Tuesday, March 8, 2011

राग बेरोज़गारी, झूठी..

मंच और माइक पाते ही हिंदी का लेखक जिस बेधड़क उत्‍साह और बकवासी प्रवाह में बकलोली बोलने लगता है, गोभी के पत्‍तों की सुखद हरियाली से घिरा, दो महिलाओं से रक्षित, बकलोली छांटने की मेरे भीतर भी कुछ वैसी ही सुखद घुमड़न उमड़ रही थी. यही वज़ह होगी कि ऐसी नवजातस्‍था के बावज़ूद मैं मंद-मंद मुस्‍करा रहा था.

तब से ताड़ रही कलम्‍मा काकी अब घबराने लगी, मां से बोली, ‘दीदी, मेरा को दिस ओल अफेयर बेरी सस्‍पेक्‍ट लगता, डोंड यू सी? आई नेबर अर्ड एबर बीफोर ए बेबी बीइंग बोर्न इन ए गोबी फील्‍ड! एंड हि इस स्‍माइलिंग नान स्‍टाप, व्‍हाट इस देयर टू स्‍माइल अबाउट? बेरी सस्‍पेक्‍ट, दीदी, आई टेल यू, द ओल तिंग इस ड्रिपिंग ऑफ सो मेनी रिलीजस तॉट्स एंड कनोटेशंस, आई मस्‍ट से!’

मुझसे और सुना नहीं गया, इनस्‍पाइट ऑफ कलम्‍मा काकी. चिंचियाई आवाज़ में हम अलाउंस किये, ‘गे मइय्या, हटाव ई मलयालीन के हियां से! हम्‍मर दुनिया में आये नौ मिनिट नै हुआ और एकर मुंह खोले के तीन, अऊर ई धड़धड़ाई दिन-दहाड़े धा‍रमिक अस्‍लीलता ठेलल सुरु कै दिहिस और तोरा लउके नै रहा है रे?’

दो से दूर कोई एक तीसरी जनाना थी, भरे भर्राये गले अनैतिकता का राग छेड़े थी, गा रही थी, ‘ऐ मेरे सनम, ऐ मेरे सनम, दो दिल है एक जान हैं हम, ऐ मेरे सनम!’ नाक खोदता भूख से औंजाये मैंने निस्‍संगभाव कहा, ‘गे मइय्या, ई कवन है जेकरा अइसन दरद चढ़ा है?’

कलम्‍मा काकी फिर भौं‍चकियाने की एक्टिंग करे लगीं, बोलीं, ‘अइय्यो, हि डसंट रेक्‍गनाइस इवन लाटा मंगेसकर! मस्‍ट बी सम डेबिल इन द सेप आफ यूअर नाइंत आफस्प्रिंग, दीदी, आई टेल यू!’

‘अरे हट करीयक्‍की, बड़ आई बड़ टेलिन करेवाली!’ काकी के भारी बदसूरत देह पर मैंने अपनी मुलायम लात पटकी और दुनिया में आने के साथ ही दुनिया की औरतों का हिसाब दुरुस्‍त करने के महत्‍वपूर्ण, अपने लाइफ-लॉंग एन्‍डावर में तत्‍परता से जुट गया. (यहां यह याद करना अप्रासंगिक न होगा कि दुनिया में आने की मेरी सच्‍ची कहानी महिलाओं के प्रति अमानवीय, अवसादपूर्ण आचरण के किस्‍सों से किसी भी तरह भरी, अंटी पड़ी नहीं, यह दोष- इफ वन इज़ फोर्स्‍ड टू कॉल इट सो- सिर्फ़ झूठे संस्‍करण के हिस्‍से आया है. क्‍यों और कैसे आया है इज़ स्टिल अ पज़लिंग डिबेटेबल इश्‍यू.)

परिवेशगत यथार्थ और यथार्थवादी साहित्‍य के संग मेरे संबंध भले ही रूखे, उखड़े व सूखे-सूखे रहे हों, मां शीघ्र ही एक मार्मिकता के मोहपाश में मुझसे बंध गई थी. और अन्‍य चारा नहीं था औरत के पास. संसाधन. नहीं थे. नौ बच्‍चों की संभाल की तंगहाल दुनिया में एक चीज़ जो धड़ल्‍ले से हर समय उपलब्‍ध थी वह आत्‍मीय उलाहना व मार्मिकता ही थी. पिता फौज की नौकरी में थे और उत्‍तर-पूर्व के दुर्दांत नगा पहाड़ि‍यों में बदनाम राष्‍ट्रवादी फिज़ो के खात्‍मे का वचन लेकर घर से निकले थे और लम्‍बे समय तक घर से निकले ही रहे थे. मां भी घर से निकली ही रहती. घर था भी ऐसा कि उससे निकल जाने में ही कुशलता थी. जो न निकल पाने की हालत में होते वे खिड़की का लोहा पकड़कर झूलते और झूलते ऊबने लगते तो राग-गरीबी के असर में रोने लगते. काल्‍पनिक रोटी में लपेटकर खाने के लिए मार्मिकता का गुड़ पर्याप्‍त मात्रा में मुहैय्या होता.

मैं कज़ाकी गृहकलह किंबा मार्मिक अतींद्रीय फ्रेंच रोमान की अमूर्त कल्‍पनाएं संजोये दुनिया में आया था और यहां निस्‍संग अवसन्‍नता के विरल छविबंधों को देखकर लगातार अनसेटल्‍ड बना हुआ था. दुनिया में होने की अभी, इस क्षण वाली भौतिकता थी लेकिन उन्‍हीं क्षणों में हाहाकारी इंद्रियों को सुन्‍न कर देनेवाला एक परायापन भी वास करता होता. पुचकारता, प्रेम जताता, हर वक़्त कहता मैं हूं, मैं हूं.

ओह, सुन्‍न पड़ जाने को भूलने के लिए कितने तो खेल थे. गाने को गारिया थीं. और भागकर छिप जाने को बेरोज़गारियां. थीं नहीं, हैं. हर समय आंखों के आगे नाचतीं. बेरोज़गारी के बारे में देखिए अपने पर्यावरण कार्यकर्ता क्‍लॉद अलवारेस के पास क्‍या दिमाग-उड़ाऊ आंकड़े हैं. पेश है, मूल अंग्रेजी का ही: “According to NCAER figures, the formal economy in India employs only 28 million people today. Back in 1950, it was 25 million. That’s just a three million increase in jobs in the formal sector over 60 years. At an average, each of those jobs has been generated at an investment cost of 1 crore rupees. This means more than eighty percent of India is employed in the non-formal sector and is looking after themselves, outside the supposedly golden halo of the growth story.”

(फोटो: तहलका से साभार)

(बाकी)

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