Monday, February 28, 2011

इच्‍छालोक से लौटकर, घर..

बाबूजी घर से तीन दिन लापता रहकर लौट आये थे. नंगे पैर लौटै थे. चप्‍पल किसी भागाभागी में छूट गया था या कोई चोरी कर लिये था सच बताने में बाबूजी लजा रहे थे. पैर की उंगलियों पर सूखा कादो चढ़ा था, कान-हाथ पर सफर की दूसरी गंदगी. एकदम्‍मे घिन्‍नाये वाला रुप. बाबूजी की जगह कोई और होता तो अम्‍मा पहले रसोई से बाहर खड़ा करती तब आगे बात करती. जबकि अभी एकदम आंख के आगे पाके मुंह पर साड़ी दाबे रोने लगी थी. संजु और पायलिया आपस में झगड़ने लगीं कि बाबूजी के कान-हाथ के सफाई कौन करेगा. अविश्‍वास में घबराकर श्‍याम भागा शंखो के घर के पीछे अमरुद के पेड़ पर चढ़ गया, सोच में सर धंसाये कि दुनिया की सारी मार्मिक घटनायें उसी के घर क्‍यों घटती हैं! श्‍याम का डबल जबकि देर तक अमरुद के पत्‍तों के बीच फुसफुसता रहा था कि दुनिया की सारी मार्मिक घटनाओं से क्‍या मतलब है उसका. वह जानता भी है दुनिया क्‍या है या मार्मिकता? अपने डबल को अनसुना करके श्‍याम अमरुद के पत्‍तों पर हाथ पटकता रहा जब तक बुईया आंटी पेड़ के नीचे आकर बंगला-हिंदी में हल्‍ला नहीं करने लगीं, ‘तुम पियारो खायेगा कि हामारा वृक्‍खो गिरायेगा?’

इतने सारे सहजन के पेड़ हैं फिर भी मन हर समय हरा नहीं रहता. हरे तोते की आंख मुंदी रहती है. हरा रंग कहता है मैं नीले और पीले से गुज़रकर आया हूं, जानते हो?

नहीं जानता है श्‍याम. श्‍याम का डबल भी सिर्फ़ मनमोहन देसाई के ‘सच्‍चा-झूठा’ के राजेश खन्‍ना वाले खेल जानता है, बड़ी दुनिया के बड़े इशारों को कहां पहचानता है. बीस वर्ष बाद भी पहचानेगा कौन जानता है.

कहते हैं जंगल में कोई मोर आकर नाच जाता है जॉनी वॉकर समेत उसे कोई देख नहीं पाता, युसूफ़ ख़ान समेत ज़्यादा लोग अपनी-अपनी मधुमतियों में अझुराये रहते हैं, मोर देखने की बात दूर, किसी को उसकी याद तक नहीं रहती.

यह काफी बाद में पता चला कि ‘पिक्‍चर पोस्‍ट’ में किशोर साहू की फोटो देखकर बाबूजी का दिमाग चल गया था, और वह इच्‍छालोक के रॉयल एनफ़ि‍ल्‍ड पर अपने पीछे घर से भागी ‘गाईड’ की वहीदा बिठाये संपेरों की बस्‍ती घुमाने, नाच दिखाने गए थे! संपेरों की बस्‍ती के नाम से ही अम्‍मा के झुरझुरी छूटने लगा. पायल बिना एक शब्‍द बोले चुप्‍पै अम्‍मा के ओट जाकर खड़ी हो गई. बाबूजी शर्मिंदगी में सिर झुका लिये, श्‍याम दौड़कर पीछे वाले कमरे गया और झटके से अलमारी के दोनों पल्‍ले खोलकर वहां चुपचाप सर झुकाये थरथराता खड़ा रहा. रसोई की बल्‍ली का दीमक-खाया बुरादा था झड़कर अम्‍मा के लाल ब्‍लाउज़ की उधड़ी सिलाई वाली बांह पर इकट्ठा हो गया था, देर से संजु देख रही थी कि जाकर अम्‍मा के बांह से झाड़ देगी, वह भूलकर उसने ज़ोर से हाथ की संड़सी भींच ली, पिक्‍चर पोस्‍ट, चित्रलेखा, फिल्‍मी कलियां सबसे एकदम भरपूर नफ़रत करने लगी. (‘दिल दिया दर्द लिया’ के पोस्‍टर की वहीदा जबकि अभी भी आसमान की तरफ मुंह उठाये उत्‍फुल्‍ल हंस रही थी. रेडियो पर कॉलगेट के बाद अब ‘लाईफ़ब्‍ऑय है जहां तंदरुस्‍ती है वहां’ का लहकदार विज्ञापन बज रहा था).

अम्‍मा की छींट की सूती साड़ी पर किसी भी कोण से रोज तीन तितलियां आके बैठी मिलती हैं, आज सब उड़कर कहीं लुका गई हैं. भौं के बाल दहल रहे हैं, पैर का बिवाय चीख-चीखकर कह रहा है हमको देखे, हमको देखे? अम्‍मा थप्‍पड़ मारकर पीछे खड़ी पायल को परे ठेल देती है, नीचे जमीन तकती बुदबुदाकर मन-कटा बोलती है, ‘हमको तो भूले सो भूले, ई बच्‍चा सब आपके याद नहीं रहा?

बाबूजी क्‍या जवाब देते. जवाहरलाल ने कमला के कौनो, कभी दिया था? बगल के कमरे में जाकर बंद होने की जगह दे पाते? बाबूजी की जगह राममनोहर लोहिया ही होते, अम्‍मा के सवाल का लोहा पिघला पाते?

स्‍टील की थाली में सहजन की तरकारी और तीन रोटियों का तहाकर तिकोना अभी भी बिनखाया छुटा रखा था. गंदा ललके गमछा में गीला हाथ पोंछते बाबूजी भुक्‍खले उठ गये कि इच्‍छा नहीं हो रही, खिसियाये मुस्‍कराने लगे. जबकि अलमारी के दोनों पल्‍ला के बीच खड़ा श्‍याम अबले रो रहा था. खंभे के पास सन्‍न खड़ी पायलिया सोच रही थी खुल्‍ला नल का नीचे जाके तब तक बाल भींजाऊंगी जब ले निमोनिया में प्रान न छूट जायेंगे. बाबूजी भी मुस्कियाते हुए रो ही रहे थे, मगर वह सिर्फ़ संजु जानती थी कि देख रही है.

इतनी सारी कुशवाहा कान्‍त की करुणा में लिसराया घर अचानक कितना घर-मेंटल हो गया था! श्‍याम के डबल की टेंट में पैसे होते तो वह अभी बाहर भागकर राज खोसला की ‘दो रास्‍ते’ का वीसीडी लिये आता, पड़ोस के परिड़ा के घर से चुराये पपीता के फांक काटकर खाते सब बलराज साहनी को ग्रामोफोन पर सहगल का ‘एक बंगला बने न्‍यारा’ गाता सुनते और आंख में आंसू लिये बिना बोले एक-दूसरे को सुना-सुनाके गृहस्‍थी की रसवर्षा में, थोड़ा रोते और थोड़ा हंसते रहते, क्‍या सुनाते? अरे वही चेतनानंद की मदन-मोहनी ‘तुम जो मिल गये हो, जहांsssss मिल गया हैsssssss……’

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