Thursday, May 19, 2011

नीच, धूप बीचोंबीच..



जीवन ओब्‍लॉमोव के उनींदे अंधेरों में रह-रहकर जागता होगा
कलास्‍सो की लहरदार सुरमई पर सन्‍नाता, मुंदी आंखों भागता
चिलचिलाती धूप में पटखनियां खाती होगी पीठ, सिर खौराता
बाल नुचते होंगे (हिमानी नवरत्‍न 100% ठंडा आयुर्वेदिक, तेल
थरथराता), टुंड्रा प्रदेश के छोर पर ‘खाने का अंत’ के किस्‍से
चुपचाप अधरात दरवाज़ा खटखटाते, दूसरे और कई किस्‍सों
की गांठ बनाते, अचक्‍के एकदम कहीं कौवा ककर्श चिंचियाता
’वर्ल्‍ड वीयरी, आर यू, मेट? आर यू आर यू, वर्ल्‍ड वीयरी, हं?’
मैं दहकता मुंह से सीटी छोड़ता, मुनि योगवशिष्‍ट होते, मंत्राते
‘संसार कहानी सुनाने के बाद बचे उसके प्रभाव जैसा है.’
(यह ख़ास चंद्रभूषण के लिए)

Wednesday, May 11, 2011

बड़ी धूप है मगर..


धीमी आवाज़ में लड़की शिकायत करती दिख रही थी. लड़का गुमसुम सुनता, फिर अचानक वो कहने लगता लड़की मुंह फेर सड़क के दूसरे ओर देखने लगती. ज़रा देर को वहम होता लड़का लड़की को मनाने की कोशिश करेगा, जबकि बाद में फिर ऐसा कुछ होता नहीं. लड़का जेब से तहा रुमाल निकालकर उसे कनपटी और गरदन के पीछे फेरने लगता. हैरान गरमी क्‍या आफत कर रही है जैसी बेमौज़ूं बात करने लगता. लड़की दुखी हो जाती कि इतना कम समय है उसके पास फिर ये गरमी की बात क्‍यों कर रहा है. हालांकि इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि गरमी खासी थी. गरदन और हाथ पर धूप कांटे की तरह चुभती. रहते-रहते माथा सुन्‍न हो जाता, पैर बेकाबू होने लगते. मगर कुछ-कुछ कुपोषण की शिकार पतली-दुबली सांवली लड़की के लिए इस वक्‍त गरमी नहीं, कितना कम समय है उन दोनों के पास का सवाल था. शायद इसीलिए वह इतने गुस्‍से में थी. हालांकि बाहर से देखने पर लगता वह चिलकती धूप के असर में हांफ रही है. एक पानी के ठेलेवाले के बगल से गुज़रते लड़के ने सुझाव दिया वो चाहे तो जीरा या पुदीना मिला एक गिलास पानी पी सकती है.
लड़की ने कहा शटअप, मुझे प्‍यास नहीं है.
लड़के की जेब में घंटी बजी. लड़के ने मोबाइल निकालकर देखा फेसबुक पर प्रधान सर के स्‍टेटस की सूचना थी: “पाँचों विधान सभा चुनावों में अगर कांग्रेस घुमाफिराकर भी जीत जाती है तो ये सब नंगा नाचेंगे. सबूत पेट्रोल का दाम बढ़ाने की बात करके अभी से दे रहे हैं. चिदंबरम एंड कंपनी सर चढ़कर बोलेंगे कि जनता हमारे साथ है. माकपा के कुकर्मों की सजा समूचे वाम और जनता को भुगतनी पड़ रही है.” लड़के ने मोबाइल जेब में रखकर उसी हाथ से लड़की का कंधा छू लिया, लड़की से कहा, “प्‍लीज़, तुम इस तरह बिहेव मत करो. हर चीज़ के लिए मैं रेस्‍पॉंसिबल नहीं हूं.”
लड़की चुपचाप धूप में चलती रही. लड़की के बाल पसीना या जाने किसके असर में सब उसके माथे से चिपक रहे थे. लड़की के ठीक पीछे आगरा या राजस्‍थान का कोई रंग-बिरंगा कबीलाई बंजारों का परिवार चल रहा था. एक सात-आठ साल की बच्‍ची थी जिसके माथे पर चिकट बाल और बायें पैर में बड़ा सा घाव था. बच्‍ची कुछ लंगड़ाकर चल रही थी. डॉक्‍टरी ईलाज के अभाव में शायद वह आगे का पूरा जीवन इसी तरह लंगड़ाती चलती रहे. मगर लड़की का उधर ध्‍यान नहीं था. लड़के ने फिर कोशिश की, “तुम्‍हें आइडिया है मैं कितने टेंशन में हूं? बत्रा ने प्रॉमिस किया था कि मैं ज्‍यादा दिन खाली नहीं बैठूंगा, मगर चार महीने तो गए न?”
“और तुम अभी भी खाली बैठे हो,” लड़की ने चिढ़कर कहा, “सिर्फ मुझसे मिलने के लिए तुम्‍हारे पास टाईम नहीं रहता.”
“तुम भी ऐसे बात करती हो जैसे जानती नहीं. नौकरी के समय नौकरी थी, अभी नौकरी नहीं होने की नौकरी है, तुम्‍हें दिखता नहीं कितना फंसा रहता हूं?”
धूप में लड़की का माथा चल रहा था, उसे लड़के से रुपये भर की सहानुभूति नहीं थी. शायद उसे लड़के से प्‍यार था भी नहीं और बेमतलब ही वह परेशान होकर खाना स्किप कर रही थी कि लड़का नौकरी के चक्‍कर में किसी दूसरे शहर चला गया तो वह नींद की गोलियां खा लेगी या कुछ कर लेगी एटसेट्रा. भौं का पसीना पोंछती लड़की ने इतमीनान से कहा, “मेरी अपनी नौकरी है. कब फंसे हो और कब फ्री हो का हिसाब लगाते रहने का टाईम नहीं मेरे पास. वो जकारिया तुम्‍हें नौकरी दिलवा रहा था न, तुम जाओ कोलकाता! तुम्‍हारी वो बंगाली लड़की भी है उधर, खुश रहना उसके साथ! मुझे फिर फोन करने की ज़रुरत नहीं.”
लड़के की तबीयत हुई हाथ बढ़ाकर जोरों से लड़की के एक तमाचा जड़ दे, मगर बढ़े हाथ से फिर वह गरदन का पसीना पोंछने लगा, कातरता में मुस्‍कराने. लड़की ने तपाक से चेहरा फेर लिया. कहना मुश्किल है उसके गाल पर गिरी आई वो आंसू की धार थी, या सिर्फ पसीना था. वैसे भी लड़की किसी वक्‍त बेहोश हो जाये जैसी अच्‍छी-खासी धूप थी. लड़की का ललाट गरमी में चमक रहा था. लड़का अचानक हंसने लगा था.

