Wednesday, February 2, 2011

कहां थे कई चांद सरे आसमां..

सत्तर के दशक का बेगाना समय. सरे आसमां कई चांद थे तो बच्चों को उसकी खबर नहीं थी. दीवार से लगी जंगखाई साइकिल के कैरियर पर चढ़-चढ़कर जमीन पर लद-बद गिरते वे पुलिया से चलती रेल पर धर्मेंद्र के कूद जाने का जांबांजपना साकार कर रहे थे, कई सारे संवरे, संवारे आसमानों की दुनिया उनके लिए सलीम-जावेद और नासिर हुसैन की कल्पनाओं में खड़ी ‘यादों की बारात’ के दरवाज़ों पर आकर चुक जाती. गोलगप्पे के चार ठेले और घुघनी मिले सिंघाड़े की अढ़ाई गुमटी दिखती, कापी-किताब खरीदने की डेढ़ दुकानें जिसके आगे खुशहाल घरों के बच्चे एक पैर से दूसरा खुजाते, किताब के पन्ने पलटते, मुआयना करते दिखते, बाटा की इकलौती दुकान को नज़रअंदाज़ करके नंगे पैर राजू पंजाब से भागकर आये शरणार्थी हमीर सिंह की सड़क पर बोरों पर सजाये सस्ते चप्पलों के नीले-हरे को ललकन में पढ़ता, परखता बहुत सोचकर सवाल करता, ‘वो हरा वाला पांच रुपये में दोगे? ठीक है, साढ़े पांच? फाइनल रेट?

राजू भी जानता कि हमीर सिंह का मंझला बेटा, बीच बचपन ही मुरझाया पड़ गया जुगनू जान रहा है कि राजू की जेब में साढ़े पांच क्या साढ़े पैसे नहीं. मगर राजू फिर यह भी जानता कि छठवीं में नाम लिखवाकर और दो साल उसी क्लास में फेल होकर जुगनू स्कूल और स्कूल जानेवाले दूसरे बच्चों से नफरत करता है, राजू पर तरस खाता है, उससे नफरत नहीं करता. राजू को अच्छा नहीं लगता कि हमीर सिंह का मंझला बीमार बेटा जुगनू उस पर तरस खाये, शायद इसलिए भी अदबदाकर रोज़ एक बेमतलब मोलभाव के बहाने वह जुगनू को एक जिरह में खींचता रहता है, कि चिढ़कर जुगनू जवाब दे, उनके बीच हाथापाई हो तो राजू इस गंदे सरदार के मुंह पर थूककर अपने नंगे पैरों, और जाने किस-किस बात का दबा गुस्सा निकाल सके, मगर पिटी पसलियों में एक लंबी सांस ऊपर खींचकर जुगनू आंखें मींच लेता है, राजू की बात का चिढ़कर जवाब नहीं देता.

राजू मन ही मन पिस-ऑफ होता है कि किस तरह का जाहिल, गंवार सरदार है. जबकि राजू की क्लास में तेजिंदर है, उसके माथे के पट्टे पर हाथ रख दो तो उतने पर भी वह गुस्सा हो जाता है. रखो नहीं, रख दे सकते हो ऐसी एक्टिंग करो तो भी तेजिंदर की आंखें एकदम से लाल होने लगती हैं. वैसे ही उसकी कमर में ज़रा सा उंगली छुआ दो तो बेंच पर उछल-उछलकर हंसने भी लगता है. जबकि जुगनू कभी हंसा हो ऐसा एक भी मौका राजू के याद नहीं पड़ता. कितनी अजीब बात है कि दुनिया में सरदार भी दो किस्म के होते हैं. मगर यह भी सही है कि जुगनू तो पूरी दुनिया में अपने ही किस्म का है. हरामी पागल कहीं का. मर भी नहीं जाता! उससे पूछकर देखे? ‘तू मर क्यों नहीं जाता, जुगनू? टिक ट्वेंटी खा ले, अपने को कैंसर करवा ले, या ‘आनंद’ में राजेश खन्ना को जो बीमारी होती है वही पा ले, मगर तू प्लीज़ मर जा, जुगनू?’

लेकिन क्या फायदा, ये हरामी अपने मरने की बात का भी जवाब नहीं देगा, राजू जानता है. जैसे उसके मोहल्ले की क्रिकेट टीम का सेवन स्टार से कभी कोई टुर्नामेंट जीतना टोटली इम्पॉसिबल है, मुमताज़ से उसकी शादी होना, वैसे ही ये उम्‍मीद करना कि जुगनू किसी सवाल का ठीक जवाब देगा. जस्टं नामुमकिन. जैसे दुनिया में कुछ लोग होते ही हैं कि बीच-बीच में नामुमकिन की बात को सही साबित करते रहें. जैसे हंसती शारदा मौसी से कोई सांबर बनाने की बात छेड़कर देख ले कैसे पलटकर छनौटा फेंककर मारती हैं, या नाक तक आंचल खींचकर वहीं भर्र-भर्र रोने लगेंगी, क्यों? क्योंकि सांबर शारदा मौसी के लिए नामुमकिन है इसलिए!

