Wednesday, March 9, 2011

मेरे पास आओ एटसेट्रा..

जल्‍द ही मेरी कविताओं की किताब छपकर आ रही है. मलयालम में. कविताएं क्‍या हैं जीवन के अंतरंग आत्‍मीय ऊहापोहों का सरस आलोड़न हैं, दार्शनिक आख्‍यान हैं. पाठक मन लगाकर उन्‍हें पढ़े तो हंसते-हंसते जीवन की नैया खे कर उस पार पहुंच जाये. दिक्‍कत यही है कि पाठक मेरी कविताएं पढ़ने के बजाय मन लगाकर वर्ल्‍ड कप देखने चला जाता है. और फिर मैं भी भले ही कितना पहुंचा हुआ कवि होऊं, सामाजिक भी हूं ही, पाठक के ऐसे अपठनीय, अनाचारी भाव से क्षुब्‍ध बेमन कविताओं को लात लगाकर कृष्‍णा के पास चला जाता हूं. कृष्‍णा चंडीगढ़ के सेक्‍टर 21 में निवास करती है किन्‍तु मन उसका कविताओं में ही बसता है. विशेषकर मेरी कविताओं में जो आमतौर पर प्रेम पर होती हैं. और मज़ेदार बात है कि उसके भीतर काफी मात्रा में प्रेम संरक्षित रहने में सफल हो भी जाता है. चंडीगढ़, कोहिमा, कोची, कालपट्टम, केंओझर के तो मेरे ऐसे ही उदात्‍त प्रेमिल अनुभव रहे हैं, अन्‍य शहरों का भी मुझे विश्‍वास है इससे अलग कतई न होगा. होने की वजह नहीं है. मैं वही हूं मेरा प्रेम वही है. पाठक भी लगभग वही वही हैं. जो मेरी कविताएं पढ़ने की जगह फिर वर्ल्‍ड कपोन्‍मुख हो रहे हैं. एनीवे, पाठकों की मैं इतना सोचता रहा तो हुआ मेरे जीवन में प्रेम और हो चुकीं कविताएं. मलयालम में तो होने से रही हीं. जिसे डीसी बुक्‍स छाप रहा है. मतलब अभी तक तो छाप रहा ही है हो सकता है डीएमके की तरह कल दूसरी ज़बान बोलने लगे. कृष्‍णा भी तो कल कैसे चहक-चहककर आह्लादित हो रही थी, जैसे ही पता चला कविताएं मैं पंजाबी में नहीं, मलयालम में छपवा रहा हूं नाम लेकर मेरी मां और बहन के गालियां पुकारने लगी. अब इस महिला दिवसीय माहौल में कुत्सित कलुषित पाठिकाओं का कोई क्‍या करे. मैंने कुछ किया भी नहीं. पंजाबी में तो नहीं, अपने एक गीत का हिन्‍दी तर्जु़मा पीछे छोड़ आया, कि कृष्‍णा चाहेगी तो मेरी ग़ैरहाज़ि‍री में भी मेरे गीत से जीवन का, हमारी अंतरंग मार्मिकताओं के सबक लेगी. ले ही सकती है, जो लेना चाहे. मगर दिक्‍कत वही है, पाठकों की तरह ही अपने यहां पाठिकाएं भी रुठने और खुद के मनवाने के खेलों में ज़्यादा दिलचस्‍पी रखती हैं, काव्‍य की अंतरात्‍मा तक पहुंचने में तो कतई नहीं. आप पहुंचिए अंतरात्‍मा तक. मलमालम से हिन्‍दी का अनुवाद पेश है. प्‍लीज़ मन लगाकर पढ़ि‍येगा, देख सकेंगे कैसे तत्‍काल फ़ायदा देता है.

मिलने दो अब दिल से दिल को, मिटने दो मज़बुरियों को
शीशे में अपने डूबो दो, सब फ़ासलों दुरियों को
आंखों में मैं मुस्‍कराऊं तुम्‍हारे जो तुम मुस्‍कराओ

हम तुम ना हम तुम रहे अब, कुछ और ही हो गए अब
सपनों के झिलमिल नगर में, जाने कहां खो गए अब
हम राह पूछें किसी से ना तुम अपनी मंज़ि‍ल बताओ

कल हम से पूछे न कोई, क्‍या हो गया था तुम्‍हें कल
मुड़कर नहीं देखते हम, दिल ने कहा है चला चल
जो दूर पीछे कहीं रह गए, अब उन्‍हें मत बुलाओ

दिल की गिरह खोल दो, चुप ना बैठो, कोई गीत गाओ
महफ़ि‍ल में अब कौन है अजनबी, तुम मेरे पास आओ..

मलयालम की जगह हिन्‍दी में पढ़ रहा हूं, और मेरी ही लिखी चीज़ है फिर भी सोचकर सन्‍न हो रहा हूं कि कैसे और कितनी महीन बात कह दी, और ऐसे सरसता से.. मगर फिर, शायद पहुंचे हुए कविओं के साथ ऐसा होता रहता है कि एक कैज़ुअलनैस में कह दें और फिर देर तक सन्‍न होते रहें कि अरे, कैसे कह दिया!

आप सन्‍न न हों, कायदे से अपना दिन शुरु करें. और कृष्‍णा से भूले कहीं टकराना हुआ पड़े तो बेवकूफ़ से कहें क्‍यों फालतू में मुझे दिक कर रही है, कविता में ठीक से उतर नहीं सकती थी?

3 comments:

  1. सही बताएं तो हम भी सन्न हो गए पढके ;)
    कृष्णा तो दिक करने के लिए बनी ही है... न ठीक से जिंदगी में उतरेगी न कविता में...

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  2. दिल की गिरह खोल दो, चुप ना बैठो, कोई गीत गाओ
    महफ़ि‍ल में अब कौन है अजनबी, तुम मेरे पास आओ..



    shayad baki kavitayen kuch isi tarah hongi, par malyalam mein hain,.........

    shayad hindi mein bhi aap pesh karien.

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  3. ये भी खूब रही :-)

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