है, लेकिन दीदी को परवाह नहीं. कोई डांटकर पूछेगा इस्‍कूल का गिट्टी पर क्‍यों खड़ी है तो मुंह झुकाये बोल देगी बुच्‍चन को खोज रही है. हां, वही, बुच्‍चन को, खोज रही है. हिम्‍मत बंधा तो धूप से आंख बचाती, आंख पर हाथ धरे आगे ये भी पूछ लेगी, ‘आप देखे हैं? हमरा भाई को?’

मैदान के उस पार रेलवे यार्ड में एक कोयले का इंजन भक्क-भक्क बोलता धुआं उगल रहा है. माथा में गमछा बांधे डेलाइवर जी मुंह में बीड़ी जलाये एगो हौस पाइप का नीचे हाथ और गोड़ धो रहे हैं.

सैकिल के हैंडिल पर धरे एगो सरदार जी सुग्‍गा का पिंजरा लिये जा रहे हैं. सुगवा चीख-चीख के सिकायत कर रहा है, ‘सुग्‍गा हेरा गया! सुग्‍गा हेरा गया! कोई सुग्‍गा के खोज रहा है जी?’

ताप्‍ती के मम्‍मी दास अंटी के रसोई की खिड़की पर टोह लेती एगो बिल्‍ली बैठी है, भृकुटि चढ़ाये सुगवा के देखकर मुंह बनाती है, ‘पूरा मोहल्‍ला जगलायेगा, का रे पागल?’

बुच्‍चन का अबहुंओ ले पता नहीं है.

Monday, February 14, 2011

कितने पास कितनी दूर..

दीपा सो रही है. अच्‍छा है. दिन भर खटनेवाली स्‍त्री अंतत: आधी रात चैन की नींद ले रही है. जबकि मैं नहीं ले पा रहा हूं. चैन तो दूर, बेचैन वाली भी नहीं. और ऐसा नहीं कि दिन भर खट नहीं रहा था. फिर भी. थोड़ी देर में पता चलेगा रात भी खटाई में ही बीती. ऐसा नहीं कि खाट पर लेटे से खटना कम हो जाता है. बताने की ज़रुरत नहीं, भुक्‍तभोगी जानते हैं. इस उम्र में आकर अट्ठारह के बाद उन्‍नीसवीं मर्तबा करवट बदलना भारी पड़ने लगता है. नब्‍बे किलो का बोरा उठाकर एक जगह से दूसरी जगह रखने की तरह है. बहुत बार बोरा ऊपर उठा रहता है, नीचे रख लेने का क्षण मुल्‍तवी बना रहता है. मुंह से बिना कोशिश अजीब-अजीब आवाज़ें निकलने लगती हैं. कुछ देर तक निकलती रहती हैं. इससे अलग की आवाज़ें भी निकलती हैं. आदमी को अपने से जनित आवाज़ों तक से घबराहट होने लगती है. बहुत बार ऐसे मौकों पर हुआ है (पता नहीं कितना अच्‍छा हुआ है) कि दीपा नींद से उठकर मुझसे ज्‍यादा शोर करने लगी है- कि मुझे क्‍या हुआ है, मैं ऐसी अजीब आवाज़ें क्‍यों निकाल रहा हूं? कुत्‍ते रात में पहचाने चेहरे को देखकर उत्‍साह में जैसे कुछ ज्‍यादा चिंहुकने लगते हैं, दीपा के हल्‍ले से मुझे भी कुछ वैसी ही तसल्‍ली मिलती है, मुंह पर हाथ धरे मैं लंबी सांसें खींचता भर्राई आवाज़ में कहता हूं, ‘वही, हार्ट अटैक आया होगा, या कैंसर हो शायद?’ दीपा बिफरकर गालियां सुनाती मेरा कैंसर कम करने लगती है. और कैंसर सचमुच कम होने भी लगता है. लेकिन गिनकर तेईस करवट बदल चुकने के बावज़ूद अभी तक मुझे कैंसर हुआ भी नहीं है. और दीपा सो रही है.

यह भी सही है कि कुछ रातें कैंसर की रातें नहीं होतीं. कविता की भी नहीं होतीं. कि मैं फुसफुसाकर दीपा के कान मैं गर्म शीशे की तरह दुष्‍यंत कुमार उड़ेल दूं, ‘तुम रेल की तरह गुज़रती हो, मैं पुल की तरह थरथराता हूं’ और दीपा मुझसे हाथ भर की दूरी बनाकर कुछ और गाने लगे. ऐसे मौकों पर वह कुछ भी गाती है मुझे रेल की तरह गुज़रती ही लगती है. मैं हमेशा थरथरा नहीं पाता तो वह उम्र व अन्‍य व्‍याधियों-जनित दबावों में होता है. जबकि इन दिनों शुक्‍ला के बारे में सोचना शुरु करते ही मैं भीतर-भीतर गहरे थरथराने लगता हूं. पाजी मेरा अट्ठारह हज़ार दाबे बैठा है. फोन लगाओ तो शुरुआत ही बेटी की बीमारी के रोने से करता है. कभी-कभी तो शर्म लगने लगती है कि उसे कुछ दे देने की बजाय मैं पाने की उम्‍मीद कैसे कर रहा हूं. जबकि महीने के आखिर तक जगदीश के पास जबलपुर पैसे भेजने ही हैं. बत्‍तीस हज़ार भेजने हैं. कहां से भेजूंगा की सोचते ही सब कविता कहीं घुस जाती है. कविताई-चूरन के बिना ही चेतना के एक छोर से दूसरी तक थरथराहट महसूस होने लगती है. फिर ठीक-ठाक वक़्त तक होती रहती है. अभी ही सोचना शुरु कर दूं तो मज़े में थरथराता पड़ा रहूंगा. जैसे दीपा मज़े में नींद की रेल पर पड़ी ही हुई है.

