Tuesday, March 29, 2011

(निरमल बर्मा का ‘वे दिन’ नहीं) चेन का बेल्‍ट बांधे के वे डेंजर दिन..

हिंदी प्रकाशक जैसे लगातार पाठक से दूर होने, और कथाकार प्रगतिशीलता के अपने डेढ़ पेजी सूचीपत्र गिनाने से बाज आ नहीं पाते, कलम्‍मा काकी अपने ‘टैंजेंट’ पर निकल जाने से न आती. गोड़ पर पेटकुनिया लेटाये बीनुआ के बेटी के ऊबटन मल रही हो, या अट्ट कल्‍ल (पत्‍थर की चक्‍की) में भिगोया उड़द दल रही हो, जमीन पर पैर साटे उड़कर अपने कलम्‍मा कोश में लौटती ही, देयर इस टाईम फार चीयरफुलनैस एंड देयर इस टाईम टू बी सैड. देयर इस टाईम टू रेजायस एंड देयर इस टाईम टू गो मैड.”

उन्‍चास वर्षीय (जोड़ सात महीना) चंद्रबलि राय के लिए कलम्‍मा काकी और उनका कलम्‍मा कोश उसी तरह थे जैसे कवनो पके, खेले, खाये दारुबाज के लिए आसमान का चंदा होता. मतलब, कभी-कभी ही आसमान में होता, ज्‍यादे ज़मीने पर ही लिसराता. पैर की ठोकरों से फुटबाल की तरह ठुकता, लुढ़काता. मतलब चंद्रबलि मौसा सामने हों तो सब उन्‍हीं को देखते, आसमान में चांद देखने का किसी को खयाल न उठता. ‘चांद को क्‍या मालूम चाहता उसे चकोर’ की तर्ज़ पर मौसा भी आमतौर पर नहीं ही जानते कि कितना ‘चाहे’ जाते हैं, हाथ में अनुपस्थित जाम लिये चुप्‍पै मुस्‍कराते बैठे रहते. थोड़ा वक्‍त ऐसे ही चुप्‍पै मुस्‍कराते बैठे का निकल जाता तो दर्शक दीर्घा के बच्‍चों को लैमनचूस या चकलेट दिलवाने की बात कहते (और कहने के बाद उतनी ही आसानी से भूल भी जाते) और फिर चुपचाप बैठे मुस्‍कराते रहते. सोमारु बो मौसा से बहुत चिढ़ती, क्‍योंकि मौसा के लिए चाय बनाना या पानी का लोटा लाना हमेशा उसी के हिस्‍से आता. मगर चिढ़ने की एक दूसरी तथा असल वजह थी मौसा सोमारु बो को हमेशा ऐसे देखते जैसे पहली बार देख रहे हों. गंवार औरत बरामदे में लौटकर भुनभुनाती रहती, ‘एकदम पगलेट अमदी है जी, अइसे बेबाती कोऊ मुस्कियाता है जी?’

सोमारु बो की चिढ़ का एक और कारण यह भी था कि चंद्रबलि राय हमारे असल मौसा नहीं थे. हमारे क्‍या किसी के नहीं थे. असल कोई मौसी ही नहीं थी क्‍योंकि चंद्रबलि राय की कभी शादी हुई ही नहीं थी. कभी कोई छेड़ने के लिए सवाल करता कि मौसी कहां है तो मौसा बिना भृकुटि चढ़ाये सीधे जवाब देते होगी जहां सुख पा रही होगी; हमरे संगे रहती बेचारी का जीना मुहाल होता, नहीं जी? बच्‍चों के बारे में भी मौसा का ऐसा ही मासूम जवाब होता-‘होगा सब कहीं. भगवान का दया से नीमने से होगा, अब केतना गो होगा हमसे मत पूछिये, काहे कि हम कब्‍बो लाइन में बइठा के गिनती त नहीं न किये थे जी?’

तो बिना बियाह वाले उन्‍चास वर्षीय (जोड़ सात महीना) बाबू चंद्रबलि राय कहां से कब मौसा हो गये, इसका सूत्रपात (रक्‍तपात के तर्ज पर) कहां से हो गया; और इस गहरा कहानी का सूराग कहां तलक जाता है इसका जवाब दुनिया में आने की मेरी (झूठी) कहानी में ही नहीं, (सच्‍चो) तक में कवनो खुलासा नहीं है. (नाट इबन ए सिंगल मेंशनिंग, जैसाकि कलम्‍मा काकी इमली के पानी और मिर्ची का घोल बनाती कहती)

एनीवेस, हरमेसा के मुस्कियाये वाले वही चंद्रबलि मौसा के एक दिन हुआ एकदम से पलटा खाये और सीधे करीयक्‍की ककीया के ‘देयर इस टाईम टू गो मैड’ वाले दौर में पाये गये ( “हालांकि ‘दौर’ से ज्‍यादा ऊ समूचा फेस के ‘दौरा’ बुलाना ज्‍यादा वाजिब होगा, एकाटिंग टू मी”, कोट-अनकोट दिलीप भैया) !

तोड़ा-तोड़ी वाला ‘मेरे अपने’ का दुसरका हफ्ता चल रहा था, या (शम्‍मी-लीना के) ‘जाने-अनजाने’ पहिलकाही हफ्ता में मुरझा रहा था, हवा में बेजारी का एगो कैसा तो तरन्‍नुम था, सैकिल पर चढ़ल आदमी अचानक से उतरकर उदास हो जाता, कंठ टेढ़ा करके किशोर को गाने का कोशिश करता, ‘कोई होता मेरा अपना, हम जिसको अपना कह लेते यारो..’ ‍पुलिया का पास कहीं (या पानी टंकी का पीछेवाला हाकी फिल्‍ड में) राजिंदर भैया गाना गा भी नहीं रहे थे, सैकिल को स्‍टैंड पे लगाके लघु वाला संका से फारिक हो रहे थे कि दू मिनिट का उतना ही देर में जाने पीछवा से कहां से तीन गो छौंड़ा आया, सरिया कि छुरी नीचे किया, हाकी स्टिक ऊपर, जे थुराई किया कि अगला छौ दिन राजिंदर भैया अस्‍पताल का बिछौना पर थे (पेसाब-पैखानो सब बिछौने पर ही रहा!). छौ दिन बाद हालत हुई कि कांखते-कांखते, होंठ का पपड़ी पे हाथ साटके दू बात बोल सकें. जयरपरकास का मम्‍मी रो-रुला के और तीन गो संतरा छीलके और आधा अनार का बीजा टिफिन का कटोरी में सजाके घर लौट गई तब राजिंदर भैया रंगनाथ चौबे, परमोद सड़ंगी, दिलीप सबके सुनाके बोले, ‘ऊ दिन चेन का बेल्‍ट बांधके बाहर नहीं निकले, बड़का मिस्‍टेक हो गया, बे!’

चंद्रबलि मौसा ने हंसते-हंसते ऐलान किया एक-एक को बम से उड़ा देंगे, तू खाली हमरा के सबका नाम दे!

‘मेरे अपने’ का ऊ डेंजर जमाना में कमर में बिना चेन का बेल्‍ट लगाये बीच सड़क पेशाब करे का राजिंदर भैया से मिस्‍टेक हुआ वहां तक तो ठीक, कि आलरेडी हो चुका था, मगर सबसे बड़का मिस्‍टेक त उसके बाद हो गया, कि बदला का आग में मचलते हुए चंद्रबलि मौसा के इंबाल्‍ब कै लिये!

(बाकी)

Monday, March 28, 2011

अरेण्‍येर दिबस ओ रात्रि..



(चित्र को बड़ाकार देखने के लिए चटकाकर उसे नई खिड़की में खोलें.)

एकटी छटो कतो गुलो संबाद..



(चित्र को बड़ाकार देखने के लिए कृपया उसपे क्लि‍कियाकर नई खिड़की में खोलें)

मुट्ठी भर (दतुअन की तर्ज़ पर) काब्‍य पंक्तियां..


लाख सलिल चौधुरी के ऑर्केस्‍ट्रा पर चढ़कर
किसी बोलेरो में उतर जायें, भागकर छू आयें पाला
बुरकिना फासो, माली की लरज़ती धुनें कई एक
इस बड़े देश में हमारी कल्‍पनाओं का गाना
मगर हाय, होगा उतना ही पिटा, बचकाना
जैसे शहर का अंड़सा कोना दो-चार पुराना
थमकर सुस्‍ताये पैर भाग जायेंगे, मगर
ओह कितना, पैर दौड़ेंगे उतना ही
जितना मज़बूत ड्राईव होगा रैम होगा
कल्‍पनाओं के कहां कैसा पर होगा
आखिर तो उतना ही होगा जितना
दलिद्दर संस्‍कृति का रोजग़ार होगा.

***

एक खरगोश के खड़े कान होंगे
दांतों में घास दबाये, घबराये
सामने नज़र फैलाये कि रस्‍ता
जाता कहां है कित्‍ती दूर
दूसरा (चैटविन के) बुढ़ऊ
पैटागोनियन कवि-सा बड़े चैन पगुराता होगा
"बाबू, मेरी पैदावार कम है. ईलीयट साहेब
कहे ही रहे, द कविता कैन वेट."

***

रोटी में इमली की चटनी और थाली
के भात पर बूट की तरकारी होगी
आंखों में बहुत दिनों पर
अच्‍छा खाये की आत्‍मा में खुमारी
वैसा कुछ उतना ही साहित्‍य
और कुछ मन में उतनी-उतनी
अलसायी लाचारी होगी.

Sunday, March 27, 2011

चिचरीकारी..

उपनगरीय डगर पे एक ज़रा-सी दिलकारी, दुपहरिये की चिचरीकारी..

(तस्‍वीरों को बड़ाकार देखने के लिए पेजों पर क्रमश: क्लिकियाकर उसे नई खिड़की में खोलें..)

Friday, March 25, 2011

जो होयेंगे कामो-आब..


