Monday, March 28, 2011

मुट्ठी भर (दतुअन की तर्ज़ पर) काब्‍य पंक्तियां..


लाख सलिल चौधुरी के ऑर्केस्‍ट्रा पर चढ़कर
किसी बोलेरो में उतर जायें, भागकर छू आयें पाला
बुरकिना फासो, माली की लरज़ती धुनें कई एक
इस बड़े देश में हमारी कल्‍पनाओं का गाना
मगर हाय, होगा उतना ही पिटा, बचकाना
जैसे शहर का अंड़सा कोना दो-चार पुराना
थमकर सुस्‍ताये पैर भाग जायेंगे, मगर
ओह कितना, पैर दौड़ेंगे उतना ही
जितना मज़बूत ड्राईव होगा रैम होगा
कल्‍पनाओं के कहां कैसा पर होगा
आखिर तो उतना ही होगा जितना
दलिद्दर संस्‍कृति का रोजग़ार होगा.

***

एक खरगोश के खड़े कान होंगे
दांतों में घास दबाये, घबराये
सामने नज़र फैलाये कि रस्‍ता
जाता कहां है कित्‍ती दूर
दूसरा (चैटविन के) बुढ़ऊ
पैटागोनियन कवि-सा बड़े चैन पगुराता होगा
"बाबू, मेरी पैदावार कम है. ईलीयट साहेब
कहे ही रहे, द कविता कैन वेट."

***

रोटी में इमली की चटनी और थाली
के भात पर बूट की तरकारी होगी
आंखों में बहुत दिनों पर
अच्‍छा खाये की आत्‍मा में खुमारी
वैसा कुछ उतना ही साहित्‍य
और कुछ मन में उतनी-उतनी
अलसायी लाचारी होगी.

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