एक थे साधु भुईंया. जाने किसका खोया कहां से एक अभागा पुरनका लाल हेलमेट पा गए थे, हर बखत माथे चढ़ाये रहते. हेलमेट धारे-धारे मंटू के राशन दुकान से आठ रुपये वाले पेट के दरद का चुरन खरीदते, गिरिधारी के ठेले पर घुघनी खाते. रसिकता में बिसरामपुर की काली बंगाली लड़कियों से गरीब मज़ाक करते, फिर हें-हें करते गुड़ाखू के बदरंग दांत दिखाते. पसलियों के पंजर की ही तरह माथे का लाल हेलमेट हिल-हिल हिलता. कौन जाने साधु भुईंया के प्रेम हो गया था. वही हुआ होगा. जभी तो. एक बार अंड़से टेलर में घुसे, बाजू का पसिंजर हाथ फेंकने लगा, टेलर के कंडक्टर बाबू नाराज़ हो गए. हल्ला बोलने लगे शंखी खाके घर से चले हो, का जी? सर पर का डराम हटाओ, दायें-बायां लग गया तो जनाना-मरदाना कोईयो इंजर्ट हो सकता है, अबे, आपै से बतिया रहे हैं? कितना किच-कांव हुआ, एगो बुचरुग के हाथ का डंडा से एक छौंड़ी के गोड़ चंपा गया, अगले इस्टाप साधु भुईंया धकियाये टेलर के बाहेर फेंका गये, मगर हेलमेट कहां उतारे? नहींये उतारे. मुन्ना कि उसकी बहिन कवन तो बोल रहा था कि साधु भुईंया हगने जाते हैं तब्बो हेलमेट नहीं उतारते! नहींये उतारते होंगे. आदमी प्रेम में पड़ता है तो उसकी यही दुरगति होती है.
जैसेकि एक थी चंद्रकला, और वो प्रेम में थीवो नहीं, मगर मन लगाने का बलिहारी देखिए! हां, मने लगा था चंद्रकला का, सुख-दुख कवनो मौका हो, लइकी का आंख से भर्र-भर्र आंसू गिरने लगता! सरोजा मौसी की बेटी गौना के बाद ससुरारी जा रही है, चाहे गोदी में बच्चा लिये वापस मम्मीजी के यहां आ रही है, एक नज़र चंद्रकला को दिखला दीजिए और भर्र-भर्र लइकी के आंख का टंकी चालू. मुबारक के यहां सब एक बंदर पाले थे, कुछ दिन पीछे पगलाकर जवान ने खूब उधम मचाईस, तीन कुत्तों ने चांप के रगेद लिया, काट-कूट के बानरजी को जीवन लीला के पार लगा दिया, चंद्रकला देखी तो लगी भां-भां रोने. संपूर्णा के मंगनी के बखत वही आलम. अशोक कहां-कहां हाथ और गोड़ रगड़ के, केकरा-केकरा के पइसा खेला के रेलायंस का चोर कंपनी में तेरह सौ के नौकरी पाये तब्बो वही कहानी, चंद्रकला के हाथ के स्टिल गिलास और गाल दोनुए जगह पानीये-पानी..
इसीलिए महापुरुस लोग बोल गए हैं प्रेम करना और मन लगाना दोनों ही बड़ नुकसान वाला चीज है. पब्लिक बड़ हिकारत से देखती है, और बकिया जो नुकसान होता है सो अलग. जैसे एक गाय थी और एक थी उसकी बछिया. गइया रहते-रहते गोड़ पटक के बोलती सुन रे, बाछी, तोरा के देख बड़ हम्मर मन जुड़ाता है, ममता में छाती फूल जाती है और सांस भारी होने लगता है, मगर ई रोज-रोज वही चारा-चोकर, बासी रोटी और मुरझाया आवाज में अपना बां-बां हमको सुहाता नहीं, सब छोड़के सोचते हैं पोखरा-पहाड़ पारे कहीं भाग जायेंगे, तू अप्पन खयाल रखना, हम्मर पीछे-पीछे मुंह डोलाये मत आना, हां? बछिया अपनी बड़ी-बड़ी आंखों, फटी-फटी आंखों अपनी जननी को ताकता और वैसे ही आंखें फैलाये फिर मुंडी हिलाता, गोड़ पटककर बोलता, ‘हम तो आऊंगा, पीच्छे से आके बहुत बहुत बहुत दूर आग्गे निकल जाऊंगा, फिर देखता हूं कइसे हमके पकड़ोगी, पकड़ लोगी, मम्मीजी?’
ऐसे ही मौकों पर मम्मीजी गइया आंटी के अकिल काम नहीं करती, सोचती हैं ममता के मारी घर छोड़के भागे वाली गइयों के बारे में जाने महापुरुसों ने कुछ क्यों नहीं बोला, और बोला है तो सब इतना गलत क्यों बोला है..
(ऊपरी के इस्कैच: गया के तीन रुपइया वाला सस्ता इस्टाकिंग से)