काफ़ी नहीं कि आदमी दिन भर टंटे निपटाते रहने के बाद रात को चैन से चार घड़ी सो? दिन भर झपकी आती रहती है और रात के आधा बीतते ही दिमाग लालबाग और दांतेवाड़ा के संग्रामी मैदानों में बदल जाता है. जबकि सच्‍चाई है कि इन दोनों ही जगहों मैं भौतिक रुप से कभी गया नहीं. न ही आगे कभी जा सकूंगा जैसी कोई संभावना दिखती है. मगर ठीक रात के डेढ़ बजे रसोई की बत्‍ती जलाकर, कुर्सी खींचे अख़बार इस बेचैनी से पलटता हूं मानो सुबह की पहली फ्लाईट से काहिरा निकलने का होमवर्क कर रहा हूं. सरकार निर्माण व संविधान संशोधन के प्रस्‍तावों पर मुझसे राय ली जाये तो ऐसा न हो सलाह देने में कहीं मैं पीछे रह जाऊं. जगदीश वाले बत्‍तीस कहां से लाकर दूंगा उसकी बेचैनी नहीं हो रही है. या गाड़ी का क्‍लच खराब चल रहा है, वह. देह के ही इतने सारे कल-पुरजे मरम्‍मत की मांग कर रहे हैं, वह? आह भरकर चौबीसवां करवट बदलता हूं. अंधेरे में दीवार पर एक तैरता सांप दीख रहा है. चिढ़कर नज़र छत पर करता हूं. वहां कोई खरगोश है ज़मीन कोड़ता जाने क्‍या खोज रहा है. बाहर गली में कुछ कुत्‍ते हैं अभी तक चुप थे अब ऊब कर भूंक रहे हैं. खिड़की के नज़दीक से किसी चमगादड़ की आवाज़ आ रही है. हालांकि मुझे मालूम नहीं चमगादड़ की आवाज़ कैसी होती है, मगर इतनी देर में ऐसी अपहचानी, अजीब आवाज़ आ रही है तो ज़ाहिर है चमगादड़ की ही होगी. मेरी नहीं है. होती तो मुझे खबर हो जाती. शायद तब दीपा भी उठ गई होती और मैं इतना अकेला नहीं होता और हम कैंसर या कविता जैसा कुछ मनरंजन कर रहे होते. मगर हा, दीपा सो रही है. ऐसे मौके के लिए ही हिंदी फिल्‍मों के किसी कल्‍पनाधनी, विचार-प्रवीण चितेरे ने चित्र ईजाद किया होगा- ‘कितने पास कितने दूर’. दीपा कितने पास है, जबकि मैं, कितनी दूर हूं!

Friday, February 11, 2011

जल-डूबल जैज़..

पता नहीं बकरी बंधी है या खूंटा है, जो बकरी-बंधा घिसिटाया, रगड़ा रहा है. आंखों के आंसू दिख रहे हैं. देह पर चोट के निशान. खास खबरें हैं चमकौवा माल की मानिंद अख़बारी मुखपृष्‍ठ के शो-केस में धंसे हैं. एक चमकती तारिका है दांत निपोरे हाथ हिला रही है, अपना लाल कपड़ा दिखा रही है. होता तो क्‍या मालूम मैं भी दिखा रहा होता? छापने के अख़बार पैसे मांगती तो शायद छत पर सुखाने लिये गया होता. मगर जा नहीं रहा. छत पर ताला चढ़ा है. वैसे भी फिर लाल कपड़ों की ज़रुरत होती. जो आपके यहां हो सकता है पेटी में बंद हो, मेरे घर में मैं ही बंद हूं. बिना कपड़े आंखों में उंगली ठेलकर देख रहा हूं हो सकता है चार लाल आंसू मिल जायें, उतना तक नदारद है. कोने में बैठे कुछ लोग दिखते हैं. एक-दूसरे की पीठ खुजलाते हुए उनके चेहरों पर संतुष्टि की कोमल स्निग्‍घता फैली हुई है. मंद-मंद मुस्‍करा रहे हैं. लजा भूले से भी नहीं रहे हैं. एक अजन्‍मी बच्‍ची है, मां के पेट में गोड़ पटकती चीख रही है, ‘सुन रही हो, सुनी? इतना सारा फेसबुक करना होगा और पासबर्ड याद रखना तो हम बहरी नहीं आ रही हूं, हां?’ मुंह में गुड़ाखू फंसाये बाबूजी कान से हवा छोड़ते लंबी सांस भरते हैं, ‘देखो, हम तीस साल का उमिर में पहली मर्तबा बिजली से चले वाला बल्‍ब देखे रहे, रेल का टिकिस लेके चढ़े रहे, लेकिन घबराके वोही इस्‍टेशन उतरियो गये रहे, अऊर ई आज के छौंड़ी, पेटे से इंटरने के कनेस्‍सन खोल रही है?’

