
फुआ के होस गुम है. पड़ोस में पंडा बो के हाते दू मुट्ठी मेथी सरहेजने गई थी, बुच्चन गेट का जाली में गोड़ फंसाये ‘सैकिल-सैकिल’ खेल रहा था, पल्ला का नीचे मेथी दाबे लौटी हैं तो गेट से बुच्चनवा गायब है. घर नहीं, न जनार्दन के टंकी ठाड़ा है, नहींये रामनाथ के गुमटी का आगा लउक रहा है. सुबहै-सुबहै मुफ्त का दू मुट्ठी मेथी पाये का सब सुख भुला उजरा गया, लजाईल फुआ ‘लापता’ बुच्चन खोज रही हैं. लजाये का मामलै है. भौजी का जिम्मा, जगलल आंख का आगा सुबही का उजाला में ओझिल हो गया! पांच साल की दीदी के तीन लप्पड़ पड़ा है, दू हाली झोंटा का खिंचाई हुआ है, बुचना के बेचारी घबराईल खोज रही है. क्या होशियारी है, पांचे साल के उमिर में छौंड़ी घबराये सीख लीहिस है! मगर अढ़ाई साल के बुच्चन फरार होये नहीं सीख लिया है?
गोलगप्पा का ठेला पर, टाली के बाहिर कोयले का रेला पर, दीनामोहन के दुकानी, जदुनंदन भुइयां के खटाली, बुच्चनवा के कहीं पता नहीं है. फुआ के माथा तपा रहा है. हवाई चप्पल का भीतरी गोड़ दमक रहा है. फूफा आधा घंटा में कंपौंडर के हियां से लौटेंगे तो खुलल मुंह उनको क्या बोलेगी, कि माड़-भात खाके चौधरी जी के सैट पर जाइये, हमरा माथा मत गरमाइये? दीदी नंगे गोड़ रुपाली सेनगुप्ता के इस्कूल के बाहिर मरम्मत के गिट्टी पर जाके खड़ी हो गई है. इस्कूल का अहाता में बच्चा लोक के शोर है, आसमानी में चम-चम धूप का अंजोर, मगर दीदी मनै-मनै डेराई हुई है. काहे डेराई है क्योंकि बुचना हेरा गया है? न्न्ना, बुचना नहींयो हेराया होता, कवनो दुसिरका बहाने, तीन लप्पड़ का परसादी और झोंटा-खिंचव्वल तो दीदिया तब्बो पाती? रोटी में गुड़ लपेट के दू गो रोटी सुबही खाई थी अऊर एतना ही देरी में चेहरा मेहरा गया है. बुच्चना चट देना कहीं लउक जाये तो उसके चार चटकन मारके दीदिया अपना फेशियल दुरुस्त कै ले, मगर बुचना एतना ईजीली भेंटाये वाला लइका है? नंगे पैर के नीचे गिट्टी गोड़ में तप रहा है, लेकिन दीदी को परवाह नहीं. कोई डांटकर पूछेगा इस्कूल का गिट्टी पर क्यों खड़ी है तो मुंह झुकाये बोल देगी बुच्चन को खोज रही है. हां, वही, बुच्चन को, खोज रही है. हिम्मत बंधा तो धूप से आंख बचाती, आंख पर हाथ धरे आगे ये भी पूछ लेगी, ‘आप देखे हैं? हमरा भाई को?’
मैदान के उस पार रेलवे यार्ड में एक कोयले का इंजन भक्क-भक्क बोलता धुआं उगल रहा है. माथा में गमछा बांधे डेलाइवर जी मुंह में बीड़ी जलाये एगो हौस पाइप का नीचे हाथ और गोड़ धो रहे हैं.
सैकिल के हैंडिल पर धरे एगो सरदार जी सुग्गा का पिंजरा लिये जा रहे हैं. सुगवा चीख-चीख के सिकायत कर रहा है, ‘सुग्गा हेरा गया! सुग्गा हेरा गया! कोई सुग्गा के खोज रहा है जी?’
ताप्ती के मम्मी दास अंटी के रसोई की खिड़की पर टोह लेती एगो बिल्ली बैठी है, भृकुटि चढ़ाये सुगवा के देखकर मुंह बनाती है, ‘पूरा मोहल्ला जगलायेगा, का रे पागल?’
बुच्चन का अबहुंओ ले पता नहीं है.