Wednesday, April 27, 2011

सप्‍प देना चाकू दन्‍न देना गन (गरमी के नहीं, गुफ्तगू का)

फ़िल्‍म के शुरु में ही इंजन के सुरबद्ध शोरिल संगत में दबे दर्द के अचानक ऊपर चले आने के तने क्‍लोज़अप्‍स बझाना, कुछ हमारे भीतर बजाना शुरु करते हैं. अलबत्‍ता यह योगेश और सलिल चौधुरी के कहीं दूर जब दिन ढल जाये के आनंदी सुरीलेपन का बजना नहीं होता, कनपटी पर अंग्रेजी का एस ए डी (SAD) जैसा कुछ अचक्‍के का जगने लगना होता. दांतों के बीच नंगा चाकू दबाये धूप की भीड़ में कोई नंगे पांव भागता दिखता, थोड़ी देर को वहम होता मेरा ही कोई डबल है बदहवास, बलतोड़ के दर्द में ऐंठा म‍दहोश भागा जाता है. मगर फिर गोद की किताब और गरदन के उमस को पोंछते हाथ से तसल्‍ली होती कि मैं भगा हुआ भले हूं, कहीं भाग नहीं रहा. मस्‍ट बी सम अदर किड्स, हैविंग अ प्‍लीज़ेंट करवरसेशन, देन शायद बहस हाथ से छूट गई हो, पीठ पीछे कहीं बम फूट गया हो. ए केस ऑफ एक्‍सप्‍लोडिंग मैंगोज़ जैसा कोई सेनारियो? इट्स ऑल मिक्‍स्‍ड अप ऐक्‍चुअली. मीनाक्षी मुखर्जी को नहीं पढ़ा है. न पोस्‍ट इंडिपेंडेंस बांग्‍ला कविताओं का नॉट सो वेल ट्रांसलेटेड, परफेक्‍ट एंथालॉजी. पोस्‍ट इंडिपेंडेंस ऑरिजनल भोजपुरी की कविताएं भी नहीं पढ़ सका हूं. सो द मैन विद मीनाक्षीस बुक इन हिस गोद ऑल्‍सो मस्‍ट बी समवन एल्‍स, मेरे हाथ किताब नहीं, ओपेन का एक पुरनका अंक है और मैं अरणव सिन्‍हा को पढ़ रहा हूं, बिना जाने कि आई डोंट नो व्‍हॉट इस माई टेक ऑन दिस. जबकि मैन ऑन द रेल की कहानी काफी आगे बढ़ गई है. कनपटी और सिर का दर्द भी. आंबीयेंस में एक नंगा चाकू है, धूप में नंगे पांव भी, बट इट्स स्टिल, ऑल मिक्‍स्‍ड अप. एन ओल्‍ड फ्रेच चैप हैस रिटेन सम मैजेस्टिक लाइन्‍स इन हिस मैजेस्टिक बुक (पार्ट फोर, द वर्ल्‍ड एंड इट्स इनहैबिटेंट्स, अध्‍याय चौदह: द मैजिक कारपेट), ऑब्‍जर्वेसंस, और सिर्फ़ हिंदुस्‍तान का ही नहीं, बांग्‍ला और पाकिस्‍तानी सैरे भी समेटे हैं बंदे ने, और बड़ी मुहब्‍बत से समेटे हैं. अब यह दीगर बात है कि इसका हिंदी तो हिंदी कभी बांग्‍ला में भी अनुवाद हुआ है या नहीं. नहीं हुआ तो क्‍यों नहीं हुआ, और नहीं हुओं का हमारा समाज सभ्‍यता के किस पायदान पर गोड़ फंसाये खड़ा है. भाषा और साहित्‍य और समाजशास्‍त्र तो हुआ, देश में विज्ञान के अवदान पर भी यह एक छोटी टिप्‍पणी है, उड़ते में नज़र गई. इतना सारा जख़्म है, मगर मालूम नहीं चाकू किसके दांतों के बीच है. नॉट बीटवीन माई टीथ फॉर श्‍युअर.

