Thursday, March 17, 2011

जब भी ये दिल उदास होता होगा..

कितनी दूर तक दुनिया अपनी होती है, कि हाथ बढ़ाकर उस बिंदु को छूकर कह दें कि यहां तक हमारी है और उससे आगे परायेपन का संसार शुरु होता हो? अपहचाना, निर्मम, तकलीफ़देह? सपने के बाहर ताप्‍ती दीदी, टुपुर, मनोज, दीपू, जसोदा फुआ, मैं हम सब पहचाने संसार की तरलता में खड़े थे और सपने के अंदर खड़ा आदमी (बाबूजी! बाबूजी!) जाने किस वीराने, स्‍नेहरहित, सूने प्रांतर में भटक रहा था. कभी होता बर्तन मांजती, या मिट्टी के दीवार पर गोईंठा पाथती, मुंह पर मटियाया आंचल ढांपे मां सूने दीवाल से खुद को फुसफुसकर पूछता देखती, ‘तुम एक बार बस अपने मुंह से बोल दो अब कब्‍बो नहीं आओगे, एक बार?’ सपने में खड़े आदमी का सूना, पथराया चेहरा एकबारगी को कांपता दिखता लेकिन उसके मुंह से कभी कोई बोली छूटकर मां तक पहुंची हो, और मां अपना जवाब पा गई हो जैसा कभी नहीं हुआ.

सपने से बाहर पहचानी दुनिया के स्‍नेहिल संसार में कितने तो- सब गिनतियों से परे, हजार की गिनती के बियोंडो- सवाल थे जिसका सपनों के भीतर के बीहड़, रहस्‍यलोकों में मगर जवाब नहीं था!

एक बार ताप्‍ती दीदी मनोजवा की पीठ पर आईना फंसाकर बाल काढ़ रही थी, एकदम्‍मे चौंककर बोली, ‘सेई तो पिंटू चा, ना की?’

खपड़े पर सोमारु बो हरे पसरे लतरों में लौकी की बतिया खोज रही थी, चिढ़ी चिल्‍लाईं, ‘कोत्‍था लउक गईंलें तोरा पिंटू?’

हैरानी और दुख से ताप्‍ती दीदी ने जवाब दिया, ‘स्‍वप्‍ने, आर कोथाय?’

पहली बार नज़र जाते ही सबने पहचान लिया कि सपने में पिंटू चाचा ही हैं. बड़ी मोहरी का पजामा पहिने कौनो मुसलमानिन है जिसके हाथ में हाथ फंसाये बदकार को बजार की सैर करा रहे हैं. अभी अलमुनिया और स्‍टील का दुकान का आगे खड़ा हैं और अगिलका फ्रेम में चेचक का टीका लगाये वाला तंबू का बाहर एक दूसरा का आंख में आंख डाले मुस्किया रहे हैं. नीलकमल सजावट सेंटर का मिसेस का ऑपिनियन में दोनों भागकर जैपुर गए हैं. जबकि ताप्‍ती दीदी की सहेली दीपशिखा जिद किये रही लखनऊ का हजरतगंज है, जयपुर कोनो रोकोमे नेई!

चूल्‍हे में जाये नीलकमल सजावट सेंटर की मिसेस और ताप्‍ती दीदी की सहेली दीपशिखा! माने सोचने वाली बात है पिंटू चाचा को घर आने की फुरसत नहीं निकलती, अपनी शादी तक के लिए नहीं निकलती, और हाट-मेला में किसी जाने कहां की जनाना के संगे सैर-सपाटा के मिल जाती है? कितनी बार तुनुवा को गोदी में लेके उसका माथा से माथा सटाके वादा किये थे कि ‘तोरा खातिर अगली मर्तबा लेके आयेंगे, प्रामिस!’ और घेंघर, बेवकूफ तुनुवो भरोसो की, क्‍या फैदा ऐसे भरोसे का? झूठखार चाचा के झूट्ठल वादा! एतना और केतना बच्‍चन लोक का मन और जीवन में उनका भरोसा का बलि चढ़वा दिये!

‘सबसे बड़ झूठखार त ऊ लेसनल (नेशनल) चचवा रहा,’ ये नगीना काका बोलते, 'ई वादा अऊर ऊ बादा, सोजलिज्‍म, सब सोजलिज्‍म बह गईल तोर ईनारा में!’