औरत के जिम्‍मे कुल सात बच्‍चे थे. बहुत बार होता औरत बच्‍चों से तीन हाथ की दूरी बनाकर, हाथों में सिर लिए बैठती, चुपचाप उन्‍हें तकती सोचती किस पाप की सज़ा भुगत रही है. बच्‍चे तीन हाथ की बनी दूरी से औरत को एकटक ताकते, सोचते बिना पाप किये वे किसकी सज़ा भुगत रहे हैं. औरत के मुंह से एक शब्‍द न निकलता, ज्यादाह निशब्‍द आह निकलती, नज़रों में बच्‍चों की खातिर ख़बरदारी होती नासपीटो, मुझसे उम्‍मीद मत करो. बच्‍चे मुंदी आंखों के अभिनय में अधखुली आंखों ताड़ते रहते और हर नज़र में चोरी से उम्‍मीद की एक तीली जला लेते. औरत हारकर नज़र फेर लेती, गीली आंखों पर आंचल धरे मन ही मन गालियां बकती.
बच्‍चा हवा में पैर उठाये दायें पैर के अंगूठे से बायें को जोड़ने का खेल खेल लेता. दूसरा उसकी नकल करता और ढिलमिलाये गिर पड़ता. तीसरे को हंसने की कोशिश में रुलाई छूट जाती. चौथा होंठों से जीभ बाहर किये अपनी नाक की नोक चाट लेता. पांचवा छठे की चिकोटी काटता, सातवां पेटकुनिया गिरा ओम जय जगदीश हरे का भजन गाने की जगह उसे चबाने लगता.
तीन हाथ की दूरी बनाकर बैठी औरत एक बार फिर मुंह पर आंचल दाबे खुद को सताने लगती.
बच्‍चे बिना उम्‍मीद गाये इशारों में एक-दूसरे को समझाने लगते, कभी मुंडारी कभी मोतीहारी स्‍टेशन की ठेठ काठमार जबान में, ‘हम होयेंगे कामयाब एक दिन..’
औरत की आंखों में दुस्‍वप्‍न के सिनेमा का सिल्‍वर जुबली सप्‍ताह बदस्‍तूर जारी रहता.

Thursday, March 24, 2011

जीवन में उंगलियां.. उंगलियों में..


बड़ी दुनिया की तस्‍वीर उन ख़बरों, विश्‍लेषणों में छुपी होतीं जिसे बड़े अखबार अपने पन्‍नों में छापने से बचा ले जाते. रोज़मर्रे की आवाजाही, थकान, दफ़्तर के तीन और घर के चार काम ही जीवन की बड़ी खबरों की जगह अडिग जमे रहते. वनस्‍पति तेल, इमली, अजवाईन. परदे का हुक. प्‍लम्‍बर को फोन. पीठ की दर्द का मलहम? बड़ी दुनिया की उधड़न बुख़्नर और लुकाच के पन्‍नों में फड़फड़ाते, चैटविन की आवारगी में. कल्विनो की कल्‍पनाओं और सदनानंद झा के हरमुनिया के दबे, मुखर राज़दार बोलों में. ताज़ा नहाकर निकली, पूजाघर में पेट पर साड़ी का फेंटा बांध रही पत्‍नी का मन सरकता लेकिन जाकर टीवी पर उमड़ता, लगभग आदत-सी हुईं अब की एक सायास कोशिश में आंखें भर भी आतीं, फिर उड़ी नज़र में बालकनी का गमला दिखता (बद्तमीज़, फिर मुरझाता) जिसे किसी भी सूरत बचा लेना होता.
रात कूलर के नीचे के संकरे अंधेरों में एक चिड़ि‍या अपने पंख फड़फड़ाती स्थिर होती, देर तक चौंकी बुदबुदाती रहती, ‘मैं बची. हाय, मैं बची हुई.’
पत्‍नी की पेट पर सिर टिकाये पति उनींदा फुसफुसाता, ‘मैं भी, ओह.’ पति के घने लटों (कल्पित) में हाथ फेरती पत्‍नी मुस्‍कराती, ‘हां, मेरी उंगलियां, तुम्‍हारे पैर. पड़ोस में मुनगे का पेड़, तुम्‍हारे मन की मुनगी मैं, मेरे माथे की टिकुली सब बचे, हमारी पूरी बड़ी दुनिया बची हुई!’
देर रात के चमकदार अंधेरे-उजालों में किसी अजाने पेड़ की छाया अपने साथिन अजाने पेड़ की छांह की संगत में कांपकर हिलग जाती, कहती, ‘जो बचा हुआ है हमारी छाया है, हम बचे हैं?’ साथिन छाया अब एक नये सुर में कांपना शुरु करती.
जैसे सदनानंद झा एक नये सुर के दबे तनाव में अपना हरमुनिया बजाना.
अपनी अड़सन में बुख़्नर बहुत दूर कहीं अदीखे फड़फड़ाते, हकलाये बोलते, ‘डांके. डांके.’

Tuesday, March 22, 2011

बदरी का नाम बताइये, या अपना मोजा का पहचान?

एक चिड़ि‍या है रोज आकर अनार के गाछ पर बैठती है, मालूम नहीं सगरे दिन सोचती क्‍या है, टुपुर? अपना नाम पसंद नहीं उसको, कवनो और नाम होता तो केतना अच्‍छा होता यहीये सोचती है, टुपुर?

‘एकरा का (क्‍या) ना (नाम) है?’ यह कोई और बच्‍चा पूछता, टुपुर आंख झपकाये चुप रहती.

‘देखो, इनको चिरियो का नामौ नै मालूम है! ई हुई सोनामुखी, न जी? का सोचै बइठी हैं, सोनामुखी जी? घरै डकैती पड़ा था कि एसप्रेसन (एक्‍सप्रेशन) अइसन मुरझाया वाले साटल पड़ी हैं? सैकिल में बैठ के अप्‍सरा टाकी ‘हरीयर कांच का चूड़ि‍यां’ देखे ला चलिएगा, सोनामुखी?’ .

‘रोज आके बइठती है ऊ नहीं है जी, ओकर बहीन है, काकी किरिया, हम पहचान रहे हैं! जइसे पच्छिम में ऊ बदरी देख रहे हैं? ई कल वाला नहीं है! ऊ गया जमसेदपुर कि जसी‍डीह?’

‘मतलब ईहौ नीलामनि नै ओकर बहीन है, जी?’ शंभुनाथ मामा वास्‍ते गुल खरीदकर लौटे हैं, सैकिल का पैडिल में उनका पैजामा अझुराया जा रहा है, लेकिन अभी तक जाने नहीं हैं.

‘बहीन होगी कि गोतिया है, मौसी है ई तो गंभीरता से जांच करै से पता चलेगा न जी?’ अपने हिस्‍से का ज्ञान निकालने के संतोष के साथ कामता देह के दूसरे हिस्‍से से हवा रिलीज करते और टेस्‍टर की नोक से कान खोदने लगते.

बुनकी फ्रॉक के छापे के तीन फूलों पर एक हाथ दाबे, दूसरा मुंह पर धरे वहां से हट जाती. गुड़ के खौलाये पानी और सौंफ की महक के पीछे चलती रसोई में जसोदा फुआ के पाछे जाकर ठड़ी हो जाती. महीनी मिठास में एक पूरे मिनट के अंतराल के बाद कहती, ‘पुआ बनायेगी, पुआ? हम दू गो कायेंगे. अउर केउ के बाटा नइ तेंगे!’

‘तू तीन गो खाना.’ परात में आटा निकालती फुआ कहती.

‘अऊर हम?’ हाथ का धूल पैंट में पोंछता मनोज भागा आता, ‘हम बुनकीया के तेगुना खायेंगे, टेन पलस टू, टुअेल!’

दुनिया में आने की मेरी (सच्‍ची) कहानी से झांकते बाबा ललकारते आवाज़ लगाते, ‘ऊ रसोई में चप्‍पल पहिन के को गया है?’

जवाब पिंटू या जितेन्‍दर चाचा की तरफ से आता, ‘कब्‍बो कीने हैं चप्‍पल कि पहिन के कोई कहुंओ जायेगा?’

एक दूसरा जवाब बिष्‍णु भैया का आता, ‘पंद्रह अगस्‍त का परेड हम रजेस महन्‍ती का चप्‍पल उधारी लेके दिये!’

राजेश महान्ति अपनी बहन के कपड़े के जूते पहनकर दिया. जैसे मंजु परीक्षा इंदु दीदी का पेन लेकर दी. राजू मनोज के मेडिकल कार्ड पर हॉस्पिटल गया. सुशांत अपने भाई का मोजा पहनकर एस्‍से में फस्‍ट प्राइस का ईनाम लेने इस्‍टेज पर गया था. रंजु नरसरी से फूल और गमला दीपा आंटी के लिए कीनने गई थी. दीपा आंटी अपने घर रेकार्ड पर जो मधुमती का ‘दिल तड़प-तड़प के कह रहा है आ भी जा’ गाना बजा-बजाकर सुनती रहती हैं वो रेकार्ड प्‍लेयर संधु अंकल के घर से उधारी गया है. जैसे कामता के पास पंचानन की सैकिल पहुंची है. विष्‍णु भैया का कुरता दुर्गा पहनकर घूमता है. जैसे तापस और सुरंजन मेरी कहानी को अपनी साइकिल पर घुमाते घूमते हैं.

(बाकी)

Monday, March 21, 2011

फिर-फिर ककहरा..



मुट्ठी में होशो-हवास की गल रही एक ज़रा टैबलेट दबाये
अवसर के पीठ सवार अढ़ाई दोस्तियां और उजबक
यारंदाजी की वही-वही बरबराई रोवनियां पौने तीन
सबको अनसुनियाता (अंधारे छूटा जाता)
पसलियों में साइकिल के ट्यूब भर हवा किये पंप
बिवाय फटाय एड़ी एक हाली हथेलियन के दुलारे दुलराये
दौड़ती मैट्रो के बाजू चौड़ी कार-बहार सड़क के मैं
नीचे दबीं चौदह हज़ार ज़ि‍न्दगियां कार-बाहर, बेमतलब
लांघता, उछलता, गिरता, दौड़ता, तेज़ी से जितना सकता
एक सांस में तुम तक पहुंचने की कोशिश करता

अजाने धातु अपहचाने रसायन-द्रव्यों के अंकीय अंबार
घालमेल के लम्बे गलियारों, सत्ता-श्रृंखला के शराबी नीम उजारों
के बीचोंबीच तुम ऊबी, मुस्कराती बहलती, किसी बतकही में रमा दिखतीं
मैं सकुचाया, भासा के बसियाये, कुछ खाये ज़रा बचाये पन्ने सजाता
दिखता, दहलता कि भाषा समाज की तात्कालीकता से बाहर तुम्हें
अपनी बेजुबानी की अश्लील नाचों को देखने से किसी तरह बचा सकूं
अलबत्ता साथ ही जता सकूं कि जी, सुनें, मेरे भाषाई इरादे नेक़ हैं
कि फिर बहुत देर ख़ामोश रहने के बाद हम बात शुरु करें तो उसमें
भाषा नर हो न मादा हो, मेरा कहना अश्लील हो न आधा

मज़बूत रस्सी की सघन बांट सी खुले भाषा, खुलती चली जाये
तुम कौतुक बनो नहीं, न मैं नाटक
शालीनता की सादगी में बिना फुदके रह सकूं सादा.

Sunday, March 20, 2011

बेभांग..



(चित्र को बड़काकार देखे के लिए क्लिकियाकर नवका खिड़की में खोलिए..)

Saturday, March 19, 2011

चिरिया बनके उर जाइये..

