Saturday, March 12, 2011

रेलचढ़े या जेहलगढ़े, कवन फरक, घरे नै हैं न ?

संजू चाचा की शादी नहीं हुई. हुई होगी तो दुनिया में आने की मेरी (सच्‍ची) कहानी में भले हुई हो, (झूठी) कहानी में इस व्‍याह के घटित होने का कोई, कैसा भी साक्ष्‍य नहीं. और अकेले यह संजू चाचा का दुर्भाग्‍यनामा हो सो भी नहीं. और दूसरे थे (ओह, कितने तो चाचा थे! जसोदा फुआ करम सुनाने के बहाने उनके नाम गिनाना शुरु करती तो दीपू की गिनती गड़बड़ा जाती. हमेशा! सात चाचाओं का तो मैंने हिसाब किया जिनको हमारी पूरी बचपन निकल गई हमने कभी देखा ही नहीं! बेचारे डिप्‍टी, या दुनियादारी, या जाने किसके मारे, एक बार घर से निकलने के बाद फिर दुबारा उस देहरी कभी उनका लौटना ही न हुआ. नेबर!) मनोहर, पिंटू चाचा, देवानंद, सुरंजन चच्‍चा सबका इसी तरह उनकी गैरहाजिरी में बरीच्‍छा हुआ, तिलक तक घर की औरतें कलेजा मुंह में लिये, घबराई राह तकती बैठी रहीं और बियाह का दिन आया, निकल गया, अबो-मेंसन चाचा पाल्‍टी घर अइबे नहीं की! नेबर! द सैटेस्‍ट नेबर हैपनिंग मेरिजेस इन अबर अमेंजिंग आल्डिनरी लाइफ! फुल ऑफ सैटिस्टिक (सैडिस्टिक) सैटनेस (सैडनैस), बट ट्रू अल्‍सो!

जसोदा फुआ और जयपरकास के मम्‍मी के त भूले जाइये, कलम्‍मा काकी तक एक हाथ गइया के नाद में खली फेंटती और दुसरके से मुंह पर आंचल धरै आंसू बहलाती. अंधारै, मन का अंधारा सगरे दुनिया से छुपलातीं.

बहुत बार होता जसोदा फुआ घंटों चुप रहने के बाद मुंह खोलती तो सिर्फ ये कहने के लिए कि, ‘सायेत ई घर में सहता नहीं कि दुल्‍हा घरै आय के बियाह करे. सायेत प्रभू जी ई घर बास्‍ते यहीये बिधान मंजूरी किये!’

एक बार महीनों लापता रहने के बाद खबर आई कि मनोहर चाचा जिंदा हैं सौस्‍थ हैं. जोधपुर कि जयसलमेर का जेहल में हैं वहींये से चिट्ठी पठाये हैं. रेल में कवनो के संग झगड़ा हो गया था, कवनो के कंधा में छुरी चल गया था, दू लोक का बक्‍सा गिरे से कपार फूटा, चाचा टोटल निरदोस थे लेकिन झगड़ा-झांटी का झपेटा में धरा गये और अब इकतालीस दिन का सजा काट के बाहिर आयेंगे! सुरंजन चच्‍चा जबकि बाकई झगरा-फसादी में अरेस्टिन हुए. उनका किस्‍मत सीतापुर जेल में मजा करना लिखा रहा!

(झूठी) कहानी ही नहीं, दुनिया में मेरे आने की (सच्‍ची) कहानी भी ऐसे दरदनाक रेल और जेहल के प्रसंगों से अंटी पड़ी है. घर के किसी सदस्‍य के रेल चढ़ने के अंदेशे से ही सोमारु बो के मिरगी पकड़ने की हवा बनने लगती. औरतें खूब जानती, और सही ही जानती होतीं कि अबस्‍मभाबी अनिस्‍ट घटे वाला है. और घटकर रहता ही. साढ़े चार फुट के बाबा त रेल लाईन के नौकरी में थे, मगर घटना का बखत रेल में सवारो नै थे, चौबेपुरवा का ईनार पर नहा रहे थे कि किसका त घड़ी चोरी हो गया, या अचक्‍के लोटा ईनारे गिर गया था, वहींये मारामारी हो गई और सात साल ले मोकद्दमा चला! पिंटू चाचा भी कौन रेल में थे, ईस्‍टेसन का बहरी गुमटी पे पान का ऑल्‍डर बोलके हिंदुस्‍तान दैनिक का पल्‍ला पलट रहे थे, कि एकदम्‍मे हुआं साइकिल चेन और हाकी स्टिक गुलचार का ‘मेरे अपने’ वाला एश्‍शन सीनरी होये लगा. सात महीना पिंटू चाचा रहे जेल का भीतरी!

टुपुरवा बहुत गोड़ पटकती कि ऊहो रेल चढ़ेगी. जेहल जायेगी. जइसे पिंटू चाचा गए, सुरंजन, देबानंद और मनोहर चाचा गए. मनोजवा के भी बोखार चढ़े लगता कि हम्‍मो जायेंगे. रेल जेल जहां जगह है अब्‍भी जायेंगे, इसी बक्‍त! शायद इकलौता एक मैं ही समझदार था फ्रॉक के तीन फूल छुपाये बुनकी का हाथ थामे ताप्‍ती दीदी के पीछे जाकर छिप जाता, या रसोई के दरवाजे के बाहर परात में आटा मींस रही मां के साड़ी खींच फुसफुसाकर कहता, ‘मां, हम रेल जेल नै जायेंगे, कब्‍बो! हरमेसा तोहरे संगै रहेंगे, ठीक?’

गीले आटे में मां की उंगलियां अटकी रह जाती, चेहरे का रंग उतर जाता. फीकी हंसी हंसती तो लगता अकेले का अपना चुपचाप रोना छुपा रही है. अभी किसी भी क्षण रो देगी का चेहरे पर भाव लिए मेरे एक कदम पीछे बुनकी खड़ी होती, मैं मां के ठोढ़ी को अपनी तर्जनी से छुआते कहता, ‘जइसन बाबूजी किये, ठीक? वइसन हम कब्‍बो करुंगा? तोरा को छोर के दूर जाऊंगा, नै जाऊंगा? नेबर!’

मां ठेहुने की साड़ी पर आंख गिराये अपनी आंखों का भर आना छुपा लेती, गर्व और अभिमान से भरा मेरा दिल कैसा तो अपनी ही भार में कभी टुकड़े टूटता, कभी ऊंचे आसमान उड़ता महसूस करता. मगर जाने क्‍या होता के तबहींये बुनकी बोकार फाड़े रोना शुरु कर देती.

(बाकी)

5 comments:

  1. पढ़ते तो चल रहे हैं..मगर चुपाई मारे बैठे हैं बस...भरे..ऐसन समझे रहिये बस!!

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  2. बहुत नीम्मन लिखे हो च्चा ....बहुत नीमन।

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  3. दीपू की कहानी रुचिकर बनती जा रही है। :-)

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  4. माँ की आँखें भर आने के लिए उस अबोध मुख के चंद बोल ही काफी थे...

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