Tuesday, March 1, 2011

सुर कहां है, साहित्‍य ही..



बिसनापुर के हाट बाजार पुलिया पे साइकिल गिराये
दिखा कहीं कोई पढ़ता पुश्किन पढ़वैया प्यारेलाल?
सांवली पसलियों में घुली घनी, देर तक बजी
टंकार, साहित्य की मर्मभेदी अंतरंग आत्मीय सीत्‍कार
पुरैना डिपो से लगभग तीन घंटे देर से छूटी
बस की छत के जगर-मगर में धूल-धुसरित, मिले धूमिल?

सेवाईलाल महतो के सिफ़ारिश करो तो तंबाखू, बीड़ी मुट्ठा
के बाजू कभी मिल जायेगा जुग निर्माण योजना का बसिया अंक
साईकिल दुकान के पिछाड़े, रेलवे के भहराये क्वार्टर की मुर्चा खाई
पेटी से झाड़कर जगदीश भाई बहरियायेंगे लेनिन की गुटखा जीवनी
उससे बाहर धूलभरी सड़क मिलती है, मेहनापुर का मशहूर बताशा
बंद अप्सरा सिनेमा की बगलवाली गली के मेघना मारकिट शंकर ताशा
बैण्डपार्टी के ऊपरवाले तंग कमरे में बीडियो पारलर की हताशा मिलती है
इस दुनिया में गुमनाम नक्सलाईट है, दोस्तो, साहित्य विस्थापित
कहीं नहीं मिलता, एक कविता कहीं बहुत दूर
बम्बई में मिलती है, मगर फिर
यहां वह दूसरे तरीके से विस्थापित खिली है.

***

धूप में देर तक रहे खड़ी, रहे
बंद छोड़े प्राइमरी स्कूल के किसी छूटे दरवाज़े चढ़ी
सर पर अंगौछा धरे बेउम्र बुढ़ाये साइकिल खड़खड़ाये
गड़बड़ाये, बेतरह घबड़ाये घर लौटते मास्टर के मेहराये
आंखों में किसी चौंध की तरह गड़ी
कब चमकती है कविता, अलमुनिया की थारी
में संबंधों की सौंध चखता, अपने होने में मतलब
पाता, जीने का जीवन जीता दिखता है साहित्य?

ललगेहना से तीतराबेर से बड़काडीह से बिसुनपुर
झीरपानी मैं साहित्य के रास्ते लौटना चाहता हूं
कुछेक घंटों का यह कुछ ज़रा सा सफ़र, ओह, कितना
फैला जाता है (जितना कटा जाता है जंगल)

सूने पत्थरों को लांघता, कांख में झोला दबाये
कोई बच्चा है, ज़रा आगे दो लड़कियां, कविता
के बंध में, बिना कविताई लाग-फेंट, स्कूल जा रहे हैं
चुपचाप. मैं कहीं बहुत दूर पीछे छूटा हूं, अबहीं तलक
भाषा की गुमटी पर मोल-भाव में फंसा, साहित्य प्रादेशिक
राजधानियों में सटा, पान-पराग के गुटखे गिन रहा है
आह भरकर शिकायत करता है ये तीन ईनाम हट जायें
फिर वह किधर पैर धरेगा, कहीं का रहेगा.

1 comment: