Thursday, March 10, 2011

आयेगा आनेवाला..

बुनकी के फ्रॉक पर हमेशा बड़े-बड़े फूल होते. और हमेशा ऐसा होता कि कम से कम तीन फूल वह मुट्ठी में दाबे होती और लाख होशियारी दिखाओ मुट्ठी खोलती नहीं. उस हिस्‍से के फ्रॉक पर किसी का हाथ पहुंचते ही चट उसकी बड़ी-बड़ी आंखें फैल जाती और मुंह बाकर कर्कशराग रोना चालू हो जाता. मनोज जैसे बेहया भी बुनकी के फ्रॉक पर हाथ धरने से बचते थे. मुझे दिखती तो मैं उधर ध्‍यान भी न देता, गोद में बाबूजी का फौजी जूता लिए खेलता बझा रहता (बहुत बार जूते पर सोमारु बो के बेलाउज टांग देता कि मेरे हाथ जूता देखकर कोई मुझसे छीन न ले. गणेश और शंकर बहुत बार छीन लेते थे ही. फिर मैं खिड़की पर खड़ा होकर देर तक रोता रहता. इस दौरान कोई फुरगुद्दी चिरैया खिड़की पर आती तो रोते-रोते हाथ मारकर उसे उड़ा भी देता. इसी बीच कभी भूख लग जाती, या तेभागा पीशीमां स्‍टील के प्‍लेट में चार केले लिये आती और केलों के लिए झगड़ने में तब रोना स्‍थगित करना होता). ताप्‍ती दीदी ही होती जो जब-तब बुनकी के सामने कमर पर हाथ बांधे अड़ी सवाल करती, ‘फ्रॉके की लुकियेछिस रे?’

बुनकी फ्रॉक के तीन फूलों पर हाथ कसे आंखें बड़ी करके जवाब देती, ‘चिउरा अउर गूर. अमके बूक लगेगी तो काउंगी!’ फ्रॉक पर हाथ दाबे वही बुनकी टुपुर से कोस्‍चन कर रही थी, ‘बियाह में किया होता ऐ तुपुल?’

मेरी बाबूजी के जूते में नाक फंसी थी, टुपुर इस कमरे से उस कमरे दौड़ लगा रही थी शायद इसीलिए बंगाली अखबार के पुराने पन्‍ने फाड़ने में बझा मनोज को लगा हो कि टुपुर की जगह वही जवाब दे दे. उसी ने कहा, ‘एगो लरका और एगो लरकी नेया सारी और नवका धोती का फेंटा बांधके चकरी घूम लें माने उनका बियाह हो गया बूझी?’

हर चौथे घंटे घर के किसी कोने या दलानी में या आंगन की दीवार से सटे बच्‍चों का ‘बियाह’ का खेल शुरु हो जाता. हाथ में लाल गमछा फैलाये भागकर तुनू हमेशा आगे खड़ी हो जाती कि किसी के भी साथ फेंटा बांधकर उसका ‘बियाह’ हो जाये, मगर अभी तक हो सकी नहीं थी. असल वाला ब्याह संजू चाचा के हो रहा था और वही मसला था जो अचानक जसोदा फुआ हाथ के चाय का कप एक ओर धरकर एकदम रोने लगी. थोड़ी देर में उनकी देखादेखी मंजरी मौसी और जयपरकास की मम्‍मीओ रोये लगीं. एकदम्‍मे रोये-धोये वाला माहौल खड़ा हो गया. बात थी भी रोये वाली. जयपरकास की मम्‍मी रोते-रोते अपना चाय खतम कीं और बोलीं दुनिया में कहिंयो नहीं होये वाला किस्‍सा ई घरै देख रही हैं और अबले उनके बिस्‍सास नहीं हो रहा! जसोदा फुआ आंख का लोर पर साड़ी छुआते बोली, ‘तेईस तारीक (बियाह का तीथी) आके निकल जायेगा तब करियेगा बिषवास!’

बरीच्‍छा दुल्‍हे की गैरहाजिरी में संपन्‍न करना पड़ा था, दुल्‍हा साहब उपस्थित हो नहीं सके थे मगर अब तिलक के मात्र पांच दिन बाकी रह गए थे और संजू चाचा के घर पहुंचे की कहिंयो कोई खबर नहीं थी तो स्‍वाभाविक था घर की औरतें घबरा रही थीं. जसोदा फुआ पक्‍के भरोसे से दुखी हो रही थी, ‘तेईैस तारीक आके निकल जायेगा लेकिन तू लोक देखना संजुआ हाथै नै आवेगा! ई घर का पुरनका इतिहास है. सादी के तीथी तै हो जाता है और दुल्‍हा बाबू लापतै रहते हैं! तू लोक बताओ केतना टैम से संजुआ घरै नै आया है? दू बरीस आठ महीना! और अइसा छौंड़ा का पीछे तू लोक पंडिजी का संगै पंचाग देखके तीथी-दिबस पर मोहर गाड़ दी. एतना देमाग छांटे वाला लोक सब है तब्‍ब केहू के बुद्धि काम नहीं किया? आज ले कहींयो सुने हैं जी कि दुल्‍हा नतारत है और आप उसका अपसेंसिये में बरीच्‍छा फरिया लिये? अरे? त‍ जाइये उसका अपसेंसी में बियोहो निपटा लीजिए, कवन जरुरत है दुल्‍हा के!’

चर्चा छिड़ी तो दूसरे किस्‍से बाहर आये. खबर हुई मनोहर चाचा भी तीन बरस से घर नहीं आये. रामतीरथ इनलैंट में लिखते हैं आ रहे हैं पहुंच रहे हैं मगर गाड़ी वाला दिन फिर कवनो काम निकल जाता है. डिप्‍टी छोड़ के नहीं आ सकते. डिप्‍टी परिवार से आगा है. डिप्‍टी भगवानो से आगा है! बाबूजी कब से नहीं आये की चरचा छिड़ते ही मां का चेहरा सफेद पड़ जाता. तब कलम्‍मा काकी हाथ ऊपर किये चिल्‍लाने पर मजबूर होती, ‘एय अब्‍बी चुप करो आप लोक, जिसको आने का ओगा, आयेगा, नेई आनेवाला नेई आयेगा, द वर्ल्‍ड इस नाट एंडिंग बिकॉस आफ दैट!’

(बाकी)

5 comments:

  1. यह भी मारूं है साहब जी। जेदा कुछ कहने का हालात में नहीं है अभी। डिप्टी जाने का हड़बड़ाहट हावी है। बाय बोल के जा रहे हैं। शाम को फ़िर बांचेगे आकर! तो लेते हैं डिप्टी ब्रेक!

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  2. बढ़िया । मुझे भी बाकी का इंतजार है ।

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  3. @भलके लोगो, शुरकिया,
    मगर खिलेगा त देखेंगे? आंख फाड़े देखते रहें त शायद खिले भी लगे?

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  4. बहुतै बढ़िया है जी ! पूरा कब्ब होगा .

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