Sunday, March 13, 2011

बाह रे सपना के जमाना!

बादलों भरे दुपहरिया के अंधेरे में चुप्‍पे दीवार पर बैलेंस-वॉक की प्रैक्टिस करते कोई अदृश्‍य लड़की होती है जिसे रीझाने के लिए मैं दबी आवाज़ गुनगुनाता हूं, ‘ऐ लइकी, ईंटा का ये दिल कर नरम जरा..’ शरीफा के पेड़ के नीचे गोदी में बुनकीया को खींचे ताप्‍ती दीदी उसके हाथ मेंहदी न लगा रही हो, या सोमारु बो गुल का गोली न बना रही हो तो बहुत बार ध्‍यान देकर सुनने पर दीवार के दूसरे छोर खड़ी लड़की का जवाब भी सुनाई पड़ता है- सिटी-वीटी मार इरिटेट करदा, हरकतें डाउनमारकेट करदा! और मैं गुस्‍से में सुलगता कमर पर हाथ बांधकर नाक से धुआं छोड़ता जवाब देता हूं, ‘रे पंजाबिन, गोरा रंक पे बड़ तोर गोमान है रे?’ और वाक्‍य पूरा होने के पहले ही दीवार पर मेरे बैलेंस-वॉक की सारी बैलेन्सिन तेल हो जाती है. कपार नहीं फूटता तब भी कुहनी तो फूटती ही. मगर अभी टुपुरवा का फूटा है. रो कम से कम वैसे ही रही है. सलीमा में टेलीक्राम का खबर पाके अचला सचदेब अऊर ललिता पलवार जइसे जमीन-असमान एक करे वाला रोआई रोती हैं, ठीक वइसने!

पहिलका डैलाक, एकदम्‍मे मारमिक: ‘हम हेरा गए हैं! बैया (भैया), ई चंकल (जंगल) में हमरा के बाक (बाघ) खा जायेगा!

जबकि कवनो जंगल-टंगल नहीं है, बादलभरा दुपहरिया का अंधेरा है और लइकी सीतानाथ बो का पलंग का नीचवा लुकाई है. और अकेलहूं नहीं है, अपना दूनो गुड़ि‍यो साथै लीहिस है!

कलम्‍मा काकी थी हमरा हाथ रोककर, दरवाजे पर टोककर बोली, ‘डोंड ट्रबल द लिडिल गर्ल, फिसिकली शी इज नाट ईयर एनीमोर.’

टुपुरवा पलंग का नीचे लुकाईल दीख रही थी मगर फिचिकली (बकौल काकी) हुआं थी नहीं! ‘शी इस लिविंग समवन एल्‍स ड्रीम.. आर नाइटमेयर!’ जाने कोडईकनाल कि कुंचुनालपट्री कहंवा से करीयक्‍की थेयरी सब लाके हम गरीबन के बीच ठेलती रहती थी! केकरा डिरीम में हेराई है टुपुरवा? कोई केहू अऊर के डिरीम में हेराइयो सकता है भला? अनबीलीबेबल बट ट्रू अल्‍सो जइसन?

दुनिया में आने की मेरी (सच्‍ची) कहानी में शायद बाबूजी थे जो जसोदा फुआ के सपने में हेराये थे, (झूठी) कहानी में किसके सपने में यह कौन हेरा रहा था जैसा कुछ भी तय करना असम्‍भव था. एक बार के लिए तो शक़ हो कि शायद यह सब ताप्‍ती दीदी का किया-धरा है. बेचारी टुपुरवा उनके माथे की रुसी का दवाई कीन के नहीं लाई उसी की सज़ा पा रही है! मगर तभी सपने का पगहा अपने हाथ लिये पिंटू चाचा कहां से चल्‍ल आते और ताप्‍ती दीदी वाला खेला है की सारी कल्‍पना भुरकुस, बेमतलब हो जाती. एक बार तो मनोज चिल्‍लाके बोलिस कि ‘सब हमरे साइंस टीचर सिंग सर के करस्‍तानी है, एकदम्‍म राच्‍छस टीचर है, ककीया, हं?’

करीयक्‍की काकी ने मुंह पर उंगली धरकर मनोज को चुप कराया. सब बच्‍चे आंख फाड़े देखते रहे टुपुरवा किसके सपने में हेराई है (दाल का सगरे अदहन जल गया, दीपू इस्‍कूल से फिर अपना टिफिन भुलाके लौटा, मगर उधर किसी का भी ध्‍यान नहीं था). सपने में खूब हरीयर पहाड़ी सब दीख रहा था. फिर कैमरा किलोज गया त बाबूजी दिखे (हमको बाबूजी ही लगे, हलांकि मनोज अंत तक गोड़ पटकता रहा कि बाबूजी नहीं हैं). पीठ पर कोची का त कनस्‍तर बांधे टीला चढ़ रहे थे. पसीना-पसीना. नंगा गोड़, उघारे बदन. चार हाथ का दूरी से आदमी बास मारे वइसा हाल में जाने केकरा खातिर कइसा मेहनती कै रहे थे!

टुपुरवा रोये लगी कि बहुत दरत हो रहा है, एतना अंधारा में कवनो मिलिट (मिनट) बाग (बाघ) उसको खा जायेगा, ई साल दुर्गा पूजा बास्‍ते ऊ नवको फराको नहीं बनवा सकेगी! मगर सपना का सीनरी में फंसा पब्लिक टुपुरवा का सुन कहां रहा था?

कहीं-कहीं बाबूजी (ठीक है, ताप्‍ती दीदी का टेंहुका सहे से अच्‍छा है बाबूजी नै बोलें. नहीं बोलेंगे. सपना वाला आदमी, अब्‍ब ठीक?) का देह छिलाया हुआ था. करीयर लोहू का छापा जइसन दीख रहा था (जयपरकास के मम्‍मी मुंह पर हाथ धर लीं और आंखी पर अंचरा).

सपना वाला अदमी आखिलकार टीला का ऊपरी जब पहुंचा त हुआं एगो कुदाली रखा हुआ था. उसी का बगली एगो रंगील हवाई चप्‍पलो भी. कुदाली वइसने था जइसा हमरे घर में है, मगर वइसने नहीं भी था! चप्‍पलो लगता जैसे कौनो इस्‍पेसल डेजाइन वाला है. चीन से कि जपान से कहीं कवनो दुसरका दुनिया से आया है. लोहा का मग से मुंह में चुल्‍लू भर सपना वाला आदमी पानी पिये तो हम एकदम चिंहुक के पहचान लिये कि हं, बाबूजीये हैं, मगर दुसरका छण फिर येहो बिस्‍सास हो गया कि कवनो सूरत में हमरे बाबूजी नहीं हो सकते!

एगो बेमतबल का सपना में खाली टुपुरवा ही नहीं हेराई थी, बाबूजी के संगै का हम सबका संबंधों गरबरा गया था! बाह रे सपना के जमाना!

(बाकी)

1 comment:

  1. बाह रे सपना के जमाना .....1

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