Feb 25, 2011

अच्‍छा होने के खतरे..

नाक में जीत के पूर्वाभास की नसैनी सटाये, या आह्लादकारी अफीम की पिनक में हरियाये, वर्ल्‍ड कप के गड्ढे में गिरे अच्‍छा हो इस लिंक पर नज़र न ही डालें (क्‍योंकि अभी अप्रैल भर किरकेट-हरियाली के सिवा यूं भी दुनिया में उन्‍हें और कुछ नज़र नहीं आने वाला.. इस्‍लामी जगत की तानाशाहियों की जो ख़बरें खंगाल रहे हैं उनसे अलबत्‍ता कातर मनहारी गुज़ारिश ज़रुर है कि एक नज़र इधर, अपने गिरेबान में भी डालें.. भूल गई होगी तो शायद फिर कुछ-कुछ गोरख पाण्‍डेय की कविताएं याद आने लगें.. याद करने में बड़ी ज़िल्‍लत हो रही हो तो आकर मेरी आंखें देख जायें, सहुलियत के लिए फिर मैं गुनगुना भी लूंगा: ये आँखें हैं तुम्हारी / तकलीफ़ का उमड़ता हुआ समुन्दर / इस दुनिया को / जितनी जल्दी हो बदल देना चाहिये.

(पोस्‍ट से लगी तस्‍वीर पलामू के 34 वर्षीय ललित मेहता की है, बंगलौर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई किये व अपने सूखाग्रस्‍त जिले में पानी लाने की कोशिशों में भ्रष्‍ट अधिकारियों की ओर उंगली उठाने के एवज में उन्‍हें अपनी जान गंवानी पड़ी. फोटो: तहलका)