Friday, March 25, 2011

जो होयेंगे कामो-आब..


औरत के जिम्‍मे कुल सात बच्‍चे थे. बहुत बार होता औरत बच्‍चों से तीन हाथ की दूरी बनाकर, हाथों में सिर लिए बैठती, चुपचाप उन्‍हें तकती सोचती किस पाप की सज़ा भुगत रही है. बच्‍चे तीन हाथ की बनी दूरी से औरत को एकटक ताकते, सोचते बिना पाप किये वे किसकी सज़ा भुगत रहे हैं. औरत के मुंह से एक शब्‍द न निकलता, ज्यादाह निशब्‍द आह निकलती, नज़रों में बच्‍चों की खातिर ख़बरदारी होती नासपीटो, मुझसे उम्‍मीद मत करो. बच्‍चे मुंदी आंखों के अभिनय में अधखुली आंखों ताड़ते रहते और हर नज़र में चोरी से उम्‍मीद की एक तीली जला लेते. औरत हारकर नज़र फेर लेती, गीली आंखों पर आंचल धरे मन ही मन गालियां बकती.
बच्‍चा हवा में पैर उठाये दायें पैर के अंगूठे से बायें को जोड़ने का खेल खेल लेता. दूसरा उसकी नकल करता और ढिलमिलाये गिर पड़ता. तीसरे को हंसने की कोशिश में रुलाई छूट जाती. चौथा होंठों से जीभ बाहर किये अपनी नाक की नोक चाट लेता. पांचवा छठे की चिकोटी काटता, सातवां पेटकुनिया गिरा ओम जय जगदीश हरे का भजन गाने की जगह उसे चबाने लगता.
तीन हाथ की दूरी बनाकर बैठी औरत एक बार फिर मुंह पर आंचल दाबे खुद को सताने लगती.
बच्‍चे बिना उम्‍मीद गाये इशारों में एक-दूसरे को समझाने लगते, कभी मुंडारी कभी मोतीहारी स्‍टेशन की ठेठ काठमार जबान में, ‘हम होयेंगे कामयाब एक दिन..’
औरत की आंखों में दुस्‍वप्‍न के सिनेमा का सिल्‍वर जुबली सप्‍ताह बदस्‍तूर जारी रहता.

4 comments:

  1. हम होंगे कामयाब,
    भुथरा बने ख्वाब।

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  2. बच्चों की बड़ी तादाद गरीबी की सौगात है |
    अमरनाथ 'मधुर '

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  3. क्या इसे भी अपनी नई किताब में शामिल किए हैं? जबर्दस्त हैै।

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    1. नहीं, भलकन कोमारी..
      एनीबेज, सुरकिरिया..

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