Wednesday, February 23, 2011

वह आदमी बस से उतरकर



वह आदमी बस से उतरकर अभी जो
उस इमारत गया बस इतना
दिखने की उसकी सिर्फ़
इतनी ही कहानी है मेरे पास
एक घर के अंधेरों में दाखिल होकर
उसने क्या तरतीब पाई होगी
समय औ’ स्पेस में सहजता बुनता
बीमार मां को नहलाया होगा
जीवन-संगिनी को बहलाया, बेज़ारी
में किया नंगा होगा, कि देर रात
मध्य-पूर्व और पच्छिमी एशियाई
ख़बरों के बीटवीन द लाईन्स में उलझा
उलझता, स्वयं नंगा हुआ होगा
होता होता होता रहा होगा
गांव औ’ शहर औ’ सपनों में विस्थापित
उनींदे चौंककर आदमी मर्तबा जागता है, सिहरता
जानता है कुछ ज़रा चीनो-अरब उसके हिस्से
का भी होगा, सड़कों पर गुज़रते, मरते
लोगों के ख़ून में कुछ उसकी आत्मा़
भी जाया होती होगी, मरती और
जिये जाती, जिये, जिये जिये
सांस रोककर आवाज़ें सुनता
कि यह किसका मुल्क है किसकी लड़ाई
ज़बान में विस्थापित किस भाषा में आदमी
ज़ि‍न्दा खड़ा हो जाये, भरपूर
गिरा आदमी कभी होता है खड़ा
अपनी समूची इज़्ज़त में, ज़बान में?

बसंत की इस अलसायी हवा में
नाक की नोक पर बारूद की गंध नहीं
न रसोई की रस्सी पर ख़ूनसनी कमीज़
कोई पसराती, सूने सुन्नाट रात की ख़ामोशी
अजाने ज़मीनों अजानी उम्मीदों की कोई
बदज़ुबान लोरी है बेहयायी में गाती, गाये जाती
एक अदद जोड़ी हाथ हैं, पैर हैं
कल दोपहर तक की खुराक भर
का ही आत्मविश्वास है उससे ज़्यादा
सच पूछिये आदमी की पहचान
की तमीज नहीं है, तक नहीं है
भाषा की पुरानी पड़ रही पट्टी में ज़रा
कुछ नया गांठने की गिरह कर रहा हूं
भाषा से बाहर खड़ा, नई
नागरिकता की जिरह कर रहा हूं.

5 comments:

  1. सिरसक तो विनोद कुमार शुक्ल टाइप का है और कविता आपकी अपनी स्टाईल में उनकी टाइप का

    ReplyDelete
  2. आदमी की जबान, उसकी पहचान.

    ReplyDelete
  3. Ae bhai.ee to hamko nahi bujhaya. Kuchh 'high levek' ka baat hai kya !

    ReplyDelete
  4. delightful, involving and disturbing...

    ReplyDelete