होली की गर्म हवाओं के चलते ही मनोज घर से लापता हो जाता. बाज़ार में या लंबी ढलान वाली सड़क पर कभी दिखता तो हमेशा तीन लड़कों की संगत में साईकिल में टंगा, ठंसा हुड़दंगी शोर मचाता दिखता. दौड़ता कभी घर आता तो हड़बड़ में सिर्फ बताने के लिए कि कितनी भूख लगी है. नाक और होंठों पर पसीने की बूंदें होतीं, माथे के बाल धूल-अंटे, छितराये होते. बिना एक जगह स्थिर बैठे, उसी हड़बड़ी में तीन कौर खाकर उतनी ही तेजी से फिर भाग भी जाता.

जबकि होली सुनते ही टुपुर के चेहरे पर मुर्दनी उतर आती. आंगन और बरामदे से भागकर इस और उस कमरे छिपती रहती. फुआ और मौसी की साड़ी के पीछे. जितेन्‍दर चाचा या देवीशंकर कक्‍का लोटा का पानी पीते हुए दूर से कहते, ‘ऊ सारी (साड़ी) के पिछवा कौन लुकाया है जी, हियां से त सगरे (सब) लउक रहा है?’ हदसी टुपुर चार हाथ दौड़कर जगह बदलती, ‘अऊर हियां से? अब? लउक रहे हैं? हियंवा से?’

पूरे होली भर टुपुरवा का दिमाग पटखनी खाये रहता. फट्टल आंख लिये माथा पर दीदी का चुनरी धरे न पूछेवाले को भी बताती फिरती, ‘हमरा के होली नहीं खेले का है, बइय्या?’

मुंह में गर्म पुआ दाबे बिष्‍णु भैया हंसते जवाब देते, ‘मत खेलना बुच्‍ची, चिड़ि‍या बनके उड़ जाना!’

टुपुर होंठ में उंगली फंसाये बिष्‍णु भैया का कहा सुनती, फिर झुमुर, पायलिया, दीपू सबको सुनाती इस कमरे से उस कमरे भागती बताती फिरती, ‘हम होली नै खेलेंगे, चिरिया बनके उर्र जायेंगे, जाने? हं?’

‘चिड़ि‍या बने बास्‍ते बड़ इच्‍छासक्ति का दरकार होता है,’ कुर्सी खींचकर उस पर ढेर होते जितेन्‍दर चाचा कहते. माथे और गाल पर उनके संवलाई गाढ़ी ललाई होती. अधमुंदी आंखों फुसफुसाकर बात करते, मानो किसी गहरे रहस्‍यलोक में डूबकर अभी-अभी बाहर आये हों. तीन लोटे भांग के असर में बीस कोस दौड़कर आयें हों और बीस कोस दौड़ लेने का अभी भी हौसला रखते हों.

टुपुर की पीठ पर हाथ धरकर जितेन्‍दर चाचा बुचिया के हौसला-अफजाई करते. हालांकि अधमुंदी आंख इधर-उधर ताड़ती रहती कि कहीं बचा आधा गिलास भांग और दिख जाये तो उससे सूखा हलक अभी कुछ और ठंडा कर लें, ‘चिड़ि‍या जइसन महीन सोच का दरकार होता है. अंगना और ओसारा का अइसहीं दौड़ाई करके बुच्‍ची, आज ले केऊ चिरिया बना है? मनोज कुमारो सहीद बन सकते हैं, चिरिया नै बन सकते, रघुबर रामचन्‍नर जी के जै!’

टुपुरवा के दिल टूट जाता. चाचा से हाथ छुड़ाकर वह भाग जाती. ढेंकुली वाले कमरे में सफाई कर रही सोमारु बो के पास या निमकी छान रही जयपरकास की मम्‍मी के पीछे जाकर चुप्‍पे खड़ी हो जाती और खड़ी रहती. गुमसुम. दोपहर की धूप उतरकर सांझ का रंग चढ़ने लगता, लइकी किसी से बात नहीं करती.

ताप्‍ती दीदी भागकर छत की सीढ़ि‍यां चढ़ती, पड़ोस के दीपांकर को सुनाती शेफाली से कहती, ‘एबार हूली थाकबो ना, चोक्रोधरपुर जाच्‍छी!’

इससे ये बोलकर और उसके साथ वह करके भी ताप्‍ती दीदी को मगर चैन पड़ता नहीं. कुहनी पर गाल टिकाये देर-देर तक गेट पर बिना किसी से बात किये ऐसे ही खड़ी रहती. पता नहीं किसका इंतज़ार रहता. फिर एकदम तेजी से भागकर भीतर आती. रास्‍ते गेंदे का फूल कचर देती, या बेवज़ह पीशीमां से झगड़ा करने लगती. होली आता और आकर निकल जाता, ताप्‍ती दीदी चक्रधरपुर क्‍या बिरमित्रापुर तक न जातीं, मगर होली के चार-छह दिनों तक पारा उनका एकदम चढ़ा रहता. सुदीप भैया बोलते अरे हटो रे, ब्‍लास्‍ट फरनेस आ रही है!

वैसे ही दिलीप भैया. सूखे होंठ पर उल्‍टा हाथ पोंछते. चिढ़े जिस किस को डांटते रहते, ‘अरे, तोरा से गिलास में पानी लाने को बोले थे न रे?’ बेल के पेड़ से लगे साइकिल को लात लगाकर शिकायत करते, ‘साला मटगार्ड फिर से अवाज कर रहा है, ये साइकिल लेके हम अंजलि का मोहल्‍ला जायेंगे बे?’

इसी में कभी रहमतुल्‍ला या प्रदीप साड़ंगी भैया के जले में नीमक छिड़कने, ये बताने भी चले आते, ‘मगर ऊ तो जमशेदपुर गई है!’

कोई दूसरा कहता, ‘आरे बुड़बक, कोलकाता गेयेछे!’

दिलीप भैया चिढ़े-चिढ़े जवाब देते, ‘गई रहे कलकत्‍ता, हम सैकिल से कलकत्‍ता नहीं जा सकते? ई बार उसके कलकत्‍ता वाले घर तक पहुंचकर दिखाते हैं!’

दीपू छौ महीने के टामी को गोदी में लिये उसके मुंह में गरम पुआ का टुकड़ा ठेलने की कोशिश करता, अदबदाये पिल्‍ले के मुंह फेरने पर उदास होकर उससे सवाल करता, ‘टामी, ई बताओ, बाबू, तू चिरिया बनके उर सकते हो?’ स्‍नेह के दुलार में टामी घबराकर दीपू के गाल चाटने लगता.

जितेन्‍दर चाचा के हाथ जाने फिर कहां से भांग का एक लोटा चला ही आता, चमकती आंखें और थकी सांस लिये चाचा महकते बोलते, ‘कोऊ है हो? देखो हियां, अबीर और रंग का एक्‍को छींटा नहीं गिरा लेकिन केतना रंगीनी बरीस रहा है?’

ढेंकुली वाले कमरे के अंधारे में सफाई करती सोमारु बो झाड़ू चलाती खुदै खुद में फिक्‍क देना हंस देती (जैसे फिक्‍क देना घर का कवनो दुसरका कोना में केहू के रुलाई छूट जाता, मगर किसी के नज़र नहीं आता).

(बाकी)

Thursday, March 17, 2011

जब भी ये दिल उदास होता होगा..

कितनी दूर तक दुनिया अपनी होती है, कि हाथ बढ़ाकर उस बिंदु को छूकर कह दें कि यहां तक हमारी है और उससे आगे परायेपन का संसार शुरु होता हो? अपहचाना, निर्मम, तकलीफ़देह? सपने के बाहर ताप्‍ती दीदी, टुपुर, मनोज, दीपू, जसोदा फुआ, मैं हम सब पहचाने संसार की तरलता में खड़े थे और सपने के अंदर खड़ा आदमी (बाबूजी! बाबूजी!) जाने किस वीराने, स्‍नेहरहित, सूने प्रांतर में भटक रहा था. कभी होता बर्तन मांजती, या मिट्टी के दीवार पर गोईंठा पाथती, मुंह पर मटियाया आंचल ढांपे मां सूने दीवाल से खुद को फुसफुसकर पूछता देखती, ‘तुम एक बार बस अपने मुंह से बोल दो अब कब्‍बो नहीं आओगे, एक बार?’ सपने में खड़े आदमी का सूना, पथराया चेहरा एकबारगी को कांपता दिखता लेकिन उसके मुंह से कभी कोई बोली छूटकर मां तक पहुंची हो, और मां अपना जवाब पा गई हो जैसा कभी नहीं हुआ.

सपने से बाहर पहचानी दुनिया के स्‍नेहिल संसार में कितने तो- सब गिनतियों से परे, हजार की गिनती के बियोंडो- सवाल थे जिसका सपनों के भीतर के बीहड़, रहस्‍यलोकों में मगर जवाब नहीं था!

एक बार ताप्‍ती दीदी मनोजवा की पीठ पर आईना फंसाकर बाल काढ़ रही थी, एकदम्‍मे चौंककर बोली, ‘सेई तो पिंटू चा, ना की?’

खपड़े पर सोमारु बो हरे पसरे लतरों में लौकी की बतिया खोज रही थी, चिढ़ी चिल्‍लाईं, ‘कोत्‍था लउक गईंलें तोरा पिंटू?’

हैरानी और दुख से ताप्‍ती दीदी ने जवाब दिया, ‘स्‍वप्‍ने, आर कोथाय?’

पहली बार नज़र जाते ही सबने पहचान लिया कि सपने में पिंटू चाचा ही हैं. बड़ी मोहरी का पजामा पहिने कौनो मुसलमानिन है जिसके हाथ में हाथ फंसाये बदकार को बजार की सैर करा रहे हैं. अभी अलमुनिया और स्‍टील का दुकान का आगे खड़ा हैं और अगिलका फ्रेम में चेचक का टीका लगाये वाला तंबू का बाहर एक दूसरा का आंख में आंख डाले मुस्किया रहे हैं. नीलकमल सजावट सेंटर का मिसेस का ऑपिनियन में दोनों भागकर जैपुर गए हैं. जबकि ताप्‍ती दीदी की सहेली दीपशिखा जिद किये रही लखनऊ का हजरतगंज है, जयपुर कोनो रोकोमे नेई!

चूल्‍हे में जाये नीलकमल सजावट सेंटर की मिसेस और ताप्‍ती दीदी की सहेली दीपशिखा! माने सोचने वाली बात है पिंटू चाचा को घर आने की फुरसत नहीं निकलती, अपनी शादी तक के लिए नहीं निकलती, और हाट-मेला में किसी जाने कहां की जनाना के संगे सैर-सपाटा के मिल जाती है? कितनी बार तुनुवा को गोदी में लेके उसका माथा से माथा सटाके वादा किये थे कि ‘तोरा खातिर अगली मर्तबा लेके आयेंगे, प्रामिस!’ और घेंघर, बेवकूफ तुनुवो भरोसो की, क्‍या फैदा ऐसे भरोसे का? झूठखार चाचा के झूट्ठल वादा! एतना और केतना बच्‍चन लोक का मन और जीवन में उनका भरोसा का बलि चढ़वा दिये!