‘दुर! दुर!’ मुंह की बजाय मैं मन से बोलता हूं और किताब में नज़र धंसाये आंख फोड़ने लगता हूं. तीन किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से सात सौ सतहत्‍तर हज़ार किलोमीटर का अनसुलझा सफ़र एक बार फिर चालू हो जाता है. माने जीवन की रेल कवनो गड़हे में जाकर अटक जाती है. जॉयस बोलते हैं, ‘ओ शिट!’, फॉकनर, ‘ओ फक्क!’, भोजपुरी में तर्जुमा करके मैं साहित्‍त-मंजुषा मर्म सुनता हूं, ‘ओ तिलकुट के दोकान, हमरी सवारी बगैर कबहूं बक्‍सर चहुंप पाओगे? साहित्‍त-जीबन को कब्‍बो जन्‍मेजय बनाओगे?’ मैं चिंहुककर अपने बचाव में कहता हूं, ‘सब जानके इब्‍न खल्‍दून कब्‍बो हो गये थे? बिना रेल के पानी-पानी हियां और हुआं भटकते नहीं रहे थे?’

मुंह में सुपारी और लवंग और कांखी के नीचे पंचांग दाबे पंडित नारदाप्रसाद गहलोत हैं, बिना मांगे आशीर्वाद दिये शिकायत करते हैं, ‘बच्‍चा, जलमभर थियरी गुल छांटते रह जाओगे, गाल के फुंसी तक तुम्‍मर हाथ नै पहुंचेगा!’ नीचे गली में पंडिजी की साइकिल सोगहग खड़ी होगी, हैंडल पर सोहाता लाल झोला. आगे मुंह चुभलाते बोलेंगे, ‘पैर छूओ तो हम सोचकर बोलें कवन ईलाम तोहरे खातिर बाजिब बइठेगा! संज्ञान प्रकासन का साहित्‍य गुलो पढ़ रहे हो? जुग निर्माण योजना का ‘जीबनसत्‍त-प्रकाश’? अइसही फुदकते रहे से कुच्‍छो होगा जी? फुदकनिये होगा, जीबन नै होगा, हं? हें-हें-हें, ई लS तीन गोS सुपारी खावो!’

सीढ़ि‍यों पर बैठी एक जनाना है, पैर की गंदी उंगलियों पर चटख़ नेल-पॉलिश पोत रही है. शायद दोष मेरी नज़र का है, रंग ऐसा गंदा है भी नहीं. जैसे बच्‍चे नहीं हैं जो नीचे पानी में डूब रहे हैं. मैं घबराकर चिल्‍लाता हूं, ‘अबे ओ माधुरी दिच्छित, आपको दिख नहीं रहा, आप सौंदर्ज-प्रकाश फैला रही हैं और हुआं ऊ बच्‍चा-सब पानी में डूब रहा है? जनाना- बिना नज़र उठाये, बिना नाराज़ हुए- बताती है, ‘डूब नै रहा है, खेल रहा है. पानी में जब ले हेलेगा नै खेलेगा कइसे! डुबल तुम रहते हो. एतना डुबाई अच्‍छा नहीं है. रक्‍कचाप बढ़ जाता है. कमर बेथा में पेराये लगता है, सो, अलग. अइसही माथा का बाल नै उड़ रहा है. कवन तेल लगाते हो? झाड़ा ठीक से होता है?’

मैं औरत की बातें अनसुना किये बच्‍चों पर बरसता हूं, ‘अबे, तू लोक को डर नहीं लग रहा? कवन खेला खेल रहे हो?’ एक बच्‍चा और गहिरे डूबता, पानी में दांत निपोरे कहता है, ‘इन्‍न खल्‍दून!’ बाकी के दोनों भी पानी के नीले में बिजलियों की चमक फैलाते चहकते हैं, ‘हां, इन्‍न खल्‍दून, इन्‍न खल्‍दून!’

Thursday, February 10, 2011

सुखदेव..


- यही नाम है तुम्‍हारा?

- Yes.

- Oh god..

- Yes.

- I mean, really..?

- Yes.

- To think.. the kind of cruel vulgarities parents inflict on us..

- Yes.

- Oh god..

- Yes.

- Doesn’t it bother you?

- Yes.

- I mean.. you are standing in some company, and you introduce yourself to some girl, hi, this is Sukhdev..

- Yes.

- Oh god.. Isn’t is preposterous.. ghastily, horrifyingly vulgar?

- Yes.

- I can not imagine having such a name on my head and carrying on with life..

- Yes.

- But you are?

- Yes.

- Oh god?

- Yes.

***

- ये रास्‍ता कहां तक जाता है?

- जहां तक आप लेकर जाओ.

- अरे, आप तो फिलॉसफ़ी छांटने लगे?

- आपने सवाल ही फिलसॉफिकल पूछा.

- अब आप मेरा मज़ाक बना रहे हैं!

- हो सकता है. हम सब बनाते रहते ही हैं.

- सीधा आदमी, मैं फिलसॉफिकल क्‍या पूछूंगा?

- मगर पूछ रहे थे.

- सड़क कहां जाती है में ऐसा आपको टेढ़ा क्‍या लग गया?

- सड़क के कहीं जाने में ऐसा सीधा भी कुछ नहीं है.

- क्‍या मतलब?

- मतलब यही कि आदमी सिर्फ़ शरीर नहीं है. वही बात सड़क पर भी लागू होती है.

- मीनिंग?

