Monday, February 14, 2011

कितने पास कितनी दूर..

दीपा सो रही है. अच्‍छा है. दिन भर खटनेवाली स्‍त्री अंतत: आधी रात चैन की नींद ले रही है. जबकि मैं नहीं ले पा रहा हूं. चैन तो दूर, बेचैन वाली भी नहीं. और ऐसा नहीं कि दिन भर खट नहीं रहा था. फिर भी. थोड़ी देर में पता चलेगा रात भी खटाई में ही बीती. ऐसा नहीं कि खाट पर लेटे से खटना कम हो जाता है. बताने की ज़रुरत नहीं, भुक्‍तभोगी जानते हैं. इस उम्र में आकर अट्ठारह के बाद उन्‍नीसवीं मर्तबा करवट बदलना भारी पड़ने लगता है. नब्‍बे किलो का बोरा उठाकर एक जगह से दूसरी जगह रखने की तरह है. बहुत बार बोरा ऊपर उठा रहता है, नीचे रख लेने का क्षण मुल्‍तवी बना रहता है. मुंह से बिना कोशिश अजीब-अजीब आवाज़ें निकलने लगती हैं. कुछ देर तक निकलती रहती हैं. इससे अलग की आवाज़ें भी निकलती हैं. आदमी को अपने से जनित आवाज़ों तक से घबराहट होने लगती है. बहुत बार ऐसे मौकों पर हुआ है (पता नहीं कितना अच्‍छा हुआ है) कि दीपा नींद से उठकर मुझसे ज्‍यादा शोर करने लगी है- कि मुझे क्‍या हुआ है, मैं ऐसी अजीब आवाज़ें क्‍यों निकाल रहा हूं? कुत्‍ते रात में पहचाने चेहरे को देखकर उत्‍साह में जैसे कुछ ज्‍यादा चिंहुकने लगते हैं, दीपा के हल्‍ले से मुझे भी कुछ वैसी ही तसल्‍ली मिलती है, मुंह पर हाथ धरे मैं लंबी सांसें खींचता भर्राई आवाज़ में कहता हूं, ‘वही, हार्ट अटैक आया होगा, या कैंसर हो शायद?’ दीपा बिफरकर गालियां सुनाती मेरा कैंसर कम करने लगती है. और कैंसर सचमुच कम होने भी लगता है. लेकिन गिनकर तेईस करवट बदल चुकने के बावज़ूद अभी तक मुझे कैंसर हुआ भी नहीं है. और दीपा सो रही है.

यह भी सही है कि कुछ रातें कैंसर की रातें नहीं होतीं. कविता की भी नहीं होतीं. कि मैं फुसफुसाकर दीपा के कान मैं गर्म शीशे की तरह दुष्‍यंत कुमार उड़ेल दूं, ‘तुम रेल की तरह गुज़रती हो, मैं पुल की तरह थरथराता हूं’ और दीपा मुझसे हाथ भर की दूरी बनाकर कुछ और गाने लगे. ऐसे मौकों पर वह कुछ भी गाती है मुझे रेल की तरह गुज़रती ही लगती है. मैं हमेशा थरथरा नहीं पाता तो वह उम्र व अन्‍य व्‍याधियों-जनित दबावों में होता है. जबकि इन दिनों शुक्‍ला के बारे में सोचना शुरु करते ही मैं भीतर-भीतर गहरे थरथराने लगता हूं. पाजी मेरा अट्ठारह हज़ार दाबे बैठा है. फोन लगाओ तो शुरुआत ही बेटी की बीमारी के रोने से करता है. कभी-कभी तो शर्म लगने लगती है कि उसे कुछ दे देने की बजाय मैं पाने की उम्‍मीद कैसे कर रहा हूं. जबकि महीने के आखिर तक जगदीश के पास जबलपुर पैसे भेजने ही हैं. बत्‍तीस हज़ार भेजने हैं. कहां से भेजूंगा की सोचते ही सब कविता कहीं घुस जाती है. कविताई-चूरन के बिना ही चेतना के एक छोर से दूसरी तक थरथराहट महसूस होने लगती है. फिर ठीक-ठाक वक़्त तक होती रहती है. अभी ही सोचना शुरु कर दूं तो मज़े में थरथराता पड़ा रहूंगा. जैसे दीपा मज़े में नींद की रेल पर पड़ी ही हुई है.

काफ़ी नहीं कि आदमी दिन भर टंटे निपटाते रहने के बाद रात को चैन से चार घड़ी सो? दिन भर झपकी आती रहती है और रात के आधा बीतते ही दिमाग लालबाग और दांतेवाड़ा के संग्रामी मैदानों में बदल जाता है. जबकि सच्‍चाई है कि इन दोनों ही जगहों मैं भौतिक रुप से कभी गया नहीं. न ही आगे कभी जा सकूंगा जैसी कोई संभावना दिखती है. मगर ठीक रात के डेढ़ बजे रसोई की बत्‍ती जलाकर, कुर्सी खींचे अख़बार इस बेचैनी से पलटता हूं मानो सुबह की पहली फ्लाईट से काहिरा निकलने का होमवर्क कर रहा हूं. सरकार निर्माण व संविधान संशोधन के प्रस्‍तावों पर मुझसे राय ली जाये तो ऐसा न हो सलाह देने में कहीं मैं पीछे रह जाऊं. जगदीश वाले बत्‍तीस कहां से लाकर दूंगा उसकी बेचैनी नहीं हो रही है. या गाड़ी का क्‍लच खराब चल रहा है, वह. देह के ही इतने सारे कल-पुरजे मरम्‍मत की मांग कर रहे हैं, वह? आह भरकर चौबीसवां करवट बदलता हूं. अंधेरे में दीवार पर एक तैरता सांप दीख रहा है. चिढ़कर नज़र छत पर करता हूं. वहां कोई खरगोश है ज़मीन कोड़ता जाने क्‍या खोज रहा है. बाहर गली में कुछ कुत्‍ते हैं अभी तक चुप थे अब ऊब कर भूंक रहे हैं. खिड़की के नज़दीक से किसी चमगादड़ की आवाज़ आ रही है. हालांकि मुझे मालूम नहीं चमगादड़ की आवाज़ कैसी होती है, मगर इतनी देर में ऐसी अपहचानी, अजीब आवाज़ आ रही है तो ज़ाहिर है चमगादड़ की ही होगी. मेरी नहीं है. होती तो मुझे खबर हो जाती. शायद तब दीपा भी उठ गई होती और मैं इतना अकेला नहीं होता और हम कैंसर या कविता जैसा कुछ मनरंजन कर रहे होते. मगर हा, दीपा सो रही है. ऐसे मौके के लिए ही हिंदी फिल्‍मों के किसी कल्‍पनाधनी, विचार-प्रवीण चितेरे ने चित्र ईजाद किया होगा- ‘कितने पास कितने दूर’. दीपा कितने पास है, जबकि मैं, कितनी दूर हूं!

5 comments:

  1. नींदे आने से अधिक न आने पर सृजनात्मक हो जाती हैं।

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  2. करवटे भी गिनते है सर जी.....

    Amazing writing as always!

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  3. बहुत बढ़िया शब्द चित्र है | बधाई

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