‘सबसे बड़ झूठखार त ऊ लेसनल (नेशनल) चचवा रहा,’ ये नगीना काका बोलते, 'ई वादा अऊर ऊ बादा, सोजलिज्‍म, सब सोजलिज्‍म बह गईल तोर ईनारा में!’

नगीना काका के इशारे पर फिर रामधनी और धनंजय भैया नारा बोलते, ‘डौन डौन चाचा लेहरु! औट औट चाचा लेहरु!’

बुनकिया कहीं से सुनकर बोलती ‘बेहरु.’ फिर माथा पर जोर डालकर सोचती और कहती, ‘बराता (पराठा), हमरे को काना (खाना) है!’

ताप्‍ती दीदी हंसती उसे नजदीक खींचकर उसके गालों को हाथ में दबाये सवाल करती, ‘देखो एर दुष्‍टामी, पाराटा बोलते पारीश ना की रे?’

दीपुआ अपने नाक में उंगली फंसाये चोन्‍हाये जवाब देता, ‘फरौटा!’ मनोज दौड़कर दीपू के बाल खींच भाग जाता, ‘चुप्‍प बुड़बक, परौठो बोले नहीं जानता है!’

जयपरकास की मम्‍मी मनोज के दो हाथ लगाती, मनोज बहुत चोट लग गई की एक्टिंग करके रोने लगता. या मनोज पुलिया की तरफ भाग जाता, किसी और के ही पिटाई हो जाती. या बिना पिटे, कोई और होता सिर्फ हल्‍ला मचाने की गरज से ही रोता होता. इस पूरे हो-हल्‍ले में सबकुछ और सब किसी से चिढ़ा, थका, उदास मैं जोर से आंखें मींचे उस सपने को देखने की कोशिश करता जो मेरे भीतर दर्द बढ़ाने की जगह मुझे फुरगुद्दी चिरैया में बदल दे; अमरुद के पेड़ से उड़ाकर कहीं बहुत दूर, बहुत ऊपर- सब पतंगों से भी ऊपर- ऊंचे आसमान में छोड़ आये जहां से नीचे मैं सबकुछ साफ-साफ देख सकूं. हंसूं तो अपनी रुलाई को छिपाने की गरज में हंसता न दीखूं, जैसे मां इतनी बार करती है और समझती है जैसे मैं समझता नहीं. फिर मैं हंसू तो मुझसे ज्‍यादा मां हंसे और भूल जाये कि एक जरा से जीवन में मन को इतनी चोट क्‍यों मिलती है. और मिलती है तो उसका जिम्‍मेदार कौन है.

बहुत सारी आवाजें आतीं मगर कुछ दिखाई न पड़ता. सुझाई न पड़ता. छाती में एक बार पूरी ताकत से सांस खींच फिर मैं तेज-तेज दौड़ने लगता. जैसे मौत के कुएं का अंधेरा हो और मैं बेदम दौड़े जाता होऊं. कोई बड़ा शहर हो की तरह का रेल स्‍टेशन होता, प्‍लेटफॉर्म पर जगर-मगर इतने सारे लोग दिखते, सीढ़ि‍यां चढ़ते, उतरते. या गोदी में लगी कोई बहुत बड़ी नाव होती, लोहे के लंबे पटरों पर भारी सामानों की ढुलाई होती रहती, कोई बूढ़ा माथे पर गमछा रखे घबराया दिखता, कोई औरत आवाज लगाती कि वो लाल बक्‍सा नहीं मिल रहा? मैं सब अनसुना किये सबके बीच रास्‍ता बनाये भागता. गोदी का कोई कर्मचारी होता, लपककर पीछे से मेरी शर्ट थामकर मुझे रोक लेता, ‘क्‍या है? कहां भाग रहे हो?’

एक पल को लगता सपने में सिस्‍टम फेलियर हुआ है. एबरप्‍ट सेटअप शटडाउन. कुछ नहीं सूझता क्‍या कहूं इसके सिवा कि, ‘दुनिया में आने की मेरी (झूठी) कहानी एकदम झूठी है, (सच्‍ची) कहानी खोज रहा हूं, प्‍लीज़ भाईसाब मुझे आगे जाने दो?’

नंगा सांवला कंधा किसी बोरे पर टिकाये ऊंघते पिता दिखते, नींद में बुदबुदाकर बोलते और तेज भागो, बाबू, हमसे भी ज्‍यादा तेज. अंग्रेजों के जमाने के हाफ पैंट पहने चार पुलिस वालों के पीछे सिर झुकाये चलते बाबा दिखते, नजर चुराकर वह भी हुड़कते, 'भाग. अऊर तेज!'

(बाकी)

Sunday, March 13, 2011

बाह रे सपना के जमाना!

बादलों भरे दुपहरिया के अंधेरे में चुप्‍पे दीवार पर बैलेंस-वॉक की प्रैक्टिस करते कोई अदृश्‍य लड़की होती है जिसे रीझाने के लिए मैं दबी आवाज़ गुनगुनाता हूं, ‘ऐ लइकी, ईंटा का ये दिल कर नरम जरा..’ शरीफा के पेड़ के नीचे गोदी में बुनकीया को खींचे ताप्‍ती दीदी उसके हाथ मेंहदी न लगा रही हो, या सोमारु बो गुल का गोली न बना रही हो तो बहुत बार ध्‍यान देकर सुनने पर दीवार के दूसरे छोर खड़ी लड़की का जवाब भी सुनाई पड़ता है- सिटी-वीटी मार इरिटेट करदा, हरकतें डाउनमारकेट करदा! और मैं गुस्‍से में सुलगता कमर पर हाथ बांधकर नाक से धुआं छोड़ता जवाब देता हूं, ‘रे पंजाबिन, गोरा रंक पे बड़ तोर गोमान है रे?’ और वाक्‍य पूरा होने के पहले ही दीवार पर मेरे बैलेंस-वॉक की सारी बैलेन्सिन तेल हो जाती है. कपार नहीं फूटता तब भी कुहनी तो फूटती ही. मगर अभी टुपुरवा का फूटा है. रो कम से कम वैसे ही रही है. सलीमा में टेलीक्राम का खबर पाके अचला सचदेब अऊर ललिता पलवार जइसे जमीन-असमान एक करे वाला रोआई रोती हैं, ठीक वइसने!

पहिलका डैलाक, एकदम्‍मे मारमिक: ‘हम हेरा गए हैं! बैया (भैया), ई चंकल (जंगल) में हमरा के बाक (बाघ) खा जायेगा!

जबकि कवनो जंगल-टंगल नहीं है, बादलभरा दुपहरिया का अंधेरा है और लइकी सीतानाथ बो का पलंग का नीचवा लुकाई है. और अकेलहूं नहीं है, अपना दूनो गुड़ि‍यो साथै लीहिस है!

कलम्‍मा काकी थी हमरा हाथ रोककर, दरवाजे पर टोककर बोली, ‘डोंड ट्रबल द लिडिल गर्ल, फिसिकली शी इज नाट ईयर एनीमोर.’

टुपुरवा पलंग का नीचे लुकाईल दीख रही थी मगर फिचिकली (बकौल काकी) हुआं थी नहीं! ‘शी इस लिविंग समवन एल्‍स ड्रीम.. आर नाइटमेयर!’ जाने कोडईकनाल कि कुंचुनालपट्री कहंवा से करीयक्‍की थेयरी सब लाके हम गरीबन के बीच ठेलती रहती थी! केकरा डिरीम में हेराई है टुपुरवा? कोई केहू अऊर के डिरीम में हेराइयो सकता है भला? अनबीलीबेबल बट ट्रू अल्‍सो जइसन?

दुनिया में आने की मेरी (सच्‍ची) कहानी में शायद बाबूजी थे जो जसोदा फुआ के सपने में हेराये थे, (झूठी) कहानी में किसके सपने में यह कौन हेरा रहा था जैसा कुछ भी तय करना असम्‍भव था. एक बार के लिए तो शक़ हो कि शायद यह सब ताप्‍ती दीदी का किया-धरा है. बेचारी टुपुरवा उनके माथे की रुसी का दवाई कीन के नहीं लाई उसी की सज़ा पा रही है! मगर तभी सपने का पगहा अपने हाथ लिये पिंटू चाचा कहां से चल्‍ल आते और ताप्‍ती दीदी वाला खेला है की सारी कल्‍पना भुरकुस, बेमतलब हो जाती. एक बार तो मनोज चिल्‍लाके बोलिस कि ‘सब हमरे साइंस टीचर सिंग सर के करस्‍तानी है, एकदम्‍म राच्‍छस टीचर है, ककीया, हं?’

करीयक्‍की काकी ने मुंह पर उंगली धरकर मनोज को चुप कराया. सब बच्‍चे आंख फाड़े देखते रहे टुपुरवा किसके सपने में हेराई है (दाल का सगरे अदहन जल गया, दीपू इस्‍कूल से फिर अपना टिफिन भुलाके लौटा, मगर उधर किसी का भी ध्‍यान नहीं था). सपने में खूब हरीयर पहाड़ी सब दीख रहा था. फिर कैमरा किलोज गया त बाबूजी दिखे (हमको बाबूजी ही लगे, हलांकि मनोज अंत तक गोड़ पटकता रहा कि बाबूजी नहीं हैं). पीठ पर कोची का त कनस्‍तर बांधे टीला चढ़ रहे थे. पसीना-पसीना. नंगा गोड़, उघारे बदन. चार हाथ का दूरी से आदमी बास मारे वइसा हाल में जाने केकरा खातिर कइसा मेहनती कै रहे थे!

टुपुरवा रोये लगी कि बहुत दरत हो रहा है, एतना अंधारा में कवनो मिलिट (मिनट) बाग (बाघ) उसको खा जायेगा, ई साल दुर्गा पूजा बास्‍ते ऊ नवको फराको नहीं बनवा सकेगी! मगर सपना का सीनरी में फंसा पब्लिक टुपुरवा का सुन कहां रहा था?

कहीं-कहीं बाबूजी (ठीक है, ताप्‍ती दीदी का टेंहुका सहे से अच्‍छा है बाबूजी नै बोलें. नहीं बोलेंगे. सपना वाला आदमी, अब्‍ब ठीक?) का देह छिलाया हुआ था. करीयर लोहू का छापा जइसन दीख रहा था (जयपरकास के मम्‍मी मुंह पर हाथ धर लीं और आंखी पर अंचरा).

