Wednesday, April 6, 2011

दो बुद्धि विवेकी प्रवीण प्रामाणिक संवाद..



पहिलका:

"जानते हैं, नीमन दास, आपके संग बड़ा दिक्‍कत है. हरमेसे सोचे अझुराये रहते हैं. एतना सोच के का कबारियेगा? आज के बखत में देखे वाला ई नै देख रहा है कि केहर सोचाई हो रही है. ऊ कमाई और कराई देख रहा है. करे वाला का तोड़-फोड़ के कराई में ही बिध्‍धंसक क्रांतिकारी सोच का उजियारो दीख जा रहा है. सोचाई के पजामा का पीछा लुकाके कराई के कुआं में कूद पड़ि‍ये, महराज, अऊर दुसरका रस्‍ता नहीं है!"

***

दुसरका:

"नींद के त एकदम्‍मे गजन हो गया है, जी, अइबे नै करता है!"
"सुत नहीं रहे हैं?"
"अरे, कहंवा से सुत्‍तेंगे, रात भर सपना आके छेका-छेकी का खेला खेलता रहता है!"

3 comments:

  1. कुआं रहेगा तब ने केहू कूदेगा.. अब तो तलवो सब भराइए गया है.. गड़ही त खाली नजर आता है एने ओने..उहवों बिना पजामा के कूदने पर दुनिया भर के जोंक अझुरा जाएगा देहि में...कउनो राह नाहीं है।

    ..हमरा हियां के गीता घाट के बाबा एहि से कह गए हैं : जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए, सीता-राम सीता-राम सीता-राम कहिए..

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  2. bahute mazzaa aayi gavaa bhayiyaa...

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