(बाबू सुमित कुमार कटारिया के लिए)

Sunday, April 24, 2011

नसा नीयरे राखिये..

संभव है उस दिन राजिंदर भैया बेल का शरबत में कच्‍चा संतरा घोलकर पिये रहे हों मगर नशे में एकदम नहीं थे जब बोले, ‘स्‍साला दारु हम पीते हैं, नसा जमाने के चढ़ता है! अरे, चढ़ा है तो खुद्दे उतारिये फिर? सगरे सिकायत कौची का कर रहे हैं? हम आपके चुल्‍लू में पियाने नहीं न लेके गये थे जी?’

कलम्‍मा काकी भी जानती है कोई किसी को नशा कराने नहीं ले जाता, लोग खुद अपना नशा सिरजते हैं. शमा फतेहअली, लेवी स्‍त्रास, प्रमोद सिंह, बुनकी कुमारी राय किसी नशे के असर में थोड़े नशे में रहते हैं? नशा है जो बहुत बार उनके संपर्क में आकर बेमज़ा, बेमतलब हुआ जाता है. दुनिया में आने की मेरी (सच्‍ची) कहानी की जो गुप्‍त कापी लिये बाबा फरार हुए वह इसलिए नहीं कि उनके नाक के बाल और मसूड़े की चिकनाई पर हुक्‍के के धुएं और पान-कत्‍था रस की तलब चढ़ी रहती थी, न. वो कथरस का खुमार होता जिसमें उनकी नज़रें उलट जातीं, मुंह में लाल पीक का आलता चढ़ाये अंड-बंड अलापते अपनी लुकाठी घरे ही भूल वो अलबलाये जंगल निकल जाते, फिर तीन-तीन उनकी खबर न लगती! कलम्‍मा काकी जानती हैं आदमी पर क्‍या, कौन नशा चढ़ता है, क्‍यों चढ़ता है. सक्‍करिया ने अपनी कहानियां उसी नशे में घुली लिखी हैं, और विजयन ने, आनन्‍द और वीकेएन ने. दुनिया में कुछ होते हैं उनके माथे मोहब्‍बत का नशा गांजे से ज्‍यादा भारी चढ़कर डोलता है, कुछ भरी हुई थाली का भात सामने पाकर बहक में गिर जाते हैं. आसमान में पतंग नाचता देख जैसे कभी-कभी ताप्‍ती दीदी कोयल नदी जाकर नहाने की जिद करने लगती हैं, तुनुआ रो-रोकर घर आसमान पर उठा लेती है कि नहीं पहनेगी तो फ्रॉक नहीं पहनेगी, और फिर नहीं ही पहनती उस दिन, किस नशे के असर में करते हैं कुछ जैसा वो करते हैं?

उन्‍चास वर्षीय (जोड़ सात महीना) चंद्रबलि मौसा पर जाने कहां से नशा चढ़ा कि अस्‍पताल के बिस्‍तरे पर असहाय से दीखते, पड़े राजिंदर भैया की असहायता के जिम्‍मेदार एक-एक छोकरे को बम से उड़ा देंगे, मगर उसके तीन दिन बाद संझा को पुलिया वाली सड़क पर देबाशीष के स्‍कूटर का जो बैलेंस बिगड़ाया और पिलियन सवार मौसा छिटकाकर गड़ही में गिरे, गिरने से ज्‍यादा बेइज्‍जत और ‘गंदा’ हुए. उसी दिन रात छत की बल्‍ली से डेढ़ हाथ का एक सांप उनके बिछौने के बाजू गिरा, और गनीमत है अंधेरे में गिरा, उजाले में गिरता तो संभव है ह्रदयगति रुकने से मौसा तत्‍क्षण संसार सिधार गये होते, कुछ पलों के अंतराल पर टार्च की रौशनी में सच के साक्षात्‍कार से मरे नहीं लेकिन वीभत्‍स रुप से भयकातर ज़रुर हो गये. और उसके अगले दिन पूरे घटनाक्रम पर निस्‍संग विहंगम दृष्टि डालकर जनार्दन पंडित ने जब भविष्‍यकामी वक्‍तव्‍य दिया कि संसार-सन्‍न चंद्रबलि राय के एकांत जीवन में सुदीर्घ तत्‍व विशेष लक्षित नहीं होते तो मौसा पर एकबारगी जैसे भय का भयानक नशा चढ़ गया और उसके बाद सब तरह की कोशिशों के, उतरने में असफल बना रहा! सामने थाली भार भात और कटोरी में नेनुआ की तरकारी देखकर बच्‍चों की तरह प्रसन्‍न हो जानेवाले मौसा को खाने से अरुचि हो गई. बुदबुदाकर सोमारु बो से कहते देखो, दीवार का पाछा कौन तलवार लेके ठाड़ा है? कुरसी पर बैठे-बैठे गरदन और गाल का पसीना पोंछते रहते, फिर एकदम से खड़ा हो जाते मानो अपने पीछे से किसी को आता देखकर डर गए हों. इसी डरावस्‍था में अस्‍सी मील पैदल चलकर जसपुर का देवी से मनौती साधने गए. लौटकर आये तो जसोदा फुआ का हाथ थामकर गिड़गिड़ाने लगे कि हम कब्‍बो किसी का कुछ नहीं बिगाड़े हैं, कवन बात का आखिर भोलेनाथ हमको सजा दे हे हैं?