सपना वाला अदमी आखिलकार टीला का ऊपरी जब पहुंचा त हुआं एगो कुदाली रखा हुआ था. उसी का बगली एगो रंगील हवाई चप्‍पलो भी. कुदाली वइसने था जइसा हमरे घर में है, मगर वइसने नहीं भी था! चप्‍पलो लगता जैसे कौनो इस्‍पेसल डेजाइन वाला है. चीन से कि जपान से कहीं कवनो दुसरका दुनिया से आया है. लोहा का मग से मुंह में चुल्‍लू भर सपना वाला आदमी पानी पिये तो हम एकदम चिंहुक के पहचान लिये कि हं, बाबूजीये हैं, मगर दुसरका छण फिर येहो बिस्‍सास हो गया कि कवनो सूरत में हमरे बाबूजी नहीं हो सकते!

एगो बेमतबल का सपना में खाली टुपुरवा ही नहीं हेराई थी, बाबूजी के संगै का हम सबका संबंधों गरबरा गया था! बाह रे सपना के जमाना!

(बाकी)

Saturday, March 12, 2011

रेलचढ़े या जेहलगढ़े, कवन फरक, घरे नै हैं न ?

संजू चाचा की शादी नहीं हुई. हुई होगी तो दुनिया में आने की मेरी (सच्‍ची) कहानी में भले हुई हो, (झूठी) कहानी में इस व्‍याह के घटित होने का कोई, कैसा भी साक्ष्‍य नहीं. और अकेले यह संजू चाचा का दुर्भाग्‍यनामा हो सो भी नहीं. और दूसरे थे (ओह, कितने तो चाचा थे! जसोदा फुआ करम सुनाने के बहाने उनके नाम गिनाना शुरु करती तो दीपू की गिनती गड़बड़ा जाती. हमेशा! सात चाचाओं का तो मैंने हिसाब किया जिनको हमारी पूरी बचपन निकल गई हमने कभी देखा ही नहीं! बेचारे डिप्‍टी, या दुनियादारी, या जाने किसके मारे, एक बार घर से निकलने के बाद फिर दुबारा उस देहरी कभी उनका लौटना ही न हुआ. नेबर!) मनोहर, पिंटू चाचा, देवानंद, सुरंजन चच्‍चा सबका इसी तरह उनकी गैरहाजिरी में बरीच्‍छा हुआ, तिलक तक घर की औरतें कलेजा मुंह में लिये, घबराई राह तकती बैठी रहीं और बियाह का दिन आया, निकल गया, अबो-मेंसन चाचा पाल्‍टी घर अइबे नहीं की! नेबर! द सैटेस्‍ट नेबर हैपनिंग मेरिजेस इन अबर अमेंजिंग आल्डिनरी लाइफ! फुल ऑफ सैटिस्टिक (सैडिस्टिक) सैटनेस (सैडनैस), बट ट्रू अल्‍सो!

जसोदा फुआ और जयपरकास के मम्‍मी के त भूले जाइये, कलम्‍मा काकी तक एक हाथ गइया के नाद में खली फेंटती और दुसरके से मुंह पर आंचल धरै आंसू बहलाती. अंधारै, मन का अंधारा सगरे दुनिया से छुपलातीं.

बहुत बार होता जसोदा फुआ घंटों चुप रहने के बाद मुंह खोलती तो सिर्फ ये कहने के लिए कि, ‘सायेत ई घर में सहता नहीं कि दुल्‍हा घरै आय के बियाह करे. सायेत प्रभू जी ई घर बास्‍ते यहीये बिधान मंजूरी किये!’

एक बार महीनों लापता रहने के बाद खबर आई कि मनोहर चाचा जिंदा हैं सौस्‍थ हैं. जोधपुर कि जयसलमेर का जेहल में हैं वहींये से चिट्ठी पठाये हैं. रेल में कवनो के संग झगड़ा हो गया था, कवनो के कंधा में छुरी चल गया था, दू लोक का बक्‍सा गिरे से कपार फूटा, चाचा टोटल निरदोस थे लेकिन झगड़ा-झांटी का झपेटा में धरा गये और अब इकतालीस दिन का सजा काट के बाहिर आयेंगे! सुरंजन चच्‍चा जबकि बाकई झगरा-फसादी में अरेस्टिन हुए. उनका किस्‍मत सीतापुर जेल में मजा करना लिखा रहा!

(झूठी) कहानी ही नहीं, दुनिया में मेरे आने की (सच्‍ची) कहानी भी ऐसे दरदनाक रेल और जेहल के प्रसंगों से अंटी पड़ी है. घर के किसी सदस्‍य के रेल चढ़ने के अंदेशे से ही सोमारु बो के मिरगी पकड़ने की हवा बनने लगती. औरतें खूब जानती, और सही ही जानती होतीं कि अबस्‍मभाबी अनिस्‍ट घटे वाला है. और घटकर रहता ही. साढ़े चार फुट के बाबा त रेल लाईन के नौकरी में थे, मगर घटना का बखत रेल में सवारो नै थे, चौबेपुरवा का ईनार पर नहा रहे थे कि किसका त घड़ी चोरी हो गया, या अचक्‍के लोटा ईनारे गिर गया था, वहींये मारामारी हो गई और सात साल ले मोकद्दमा चला! पिंटू चाचा भी कौन रेल में थे, ईस्‍टेसन का बहरी गुमटी पे पान का ऑल्‍डर बोलके हिंदुस्‍तान दैनिक का पल्‍ला पलट रहे थे, कि एकदम्‍मे हुआं साइकिल चेन और हाकी स्टिक गुलचार का ‘मेरे अपने’ वाला एश्‍शन सीनरी होये लगा. सात महीना पिंटू चाचा रहे जेल का भीतरी!

टुपुरवा बहुत गोड़ पटकती कि ऊहो रेल चढ़ेगी. जेहल जायेगी. जइसे पिंटू चाचा गए, सुरंजन, देबानंद और मनोहर चाचा गए. मनोजवा के भी बोखार चढ़े लगता कि हम्‍मो जायेंगे. रेल जेल जहां जगह है अब्‍भी जायेंगे, इसी बक्‍त! शायद इकलौता एक मैं ही समझदार था फ्रॉक के तीन फूल छुपाये बुनकी का हाथ थामे ताप्‍ती दीदी के पीछे जाकर छिप जाता, या रसोई के दरवाजे के बाहर परात में आटा मींस रही मां के साड़ी खींच फुसफुसाकर कहता, ‘मां, हम रेल जेल नै जायेंगे, कब्‍बो! हरमेसा तोहरे संगै रहेंगे, ठीक?’

गीले आटे में मां की उंगलियां अटकी रह जाती, चेहरे का रंग उतर जाता. फीकी हंसी हंसती तो लगता अकेले का अपना चुपचाप रोना छुपा रही है. अभी किसी भी क्षण रो देगी का चेहरे पर भाव लिए मेरे एक कदम पीछे बुनकी खड़ी होती, मैं मां के ठोढ़ी को अपनी तर्जनी से छुआते कहता, ‘जइसन बाबूजी किये, ठीक? वइसन हम कब्‍बो करुंगा? तोरा को छोर के दूर जाऊंगा, नै जाऊंगा? नेबर!’

मां ठेहुने की साड़ी पर आंख गिराये अपनी आंखों का भर आना छुपा लेती, गर्व और अभिमान से भरा मेरा दिल कैसा तो अपनी ही भार में कभी टुकड़े टूटता, कभी ऊंचे आसमान उड़ता महसूस करता. मगर जाने क्‍या होता के तबहींये बुनकी बोकार फाड़े रोना शुरु कर देती.

(बाकी)

Thursday, March 10, 2011

आयेगा आनेवाला..

बुनकी के फ्रॉक पर हमेशा बड़े-बड़े फूल होते. और हमेशा ऐसा होता कि कम से कम तीन फूल वह मुट्ठी में दाबे होती और लाख होशियारी दिखाओ मुट्ठी खोलती नहीं. उस हिस्‍से के फ्रॉक पर किसी का हाथ पहुंचते ही चट उसकी बड़ी-बड़ी आंखें फैल जाती और मुंह बाकर कर्कशराग रोना चालू हो जाता. मनोज जैसे बेहया भी बुनकी के फ्रॉक पर हाथ धरने से बचते थे. मुझे दिखती तो मैं उधर ध्‍यान भी न देता, गोद में बाबूजी का फौजी जूता लिए खेलता बझा रहता (बहुत बार जूते पर सोमारु बो के बेलाउज टांग देता कि मेरे हाथ जूता देखकर कोई मुझसे छीन न ले. गणेश और शंकर बहुत बार छीन लेते थे ही. फिर मैं खिड़की पर खड़ा होकर देर तक रोता रहता. इस दौरान कोई फुरगुद्दी चिरैया खिड़की पर आती तो रोते-रोते हाथ मारकर उसे उड़ा भी देता. इसी बीच कभी भूख लग जाती, या तेभागा पीशीमां स्‍टील के प्‍लेट में चार केले लिये आती और केलों के लिए झगड़ने में तब रोना स्‍थगित करना होता). ताप्‍ती दीदी ही होती जो जब-तब बुनकी के सामने कमर पर हाथ बांधे अड़ी सवाल करती, ‘फ्रॉके की लुकियेछिस रे?’

बुनकी फ्रॉक के तीन फूलों पर हाथ कसे आंखें बड़ी करके जवाब देती, ‘चिउरा अउर गूर. अमके बूक लगेगी तो काउंगी!’ फ्रॉक पर हाथ दाबे वही बुनकी टुपुर से कोस्‍चन कर रही थी, ‘बियाह में किया होता ऐ तुपुल?’

मेरी बाबूजी के जूते में नाक फंसी थी, टुपुर इस कमरे से उस कमरे दौड़ लगा रही थी शायद इसीलिए बंगाली अखबार के पुराने पन्‍ने फाड़ने में बझा मनोज को लगा हो कि टुपुर की जगह वही जवाब दे दे. उसी ने कहा, ‘एगो लरका और एगो लरकी नेया सारी और नवका धोती का फेंटा बांधके चकरी घूम लें माने उनका बियाह हो गया बूझी?’

हर चौथे घंटे घर के किसी कोने या दलानी में या आंगन की दीवार से सटे बच्‍चों का ‘बियाह’ का खेल शुरु हो जाता. हाथ में लाल गमछा फैलाये भागकर तुनू हमेशा आगे खड़ी हो जाती कि किसी के भी साथ फेंटा बांधकर उसका ‘बियाह’ हो जाये, मगर अभी तक हो सकी नहीं थी. असल वाला ब्याह संजू चाचा के हो रहा था और वही मसला था जो अचानक जसोदा फुआ हाथ के चाय का कप एक ओर धरकर एकदम रोने लगी. थोड़ी देर में उनकी देखादेखी मंजरी मौसी और जयपरकास की मम्‍मीओ रोये लगीं. एकदम्‍मे रोये-धोये वाला माहौल खड़ा हो गया. बात थी भी रोये वाली. जयपरकास की मम्‍मी रोते-रोते अपना चाय खतम कीं और बोलीं दुनिया में कहिंयो नहीं होये वाला किस्‍सा ई घरै देख रही हैं और अबले उनके बिस्‍सास नहीं हो रहा! जसोदा फुआ आंख का लोर पर साड़ी छुआते बोली, ‘तेईस तारीक (बियाह का तीथी) आके निकल जायेगा तब करियेगा बिषवास!’