- कि सड़क सूराग है. रहस्‍यलोक का एंट्री पॉयंट है. ये आपकी बुद्धि पर है कि आपके भीतर रहस्‍यलोक का आइडियेशन कितना, कैसा है.

- अरे. ओ रे? आप बात क्‍या कर रहे हो?

- सड़क के बारे में कर रहा हूं.

- आर यू किडिंग? आप शुद्ध मेरा चूतिया काट रहे हो!

- आई अम एक्‍स्‍ट्रीमली सॉरी इफ यू फ़ील दैट वे.

- अरे, एक सीधा सवाल पूछ लिया तो आप नाक में दम कर दोगे?

- नाक में दम, ऑनेस्‍टली, आपको अपनी समझ की वज़ह से हो रही है.

- यू सी, यू आर अगेन मेकिंग फन ऑफ़ मी. आप सिंपली बता नहीं सकते ये सड़क किधर जा रही है?

- कहीं नहीं जा रही. सड़क वहीं खड़ी है जहां हमेशा से खड़ी थी. आप जा सकते थे लेकिन लगता नहीं कभी सकेंगे.

- आई कांट बिलीव इट!

- लेकिन मुझको है. आपके कहीं नहीं जाने में.

***

- और कहां दुख रहा है?

- मुंह में डाकदर साहेब.

- गोड़ दिखाओ?

- अऊर पीठो में बेथा है, डाकदर साहेब..

- आंख दिखाओ.

- कल सोये थे तो पीठ ठीके थे, आज उठले के बाद..

- कांख देखाये को नहीं बोले. आंख दिखाओ, आंख!

- आंख तो जलमे से खराब है, डाकदर साहेब..

- पेसाब ठीक से होता है?

- कहां से होगा, मालिक, हमरा एरिया में पानी के संकट है. तीन दिन पहिले पखाना हुआ रहा.

- भात खाना बंद कर दो. और हरीयल तरकारी, समझे?

- ऊ वइसही बन्‍न है, डाकदर साहेब.

- आखरी हाली मंदिर कब गए थे?

- शिवरात के. छोटना को लावे ला गए थे. ऊ हुआं चप्‍पल चुराये ला गया रहा.

- तू लोक.. घरे केतना सिबलिंग हो?

- घरे का खाके रखेंगे, मालिक. लिंग जेतना गो है, सब शेवाले में है.

- पाकिट खोलके देखो केतना ठो दस का नोट लाये हो. पचसटकियो बाहिर करो!

- पचसटकिया कहां ले देखे के भेंटाता है, डाकदर साहेब, सब दू और एगो रुपिया वाला है..

- केतना है, गिनके बाहिर करो?

- ई एतना दुख जीबन में कहां ले आता है, डाकदर साहेब?

- जनाना के कौन महीना चल रहा है?

- ऊहे जानती होगी, हमसे कुच्‍छो कब्‍बो बताती है हरमखोर?

- तबीयत ठीक है उसकी?

- कब्‍बो थी जो अबहीं रहेगी. बियाह के मवके से गरबराई रही. ठाड़े-ठाड़े ठग के अइसन लइकी से हमको बांध दिये सब.

- पहिले जो टैबलेट दिये थे ऊ सब नियम से खाय रहे हो?

- ऊ आपको बताये नहीं, सब छोटना का बहिन खाये ली थी. आप पेसेन का बाते नै सुनते हैं?

- ठीक है ये लाल वाली दवाई लो, दिन में तीन बखत खाने के बाद- या पहले- जैसा सुभीता हो अपनी जनाना से खाने को कहना. और ये कैपसूल तुम्‍हारे बच्‍चों के लिए.

- छोटना के लिए जरा जादा दीजिएगा, डाकदर साहेब, ऊ बहुतै मरहा छोकरा है, बहुतै झगरा करता है­.

- और ये कोहनी में तुम्‍हें कब से दर्द है?

- आपका आगा कुरसी में बइठे हैं, दरद चालू हो गया, डाकदर साहेब.

Saturday, February 5, 2011

इन द ऑफ़िस आल द टाईम, एंड दैट्स इट..

रहते-रहते- सुबह के नाश्‍ते के बाद, या रात के खाने के पहले- हम बेसबब, खोये की टहल में इतनी दूर निकल जाते कि पुराने पहचानेपन का नक़्शा हाथ से छूट जाता. एक बिंदु तक पहुंचकर यूं भी मेरे चेहरे का रंग बदला होता, आंखें चमकने लगतीं, और चहकता मैं ऐलान करता, ‘दैट्स इट! नाऊ वी आर प्रॉपरली लॉस्‍ट.’ इसके बाद फिर असल खेल शुरु होते. अब तक लहराकर आगे निकलती आई, खिल-खिल करती, बीनू चौंककर थम जाती. अचकचाकर चारों ओर देखती ताड़ती, मुंह पर रुमाल धरे किसी पत्‍थर पर बैठकर घबराने लगती, ‘अब? मुझे मां को दवाई देनी थी. कल ऑफिस में एक ज़रूरी मीटिंग थी, आई हैव टू बी बैक होम?’

‘देन गो होम,’ पैंट की दोनों जेब में हाथ धंसाये मैं मुस्‍कराकर जवाब देता, ‘मैं तो इस खोये में ही खुश हूं. मुझे तो घर की याद भी नहीं. होम स्‍वीट होम, कहां हो तुम? डोंट यू रिमेम्‍बर, किसने कहा था, कि ग्‍लोबलाइज़ेशन ने बीच बाज़ार में खड़ा करके हमसे हमारा घर छीन लिया है? अच्‍छा लगे या बुरा, द वर्ल्‍ड इज़ व्‍हॉट इट इज़, वी आर नाऊ लॉस्‍ट फॉर एटरनिटी, एंड यू बेटर एडजस्‍ट टू इट!’

