Sunday, April 24, 2011

नसा नीयरे राखिये..

संभव है उस दिन राजिंदर भैया बेल का शरबत में कच्‍चा संतरा घोलकर पिये रहे हों मगर नशे में एकदम नहीं थे जब बोले, ‘स्‍साला दारु हम पीते हैं, नसा जमाने के चढ़ता है! अरे, चढ़ा है तो खुद्दे उतारिये फिर? सगरे सिकायत कौची का कर रहे हैं? हम आपके चुल्‍लू में पियाने नहीं न लेके गये थे जी?’

कलम्‍मा काकी भी जानती है कोई किसी को नशा कराने नहीं ले जाता, लोग खुद अपना नशा सिरजते हैं. शमा फतेहअली, लेवी स्‍त्रास, प्रमोद सिंह, बुनकी कुमारी राय किसी नशे के असर में थोड़े नशे में रहते हैं? नशा है जो बहुत बार उनके संपर्क में आकर बेमज़ा, बेमतलब हुआ जाता है. दुनिया में आने की मेरी (सच्‍ची) कहानी की जो गुप्‍त कापी लिये बाबा फरार हुए वह इसलिए नहीं कि उनके नाक के बाल और मसूड़े की चिकनाई पर हुक्‍के के धुएं और पान-कत्‍था रस की तलब चढ़ी रहती थी, न. वो कथरस का खुमार होता जिसमें उनकी नज़रें उलट जातीं, मुंह में लाल पीक का आलता चढ़ाये अंड-बंड अलापते अपनी लुकाठी घरे ही भूल वो अलबलाये जंगल निकल जाते, फिर तीन-तीन उनकी खबर न लगती! कलम्‍मा काकी जानती हैं आदमी पर क्‍या, कौन नशा चढ़ता है, क्‍यों चढ़ता है. सक्‍करिया ने अपनी कहानियां उसी नशे में घुली लिखी हैं, और विजयन ने, आनन्‍द और वीकेएन ने. दुनिया में कुछ होते हैं उनके माथे मोहब्‍बत का नशा गांजे से ज्‍यादा भारी चढ़कर डोलता है, कुछ भरी हुई थाली का भात सामने पाकर बहक में गिर जाते हैं. आसमान में पतंग नाचता देख जैसे कभी-कभी ताप्‍ती दीदी कोयल नदी जाकर नहाने की जिद करने लगती हैं, तुनुआ रो-रोकर घर आसमान पर उठा लेती है कि नहीं पहनेगी तो फ्रॉक नहीं पहनेगी, और फिर नहीं ही पहनती उस दिन, किस नशे के असर में करते हैं कुछ जैसा वो करते हैं?

उन्‍चास वर्षीय (जोड़ सात महीना) चंद्रबलि मौसा पर जाने कहां से नशा चढ़ा कि अस्‍पताल के बिस्‍तरे पर असहाय से दीखते, पड़े राजिंदर भैया की असहायता के जिम्‍मेदार एक-एक छोकरे को बम से उड़ा देंगे, मगर उसके तीन दिन बाद संझा को पुलिया वाली सड़क पर देबाशीष के स्‍कूटर का जो बैलेंस बिगड़ाया और पिलियन सवार मौसा छिटकाकर गड़ही में गिरे, गिरने से ज्‍यादा बेइज्‍जत और ‘गंदा’ हुए. उसी दिन रात छत की बल्‍ली से डेढ़ हाथ का एक सांप उनके बिछौने के बाजू गिरा, और गनीमत है अंधेरे में गिरा, उजाले में गिरता तो संभव है ह्रदयगति रुकने से मौसा तत्‍क्षण संसार सिधार गये होते, कुछ पलों के अंतराल पर टार्च की रौशनी में सच के साक्षात्‍कार से मरे नहीं लेकिन वीभत्‍स रुप से भयकातर ज़रुर हो गये. और उसके अगले दिन पूरे घटनाक्रम पर निस्‍संग विहंगम दृष्टि डालकर जनार्दन पंडित ने जब भविष्‍यकामी वक्‍तव्‍य दिया कि संसार-सन्‍न चंद्रबलि राय के एकांत जीवन में सुदीर्घ तत्‍व विशेष लक्षित नहीं होते तो मौसा पर एकबारगी जैसे भय का भयानक नशा चढ़ गया और उसके बाद सब तरह की कोशिशों के, उतरने में असफल बना रहा! सामने थाली भार भात और कटोरी में नेनुआ की तरकारी देखकर बच्‍चों की तरह प्रसन्‍न हो जानेवाले मौसा को खाने से अरुचि हो गई. बुदबुदाकर सोमारु बो से कहते देखो, दीवार का पाछा कौन तलवार लेके ठाड़ा है? कुरसी पर बैठे-बैठे गरदन और गाल का पसीना पोंछते रहते, फिर एकदम से खड़ा हो जाते मानो अपने पीछे से किसी को आता देखकर डर गए हों. इसी डरावस्‍था में अस्‍सी मील पैदल चलकर जसपुर का देवी से मनौती साधने गए. लौटकर आये तो जसोदा फुआ का हाथ थामकर गिड़गिड़ाने लगे कि हम कब्‍बो किसी का कुछ नहीं बिगाड़े हैं, कवन बात का आखिर भोलेनाथ हमको सजा दे हे हैं?