बरीच्‍छा दुल्‍हे की गैरहाजिरी में संपन्‍न करना पड़ा था, दुल्‍हा साहब उपस्थित हो नहीं सके थे मगर अब तिलक के मात्र पांच दिन बाकी रह गए थे और संजू चाचा के घर पहुंचे की कहिंयो कोई खबर नहीं थी तो स्‍वाभाविक था घर की औरतें घबरा रही थीं. जसोदा फुआ पक्‍के भरोसे से दुखी हो रही थी, ‘तेईैस तारीक आके निकल जायेगा लेकिन तू लोक देखना संजुआ हाथै नै आवेगा! ई घर का पुरनका इतिहास है. सादी के तीथी तै हो जाता है और दुल्‍हा बाबू लापतै रहते हैं! तू लोक बताओ केतना टैम से संजुआ घरै नै आया है? दू बरीस आठ महीना! और अइसा छौंड़ा का पीछे तू लोक पंडिजी का संगै पंचाग देखके तीथी-दिबस पर मोहर गाड़ दी. एतना देमाग छांटे वाला लोक सब है तब्‍ब केहू के बुद्धि काम नहीं किया? आज ले कहींयो सुने हैं जी कि दुल्‍हा नतारत है और आप उसका अपसेंसिये में बरीच्‍छा फरिया लिये? अरे? त‍ जाइये उसका अपसेंसी में बियोहो निपटा लीजिए, कवन जरुरत है दुल्‍हा के!’

चर्चा छिड़ी तो दूसरे किस्‍से बाहर आये. खबर हुई मनोहर चाचा भी तीन बरस से घर नहीं आये. रामतीरथ इनलैंट में लिखते हैं आ रहे हैं पहुंच रहे हैं मगर गाड़ी वाला दिन फिर कवनो काम निकल जाता है. डिप्‍टी छोड़ के नहीं आ सकते. डिप्‍टी परिवार से आगा है. डिप्‍टी भगवानो से आगा है! बाबूजी कब से नहीं आये की चरचा छिड़ते ही मां का चेहरा सफेद पड़ जाता. तब कलम्‍मा काकी हाथ ऊपर किये चिल्‍लाने पर मजबूर होती, ‘एय अब्‍बी चुप करो आप लोक, जिसको आने का ओगा, आयेगा, नेई आनेवाला नेई आयेगा, द वर्ल्‍ड इस नाट एंडिंग बिकॉस आफ दैट!’

(बाकी)

गलकट्टा की हिंसा, तीत्‍ता के मीट्ठा..

कलम्‍मा काकी आंचल के अंधेरे में घेरकर मुझे धमकाते हुए फुत्‍कारती, ‘पूरा दुनिया में काली (खाली) मेरा दीदी मेरा पास, यू आर नाट ट्रबलिंग दैट वूमन, यू अंडरस्‍टैंड?’

मैं बिना कुछ समझे घबराया हकलाकर कहता, ‘यस, आई अंटरस्‍टैंड,’ और चारा क्‍या था? कौन जाने करीयक्‍की आंख में उंगली डालकर मुझे अंधा कर देती? या दांतों पर ज़हर का मंजन रगड़कर? मेरे जवाब से खुश होकर इसीलिए काकी जब दांतों से काटकर छोटे मुरकू के टुकड़े मेरे मुंह में रखती, मैं औंजाया हाथ पटकता, ‘बहुत तीत्‍ता है काकी!’

मेरे जवाब की नाटकीयता का ककीया पर कवनो असर न पड़ता. मुंहजार मेरे गाल का काटा लेकर प्रसन्‍नमन कहती, ‘ओ शट्अप, आई नो देयर इस नतिंग तीत्‍ता फॉर यू इन द ओल बिग वर्ल्‍ड!’

अकेले कलम्‍मा काकी का ही खेल नहीं था, जसोदा फुआ, सोमारु बो, तइय्यन, तेभागा पीसीमां सब गलकट्टा कर-करके मन औंजाये रहतीं. बच्‍चों का जीना दुश्‍वार था. ‘तीत्‍ता‘ और ‘मीट्ठा’ के अन्‍वेषण लिए घर और पड़ोस का छोटा सा इतना बड़ा संसार था और रोमांचक, उत्‍तेजक एडवेंचर के इतने सारे कंटिन्‍युअस, कभी न खत्‍म होने वाले उद्दीपन थे, मगर रास्‍ते में कब कहां, कौन औरत निकल आयेगी और खींचकर गाल काट लेगी का ख़तरा भी उसी नियमबद्धता से सिर मंडराया रहता.

तुनू हाथ में ‘पियारो’ का छोटा टुकड़ा भींची रुआंसी गाल बढ़ाये भर्राये स्‍वर बोलती, ‘रुनू मासी काट लिये!’ थोड़ी देर में दीपू बुलके चुआता, भां-भां रोता शिकायत करता दीखता, ‘पइय्या (भैया), गोरख के मम्‍मी के मारो, हमरे के काटी है!’ टुपुरवा दौड़ी जाकर दीपू के हाथ थाम लेती, दिलासा देती, ‘चुप हो जाओ, दीपू, गोरख का मम्‍मी को मैं मारेगी, आराईट (ऑल राईट) ?’ तब तक टुपुरवा के हाथ का अंजीरी खींचकर मनोज कुछ जमीन पर छींटता, बचा मुंह में फांकता हें-हें दांत दिखाता खिड़की लटककर नचनिया नाच नाच खेलने लगता, टुपुर बेचारी दीपू को चुप कराने का खेला भूल बोकार फाड़ी अपना रोना शुरु कर देती और तीने मिनट में इतना हल्‍ला होने लगता कि मैं कहे बिना रह नहीं पाता, ‘अबे मनोज, तोरा हरकत से कवनो दिन ई घर में हार्ट अनटेक (अटैक) हो जायेगा, तू बूझ लेव हां?’

थोड़ी देर में ताप्‍ती दीदी हाथ पटकती आती, ‘की दुष्‍टामी होच्‍छे, बलो तो?’

दीपुआ कुच्‍छौ नै बोलता, हें-हें दांत निपोरे रहता.

दुनिया में आने की मेरी (सच्‍ची) कहानी में पता नहीं घर और पास-पड़ोस के बच्‍चों के कैसे उदात्‍त व गरिमापूर्ण चित्र हैं, (झूठी) कहानी में ऐसे ही पकाऊ, थकाऊ, दिल-दहलाऊ बिम्‍ब–समग्र हैं. वैसे ही सीधी-सादी दिखती मगर चट्ट गाल काटनेवाली औरतों की हिंसाओं से पटे, ठंसे मार्मिक प्रसंग. बहुत बार होता सुबह बिछौने में आंख खोलते ही मैं अपने छोटे-छोटे हाथ से दोनों गाल कवर कर लेता और तब जाकर अलाउंस करता, ‘अम उट्ठ गये ऐं!’

मगर बहुत ताज्‍जुब होता मां कब्‍बो गाल नहीं काटती. कहीं कोने बैठी दिखती मैं एकदम दौड़कर जाता, मां के पेट से माथा लड़ाते हुए उसकी साड़ी से माथा ढांपकर गोदी में छिप जाता, तब मां को पूरा मौका रहता कि ज़रा सा झुककर आराम से गाल काट ले, मगर मां तब भी एकदम हतोत्‍साहित कर जाती, गाल नहीं ही काटती. दो मिनट का एक उम्र जितना लंबा समय गुज़र जाने पर फिर मैं भारी उदासी में कहता, ‘तू कब्‍बो गाल काहे ला कटबे नै करती है गे मइय्या?’

हमरे माथा से माथा छुआकर मां तब जोर-जोर से सिर हिलाकर मुस्‍कराती, फुसफुसाकर जवाब देती, ‘अप्‍पन बाबू के हम कब्‍बो तफलीफ (तकलीफ़) देंगे? नै, नेबर!’

मैं आंख मलता सिर खुजाता सोचता, बहुत सारा सोचकर फिर कहता, ‘तफलीफ नै होगा, मां. अऊर होइबो करेगा तो तोरा के हम बोलूंगा नै, ठीक?' फिर गाल आगे बढ़ाकर जिम्‍मेदारभाव बोलता, 'इक, दू, तील, ले, अब काट!’

(बाकी)

Wednesday, March 9, 2011

मेरे पास आओ एटसेट्रा..

जल्‍द ही मेरी कविताओं की किताब छपकर आ रही है. मलयालम में. कविताएं क्‍या हैं जीवन के अंतरंग आत्‍मीय ऊहापोहों का सरस आलोड़न हैं, दार्शनिक आख्‍यान हैं. पाठक मन लगाकर उन्‍हें पढ़े तो हंसते-हंसते जीवन की नैया खे कर उस पार पहुंच जाये. दिक्‍कत यही है कि पाठक मेरी कविताएं पढ़ने के बजाय मन लगाकर वर्ल्‍ड कप देखने चला जाता है. और फिर मैं भी भले ही कितना पहुंचा हुआ कवि होऊं, सामाजिक भी हूं ही, पाठक के ऐसे अपठनीय, अनाचारी भाव से क्षुब्‍ध बेमन कविताओं को लात लगाकर कृष्‍णा के पास चला जाता हूं. कृष्‍णा चंडीगढ़ के सेक्‍टर 21 में निवास करती है किन्‍तु मन उसका कविताओं में ही बसता है. विशेषकर मेरी कविताओं में जो आमतौर पर प्रेम पर होती हैं. और मज़ेदार बात है कि उसके भीतर काफी मात्रा में प्रेम संरक्षित रहने में सफल हो भी जाता है. चंडीगढ़, कोहिमा, कोची, कालपट्टम, केंओझर के तो मेरे ऐसे ही उदात्‍त प्रेमिल अनुभव रहे हैं, अन्‍य शहरों का भी मुझे विश्‍वास है इससे अलग कतई न होगा. होने की वजह नहीं है. मैं वही हूं मेरा प्रेम वही है. पाठक भी लगभग वही वही हैं. जो मेरी कविताएं पढ़ने की जगह फिर वर्ल्‍ड कपोन्‍मुख हो रहे हैं. एनीवे, पाठकों की मैं इतना सोचता रहा तो हुआ मेरे जीवन में प्रेम और हो चुकीं कविताएं. मलयालम में तो होने से रही हीं. जिसे डीसी बुक्‍स छाप रहा है. मतलब अभी तक तो छाप रहा ही है हो सकता है डीएमके की तरह कल दूसरी ज़बान बोलने लगे. कृष्‍णा भी तो कल कैसे चहक-चहककर आह्लादित हो रही थी, जैसे ही पता चला कविताएं मैं पंजाबी में नहीं, मलयालम में छपवा रहा हूं नाम लेकर मेरी मां और बहन के गालियां पुकारने लगी. अब इस महिला दिवसीय माहौल में कुत्सित कलुषित पाठिकाओं का कोई क्‍या करे. मैंने कुछ किया भी नहीं. पंजाबी में तो नहीं, अपने एक गीत का हिन्‍दी तर्जु़मा पीछे छोड़ आया, कि कृष्‍णा चाहेगी तो मेरी ग़ैरहाज़ि‍री में भी मेरे गीत से जीवन का, हमारी अंतरंग मार्मिकताओं के सबक लेगी. ले ही सकती है, जो लेना चाहे. मगर दिक्‍कत वही है, पाठकों की तरह ही अपने यहां पाठिकाएं भी रुठने और खुद के मनवाने के खेलों में ज़्यादा दिलचस्‍पी रखती हैं, काव्‍य की अंतरात्‍मा तक पहुंचने में तो कतई नहीं. आप पहुंचिए अंतरात्‍मा तक. मलमालम से हिन्‍दी का अनुवाद पेश है. प्‍लीज़ मन लगाकर पढ़ि‍येगा, देख सकेंगे कैसे तत्‍काल फ़ायदा देता है.