बीनू मेरी बातों से अम्‍यूज़ नहीं होती. साथ टहलने निकली की खुशी में पीछे घर का सब गड़बड़ हुआ का अवसाद गड्ड-मड्ड होता रहता. मेरे एनीमेटेड चहकन से वह कुछ चिढ़ती सी, थकी आवाज़ में गुज़ारिश करती, ‘प्‍लीज़, कुछ देर चुप नहीं रह सकते? मैं समझने की कोशिश कर रही हूं.’

‘मैं भी, मैं भी. समझने की कोशिश कर रहा. हूं,’ चहकता मैं जवाब देता. टहलता-टहलता किसी अजाने पौधे को टटोलकर देखता. झाड़ी को, तिनके को. दुकान में घुसते, बाहर निकलते, सड़क पार करते, सीढ़ि‍यां चढ़ते रोज़ कितना वक़्त निकलता चलता है, हाथ की उंगलियां कोई तिनका कहां दुलराती हैं? बीनू मेरे कंधे पर ठोढ़ी गड़ाकर बुदबुदाती, ‘छेनी, संड़सी, कुदाली, चिड़ि‍ये की जाली, छनौटा, सूप, जांत, बिना-बिजली रात अब कहां आता है जीवन में, सपनों में भी दवाइयों की दुकानें खुलती, बंद होती हैं?’

नींद की ऊंघ में थके एक गदहे को बरजता एक बेरोज़गार किसान गुज़रता है. बीनू उससे चुहल करती पूछती कि उसने ‘पीपली लाइव’ फिल्‍म देखी या नहीं. किसान ना में सर डुलाता जवाब देता है कि उसके गांव में टीवी नहीं है. बिजली नहीं है पानी भी. इस तरह जंगल में हम क्‍यों टहल रहे हैं, गदहे की तरह थककर ऊंघने लगेंगे और सोने को जगह नहीं मिलेगी. बीनू हंसकर जवाब देती कि घर पर भी थककर ऊंघाई आती है और सोने को जगह नहीं मिलती, एक ही बात है. किसान इस मज़ाक का जवाब नहीं देता. डंडे से गहदे हो खोदता चुपचाप जंगली घाटी की ढलान उतरता चला जाता. छोर पर पहुंचकर, पलटकर चिल्‍लाता सवाल करता, ‘इसके माने थोड़े समय में सारी दुनिया गदहा हो जायेगी?’

इतनी देर तक में मैं किसान को भूल चुका होता. माथे के नीचे हाथ डाले आसमान तकता होता. घुटनों पर हाथ बांधे बैठी बीनू बोलती, ‘जानती हूं तुम्‍हें, थोड़ी देर में साथ आई थी की मुझको भी भूल जाओगे.’

मैं आसमान से आंखें हटाये बिना बीनू की आंखों में झांककर जवाब देता, ‘नहीं, स्‍लावो जीज़ू की गदह-पचीसी मुझे याद रहेगी. प्रॉमिस.’

‘सब भूल जाओगे. आई कैन सी इट हैपेनिंग ऑल द टाइम,’ बीनू मेरी बगल उठंगा लेटकर कहती, ‘हज़ारीबाग़ की हिस्‍ट्री दो मुझे. आई बेट तुम्‍हें याद नहीं. प्रूव मी रॉंग?’

मूर्खों की तरह मैं आसमान में अपलक इतिहास खोजता भटकता.

बीनू आगे कहती, ‘बोधगया, रांची, रक्‍सौल, डाल्‍टनगंज, डुमरांव, सी? तुम्‍हें कुछ भी याद नहीं? रज़ा के आधा गांव का गाजीपुर कितना याद है, टेल मी ऑनेस्‍टली?’

गुस्‍से में पलटकर मैं आसमान की जगह आठ इंच की दूरी से ज़मीन पढ़ने लगता, ‘तुम्‍हें नानी की मां की याद है? नानी की? मां की? ऑनेस्‍टली?’

‘तुमसे कहा तो मां को दवाई देनी थी?’ बीनू बुरा मानकर कहती.

‘दवाई लेने से पहलेवाली मां की,’ मैं ज़ि‍द्दी बना कहता.

बीनू उदास हो जाती. मुझसे मुंह फेरकर कहती, ‘मैं जानती थी तुम्‍हारे साथ निकलने पर यही सब होगा. मैं सुखी रहूं के आइडिया से तुम्‍हें जलन होती है. यू हैव टू डिस्‍टर्ब एवरीथिंग. ऑनेस्‍टली, आई वॉज़ बेटर वर्किंग इन द आफिस.’

‘यू आर, इन फैक्‍ट,’ मैं बच्‍चों की तरह जोर से हंसने लगता.

‘व्‍हॉटेवर,’ बीनू चिढ़कर जवाब देती और दुबारा घर का नंबर ट्राई करने लगती. इस बार पहली ही कोशिश में नंबर लग जाता.

Thursday, February 3, 2011

एक चांद ठेहुने पर था.. या ठोढ़ी पर?

