Thursday, March 24, 2011

जीवन में उंगलियां.. उंगलियों में..


बड़ी दुनिया की तस्‍वीर उन ख़बरों, विश्‍लेषणों में छुपी होतीं जिसे बड़े अखबार अपने पन्‍नों में छापने से बचा ले जाते. रोज़मर्रे की आवाजाही, थकान, दफ़्तर के तीन और घर के चार काम ही जीवन की बड़ी खबरों की जगह अडिग जमे रहते. वनस्‍पति तेल, इमली, अजवाईन. परदे का हुक. प्‍लम्‍बर को फोन. पीठ की दर्द का मलहम? बड़ी दुनिया की उधड़न बुख़्नर और लुकाच के पन्‍नों में फड़फड़ाते, चैटविन की आवारगी में. कल्विनो की कल्‍पनाओं और सदनानंद झा के हरमुनिया के दबे, मुखर राज़दार बोलों में. ताज़ा नहाकर निकली, पूजाघर में पेट पर साड़ी का फेंटा बांध रही पत्‍नी का मन सरकता लेकिन जाकर टीवी पर उमड़ता, लगभग आदत-सी हुईं अब की एक सायास कोशिश में आंखें भर भी आतीं, फिर उड़ी नज़र में बालकनी का गमला दिखता (बद्तमीज़, फिर मुरझाता) जिसे किसी भी सूरत बचा लेना होता.
रात कूलर के नीचे के संकरे अंधेरों में एक चिड़ि‍या अपने पंख फड़फड़ाती स्थिर होती, देर तक चौंकी बुदबुदाती रहती, ‘मैं बची. हाय, मैं बची हुई.’
पत्‍नी की पेट पर सिर टिकाये पति उनींदा फुसफुसाता, ‘मैं भी, ओह.’ पति के घने लटों (कल्पित) में हाथ फेरती पत्‍नी मुस्‍कराती, ‘हां, मेरी उंगलियां, तुम्‍हारे पैर. पड़ोस में मुनगे का पेड़, तुम्‍हारे मन की मुनगी मैं, मेरे माथे की टिकुली सब बचे, हमारी पूरी बड़ी दुनिया बची हुई!’
देर रात के चमकदार अंधेरे-उजालों में किसी अजाने पेड़ की छाया अपने साथिन अजाने पेड़ की छांह की संगत में कांपकर हिलग जाती, कहती, ‘जो बचा हुआ है हमारी छाया है, हम बचे हैं?’ साथिन छाया अब एक नये सुर में कांपना शुरु करती.
जैसे सदनानंद झा एक नये सुर के दबे तनाव में अपना हरमुनिया बजाना.
अपनी अड़सन में बुख़्नर बहुत दूर कहीं अदीखे फड़फड़ाते, हकलाये बोलते, ‘डांके. डांके.’

2 comments:

  1. जाने क्यों हम नन्हें बच्चे की तरह बार बार यहाँ आ जाते हैं...दिमाग में पैदा होती हज़ारों सोचें छोटे छोटे अनगिनत जुगनुओं की तरह यहाँ चमकते देख एक आकर्षण होता है उन्हें छूने का...जिन्हें छू नहीं पाते...थक कर लौट जाते हैं फिर आते हैं....एक हठ सा लेकर कि एक दिन सारे जुगनू एक साथ झोली में भर कर ले जाएँगे यहाँ से.... :)

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  2. @सॉरी, मीनाक्षी,
    चोरी नॉट अलाऊड, नॉट इवन ऑफ़ जुगनूस..

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