मिलने दो अब दिल से दिल को, मिटने दो मज़बुरियों को
शीशे में अपने डूबो दो, सब फ़ासलों दुरियों को
आंखों में मैं मुस्‍कराऊं तुम्‍हारे जो तुम मुस्‍कराओ

हम तुम ना हम तुम रहे अब, कुछ और ही हो गए अब
सपनों के झिलमिल नगर में, जाने कहां खो गए अब
हम राह पूछें किसी से ना तुम अपनी मंज़ि‍ल बताओ

कल हम से पूछे न कोई, क्‍या हो गया था तुम्‍हें कल
मुड़कर नहीं देखते हम, दिल ने कहा है चला चल
जो दूर पीछे कहीं रह गए, अब उन्‍हें मत बुलाओ

दिल की गिरह खोल दो, चुप ना बैठो, कोई गीत गाओ
महफ़ि‍ल में अब कौन है अजनबी, तुम मेरे पास आओ..

मलयालम की जगह हिन्‍दी में पढ़ रहा हूं, और मेरी ही लिखी चीज़ है फिर भी सोचकर सन्‍न हो रहा हूं कि कैसे और कितनी महीन बात कह दी, और ऐसे सरसता से.. मगर फिर, शायद पहुंचे हुए कविओं के साथ ऐसा होता रहता है कि एक कैज़ुअलनैस में कह दें और फिर देर तक सन्‍न होते रहें कि अरे, कैसे कह दिया!

आप सन्‍न न हों, कायदे से अपना दिन शुरु करें. और कृष्‍णा से भूले कहीं टकराना हुआ पड़े तो बेवकूफ़ से कहें क्‍यों फालतू में मुझे दिक कर रही है, कविता में ठीक से उतर नहीं सकती थी?

Tuesday, March 8, 2011

राग बेरोज़गारी, झूठी..

मंच और माइक पाते ही हिंदी का लेखक जिस बेधड़क उत्‍साह और बकवासी प्रवाह में बकलोली बोलने लगता है, गोभी के पत्‍तों की सुखद हरियाली से घिरा, दो महिलाओं से रक्षित, बकलोली छांटने की मेरे भीतर भी कुछ वैसी ही सुखद घुमड़न उमड़ रही थी. यही वज़ह होगी कि ऐसी नवजातस्‍था के बावज़ूद मैं मंद-मंद मुस्‍करा रहा था.

तब से ताड़ रही कलम्‍मा काकी अब घबराने लगी, मां से बोली, ‘दीदी, मेरा को दिस ओल अफेयर बेरी सस्‍पेक्‍ट लगता, डोंड यू सी? आई नेबर अर्ड एबर बीफोर ए बेबी बीइंग बोर्न इन ए गोबी फील्‍ड! एंड हि इस स्‍माइलिंग नान स्‍टाप, व्‍हाट इस देयर टू स्‍माइल अबाउट? बेरी सस्‍पेक्‍ट, दीदी, आई टेल यू, द ओल तिंग इस ड्रिपिंग ऑफ सो मेनी रिलीजस तॉट्स एंड कनोटेशंस, आई मस्‍ट से!’

मुझसे और सुना नहीं गया, इनस्‍पाइट ऑफ कलम्‍मा काकी. चिंचियाई आवाज़ में हम अलाउंस किये, ‘गे मइय्या, हटाव ई मलयालीन के हियां से! हम्‍मर दुनिया में आये नौ मिनिट नै हुआ और एकर मुंह खोले के तीन, अऊर ई धड़धड़ाई दिन-दहाड़े धा‍रमिक अस्‍लीलता ठेलल सुरु कै दिहिस और तोरा लउके नै रहा है रे?’

दो से दूर कोई एक तीसरी जनाना थी, भरे भर्राये गले अनैतिकता का राग छेड़े थी, गा रही थी, ‘ऐ मेरे सनम, ऐ मेरे सनम, दो दिल है एक जान हैं हम, ऐ मेरे सनम!’ नाक खोदता भूख से औंजाये मैंने निस्‍संगभाव कहा, ‘गे मइय्या, ई कवन है जेकरा अइसन दरद चढ़ा है?’

कलम्‍मा काकी फिर भौं‍चकियाने की एक्टिंग करे लगीं, बोलीं, ‘अइय्यो, हि डसंट रेक्‍गनाइस इवन लाटा मंगेसकर! मस्‍ट बी सम डेबिल इन द सेप आफ यूअर नाइंत आफस्प्रिंग, दीदी, आई टेल यू!’

‘अरे हट करीयक्‍की, बड़ आई बड़ टेलिन करेवाली!’ काकी के भारी बदसूरत देह पर मैंने अपनी मुलायम लात पटकी और दुनिया में आने के साथ ही दुनिया की औरतों का हिसाब दुरुस्‍त करने के महत्‍वपूर्ण, अपने लाइफ-लॉंग एन्‍डावर में तत्‍परता से जुट गया. (यहां यह याद करना अप्रासंगिक न होगा कि दुनिया में आने की मेरी सच्‍ची कहानी महिलाओं के प्रति अमानवीय, अवसादपूर्ण आचरण के किस्‍सों से किसी भी तरह भरी, अंटी पड़ी नहीं, यह दोष- इफ वन इज़ फोर्स्‍ड टू कॉल इट सो- सिर्फ़ झूठे संस्‍करण के हिस्‍से आया है. क्‍यों और कैसे आया है इज़ स्टिल अ पज़लिंग डिबेटेबल इश्‍यू.)

परिवेशगत यथार्थ और यथार्थवादी साहित्‍य के संग मेरे संबंध भले ही रूखे, उखड़े व सूखे-सूखे रहे हों, मां शीघ्र ही एक मार्मिकता के मोहपाश में मुझसे बंध गई थी. और अन्‍य चारा नहीं था औरत के पास. संसाधन. नहीं थे. नौ बच्‍चों की संभाल की तंगहाल दुनिया में एक चीज़ जो धड़ल्‍ले से हर समय उपलब्‍ध थी वह आत्‍मीय उलाहना व मार्मिकता ही थी. पिता फौज की नौकरी में थे और उत्‍तर-पूर्व के दुर्दांत नगा पहाड़ि‍यों में बदनाम राष्‍ट्रवादी फिज़ो के खात्‍मे का वचन लेकर घर से निकले थे और लम्‍बे समय तक घर से निकले ही रहे थे. मां भी घर से निकली ही रहती. घर था भी ऐसा कि उससे निकल जाने में ही कुशलता थी. जो न निकल पाने की हालत में होते वे खिड़की का लोहा पकड़कर झूलते और झूलते ऊबने लगते तो राग-गरीबी के असर में रोने लगते. काल्‍पनिक रोटी में लपेटकर खाने के लिए मार्मिकता का गुड़ पर्याप्‍त मात्रा में मुहैय्या होता.

मैं कज़ाकी गृहकलह किंबा मार्मिक अतींद्रीय फ्रेंच रोमान की अमूर्त कल्‍पनाएं संजोये दुनिया में आया था और यहां निस्‍संग अवसन्‍नता के विरल छविबंधों को देखकर लगातार अनसेटल्‍ड बना हुआ था. दुनिया में होने की अभी, इस क्षण वाली भौतिकता थी लेकिन उन्‍हीं क्षणों में हाहाकारी इंद्रियों को सुन्‍न कर देनेवाला एक परायापन भी वास करता होता. पुचकारता, प्रेम जताता, हर वक़्त कहता मैं हूं, मैं हूं.

ओह, सुन्‍न पड़ जाने को भूलने के लिए कितने तो खेल थे. गाने को गारिया थीं. और भागकर छिप जाने को बेरोज़गारियां. थीं नहीं, हैं. हर समय आंखों के आगे नाचतीं. बेरोज़गारी के बारे में देखिए अपने पर्यावरण कार्यकर्ता क्‍लॉद अलवारेस के पास क्‍या दिमाग-उड़ाऊ आंकड़े हैं. पेश है, मूल अंग्रेजी का ही: “According to NCAER figures, the formal economy in India employs only 28 million people today. Back in 1950, it was 25 million. That’s just a three million increase in jobs in the formal sector over 60 years. At an average, each of those jobs has been generated at an investment cost of 1 crore rupees. This means more than eighty percent of India is employed in the non-formal sector and is looking after themselves, outside the supposedly golden halo of the growth story.”

(फोटो: तहलका से साभार)

(बाकी)

Monday, March 7, 2011

दुनिया में आने की मेरी (झूठी) कहानी

अच्‍छी छपाई और अच्‍छी बाइंडिंग वाली (सच्‍ची) कहानी की कापी बाबा के पास थी, जिसका बाबा की ही तरह अब कहीं कोई पता नहीं. यह घटिया चिकने कागज़ वाला संस्‍करण है जिसके इस्‍तेमाल से आमतौर पर धार्मिक व अश्‍लील किस्‍म के अनुष्‍ठान पटाये जाते हैं. दुनिया में आने की मेरी इस (झूठी) कहानी को पढ़ते हुए इसलिए किसी भी पाठक के मन में अगर किसी भी तरह से धार्मिक, या अश्‍लील विचार उत्‍पन्‍न हों तो मैं यहां शुरुआत में ही स्‍पष्‍ट कर देना चाहता हूं कि यह विशुद्ध मिसप्‍लेस्‍ड असोसियेशन का एक निहायत मामूली मामला होगा, और उससे ज़्यादह की इसे मामलियत अता करनेवाले तथाकथित पाठबाज़ों की बेजा कारस्‍तानियों (मतलब मेरे अर्थ का अनर्थ करते रहनेवाली डिग्रेडिंग व डिस्‍गस्टिंग हरकतों) का वैधानिक या अन्‍य सूरतों में मैं जिम्‍मेदार नहीं. इन फैक्‍ट मैं कुछ भी नहीं.