नगीना काका के इशारे पर फिर रामधनी और धनंजय भैया नारा बोलते, ‘डौन डौन चाचा लेहरु! औट औट चाचा लेहरु!’

बुनकिया कहीं से सुनकर बोलती ‘बेहरु.’ फिर माथा पर जोर डालकर सोचती और कहती, ‘बराता (पराठा), हमरे को काना (खाना) है!’

ताप्‍ती दीदी हंसती उसे नजदीक खींचकर उसके गालों को हाथ में दबाये सवाल करती, ‘देखो एर दुष्‍टामी, पाराटा बोलते पारीश ना की रे?’

दीपुआ अपने नाक में उंगली फंसाये चोन्‍हाये जवाब देता, ‘फरौटा!’ मनोज दौड़कर दीपू के बाल खींच भाग जाता, ‘चुप्‍प बुड़बक, परौठो बोले नहीं जानता है!’

जयपरकास की मम्‍मी मनोज के दो हाथ लगाती, मनोज बहुत चोट लग गई की एक्टिंग करके रोने लगता. या मनोज पुलिया की तरफ भाग जाता, किसी और के ही पिटाई हो जाती. या बिना पिटे, कोई और होता सिर्फ हल्‍ला मचाने की गरज से ही रोता होता. इस पूरे हो-हल्‍ले में सबकुछ और सब किसी से चिढ़ा, थका, उदास मैं जोर से आंखें मींचे उस सपने को देखने की कोशिश करता जो मेरे भीतर दर्द बढ़ाने की जगह मुझे फुरगुद्दी चिरैया में बदल दे; अमरुद के पेड़ से उड़ाकर कहीं बहुत दूर, बहुत ऊपर- सब पतंगों से भी ऊपर- ऊंचे आसमान में छोड़ आये जहां से नीचे मैं सबकुछ साफ-साफ देख सकूं. हंसूं तो अपनी रुलाई को छिपाने की गरज में हंसता न दीखूं, जैसे मां इतनी बार करती है और समझती है जैसे मैं समझता नहीं. फिर मैं हंसू तो मुझसे ज्‍यादा मां हंसे और भूल जाये कि एक जरा से जीवन में मन को इतनी चोट क्‍यों मिलती है. और मिलती है तो उसका जिम्‍मेदार कौन है.

बहुत सारी आवाजें आतीं मगर कुछ दिखाई न पड़ता. सुझाई न पड़ता. छाती में एक बार पूरी ताकत से सांस खींच फिर मैं तेज-तेज दौड़ने लगता. जैसे मौत के कुएं का अंधेरा हो और मैं बेदम दौड़े जाता होऊं. कोई बड़ा शहर हो की तरह का रेल स्‍टेशन होता, प्‍लेटफॉर्म पर जगर-मगर इतने सारे लोग दिखते, सीढ़ि‍यां चढ़ते, उतरते. या गोदी में लगी कोई बहुत बड़ी नाव होती, लोहे के लंबे पटरों पर भारी सामानों की ढुलाई होती रहती, कोई बूढ़ा माथे पर गमछा रखे घबराया दिखता, कोई औरत आवाज लगाती कि वो लाल बक्‍सा नहीं मिल रहा? मैं सब अनसुना किये सबके बीच रास्‍ता बनाये भागता. गोदी का कोई कर्मचारी होता, लपककर पीछे से मेरी शर्ट थामकर मुझे रोक लेता, ‘क्‍या है? कहां भाग रहे हो?’

एक पल को लगता सपने में सिस्‍टम फेलियर हुआ है. एबरप्‍ट सेटअप शटडाउन. कुछ नहीं सूझता क्‍या कहूं इसके सिवा कि, ‘दुनिया में आने की मेरी (झूठी) कहानी एकदम झूठी है, (सच्‍ची) कहानी खोज रहा हूं, प्‍लीज़ भाईसाब मुझे आगे जाने दो?’

नंगा सांवला कंधा किसी बोरे पर टिकाये ऊंघते पिता दिखते, नींद में बुदबुदाकर बोलते और तेज भागो, बाबू, हमसे भी ज्‍यादा तेज. अंग्रेजों के जमाने के हाफ पैंट पहने चार पुलिस वालों के पीछे सिर झुकाये चलते बाबा दिखते, नजर चुराकर वह भी हुड़कते, 'भाग. अऊर तेज!'

(बाकी)

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