
हिंदी प्रकाशक जैसे लगातार पाठक से दूर होने, और कथाकार प्रगतिशीलता के अपने डेढ़ पेजी सूचीपत्र गिनाने से बाज आ नहीं पाते, कलम्मा काकी अपने ‘टैंजेंट’ पर निकल जाने से न आती. गोड़ पर पेटकुनिया लेटाये बीनुआ के बेटी के ऊबटन मल रही हो, या अट्ट कल्ल (पत्थर की चक्की) में भिगोया उड़द दल रही हो, जमीन पर पैर साटे उड़कर अपने कलम्मा कोश में लौटती ही, “देयर इस टाईम फार चीयरफुलनैस एंड देयर इस टाईम टू बी सैड. देयर इस टाईम टू रेजायस एंड देयर इस टाईम टू गो मैड.”
उन्चास वर्षीय (जोड़ सात महीना) चंद्रबलि राय के लिए कलम्मा काकी और उनका कलम्मा कोश उसी तरह थे जैसे कवनो पके, खेले, खाये दारुबाज के लिए आसमान का चंदा होता. मतलब, कभी-कभी ही आसमान में होता, ज्यादे ज़मीने पर ही लिसराता. पैर की ठोकरों से फुटबाल की तरह ठुकता, लुढ़काता. मतलब चंद्रबलि मौसा सामने हों तो सब उन्हीं को देखते, आसमान में चांद देखने का किसी को खयाल न उठता. ‘चांद को क्या मालूम चाहता उसे चकोर’ की तर्ज़ पर मौसा भी आमतौर पर नहीं ही जानते कि कितना ‘चाहे’ जाते हैं, हाथ में अनुपस्थित जाम लिये चुप्पै मुस्कराते बैठे रहते. थोड़ा वक्त ऐसे ही चुप्पै मुस्कराते बैठे का निकल जाता तो दर्शक दीर्घा के बच्चों को लैमनचूस या चकलेट दिलवाने की बात कहते (और कहने के बाद उतनी ही आसानी से भूल भी जाते) और फिर चुपचाप बैठे मुस्कराते रहते. सोमारु बो मौसा से बहुत चिढ़ती, क्योंकि मौसा के लिए चाय बनाना या पानी का लोटा लाना हमेशा उसी के हिस्से आता. मगर चिढ़ने की एक दूसरी तथा असल वजह थी मौसा सोमारु बो को हमेशा ऐसे देखते जैसे पहली बार देख रहे हों. गंवार औरत बरामदे में लौटकर भुनभुनाती रहती, ‘एकदम पगलेट अमदी है जी, अइसे बेबाती कोऊ मुस्कियाता है जी?’
सोमारु बो की चिढ़ का एक और कारण यह भी था कि चंद्रबलि राय हमारे असल मौसा नहीं थे. हमारे क्या किसी के नहीं थे. असल कोई मौसी ही नहीं थी क्योंकि चंद्रबलि राय की कभी शादी हुई ही नहीं थी. कभी कोई छेड़ने के लिए सवाल करता कि मौसी कहां है तो मौसा बिना भृकुटि चढ़ाये सीधे जवाब देते होगी जहां सुख पा रही होगी; हमरे संगे रहती बेचारी का जीना मुहाल होता, नहीं जी? बच्चों के बारे में भी मौसा का ऐसा ही मासूम जवाब होता-‘होगा सब कहीं. भगवान का दया से नीमने से होगा, अब केतना गो होगा हमसे मत पूछिये, काहे कि हम कब्बो लाइन में बइठा के गिनती त नहीं न किये थे जी?’
तो बिना बियाह वाले उन्चास वर्षीय (जोड़ सात महीना) बाबू चंद्रबलि राय कहां से कब मौसा हो गये, इसका सूत्रपात (रक्तपात के तर्ज पर) कहां से हो गया; और इस गहरा कहानी का सूराग कहां तलक जाता है इसका जवाब दुनिया में आने की मेरी (झूठी) कहानी में ही नहीं, (सच्चो) तक में कवनो खुलासा नहीं है. (नाट इबन ए सिंगल मेंशनिंग, जैसाकि कलम्मा काकी इमली के पानी और मिर्ची का घोल बनाती कहती)
एनीवेस, हरमेसा के मुस्कियाये वाले वही चंद्रबलि मौसा के एक दिन हुआ एकदम से पलटा खाये और सीधे करीयक्की ककीया के ‘देयर इस टाईम टू गो मैड’ वाले दौर में पाये गये ( “हालांकि ‘दौर’ से ज्यादा ऊ समूचा फेस के ‘दौरा’ बुलाना ज्यादा वाजिब होगा, एकाटिंग टू मी”, कोट-अनकोट दिलीप भैया) !
तोड़ा-तोड़ी वाला ‘मेरे अपने’ का दुसरका हफ्ता चल रहा था, या (शम्मी-लीना के) ‘जाने-अनजाने’ पहिलकाही हफ्ता में मुरझा रहा था, हवा में बेजारी का एगो कैसा तो तरन्नुम था, सैकिल पर चढ़ल आदमी अचानक से उतरकर उदास हो जाता, कंठ टेढ़ा करके किशोर को गाने का कोशिश करता, ‘कोई होता मेरा अपना, हम जिसको अपना कह लेते यारो..’ पुलिया का पास कहीं (या पानी टंकी का पीछेवाला हाकी फिल्ड में) राजिंदर भैया गाना गा भी नहीं रहे थे, सैकिल को स्टैंड पे लगाके लघु वाला संका से फारिक हो रहे थे कि दू मिनिट का उतना ही देर में जाने पीछवा से कहां से तीन गो छौंड़ा आया, सरिया कि छुरी नीचे किया, हाकी स्टिक ऊपर, जे थुराई किया कि अगला छौ दिन राजिंदर भैया अस्पताल का बिछौना पर थे (पेसाब-पैखानो सब बिछौने पर ही रहा!). छौ दिन बाद हालत हुई कि कांखते-कांखते, होंठ का पपड़ी पे हाथ साटके दू बात बोल सकें. जयरपरकास का मम्मी रो-रुला के और तीन गो संतरा छीलके और आधा अनार का बीजा टिफिन का कटोरी में सजाके घर लौट गई तब राजिंदर भैया रंगनाथ चौबे, परमोद सड़ंगी, दिलीप सबके सुनाके बोले, ‘ऊ दिन चेन का बेल्ट बांधके बाहर नहीं निकले, बड़का मिस्टेक हो गया, बे!’
चंद्रबलि मौसा ने हंसते-हंसते ऐलान किया एक-एक को बम से उड़ा देंगे, तू खाली हमरा के सबका नाम दे!
‘मेरे अपने’ का ऊ डेंजर जमाना में कमर में बिना चेन का बेल्ट लगाये बीच सड़क पेशाब करे का राजिंदर भैया से मिस्टेक हुआ वहां तक तो ठीक, कि आलरेडी हो चुका था, मगर सबसे बड़का मिस्टेक त उसके बाद हो गया, कि बदला का आग में मचलते हुए चंद्रबलि मौसा के इंबाल्ब कै लिये!
(बाकी)
1 कमेंट:
बहुत सैड! बेचारे पिटा गये। :)
अब टाईम टू रेजायस का भेट कर रहे हैं।
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