ताप्‍ती दीदी चटाई पर ब्‍लाउज का बटन टांकती धीमे-धीमे गुनगुनातीं, ‘तुमि ए रकम गान करो ना कबि,’ उसे सुनकर मौसा बम-गोला होने लगते. टुपुर चकलेट की पन्‍नी से खेलती दिखती तो मौसा लपककर उसके हाथ की पन्‍नी खींच लेते, चीखकर बोलते, ‘हमसे होसियारी खेलती है रे?’ इतनी ऊंची आवाज में बोलते कि टुपुरवा का चेहरा उतर जाता, वो भागकर दीदी के पास जाकर रोने लगती. सोमारु बो कपड़ा से छानकर खास उन्‍हीं के लिए बेल का शरबत तैयार करके लाती तो मौसा एकदम से उखड़कर खड़े होते, ‘अब जहर पिलाके मारने का इरादा है? तू समझती है हम बूझते नहीं हैं?’

नीम के पेड़ के नीचे बच्‍चों से माथे में मलवाती और बच्‍चों के माथे हिमानी का नवरतन शिकाकाई तेल लगाती कलम्‍मा काकी कहती, ‘देयर इस नतिंग टू वरी. द मैन इस सिंबली ड्रंक विद फीयर, लाइक यू, किड, एंड यूअर मदर, एंड मी, आर ड्रंक इन लब!’

(बाकी..)

(ऊपर फोटो में युवा अनुसंधानी लेवी स्‍त्रास)

9 comments:

  1. सबका नशा विशेष,
    लगे न उनको ठेस।

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  2. nasha me kaun sasura nahi hai ji..

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  3. गहन अनुभूतियों और जीवन दर्शन से परिपूर्ण इस आलेख के लिए बधाई।

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  4. ‘देयर इस नतिंग टू वरी. द मैन इस सिंबली ड्रंक विद फीयर, लाइक यू, किड, एंड यूअर मदर, एंड मी, आर ड्रंक इन लब!’

    kya baat hai ..yahi toh hai asali nasha

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  5. जीवन के तमाम सत्यों में से एक यह भी सत्य है...... बहरहाल संवेदनशील पोस्ट के लिए बधाई

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  6. पहले तो अच्छा लगा...कुछ जगहों पर खुद को भी पाया और कुछ परिचित से चेहरे जो अब धुधले हो चले है वो भी सामने आये...
    लयबद्ध प्रस्तुति के लिए शुक्रिया..

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  7. पहले तो अच्छा लगा...कुछ जगहों पर खुद को भी पाया और कुछ परिचित से चेहरे जो अब धुधले हो चले है वो भी सामने आये...
    लयबद्ध प्रस्तुति के लिए शुक्रिया..

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