Thursday, February 3, 2011

एक चांद ठेहुने पर था.. या ठोढ़ी पर?

औरत एक हाथ में बच्‍चे का जबड़ा दाबे, दूसरे से कंघी से उसके बाल पीछे कर रही थी. कंघी की नोक की रपटन में जो अझुराये बाल खिंचे जाते तो दर्द के जोर में बच्‍चे की आंखें ऊपर चढ़ जातीं, आंखें मींच वह फुसफुसाकर औरत से कहता, ‘एक बार और, मां, जेतना हाली बेथाता है ओतना हाली हम दर्द का नसा कर लेंगे!’

गालबंधे हाथ से बच्‍चे का चेहरा हिलाती औरत कहती है, ‘गोड़ फुड़वाके पहले ही दर्द का नशा नहीं किये हो? बहुत तुमको नशा का शौक है, हं?’

बच्‍चा गोड़ के ताज़ा घाव पर एक नज़र मार हंसती आंखों औरत को देखता है, औरत झुककर बच्‍चे का गाल चूम लेती है. बच्‍चा औरत के गाल से गाल सटाये बुदबुदाता है, ‘इस्‍कूल से लौटके आयेंगे तो मैंगो सेक बना दोगी न?’

औरत बच्‍चे के गाल से गाल रगड़कर अपनी तरह से जवाब देती है, ‘हां.’ उसी झोंक बच्‍चा अपनी मांग में इजाफा करता है, ‘और पाइनिप्‍पल सेक?’

औरत आंखें बड़ी-बड़ी करके बच्‍चे को देखती है. बच्‍चा गुमसुम उन बड़ी-बड़ी आंखों को पढ़ता रहता है, ‘नहीं बनाओगी हमको मालूम है. तुम बैंगन का भरुआ बनाओगी, बैंगन का भरुआ हमको पसन्‍न नहीं है, मां?’

औरत मुस्‍कराकर जवाब देती है, ‘ठीक है, हम बैंगन का भरुआ नहीं बनायेंगे.’

बच्‍चे की सूनी आंखें औरत को टटोलती हैं, ‘नहीं, तुम बनाओगी हमके मालूम है. पापा के बैंगन का भरुआ पसन्‍न है. हम इस्‍कूल चल जायेंगे त तू हमको भूल जाओगी, पापा वाला बैंगन-भरुआ बनाये लगोगी?’

औरत बच्‍चे की ठोड़ी हाथ में उसके माथे से अपना छुआये बोलती है, ‘तुमको कब्‍बो नहीं भूलते हैं, बंटु. हमेशा तुम हमरे मन में रहते हो!’

बच्‍चा असमंजस में औरत का चेहरा पढ़ता है. वह करना चाहता है मगर मन में विश्‍वास भरता नहीं, ठहरकर धीरे-धीरे कहता है, ‘तुम हमको मानती हो, मगर जादा प्‍यार पप्‍पा से करती हो, बोलो, करती हो न?’

औरत गुस्‍सा होने का अभिनय करती है, फिर हारकर बच्‍चे को करीब खींच लेती है, ‘नहीं, बंटु, दुनिया में सबसे जादा हम तुमसे प्‍यार करते हैं.’

‘सबसे जादा?’ बच्‍चे को भरोसा नहीं है.

औरत सिर हिलाकर जवाब देती है, ‘सबसे जादा!’

बच्‍चा सोच में पड़ जाता है, सोच से बाहर निकलकर कहता है, ‘हम बोलेंगे त हमरे संगे भाग जाओगी फिर?’

औरत हंसती हां में सिर हिलाती है, ‘भगाके कहां लेके जाओगे लेकिन?’

‘दूर, बौत दूर. रजाक टाकीच के पीछे.’ बच्‍चा सोचकर बहुत खुश होता है.

‘रजाक टाकी जाके तुम कारवां के अरुणा इरानी से प्रेम करे लगोगे, हमके भूल जाओगे!’ औरत दु:खी हो गई का चेहरा बनाकर कहती है.

बच्‍चा औरत की ठोढ़ी थामकर उसे आश्‍वस्‍त करता है, ‘हम तुमको अरुना इरानी से जादा प्रेम करेंगे, मां, सच्‍चो!’

12 comments:

  1. आपके ब्लॉग पर पढ़ी गयी आज तक की सबसे बेहतरीन कहानी चित्रण... ऐसा बेजोड़ कहीं और नहीं मिलता... कैसे साधते हैं ? सॉरी, गलती मेरी है की मैं भूल जाता हूँ की किस्से बात कर रहा हूँ.

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  2. @सागर,
    भूल सुधारो.
    सुधरे, सुधार लिए?

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  3. यह नहीं सुधरेगा ... बस शांत घटना में चलने/पलने वाले इस उथल पुथल को पढ़ कर जो एकबारगी मन में उतरा, उतार दिया. कुछ गलत किया ? नहीं तो.

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  4. आज मौनी अमावस पे दो-दो चाँद

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  5. ‘तुम हमको मानती हो, मगर जादा प्‍यार पप्‍पा से करती हो, बोलो, करती हो न?’

    ‘हम तुमको अरुना इरानी से जादा प्रेम करेंगे, मां, सच्‍चो!’

    pranam

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  6. तो ई दूनो परानी गजब के परेम में उलझे थे जी। औरत कंघी से बच्चे का बाल सुलझा रही थी लेकिन बच्चे का मन कुछ कुछ ज्यादा ही उलझ रहा था।

    आज हम बहुत खुस हुए। आपकी कहानी कुछ समझ में जो आ गयी। जय हो।

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  7. ई पापी पिरोफेसर सब इतना बिगाड़ दिए हैं कि पहिला शब्द हमें 'एडिपस कोम्प्लेक्स' याद आया पढ़ते ही...और सारे सौंदर्य-बोध का तेल हो गया.... जहन्नुम में जाए ऐसी पढ़ाई .!!!

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  8. लिंक्स की तवज्जो के बिना... आम सा शब्द चित्र पर कितना प्रभावशाली ...

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  9. bahut maarmik hai aapkaka yah kahani ya udgaar ya bachche ka bholabhaala man yaan maa ka man .. bahut maarmik laga .. aankhi namaa gayail

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