ताप्‍ती दीदी चटाई पर ब्‍लाउज का बटन टांकती धीमे-धीमे गुनगुनातीं, ‘तुमि ए रकम गान करो ना कबि,’ उसे सुनकर मौसा बम-गोला होने लगते. टुपुर चकलेट की पन्‍नी से खेलती दिखती तो मौसा लपककर उसके हाथ की पन्‍नी खींच लेते, चीखकर बोलते, ‘हमसे होसियारी खेलती है रे?’ इतनी ऊंची आवाज में बोलते कि टुपुरवा का चेहरा उतर जाता, वो भागकर दीदी के पास जाकर रोने लगती. सोमारु बो कपड़ा से छानकर खास उन्‍हीं के लिए बेल का शरबत तैयार करके लाती तो मौसा एकदम से उखड़कर खड़े होते, ‘अब जहर पिलाके मारने का इरादा है? तू समझती है हम बूझते नहीं हैं?’

नीम के पेड़ के नीचे बच्‍चों से माथे में मलवाती और बच्‍चों के माथे हिमानी का नवरतन शिकाकाई तेल लगाती कलम्‍मा काकी कहती, ‘देयर इस नतिंग टू वरी. द मैन इस सिंबली ड्रंक विद फीयर, लाइक यू, किड, एंड यूअर मदर, एंड मी, आर ड्रंक इन लब!’

(बाकी..)

(ऊपर फोटो में युवा अनुसंधानी लेवी स्‍त्रास)

Wednesday, April 6, 2011

दो बुद्धि विवेकी प्रवीण प्रामाणिक संवाद..



पहिलका:

"जानते हैं, नीमन दास, आपके संग बड़ा दिक्‍कत है. हरमेसे सोचे अझुराये रहते हैं. एतना सोच के का कबारियेगा? आज के बखत में देखे वाला ई नै देख रहा है कि केहर सोचाई हो रही है. ऊ कमाई और कराई देख रहा है. करे वाला का तोड़-फोड़ के कराई में ही बिध्‍धंसक क्रांतिकारी सोच का उजियारो दीख जा रहा है. सोचाई के पजामा का पीछा लुकाके कराई के कुआं में कूद पड़ि‍ये, महराज, अऊर दुसरका रस्‍ता नहीं है!"

***

दुसरका:

"नींद के त एकदम्‍मे गजन हो गया है, जी, अइबे नै करता है!"
"सुत नहीं रहे हैं?"
"अरे, कहंवा से सुत्‍तेंगे, रात भर सपना आके छेका-छेकी का खेला खेलता रहता है!"

Tuesday, April 5, 2011

चलते-चलते की बात..

अपने में गुमसुम जुसेप्‍पे गुफ्तगू कर रहा था, या शायद मैं ही था (जुसेप्‍पे सिर झुकाये, घुटने पर पंजा टिकाये सिर्फ़ सुन रहा था?).

