Monday, March 21, 2011

फिर-फिर ककहरा..



मुट्ठी में होशो-हवास की गल रही एक ज़रा टैबलेट दबाये
अवसर के पीठ सवार अढ़ाई दोस्तियां और उजबक
यारंदाजी की वही-वही बरबराई रोवनियां पौने तीन
सबको अनसुनियाता (अंधारे छूटा जाता)
पसलियों में साइकिल के ट्यूब भर हवा किये पंप
बिवाय फटाय एड़ी एक हाली हथेलियन के दुलारे दुलराये
दौड़ती मैट्रो के बाजू चौड़ी कार-बहार सड़क के मैं
नीचे दबीं चौदह हज़ार ज़ि‍न्दगियां कार-बाहर, बेमतलब
लांघता, उछलता, गिरता, दौड़ता, तेज़ी से जितना सकता
एक सांस में तुम तक पहुंचने की कोशिश करता

अजाने धातु अपहचाने रसायन-द्रव्यों के अंकीय अंबार
घालमेल के लम्बे गलियारों, सत्ता-श्रृंखला के शराबी नीम उजारों
के बीचोंबीच तुम ऊबी, मुस्कराती बहलती, किसी बतकही में रमा दिखतीं
मैं सकुचाया, भासा के बसियाये, कुछ खाये ज़रा बचाये पन्ने सजाता
दिखता, दहलता कि भाषा समाज की तात्कालीकता से बाहर तुम्हें
अपनी बेजुबानी की अश्लील नाचों को देखने से किसी तरह बचा सकूं
अलबत्ता साथ ही जता सकूं कि जी, सुनें, मेरे भाषाई इरादे नेक़ हैं
कि फिर बहुत देर ख़ामोश रहने के बाद हम बात शुरु करें तो उसमें
भाषा नर हो न मादा हो, मेरा कहना अश्लील हो न आधा

मज़बूत रस्सी की सघन बांट सी खुले भाषा, खुलती चली जाये
तुम कौतुक बनो नहीं, न मैं नाटक
शालीनता की सादगी में बिना फुदके रह सकूं सादा.

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