Saturday, February 5, 2011

इन द ऑफ़िस आल द टाईम, एंड दैट्स इट..

रहते-रहते- सुबह के नाश्‍ते के बाद, या रात के खाने के पहले- हम बेसबब, खोये की टहल में इतनी दूर निकल जाते कि पुराने पहचानेपन का नक़्शा हाथ से छूट जाता. एक बिंदु तक पहुंचकर यूं भी मेरे चेहरे का रंग बदला होता, आंखें चमकने लगतीं, और चहकता मैं ऐलान करता, ‘दैट्स इट! नाऊ वी आर प्रॉपरली लॉस्‍ट.’ इसके बाद फिर असल खेल शुरु होते. अब तक लहराकर आगे निकलती आई, खिल-खिल करती, बीनू चौंककर थम जाती. अचकचाकर चारों ओर देखती ताड़ती, मुंह पर रुमाल धरे किसी पत्‍थर पर बैठकर घबराने लगती, ‘अब? मुझे मां को दवाई देनी थी. कल ऑफिस में एक ज़रूरी मीटिंग थी, आई हैव टू बी बैक होम?’

‘देन गो होम,’ पैंट की दोनों जेब में हाथ धंसाये मैं मुस्‍कराकर जवाब देता, ‘मैं तो इस खोये में ही खुश हूं. मुझे तो घर की याद भी नहीं. होम स्‍वीट होम, कहां हो तुम? डोंट यू रिमेम्‍बर, किसने कहा था, कि ग्‍लोबलाइज़ेशन ने बीच बाज़ार में खड़ा करके हमसे हमारा घर छीन लिया है? अच्‍छा लगे या बुरा, द वर्ल्‍ड इज़ व्‍हॉट इट इज़, वी आर नाऊ लॉस्‍ट फॉर एटरनिटी, एंड यू बेटर एडजस्‍ट टू इट!’

बीनू मेरी बातों से अम्‍यूज़ नहीं होती. साथ टहलने निकली की खुशी में पीछे घर का सब गड़बड़ हुआ का अवसाद गड्ड-मड्ड होता रहता. मेरे एनीमेटेड चहकन से वह कुछ चिढ़ती सी, थकी आवाज़ में गुज़ारिश करती, ‘प्‍लीज़, कुछ देर चुप नहीं रह सकते? मैं समझने की कोशिश कर रही हूं.’

‘मैं भी, मैं भी. समझने की कोशिश कर रहा. हूं,’ चहकता मैं जवाब देता. टहलता-टहलता किसी अजाने पौधे को टटोलकर देखता. झाड़ी को, तिनके को. दुकान में घुसते, बाहर निकलते, सड़क पार करते, सीढ़ि‍यां चढ़ते रोज़ कितना वक़्त निकलता चलता है, हाथ की उंगलियां कोई तिनका कहां दुलराती हैं? बीनू मेरे कंधे पर ठोढ़ी गड़ाकर बुदबुदाती, ‘छेनी, संड़सी, कुदाली, चिड़ि‍ये की जाली, छनौटा, सूप, जांत, बिना-बिजली रात अब कहां आता है जीवन में, सपनों में भी दवाइयों की दुकानें खुलती, बंद होती हैं?’

नींद की ऊंघ में थके एक गदहे को बरजता एक बेरोज़गार किसान गुज़रता है. बीनू उससे चुहल करती पूछती कि उसने ‘पीपली लाइव’ फिल्‍म देखी या नहीं. किसान ना में सर डुलाता जवाब देता है कि उसके गांव में टीवी नहीं है. बिजली नहीं है पानी भी. इस तरह जंगल में हम क्‍यों टहल रहे हैं, गदहे की तरह थककर ऊंघने लगेंगे और सोने को जगह नहीं मिलेगी. बीनू हंसकर जवाब देती कि घर पर भी थककर ऊंघाई आती है और सोने को जगह नहीं मिलती, एक ही बात है. किसान इस मज़ाक का जवाब नहीं देता. डंडे से गहदे हो खोदता चुपचाप जंगली घाटी की ढलान उतरता चला जाता. छोर पर पहुंचकर, पलटकर चिल्‍लाता सवाल करता, ‘इसके माने थोड़े समय में सारी दुनिया गदहा हो जायेगी?’

इतनी देर तक में मैं किसान को भूल चुका होता. माथे के नीचे हाथ डाले आसमान तकता होता. घुटनों पर हाथ बांधे बैठी बीनू बोलती, ‘जानती हूं तुम्‍हें, थोड़ी देर में साथ आई थी की मुझको भी भूल जाओगे.’

मैं आसमान से आंखें हटाये बिना बीनू की आंखों में झांककर जवाब देता, ‘नहीं, स्‍लावो जीज़ू की गदह-पचीसी मुझे याद रहेगी. प्रॉमिस.’

‘सब भूल जाओगे. आई कैन सी इट हैपेनिंग ऑल द टाइम,’ बीनू मेरी बगल उठंगा लेटकर कहती, ‘हज़ारीबाग़ की हिस्‍ट्री दो मुझे. आई बेट तुम्‍हें याद नहीं. प्रूव मी रॉंग?’

मूर्खों की तरह मैं आसमान में अपलक इतिहास खोजता भटकता.

बीनू आगे कहती, ‘बोधगया, रांची, रक्‍सौल, डाल्‍टनगंज, डुमरांव, सी? तुम्‍हें कुछ भी याद नहीं? रज़ा के आधा गांव का गाजीपुर कितना याद है, टेल मी ऑनेस्‍टली?’

गुस्‍से में पलटकर मैं आसमान की जगह आठ इंच की दूरी से ज़मीन पढ़ने लगता, ‘तुम्‍हें नानी की मां की याद है? नानी की? मां की? ऑनेस्‍टली?’

‘तुमसे कहा तो मां को दवाई देनी थी?’ बीनू बुरा मानकर कहती.

‘दवाई लेने से पहलेवाली मां की,’ मैं ज़ि‍द्दी बना कहता.

बीनू उदास हो जाती. मुझसे मुंह फेरकर कहती, ‘मैं जानती थी तुम्‍हारे साथ निकलने पर यही सब होगा. मैं सुखी रहूं के आइडिया से तुम्‍हें जलन होती है. यू हैव टू डिस्‍टर्ब एवरीथिंग. ऑनेस्‍टली, आई वॉज़ बेटर वर्किंग इन द आफिस.’

‘यू आर, इन फैक्‍ट,’ मैं बच्‍चों की तरह जोर से हंसने लगता.

‘व्‍हॉटेवर,’ बीनू चिढ़कर जवाब देती और दुबारा घर का नंबर ट्राई करने लगती. इस बार पहली ही कोशिश में नंबर लग जाता.

3 comments:

  1. इसे पढकर ऎसी ही फ़ीलिंग आती है कि ‘दैट्स इट! नाऊ वी आर प्रॉपरली लॉस्‍ट.’ और फ़िर पैंट की दोनों जेब में हाथ धंसाये मैं मुस्‍कराकर अपने आप से कहता हूँ ‘मैं तो इस खोये में ही खुश हूं.‘ :)

    बेहतरीन! लवली लवली :)

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  2. बेहतरीन लेखन

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  3. कमाल है साहब !!! लिखना इसे कहते हैं !!!

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