“चलते-चलते के ज़रा के दरमियान बात कितना बदल जाती है, दोस्‍त. एकदम मीठे में जाने कहां का कसैला चला आता है. फिर कसैले धड़े पर मिस्री की एक डली चढ़ी नज़र आती है, गौर से कान लगाओ तो देखो हमेशा ‘रशोमन’ की तर्ज़ पर किस्‍से के तीन समानान्‍तर पाठ साथ चलते मिलते हैं, वही बात ज़रा-ज़रा बदलती चलती है. एक का मतलब दूसरे तक पहुंचकर कुछ का कुछ हुआ जाता है. अंतर की अपेक्षा और भावनात्‍मक दबाव में गुलकंद नीम और नीम छोहाड़े के स्‍वाद में बदलता रहता है, व्‍हाट फ़नी बिजनेस इज़ द टेलिंग ऑव अ सिंपल टेल?”

“चलते-चलते में बात हमेशा, हर घड़ी बदलती रहती है, रहेगी. फ़ोन पर तुम डिफ़रैंट साउंड करोगे, घंटे भर बाद सिर को हाथों में बांधे सामने बैठे होगे तो आई वुड बी हीयरिंग अ डिफ़रैंट म्‍यूज़ि‍क, व्‍हाई इट इज़ सो?”

जुसेप्‍पे के चेहरे पर एक ख़ामोश मुस्‍कराहट फैल गई, हालांकि हम दोनों ही जानते थे कि हम एक उदास कमरे में बैठे थे.

“फिर थोड़ी देर एक बच्‍चे की संगत में बैठो. हंसते हुए बच्‍चे की. देखोगे कितनी जल्‍दी उसका रोना सुनाई पड़ता है. और फिर उसके रोने में हंसना. परहैप्‍स दैट इज़ हाऊ लाईफ़ इज़. वही बने रहने के दिखने में भी हर वक़्त सबकुछ बदलता रहता है. तुम और हम आर नॉट द सेम पीपुल हू एंटर्ड दीज़ रुम. और फिर सतह पर प्रकट रुपों का एक अन्‍य, समानान्‍तर आंतरिक मार्मिक परिदृश्‍य भी होता है जहां चीज़ें वैसी-वैसी ही नहीं होती जैसी बाहर से वे दीख रही हों. क्रिकेट की जीत पर जुनूनी खुशी मनाता दीखता मुल्‍क शायद भीतर से गहरे उदास है, शायद इसीलिए उसे इस तरह उन्‍माद में खुशी सेलेब्रेट करने की दरकार है. इस अरजेंसी में ज़रुरत है कि अदरवाइस के पथेटिक स्‍टेट और डेस्‍पेयर को भुलाये रख सके. सुख के सीमित सामाजिक भूगोल की निर्मम, रोज़ की तक़लीफ़देह सच्‍चाई को, थोड़ी देर को ही सही, झुठलाकर, समूचे समाज के सुख के नगाड़े की तरह पीटती रहे, कि अख़बार और टीवी के पर्दों पर बड़ी उदासियां छुपी रहें, छिप जायें. जितनी देर तक यह नाटक खेला जा सकता हो उसे खेलता रहे. रोते हुए बच्‍चे के सामने जैसे आदमी हंसने लगता है. कि रोता ब‍च्‍चा संगत में अपनी रुलाई भूलकर हंसने लगे. तब आप भोलेपन में बच्‍चे को बेवकूफ़ बनाते हो. अखबार रोज़-रोज़ चिल्‍लाकर, 56 पायंट बोल्‍ड में हेडलाइन चढाकर, कि ‘द वर्ल्‍ड इज़ एट अवर फीट’ हमारे टूटे दिलों की चोटखाई भावुकता को सामान बनाकर अपने उन्‍माद का धंधा किये जाते हैं. चलते-चलते में ज़ोर-ज़ोर से हंसते हुए हो सकता है हम बहुत बेचारे दिखते हों. एक बात कह रहा हूं.