Thursday, February 24, 2011

डायरी, पंजर-पंजर

खिड़की पर हाथ हिलाये मुस्काता, मैं दिखाता था मंजर. शर्मिन्दगी में सिर नवाये वो बोले, बंजर.

बंजर? इज़ इट?

हम गिरे, इस ज़रा औचक घड़ी भाषा में ही गिरे. पीछे धीरे-धीरे रात गिर रही थी, जीवन बहुत पीछे कहीं गिरा था. स्मृतियां जाने किस मोड़ गिरी थीं (व्हॉट स्मृतियां? आर दे स्टिल अराउंड, व्हेयर?).

मुस्काने की बात नहीं थी, मगर मैं दांत बाये, हाथ हिलाये रहा, धीमे भाषा में लौटता, कहने लगा, अपने समझने में चलने. देखिए, ऐसा है वो जी, खुरदुरे पैरों की तब कहां थी खबर, बचपने के भोलेपन में हमने समझा था जीवन तितली का पर होगा, बच्चे के गोद में खुली कॉमिक किताब-सा रंगों-भावों का भंवर, गाल पर गीत व हर सम्भाल में कविता होगी.

फ़ि‍ल्मी चक्कर में किस्सा कुर्सी की टुटही टांग हुए पंजर-पंजर हिलेंगे, टिटिहरी स्‍क्रि‍प्‍ट की टिनहा कहां बानी, के-हानि, हीं-कहां-हीं-कहां कहानी हुए जाएंगे, आप टहलते बंजर बोल बोल जाओगे, कब कहां थी खबर..

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