Friday, February 11, 2011

जल-डूबल जैज़..

पता नहीं बकरी बंधी है या खूंटा है, जो बकरी-बंधा घिसिटाया, रगड़ा रहा है. आंखों के आंसू दिख रहे हैं. देह पर चोट के निशान. खास खबरें हैं चमकौवा माल की मानिंद अख़बारी मुखपृष्‍ठ के शो-केस में धंसे हैं. एक चमकती तारिका है दांत निपोरे हाथ हिला रही है, अपना लाल कपड़ा दिखा रही है. होता तो क्‍या मालूम मैं भी दिखा रहा होता? छापने के अख़बार पैसे मांगती तो शायद छत पर सुखाने लिये गया होता. मगर जा नहीं रहा. छत पर ताला चढ़ा है. वैसे भी फिर लाल कपड़ों की ज़रुरत होती. जो आपके यहां हो सकता है पेटी में बंद हो, मेरे घर में मैं ही बंद हूं. बिना कपड़े आंखों में उंगली ठेलकर देख रहा हूं हो सकता है चार लाल आंसू मिल जायें, उतना तक नदारद है. कोने में बैठे कुछ लोग दिखते हैं. एक-दूसरे की पीठ खुजलाते हुए उनके चेहरों पर संतुष्टि की कोमल स्निग्‍घता फैली हुई है. मंद-मंद मुस्‍करा रहे हैं. लजा भूले से भी नहीं रहे हैं. एक अजन्‍मी बच्‍ची है, मां के पेट में गोड़ पटकती चीख रही है, ‘सुन रही हो, सुनी? इतना सारा फेसबुक करना होगा और पासबर्ड याद रखना तो हम बहरी नहीं आ रही हूं, हां?’ मुंह में गुड़ाखू फंसाये बाबूजी कान से हवा छोड़ते लंबी सांस भरते हैं, ‘देखो, हम तीस साल का उमिर में पहली मर्तबा बिजली से चले वाला बल्‍ब देखे रहे, रेल का टिकिस लेके चढ़े रहे, लेकिन घबराके वोही इस्‍टेशन उतरियो गये रहे, अऊर ई आज के छौंड़ी, पेटे से इंटरने के कनेस्‍सन खोल रही है?’

‘दुर! दुर!’ मुंह की बजाय मैं मन से बोलता हूं और किताब में नज़र धंसाये आंख फोड़ने लगता हूं. तीन किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से सात सौ सतहत्‍तर हज़ार किलोमीटर का अनसुलझा सफ़र एक बार फिर चालू हो जाता है. माने जीवन की रेल कवनो गड़हे में जाकर अटक जाती है. जॉयस बोलते हैं, ‘ओ शिट!’, फॉकनर, ‘ओ फक्क!’, भोजपुरी में तर्जुमा करके मैं साहित्‍त-मंजुषा मर्म सुनता हूं, ‘ओ तिलकुट के दोकान, हमरी सवारी बगैर कबहूं बक्‍सर चहुंप पाओगे? साहित्‍त-जीबन को कब्‍बो जन्‍मेजय बनाओगे?’ मैं चिंहुककर अपने बचाव में कहता हूं, ‘सब जानके इब्‍न खल्‍दून कब्‍बो हो गये थे? बिना रेल के पानी-पानी हियां और हुआं भटकते नहीं रहे थे?’

मुंह में सुपारी और लवंग और कांखी के नीचे पंचांग दाबे पंडित नारदाप्रसाद गहलोत हैं, बिना मांगे आशीर्वाद दिये शिकायत करते हैं, ‘बच्‍चा, जलमभर थियरी गुल छांटते रह जाओगे, गाल के फुंसी तक तुम्‍मर हाथ नै पहुंचेगा!’ नीचे गली में पंडिजी की साइकिल सोगहग खड़ी होगी, हैंडल पर सोहाता लाल झोला. आगे मुंह चुभलाते बोलेंगे, ‘पैर छूओ तो हम सोचकर बोलें कवन ईलाम तोहरे खातिर बाजिब बइठेगा! संज्ञान प्रकासन का साहित्‍य गुलो पढ़ रहे हो? जुग निर्माण योजना का ‘जीबनसत्‍त-प्रकाश’? अइसही फुदकते रहे से कुच्‍छो होगा जी? फुदकनिये होगा, जीबन नै होगा, हं? हें-हें-हें, ई लS तीन गोS सुपारी खावो!’

सीढ़ि‍यों पर बैठी एक जनाना है, पैर की गंदी उंगलियों पर चटख़ नेल-पॉलिश पोत रही है. शायद दोष मेरी नज़र का है, रंग ऐसा गंदा है भी नहीं. जैसे बच्‍चे नहीं हैं जो नीचे पानी में डूब रहे हैं. मैं घबराकर चिल्‍लाता हूं, ‘अबे ओ माधुरी दिच्छित, आपको दिख नहीं रहा, आप सौंदर्ज-प्रकाश फैला रही हैं और हुआं ऊ बच्‍चा-सब पानी में डूब रहा है? जनाना- बिना नज़र उठाये, बिना नाराज़ हुए- बताती है, ‘डूब नै रहा है, खेल रहा है. पानी में जब ले हेलेगा नै खेलेगा कइसे! डुबल तुम रहते हो. एतना डुबाई अच्‍छा नहीं है. रक्‍कचाप बढ़ जाता है. कमर बेथा में पेराये लगता है, सो, अलग. अइसही माथा का बाल नै उड़ रहा है. कवन तेल लगाते हो? झाड़ा ठीक से होता है?’

मैं औरत की बातें अनसुना किये बच्‍चों पर बरसता हूं, ‘अबे, तू लोक को डर नहीं लग रहा? कवन खेला खेल रहे हो?’ एक बच्‍चा और गहिरे डूबता, पानी में दांत निपोरे कहता है, ‘इन्‍न खल्‍दून!’ बाकी के दोनों भी पानी के नीले में बिजलियों की चमक फैलाते चहकते हैं, ‘हां, इन्‍न खल्‍दून, इन्‍न खल्‍दून!’

2 comments:

  1. हमें लगा, अनसुना तो करना था औरत को.

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  2. उस भीड़ में अरसा हुआ.वैसे किसी को उसको सुने !

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