Tuesday, April 5, 2011

चलते-चलते की बात..

अपने में गुमसुम जुसेप्‍पे गुफ्तगू कर रहा था, या शायद मैं ही था (जुसेप्‍पे सिर झुकाये, घुटने पर पंजा टिकाये सिर्फ़ सुन रहा था?).

“चलते-चलते के ज़रा के दरमियान बात कितना बदल जाती है, दोस्‍त. एकदम मीठे में जाने कहां का कसैला चला आता है. फिर कसैले धड़े पर मिस्री की एक डली चढ़ी नज़र आती है, गौर से कान लगाओ तो देखो हमेशा ‘रशोमन’ की तर्ज़ पर किस्‍से के तीन समानान्‍तर पाठ साथ चलते मिलते हैं, वही बात ज़रा-ज़रा बदलती चलती है. एक का मतलब दूसरे तक पहुंचकर कुछ का कुछ हुआ जाता है. अंतर की अपेक्षा और भावनात्‍मक दबाव में गुलकंद नीम और नीम छोहाड़े के स्‍वाद में बदलता रहता है, व्‍हाट फ़नी बिजनेस इज़ द टेलिंग ऑव अ सिंपल टेल?”

“चलते-चलते में बात हमेशा, हर घड़ी बदलती रहती है, रहेगी. फ़ोन पर तुम डिफ़रैंट साउंड करोगे, घंटे भर बाद सिर को हाथों में बांधे सामने बैठे होगे तो आई वुड बी हीयरिंग अ डिफ़रैंट म्‍यूज़ि‍क, व्‍हाई इट इज़ सो?”

जुसेप्‍पे के चेहरे पर एक ख़ामोश मुस्‍कराहट फैल गई, हालांकि हम दोनों ही जानते थे कि हम एक उदास कमरे में बैठे थे.

“फिर थोड़ी देर एक बच्‍चे की संगत में बैठो. हंसते हुए बच्‍चे की. देखोगे कितनी जल्‍दी उसका रोना सुनाई पड़ता है. और फिर उसके रोने में हंसना. परहैप्‍स दैट इज़ हाऊ लाईफ़ इज़. वही बने रहने के दिखने में भी हर वक़्त सबकुछ बदलता रहता है. तुम और हम आर नॉट द सेम पीपुल हू एंटर्ड दीज़ रुम. और फिर सतह पर प्रकट रुपों का एक अन्‍य, समानान्‍तर आंतरिक मार्मिक परिदृश्‍य भी होता है जहां चीज़ें वैसी-वैसी ही नहीं होती जैसी बाहर से वे दीख रही हों. क्रिकेट की जीत पर जुनूनी खुशी मनाता दीखता मुल्‍क शायद भीतर से गहरे उदास है, शायद इसीलिए उसे इस तरह उन्‍माद में खुशी सेलेब्रेट करने की दरकार है. इस अरजेंसी में ज़रुरत है कि अदरवाइस के पथेटिक स्‍टेट और डेस्‍पेयर को भुलाये रख सके. सुख के सीमित सामाजिक भूगोल की निर्मम, रोज़ की तक़लीफ़देह सच्‍चाई को, थोड़ी देर को ही सही, झुठलाकर, समूचे समाज के सुख के नगाड़े की तरह पीटती रहे, कि अख़बार और टीवी के पर्दों पर बड़ी उदासियां छुपी रहें, छिप जायें. जितनी देर तक यह नाटक खेला जा सकता हो उसे खेलता रहे. रोते हुए बच्‍चे के सामने जैसे आदमी हंसने लगता है. कि रोता ब‍च्‍चा संगत में अपनी रुलाई भूलकर हंसने लगे. तब आप भोलेपन में बच्‍चे को बेवकूफ़ बनाते हो. अखबार रोज़-रोज़ चिल्‍लाकर, 56 पायंट बोल्‍ड में हेडलाइन चढाकर, कि ‘द वर्ल्‍ड इज़ एट अवर फीट’ हमारे टूटे दिलों की चोटखाई भावुकता को सामान बनाकर अपने उन्‍माद का धंधा किये जाते हैं. चलते-चलते में ज़ोर-ज़ोर से हंसते हुए हो सकता है हम बहुत बेचारे दिखते हों. एक बात कह रहा हूं.

2 comments:

  1. क्रिकेट की जीत पर जुनूनी खुशी मनाता दीखता मुल्‍क शायद भीतर से गहरे उदास है


    अखबार रोज़-रोज़ चिल्‍लाकर, 56 पायंट बोल्‍ड में हेडलाइन चढाकर, कि ‘द वर्ल्‍ड इज़ एट अवर फीट’

    मन की बतिया .....

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  2. kya baat hai.... shandaar. likhte rahiye . bhale hi tippaniya na mile. waise blogging me bhi mathadhishi hai aur adhik tippaniyan zyadatar tuchche bloggers ko hi milti hain . serious padhne wale ya samjhne wale kitne hain !

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