दुनिया में लड़कियां सब हरामी हैं मगर मंजु हरामी द बेस्ट. ये नहीं कि शाम को बीना और पर्ना गेट के बाहर गोटी खेल रही हैं, उनके साथ गोटी खेलने में लगी रहे, आंख के ऊपर हाथ धरे चौंकने की एक्टिंग करके पूछती है, ‘क्या, हुआ, राजू, तुम्हारा चप्पल चोरी हो गया? तब से खाली पैर टहिल रहे हो?’

राजू गुस्से में सुलगा जवाब देता है, ‘क्या हुआ, मंजु, तुम मरी नहीं? मधु-मुस्कान का पन्ना में छुपाके तुमको कैंसर दिये थे, तब्बो? सरबाइब कर गई, कैसे?’

बोस आंटी स्कूल से छुट्टी लेकर अपनी बहन के पास मनोहरपुर गई हैं. बच्चें दीवार फांदकर उनके आंगन के अमरुद के पेड़ पर चढ़े हैं. अमरुद खाने से ज्यादा चोरी से बोस आंटी के घर में घुस आने का सुख है. लेकिन अमरुद के दो काटे खाने के बाद हाथ का फल एक ओर उछालकर राजू चिढ़ने लगा है, ‘अबे, क्या फालतू का.. कोई साथ में रेडियो भी नहीं लाया. क्या मालूम वेस्टे इंडिज में बरसा रुक गया हो और वो लोग मैच रेजुम कर लिये हों?’

मंजु अपनी बड़ी बहन के पीछे-पीछे रुमा स्टोर नेल-पॉलिश सेलेक्ट करने गई है. ब्रिगेडियर चोपड़ा अंकल के घर सबकी आंख बचाकर हमीर सिंह का छोटा बेटा बलबीर चोरी करने घुसा है, मगर एक बार घर के भीतर दाखिल हो जाने पर पहली बार इतनी नज़दीक से फ्रि‍ज़ देखते हुए बुरी तरह डर गया है. बाहर किसी भी क्षण बरसात की झड़ी बरसना शुरु हो सकती है.

6 comments:

  1. इसपे क्या कमेन्ट दूँ समझ नहीं आ रहा , कुछ कहने को जरूर जी चाह रहा है ...

    इस तरह के किस्से प्रेरणा बनती हैं कहानियों के लिए | ये किस्से बेशक मैं पढ़ के भूल जाऊंगा, लेकिन कभी किसी न किसी कहानी में इसका अहसास जरूर नजर आएगा |

    आप दूसरों को भी प्रेरणा दे रहे हैं कि हाँ आप भी ऐसा लिख सकते हो |

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  2. @नीरज,
    मैं दूसरों को नहीं, अपने को ही प्रेरणा देना चाहता हूं. यह दूसरी बात है कि प्रेरणा बार-बार पल्‍ला छुड़ाकर किसी और दूसरे के हाथ में हाथ फंसाये अमरुद खाने निकल जाती है. तुम्‍हारे शहर भूले से पहुंचे तो ज़रा समझाओ प्रेरणा को इस तरह की हरकत क्‍यों करती है. जबकि उस तरह की भी कर सकती थी.

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  3. @आप भी ऐसा लिख सकते हो |

    नहीं, मात्र प्रमोद जी, ही ऐसा लिख सकते हैं.....
    बस पढ़ कर आनंद लीजिए....

    @सुरिलानद कि चेष्टा कर रहे हैं.

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  4. हमें लगा था पुरानी टिप्पणी छपेगी नहीं और ईमेल में आप कुछ कुछ तीखा, चटपटा सा कहेंगे :-) लेकिन आपने बख्श दिया :-)

    कई दिनो बाद कुछ किस्से सा आया अज़दक पर और काफ़ी पंक्तियाँ तो पढकर छिपी हुई मुस्कराहट उचक उचक कर झाँक रही थी..

    - कितनी अजीब बात है कि दुनिया में सरदार भी दो किस्म के होते हैं.

    :-) :-)

    - दुनिया में लड़कियां सब हरामी हैं मगर मंजु हरामी द बेस्ट. ये नहीं कि शाम को बीना और पर्ना गेट के बाहर गोटी खेल रही हैं, उनके साथ गोटी खेलने में लगी रहे, आंख के ऊपर हाथ धरे चौंकने की एक्टिंग करके पूछती है, ‘क्या, हुआ, राजू, तुम्हारा चप्पल चोरी हो गया? तब से खाली पैर टहिल रहे हो?’

    राजू गुस्से में सुलगा जवाब देता है, ‘क्या हुआ, मंजु, तुम मरी नहीं? मधु-मुस्कान का पन्ना में छुपाके तुमको कैंसर दिये थे, तब्बो? सरबाइब कर गई, कैसे?

    :-) :-)

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  5. @?
    प्रेरणा हरामी का अभी तलक पता नहीं है. उसकी छोट बहिनो का भी नहीं है.

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