औरत एक हाथ में बच्‍चे का जबड़ा दाबे, दूसरे से कंघी से उसके बाल पीछे कर रही थी. कंघी की नोक की रपटन में जो अझुराये बाल खिंचे जाते तो दर्द के जोर में बच्‍चे की आंखें ऊपर चढ़ जातीं, आंखें मींच वह फुसफुसाकर औरत से कहता, ‘एक बार और, मां, जेतना हाली बेथाता है ओतना हाली हम दर्द का नसा कर लेंगे!’

गालबंधे हाथ से बच्‍चे का चेहरा हिलाती औरत कहती है, ‘गोड़ फुड़वाके पहले ही दर्द का नशा नहीं किये हो? बहुत तुमको नशा का शौक है, हं?’

बच्‍चा गोड़ के ताज़ा घाव पर एक नज़र मार हंसती आंखों औरत को देखता है, औरत झुककर बच्‍चे का गाल चूम लेती है. बच्‍चा औरत के गाल से गाल सटाये बुदबुदाता है, ‘इस्‍कूल से लौटके आयेंगे तो मैंगो सेक बना दोगी न?’

औरत बच्‍चे के गाल से गाल रगड़कर अपनी तरह से जवाब देती है, ‘हां.’ उसी झोंक बच्‍चा अपनी मांग में इजाफा करता है, ‘और पाइनिप्‍पल सेक?’

औरत आंखें बड़ी-बड़ी करके बच्‍चे को देखती है. बच्‍चा गुमसुम उन बड़ी-बड़ी आंखों को पढ़ता रहता है, ‘नहीं बनाओगी हमको मालूम है. तुम बैंगन का भरुआ बनाओगी, बैंगन का भरुआ हमको पसन्‍न नहीं है, मां?’

औरत मुस्‍कराकर जवाब देती है, ‘ठीक है, हम बैंगन का भरुआ नहीं बनायेंगे.’

बच्‍चे की सूनी आंखें औरत को टटोलती हैं, ‘नहीं, तुम बनाओगी हमके मालूम है. पापा के बैंगन का भरुआ पसन्‍न है. हम इस्‍कूल चल जायेंगे त तू हमको भूल जाओगी, पापा वाला बैंगन-भरुआ बनाये लगोगी?’

औरत बच्‍चे की ठोड़ी हाथ में उसके माथे से अपना छुआये बोलती है, ‘तुमको कब्‍बो नहीं भूलते हैं, बंटु. हमेशा तुम हमरे मन में रहते हो!’

बच्‍चा असमंजस में औरत का चेहरा पढ़ता है. वह करना चाहता है मगर मन में विश्‍वास भरता नहीं, ठहरकर धीरे-धीरे कहता है, ‘तुम हमको मानती हो, मगर जादा प्‍यार पप्‍पा से करती हो, बोलो, करती हो न?’

औरत गुस्‍सा होने का अभिनय करती है, फिर हारकर बच्‍चे को करीब खींच लेती है, ‘नहीं, बंटु, दुनिया में सबसे जादा हम तुमसे प्‍यार करते हैं.’

‘सबसे जादा?’ बच्‍चे को भरोसा नहीं है.

औरत सिर हिलाकर जवाब देती है, ‘सबसे जादा!’

बच्‍चा सोच में पड़ जाता है, सोच से बाहर निकलकर कहता है, ‘हम बोलेंगे त हमरे संगे भाग जाओगी फिर?’

औरत हंसती हां में सिर हिलाती है, ‘भगाके कहां लेके जाओगे लेकिन?’

‘दूर, बौत दूर. रजाक टाकीच के पीछे.’ बच्‍चा सोचकर बहुत खुश होता है.

‘रजाक टाकी जाके तुम कारवां के अरुणा इरानी से प्रेम करे लगोगे, हमके भूल जाओगे!’ औरत दु:खी हो गई का चेहरा बनाकर कहती है.

बच्‍चा औरत की ठोढ़ी थामकर उसे आश्‍वस्‍त करता है, ‘हम तुमको अरुना इरानी से जादा प्रेम करेंगे, मां, सच्‍चो!’

Wednesday, February 2, 2011

कहां थे कई चांद सरे आसमां..

सत्तर के दशक का बेगाना समय. सरे आसमां कई चांद थे तो बच्चों को उसकी खबर नहीं थी. दीवार से लगी जंगखाई साइकिल के कैरियर पर चढ़-चढ़कर जमीन पर लद-बद गिरते वे पुलिया से चलती रेल पर धर्मेंद्र के कूद जाने का जांबांजपना साकार कर रहे थे, कई सारे संवरे, संवारे आसमानों की दुनिया उनके लिए सलीम-जावेद और नासिर हुसैन की कल्पनाओं में खड़ी ‘यादों की बारात’ के दरवाज़ों पर आकर चुक जाती. गोलगप्पे के चार ठेले और घुघनी मिले सिंघाड़े की अढ़ाई गुमटी दिखती, कापी-किताब खरीदने की डेढ़ दुकानें जिसके आगे खुशहाल घरों के बच्चे एक पैर से दूसरा खुजाते, किताब के पन्ने पलटते, मुआयना करते दिखते, बाटा की इकलौती दुकान को नज़रअंदाज़ करके नंगे पैर राजू पंजाब से भागकर आये शरणार्थी हमीर सिंह की सड़क पर बोरों पर सजाये सस्ते चप्पलों के नीले-हरे को ललकन में पढ़ता, परखता बहुत सोचकर सवाल करता, ‘वो हरा वाला पांच रुपये में दोगे? ठीक है, साढ़े पांच? फाइनल रेट?

