Saturday, March 19, 2011

चिरिया बनके उर जाइये..

होली की गर्म हवाओं के चलते ही मनोज घर से लापता हो जाता. बाज़ार में या लंबी ढलान वाली सड़क पर कभी दिखता तो हमेशा तीन लड़कों की संगत में साईकिल में टंगा, ठंसा हुड़दंगी शोर मचाता दिखता. दौड़ता कभी घर आता तो हड़बड़ में सिर्फ बताने के लिए कि कितनी भूख लगी है. नाक और होंठों पर पसीने की बूंदें होतीं, माथे के बाल धूल-अंटे, छितराये होते. बिना एक जगह स्थिर बैठे, उसी हड़बड़ी में तीन कौर खाकर उतनी ही तेजी से फिर भाग भी जाता.

जबकि होली सुनते ही टुपुर के चेहरे पर मुर्दनी उतर आती. आंगन और बरामदे से भागकर इस और उस कमरे छिपती रहती. फुआ और मौसी की साड़ी के पीछे. जितेन्‍दर चाचा या देवीशंकर कक्‍का लोटा का पानी पीते हुए दूर से कहते, ‘ऊ सारी (साड़ी) के पिछवा कौन लुकाया है जी, हियां से त सगरे (सब) लउक रहा है?’ हदसी टुपुर चार हाथ दौड़कर जगह बदलती, ‘अऊर हियां से? अब? लउक रहे हैं? हियंवा से?’

पूरे होली भर टुपुरवा का दिमाग पटखनी खाये रहता. फट्टल आंख लिये माथा पर दीदी का चुनरी धरे न पूछेवाले को भी बताती फिरती, ‘हमरा के होली नहीं खेले का है, बइय्या?’

मुंह में गर्म पुआ दाबे बिष्‍णु भैया हंसते जवाब देते, ‘मत खेलना बुच्‍ची, चिड़ि‍या बनके उड़ जाना!’

टुपुर होंठ में उंगली फंसाये बिष्‍णु भैया का कहा सुनती, फिर झुमुर, पायलिया, दीपू सबको सुनाती इस कमरे से उस कमरे भागती बताती फिरती, ‘हम होली नै खेलेंगे, चिरिया बनके उर्र जायेंगे, जाने? हं?’

‘चिड़ि‍या बने बास्‍ते बड़ इच्‍छासक्ति का दरकार होता है,’ कुर्सी खींचकर उस पर ढेर होते जितेन्‍दर चाचा कहते. माथे और गाल पर उनके संवलाई गाढ़ी ललाई होती. अधमुंदी आंखों फुसफुसाकर बात करते, मानो किसी गहरे रहस्‍यलोक में डूबकर अभी-अभी बाहर आये हों. तीन लोटे भांग के असर में बीस कोस दौड़कर आयें हों और बीस कोस दौड़ लेने का अभी भी हौसला रखते हों.

टुपुर की पीठ पर हाथ धरकर जितेन्‍दर चाचा बुचिया के हौसला-अफजाई करते. हालांकि अधमुंदी आंख इधर-उधर ताड़ती रहती कि कहीं बचा आधा गिलास भांग और दिख जाये तो उससे सूखा हलक अभी कुछ और ठंडा कर लें, ‘चिड़ि‍या जइसन महीन सोच का दरकार होता है. अंगना और ओसारा का अइसहीं दौड़ाई करके बुच्‍ची, आज ले केऊ चिरिया बना है? मनोज कुमारो सहीद बन सकते हैं, चिरिया नै बन सकते, रघुबर रामचन्‍नर जी के जै!’

टुपुरवा के दिल टूट जाता. चाचा से हाथ छुड़ाकर वह भाग जाती. ढेंकुली वाले कमरे में सफाई कर रही सोमारु बो के पास या निमकी छान रही जयपरकास की मम्‍मी के पीछे जाकर चुप्‍पे खड़ी हो जाती और खड़ी रहती. गुमसुम. दोपहर की धूप उतरकर सांझ का रंग चढ़ने लगता, लइकी किसी से बात नहीं करती.

