एक चिड़िया है रोज आकर अनार के गाछ पर बैठती है, मालूम नहीं सगरे दिन सोचती क्या है, टुपुर? अपना नाम पसंद नहीं उसको, कवनो और नाम होता तो केतना अच्छा होता यहीये सोचती है, टुपुर? ‘एकरा का (क्या) ना (नाम) है?’ यह कोई और बच्चा पूछता, टुपुर आंख झपकाये चुप रहती.
‘देखो, इनको चिरियो का नामौ नै मालूम है! ई हुई सोनामुखी, न जी? का सोचै बइठी हैं, सोनामुखी जी? घरै डकैती पड़ा था कि एसप्रेसन (एक्सप्रेशन) अइसन मुरझाया वाले साटल पड़ी हैं? सैकिल में बैठ के अप्सरा टाकी ‘हरीयर कांच का चूड़ियां’ देखे ला चलिएगा, सोनामुखी?’ .
‘रोज आके बइठती है ऊ नहीं है जी, ओकर बहीन है, काकी किरिया, हम पहचान रहे हैं! जइसे पच्छिम में ऊ बदरी देख रहे हैं? ई कल वाला नहीं है! ऊ गया जमसेदपुर कि जसीडीह?’
‘मतलब ईहौ नीलामनि नै ओकर बहीन है, जी?’ शंभुनाथ मामा वास्ते गुल खरीदकर लौटे हैं, सैकिल का पैडिल में उनका पैजामा अझुराया जा रहा है, लेकिन अभी तक जाने नहीं हैं.
‘बहीन होगी कि गोतिया है, मौसी है ई तो गंभीरता से जांच करै से पता चलेगा न जी?’ अपने हिस्से का ज्ञान निकालने के संतोष के साथ कामता देह के दूसरे हिस्से से हवा रिलीज करते और टेस्टर की नोक से कान खोदने लगते.
बुनकी फ्रॉक के छापे के तीन फूलों पर एक हाथ दाबे, दूसरा मुंह पर धरे वहां से हट जाती. गुड़ के खौलाये पानी और सौंफ की महक के पीछे चलती रसोई में जसोदा फुआ के पाछे जाकर ठड़ी हो जाती. महीनी मिठास में एक पूरे मिनट के अंतराल के बाद कहती, ‘पुआ बनायेगी, पुआ? हम दू गो कायेंगे. अउर केउ के बाटा नइ तेंगे!’
‘तू तीन गो खाना.’ परात में आटा निकालती फुआ कहती.
‘अऊर हम?’ हाथ का धूल पैंट में पोंछता मनोज भागा आता, ‘हम बुनकीया के तेगुना खायेंगे, टेन पलस टू, टुअेल!’
दुनिया में आने की मेरी (सच्ची) कहानी से झांकते बाबा ललकारते आवाज़ लगाते, ‘ऊ रसोई में चप्पल पहिन के को गया है?’
जवाब पिंटू या जितेन्दर चाचा की तरफ से आता, ‘कब्बो कीने हैं चप्पल कि पहिन के कोई कहुंओ जायेगा?’
एक दूसरा जवाब बिष्णु भैया का आता, ‘पंद्रह अगस्त का परेड हम रजेस महन्ती का चप्पल उधारी लेके दिये!’
राजेश महान्ति अपनी बहन के कपड़े के जूते पहनकर दिया. जैसे मंजु परीक्षा इंदु दीदी का पेन लेकर दी. राजू मनोज के मेडिकल कार्ड पर हॉस्पिटल गया. सुशांत अपने भाई का मोजा पहनकर एस्से में फस्ट प्राइस का ईनाम लेने इस्टेज पर गया था. रंजु नरसरी से फूल और गमला दीपा आंटी के लिए कीनने गई थी. दीपा आंटी अपने घर रेकार्ड पर जो मधुमती का ‘दिल तड़प-तड़प के कह रहा है आ भी जा’ गाना बजा-बजाकर सुनती रहती हैं वो रेकार्ड प्लेयर संधु अंकल के घर से उधारी गया है. जैसे कामता के पास पंचानन की सैकिल पहुंची है. विष्णु भैया का कुरता दुर्गा पहनकर घूमता है. जैसे तापस और सुरंजन मेरी कहानी को अपनी साइकिल पर घुमाते घूमते हैं.
(बाकी)