राजू भी जानता कि हमीर सिंह का मंझला बेटा, बीच बचपन ही मुरझाया पड़ गया जुगनू जान रहा है कि राजू की जेब में साढ़े पांच क्या साढ़े पैसे नहीं. मगर राजू फिर यह भी जानता कि छठवीं में नाम लिखवाकर और दो साल उसी क्लास में फेल होकर जुगनू स्कूल और स्कूल जानेवाले दूसरे बच्चों से नफरत करता है, राजू पर तरस खाता है, उससे नफरत नहीं करता. राजू को अच्छा नहीं लगता कि हमीर सिंह का मंझला बीमार बेटा जुगनू उस पर तरस खाये, शायद इसलिए भी अदबदाकर रोज़ एक बेमतलब मोलभाव के बहाने वह जुगनू को एक जिरह में खींचता रहता है, कि चिढ़कर जुगनू जवाब दे, उनके बीच हाथापाई हो तो राजू इस गंदे सरदार के मुंह पर थूककर अपने नंगे पैरों, और जाने किस-किस बात का दबा गुस्सा निकाल सके, मगर पिटी पसलियों में एक लंबी सांस ऊपर खींचकर जुगनू आंखें मींच लेता है, राजू की बात का चिढ़कर जवाब नहीं देता.

राजू मन ही मन पिस-ऑफ होता है कि किस तरह का जाहिल, गंवार सरदार है. जबकि राजू की क्लास में तेजिंदर है, उसके माथे के पट्टे पर हाथ रख दो तो उतने पर भी वह गुस्सा हो जाता है. रखो नहीं, रख दे सकते हो ऐसी एक्टिंग करो तो भी तेजिंदर की आंखें एकदम से लाल होने लगती हैं. वैसे ही उसकी कमर में ज़रा सा उंगली छुआ दो तो बेंच पर उछल-उछलकर हंसने भी लगता है. जबकि जुगनू कभी हंसा हो ऐसा एक भी मौका राजू के याद नहीं पड़ता. कितनी अजीब बात है कि दुनिया में सरदार भी दो किस्म के होते हैं. मगर यह भी सही है कि जुगनू तो पूरी दुनिया में अपने ही किस्म का है. हरामी पागल कहीं का. मर भी नहीं जाता! उससे पूछकर देखे? ‘तू मर क्यों नहीं जाता, जुगनू? टिक ट्वेंटी खा ले, अपने को कैंसर करवा ले, या ‘आनंद’ में राजेश खन्ना को जो बीमारी होती है वही पा ले, मगर तू प्लीज़ मर जा, जुगनू?’

लेकिन क्या फायदा, ये हरामी अपने मरने की बात का भी जवाब नहीं देगा, राजू जानता है. जैसे उसके मोहल्ले की क्रिकेट टीम का सेवन स्टार से कभी कोई टुर्नामेंट जीतना टोटली इम्पॉसिबल है, मुमताज़ से उसकी शादी होना, वैसे ही ये उम्‍मीद करना कि जुगनू किसी सवाल का ठीक जवाब देगा. जस्टं नामुमकिन. जैसे दुनिया में कुछ लोग होते ही हैं कि बीच-बीच में नामुमकिन की बात को सही साबित करते रहें. जैसे हंसती शारदा मौसी से कोई सांबर बनाने की बात छेड़कर देख ले कैसे पलटकर छनौटा फेंककर मारती हैं, या नाक तक आंचल खींचकर वहीं भर्र-भर्र रोने लगेंगी, क्यों? क्योंकि सांबर शारदा मौसी के लिए नामुमकिन है इसलिए!

दुनिया में लड़कियां सब हरामी हैं मगर मंजु हरामी द बेस्ट. ये नहीं कि शाम को बीना और पर्ना गेट के बाहर गोटी खेल रही हैं, उनके साथ गोटी खेलने में लगी रहे, आंख के ऊपर हाथ धरे चौंकने की एक्टिंग करके पूछती है, ‘क्या, हुआ, राजू, तुम्हारा चप्पल चोरी हो गया? तब से खाली पैर टहिल रहे हो?’

राजू गुस्से में सुलगा जवाब देता है, ‘क्या हुआ, मंजु, तुम मरी नहीं? मधु-मुस्कान का पन्ना में छुपाके तुमको कैंसर दिये थे, तब्बो? सरबाइब कर गई, कैसे?’

बोस आंटी स्कूल से छुट्टी लेकर अपनी बहन के पास मनोहरपुर गई हैं. बच्चें दीवार फांदकर उनके आंगन के अमरुद के पेड़ पर चढ़े हैं. अमरुद खाने से ज्यादा चोरी से बोस आंटी के घर में घुस आने का सुख है. लेकिन अमरुद के दो काटे खाने के बाद हाथ का फल एक ओर उछालकर राजू चिढ़ने लगा है, ‘अबे, क्या फालतू का.. कोई साथ में रेडियो भी नहीं लाया. क्या मालूम वेस्टे इंडिज में बरसा रुक गया हो और वो लोग मैच रेजुम कर लिये हों?’