ताप्‍ती दीदी भागकर छत की सीढ़ि‍यां चढ़ती, पड़ोस के दीपांकर को सुनाती शेफाली से कहती, ‘एबार हूली थाकबो ना, चोक्रोधरपुर जाच्‍छी!’

इससे ये बोलकर और उसके साथ वह करके भी ताप्‍ती दीदी को मगर चैन पड़ता नहीं. कुहनी पर गाल टिकाये देर-देर तक गेट पर बिना किसी से बात किये ऐसे ही खड़ी रहती. पता नहीं किसका इंतज़ार रहता. फिर एकदम तेजी से भागकर भीतर आती. रास्‍ते गेंदे का फूल कचर देती, या बेवज़ह पीशीमां से झगड़ा करने लगती. होली आता और आकर निकल जाता, ताप्‍ती दीदी चक्रधरपुर क्‍या बिरमित्रापुर तक न जातीं, मगर होली के चार-छह दिनों तक पारा उनका एकदम चढ़ा रहता. सुदीप भैया बोलते अरे हटो रे, ब्‍लास्‍ट फरनेस आ रही है!

वैसे ही दिलीप भैया. सूखे होंठ पर उल्‍टा हाथ पोंछते. चिढ़े जिस किस को डांटते रहते, ‘अरे, तोरा से गिलास में पानी लाने को बोले थे न रे?’ बेल के पेड़ से लगे साइकिल को लात लगाकर शिकायत करते, ‘साला मटगार्ड फिर से अवाज कर रहा है, ये साइकिल लेके हम अंजलि का मोहल्‍ला जायेंगे बे?’

इसी में कभी रहमतुल्‍ला या प्रदीप साड़ंगी भैया के जले में नीमक छिड़कने, ये बताने भी चले आते, ‘मगर ऊ तो जमशेदपुर गई है!’

कोई दूसरा कहता, ‘आरे बुड़बक, कोलकाता गेयेछे!’

दिलीप भैया चिढ़े-चिढ़े जवाब देते, ‘गई रहे कलकत्‍ता, हम सैकिल से कलकत्‍ता नहीं जा सकते? ई बार उसके कलकत्‍ता वाले घर तक पहुंचकर दिखाते हैं!’

दीपू छौ महीने के टामी को गोदी में लिये उसके मुंह में गरम पुआ का टुकड़ा ठेलने की कोशिश करता, अदबदाये पिल्‍ले के मुंह फेरने पर उदास होकर उससे सवाल करता, ‘टामी, ई बताओ, बाबू, तू चिरिया बनके उर सकते हो?’ स्‍नेह के दुलार में टामी घबराकर दीपू के गाल चाटने लगता.

जितेन्‍दर चाचा के हाथ जाने फिर कहां से भांग का एक लोटा चला ही आता, चमकती आंखें और थकी सांस लिये चाचा महकते बोलते, ‘कोऊ है हो? देखो हियां, अबीर और रंग का एक्‍को छींटा नहीं गिरा लेकिन केतना रंगीनी बरीस रहा है?’

ढेंकुली वाले कमरे के अंधारे में सफाई करती सोमारु बो झाड़ू चलाती खुदै खुद में फिक्‍क देना हंस देती (जैसे फिक्‍क देना घर का कवनो दुसरका कोना में केहू के रुलाई छूट जाता, मगर किसी के नज़र नहीं आता).

(बाकी)

2 comments:

  1. भूल जा झूठी दुनियादारी के रंग....
    होली की रंगीन मस्ती, दारू, भंग के संग...
    ऐसी बरसे की वो 'बाबा' भी रह जाए दंग..

    होली की शुभकामनाएं.

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  2. रंगों की चलाई है हमने पिचकारी
    रहे ने कोई झोली खाली
    हमने हर झोली रंगने की
    आज है कसम खाली

    होली की रंग भरी शुभकामनाएँ

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