मगर सोचकर अब भी दिल बैठा जाता है कि मेरे हाथ (और आपके किस्‍मत) चढ़ी ही तो यह (झूठी) कहानी चढ़ी (असल कहानी हमेशा मंत्रालय का वह कौन तो सचिव होता है अपने चूतड़ के नीचे दबाये रहता है, और कॉरपोरेट सांठ-गांठ के विशेष क्षणों में मीडियाबाला का हाथ अपने एक हाथ में दबाते हुए दूसरी से बाहर करता है. यहां सचिव वाला वही रोल बाबा खेल रहे थे. फर्क़ सिर्फ़ यही था कि सचिव का मंत्रालय होता है, मंत्रालय का एक वेबसाइट होता है जहां जाकर आप सचिव की तो नहीं मगर मंत्रालय की खबर ले सकते हैं, जबकि बाबा की मैं कहीं नहीं ले सकता था! द रियल फ़ाईल ऑफ़ द रियल मी लेकर एक देहाती, ज़ाहिल, नटकेस बुड्ढा गायब था और मैं कुछ नहीं कर सकता था. वैसे ही जैसे असल फ़ाईल सचिव की चूतड़ के नीचे दबी रहती है, और होंठों के पीछे अपनी राजकीय हैसियत को मीठी हवा खिलाती महीन मुस्‍की, और पब्लिक इंटरेस्‍ट का लिटिगेटर अपने नथुनों से लाख गर्म हवा छोड़ता फिरता है और किसी का कुछ नहीं बिगड़ता. मोस्‍टली मंत्रालय में बैठे मंत्री और सचिव का नहीं बिगड़ता. इस देश की तकदीर अंगद के पांव की तरह अपनी जगह जमी रहती है. और मैं शर्मिन्‍दगी में नहाया, सर झुकाया, दुनिया में आने की अपनी- झूठी- कहानी कहने को बाध्‍य होता हूं. और आप सुनते रहने को).

व्‍हॉट अ सैड स्‍टोरी. झूठी हो, बट स्टिल. ईश्‍वर हम सबकी आत्‍मा को शांति दे. झूठी कहानियों के सस्‍ते प्रकाशकों को भी (हालांकि जैसाकि पर्यावरण राज्‍यमंत्री जैराम रमेश ने पर्यावरण के भ्रष्‍टाचारियों के खिलाफ़ अपनी हारी हुई लड़ाई की झेंप मिटाने की खिसियाई मुस्‍कान में हाल ही में कहीं कहा, ‘वी मस्‍ट बी द ओन्‍ली कंट्री इन द वर्ल्‍ड व्‍हेयर ए मिनिस्‍टर हिट्स द हेडलाइंस रेगुलरली जस्‍ट फॉर अपहोल्डिंग द लॉ.’ और पैर हिलाने लगें. कि ईमानदारी से काम करनेवाला एक मंत्री इतनी दूर तक का ही सफ़र कर सकता है और उससे ज्यादा की उम्‍मीद उसके पागल होने की कामना करने लगना है. हिंदी में अच्‍छी छपाई की उम्‍मीद करने लगना कुछ वैसे ही पगलाने लगना है, व्‍हाई?)

व्‍हॉट अ फकिंग सैड स्‍टोरी! एंड यू वुड स्टिल फाइंड हंड्रेड्स ऑफ़ मैग्‍लौमैनियाक रिटार्ड्स रेजोयसिंग द अशरिंग ऑफ़ अ न्‍यू एरा ऑफ़ पिटियेबल प्रिंट एंड अ पैथेटिक न्‍यू रीडरशिप!

व्‍हॉटेवर. गोभी के पत्‍तों की ताज़ा, नर्म, और कुछ-कुछ गुदगुदी जगानेवाली छांह के बीचोंबीच मैं दुनिया में चला आया था. बे-चश्‍मा और देह पर बिना एक वस्‍त्र के. और बजाय रोने के, हवा में हाथ पटकता हंस रहा था! व्‍हॉट अ फकिंग सैड स्‍टोरी. जबकि किसी क्‍यूबन कॉयर ने या न ही किन्‍हीं माओ की कमासुत, किसानसुत कन्‍याओं ने दुनिया में मेरे चले आने की चकितकथा पर ‘तुम जियो हज़ारों साल’ जैसा सेलिब्रेटरी सॉंग गाना शुरु किया था. कलम्‍मा काकी थी भी तो चार हाथ की दूरी पर थी, आंचल में तीन सलटाने के बाद चौथे गोभी पर हाथ साफ कर रही थी कि मेरी हंसी की आवाज़ से उसका माथा सटका. घबराई अपने पेट को देखा की और फिर चीख़कर वहीं ढेर हो गई. लौटकर कलम्‍मा काकी की आंख खुली जब मैं मां की गोद में था और तब भी हंस ही रहा था. रो मां रही थी.

दुनिया में आने की मेरी (सच्‍ची) कहानी में मां के संदेहास्‍पद आचरण का संभवत: बेहतर खुलासा हो. किसी न किसी दिन वह प्रकाश में आएगा ही. बिना लाये मैं दुनिया से जानेवाला नहीं. यह दीगर बात है कि पर्यावरण की राजनीतिक सच्‍चाई प्रकाश में लाने के पहले ही ज्‍यादा संभावना है जैराम रमेश के हाथ से उनका मंत्रालय छिन जाये. इस देश में ईमानदारी से काम करनेवाला मंत्री मंत्रालयों को सोहाता नहीं. बेटा ईमानदार निकल जाये तो बाप के सर पर बोझ हो जाता है. शादी के बाद पत्‍नी की छाती पर मूंग दलता है. और पत्‍नी बेचारी सीतला मैया से लेकर सत्‍यनारायण की कथा करवाते रहने और अपनी फूटी किस्‍मत पर रोती रहने के लिए मजबूर होती है. ऐसे स्‍वस्‍थ राष्‍ट्रीय सूचकांक की रौशनी में स्‍वाभाविक है ईमानदार होने की मेरी नैसर्गिक चाहनाएं नहीं हैं. भौतिक भी नहीं. दुनिया में आने की अपनी (सच्‍ची) कहानी मैं किसी बेईमान रास्‍ते से ही प्रकाश में लाऊंगा. वैसे पिटे पाठक, कृपया उचित अवसर देखकर मुझे आगाह करें ‘होनहार के होत चिकने हाथ’ मुहावरे को चरितार्थ करते होनहार नौजवान ब्रैडली मैनिंग के विकिकृत्‍यों को मैं राष्ट्रधर्म के चश्‍मे से देखूं या बेईमान कर्म के.

दुनिया में आते ही मैंने पहली जो चीज़ करी मां को डांटकर चुप कराया. उसके आगे कहा, ‘यू नो व्‍हाट, वूमन? आई अम डिस्‍गस्‍टेड बाई यूअर बिहेवियर. यू आर हार्डली सेइंग एनीथिंग, आइदर इन सपोर्ट ऑफ़ माई व्‍यूज़, ऑर इन अपोजिशन. एंड नाउ डोंट टेल मी यू विल बी टॉकिंग टू मी इन दैट गॉड फॉरसेकेन लैंग्‍वेज?’

घबराई औरत ने मुंह खोला तो वह सचमुच ऐसी ज़बान में बात कर रही थी जिसे दुनिया में सिर्फ़ हिन्‍दी अधिकारी और अध्‍यापक समझते हैं, हिंदी कवि जिसमें कविताएं लिखता है, पत्‍नी की मेहनत किसी और ज़बान में उससे चोरी करता है.

व्‍हॉट अ फकिंग सैड स्‍टोरी.

(बाकी)

Tuesday, March 1, 2011

सुर कहां है, साहित्‍य ही..



बिसनापुर के हाट बाजार पुलिया पे साइकिल गिराये
दिखा कहीं कोई पढ़ता पुश्किन पढ़वैया प्यारेलाल?
सांवली पसलियों में घुली घनी, देर तक बजी
टंकार, साहित्य की मर्मभेदी अंतरंग आत्मीय सीत्‍कार
पुरैना डिपो से लगभग तीन घंटे देर से छूटी
बस की छत के जगर-मगर में धूल-धुसरित, मिले धूमिल?

सेवाईलाल महतो के सिफ़ारिश करो तो तंबाखू, बीड़ी मुट्ठा
के बाजू कभी मिल जायेगा जुग निर्माण योजना का बसिया अंक
साईकिल दुकान के पिछाड़े, रेलवे के भहराये क्वार्टर की मुर्चा खाई
पेटी से झाड़कर जगदीश भाई बहरियायेंगे लेनिन की गुटखा जीवनी
उससे बाहर धूलभरी सड़क मिलती है, मेहनापुर का मशहूर बताशा
बंद अप्सरा सिनेमा की बगलवाली गली के मेघना मारकिट शंकर ताशा
बैण्डपार्टी के ऊपरवाले तंग कमरे में बीडियो पारलर की हताशा मिलती है
इस दुनिया में गुमनाम नक्सलाईट है, दोस्तो, साहित्य विस्थापित
कहीं नहीं मिलता, एक कविता कहीं बहुत दूर
बम्बई में मिलती है, मगर फिर
यहां वह दूसरे तरीके से विस्थापित खिली है.

***

धूप में देर तक रहे खड़ी, रहे
बंद छोड़े प्राइमरी स्कूल के किसी छूटे दरवाज़े चढ़ी
सर पर अंगौछा धरे बेउम्र बुढ़ाये साइकिल खड़खड़ाये
गड़बड़ाये, बेतरह घबड़ाये घर लौटते मास्टर के मेहराये
आंखों में किसी चौंध की तरह गड़ी
कब चमकती है कविता, अलमुनिया की थारी
में संबंधों की सौंध चखता, अपने होने में मतलब
पाता, जीने का जीवन जीता दिखता है साहित्य?

ललगेहना से तीतराबेर से बड़काडीह से बिसुनपुर
झीरपानी मैं साहित्य के रास्ते लौटना चाहता हूं
कुछेक घंटों का यह कुछ ज़रा सा सफ़र, ओह, कितना
फैला जाता है (जितना कटा जाता है जंगल)

सूने पत्थरों को लांघता, कांख में झोला दबाये
कोई बच्चा है, ज़रा आगे दो लड़कियां, कविता
के बंध में, बिना कविताई लाग-फेंट, स्कूल जा रहे हैं
चुपचाप. मैं कहीं बहुत दूर पीछे छूटा हूं, अबहीं तलक
भाषा की गुमटी पर मोल-भाव में फंसा, साहित्य प्रादेशिक
राजधानियों में सटा, पान-पराग के गुटखे गिन रहा है
आह भरकर शिकायत करता है ये तीन ईनाम हट जायें
फिर वह किधर पैर धरेगा, कहीं का रहेगा.