मंजु अपनी बड़ी बहन के पीछे-पीछे रुमा स्टोर नेल-पॉलिश सेलेक्ट करने गई है. ब्रिगेडियर चोपड़ा अंकल के घर सबकी आंख बचाकर हमीर सिंह का छोटा बेटा बलबीर चोरी करने घुसा है, मगर एक बार घर के भीतर दाखिल हो जाने पर पहली बार इतनी नज़दीक से फ्रि‍ज़ देखते हुए बुरी तरह डर गया है. बाहर किसी भी क्षण बरसात की झड़ी बरसना शुरु हो सकती है.

Tuesday, February 1, 2011

मुंह मत खोलना, साथी



मत बोलना मुंह मत खोलना
खलिये संगीत को धूलि देखाओगे
चौधुरी सलिल मोशाय के चैन हरोगे
बाबू गोलाम मोहम्मद का बैंड बजाओगे
अइसही नहीं बोल रहे मुंह
मत खोलना, मत बोलना

हरमोनिया की टीप के देवार पर चुप्‍पे चढ़ल आना
कांखी में क्लैरिनेट दाबे बैंजो बाज़ार में भेंटाना
राजनी‍त के जंतर-मंतर के अप्‍पन सत्तर कोना
तिरिया-चलित्तर सजाये की जगह, सीधे
संगीती-सुगंधिये में नहलाना, मसाईल रुपैय्या
का हम्मर मेहराईल माथा में समझकारी
का सात फूल खिलाना, साथी
हमको तनी ऊपरी उठाना, ग़ज़ब
मगर मत बोलना, मुंह मत खोलना.

इन स्लो मोशन, म्यूज़ि‍कली..

भागती जाती है रेल. पहाड़ों के आंचल में या पानी की सतह पर, किसी पुल की ज़रुरत को धता बताती, हवा की थपकियों की दुलार पर सवार, बाख़ के कन्चेर्तो फाइव इन एफ़ माइनर की मोहब्बत में आंख मूंदे भागती जाती. स्लो मोशन में, समानान्तर छोटी लाइन की पटरियां आपस में गुत्थम-गुत्था हुई पीछे छूटती जाती हैं. घना वो कैसा तो जंगल है लाजवाब सत्रह हज़ार वृक्षों का गाढ़ा ऐंद्रिक, अपनी धुरी पर तीन सौ साठ डिग्री की मादकता में झूमकर डोले जाता, हरे के ऑर्केस्ट्रेशन में रेल के कानों फुसफुसाकर बोल जाता, ‘आज फिर जीने की तमन्ना है?’ एक कोई दीवाना वृक्ष किसी और कोने कहने से बाज नहीं आता, ‘यस, यस, सुना था मैंने, सुन रहा हूं, सुनो तुम भी- माहलर की सिम्फ़नी फाइव इन सी शार्प मेजर.. विस्कोंती की ‘डेथ इन वेनिस’ का क्लाइमैक्स याद है? समूचेपन में जी सकने की उम्मीक में मरना? याद है?’

भागती जाती है रेल. स्लो मोशन में. टाइम और स्पेस के बोध के विधान से बाहर. संगीत की सांद्रता में नहायी मन के मलिन चंचल आसमान में, माहलर की सिम्फ़नी फाइव इन सी शार्प माइनर की पियानो के बेगाने परों पर डोलती, पहचाने संसारों के भूगोल से छूटकर बाहर चली जाती, स्लो मोशन में.

स्ट्रिंग क्विन्टेट अदाज्यो की संगत में सुर की सैर को निकला है, मगर माहलर की सिम्फ़नी फाइव इन सी शार्प माइनर में गहीन घायल उड़ता मैं कहां सुन रहा हूं. ऐरियल शॉट में लहराया लट्ठों की दीवार में एक खुदी खिड़की पर गिरा आता, चौदह वर्षीय कोई बच्ची है, पियानों की टीपों के मार्फत आत्मा के अतल में डूबी, उसकी उंगलियां पढ़ता हूं. म्यूज़ि‍कल शीट के पन्ने फड़फड़ाते हैं. कहीं कोने पुराने हाथ की सधी लिखाई में गुदा दीखता है: ‘स्ताबेत मातर दोलोरोज़ा’. पियानो बजता रहता है. स्लो मोशन में. फटी आंखों पंछी नशे में डूबा थरथराता कांपता कातर गिरा, गिरता जाता है. स्लो मोशन में.

मानुएल बार्रुयेको हंसते आवाज़ लगाते हैं, स्टीव मोर्स की जुगलबंदी में गिटार पर उंगलियां फिराते, ‘यस, इट कुड बी डेथ इन पैटागोनिया, अमोर, सी, सी, के नो?’ अपनी धुरी पर दुनिया तीन सौ साठ डिग्री के कोणों पर घूमी जाती है. बेल्लिनी की नोरमा का कास्ता दीवा मारिया कालास गाये जाती है. स्लो मोशन में. हज़ारों मील दूर किसी हरामी लैंडस्कैप में नीचता के अधम में नहाया वांग कार वाई आंख का काला चश्मा उतारकर हरमखोरी में मुस्कराता है, ‘आर यू डाइंग इन स्लो मोशन, ईडियट?’ खल्वाट माथे के ज़रा बचे बालों को हवा में जलाता मैं बराबर की हरमखोरी में जवाब दिये जाता हूं(या ऐसा कुछ मुझे लगता है), ‘अबे, कांट यू सी, आई एम सोर्टिंग आउट टू लिव इन स्लो मोशन, म्यूज़ि‍कली? कोम्प्रेंदे, अमोर?