Tuesday, May 10, 2011

नंदू से बातचीत..



फिर दिल में कुछ नहीं है नंदू
दारु की खास ब्रांड की एक बोतल है कहीं पिये थे
जी रहे जैसा कुछ उस रात हम भी जिये थे
किसी के पैर में अच्छा कोई जूता था, समूचा
गाढ़ी नीली कमीज़ पर गाढ़े लाल छोटे फूल
वैसा ही कुछ मैं भी कहीं पहनना चाह रहा था
कोई लड़़की थी क्या तो नाम था उसके साथ हंसना
हाथ थामे सीढ़ि‍यां उतरकर तेज़ी से भागते सड़क लांघ ली थी
इलैक्ट्रॉनिक अप्लायेंसेस के किसी लकदक शो-रुम
किसी चकमक गजेट की कीमत पूछता
लड़की भौंचक मुझे देखती रही, भींचकर
उंगलियां दबा ली दिल में, पाकिस्तानी या फिलीस्तीनी
शायर था कोई उसके नज़्म की चार लाइनें
गुनगुनाकर मैंने भी गा लिया था दिल में
कुल सतरह से उन्नीस हज़ार
के आसपास का हिसाब है नंदू, इससे ज़्यादा
का हिसाब बनाकर रक्तचाप चढ़ाना
और हृदयाघात पाने का पॉलिसी पाना है दोस्त
इससे आगे दिल में कुछ नहीं है नंदू
बांस का जला जंगल है झींगुर की कोरस सिंगिंग है
फुआ का भुला फोन नंबर है, मौसा की मातमी में
तत्कांल से टिकट निकलवाने की मेरी हारी कोशिशें
गांव न लौटने की करुण सिफ़ारिशें हैं
इस बस से उतरकर उस बस चढ़ना
रहता है, साढ़े तीन घंटे रोज़ इसी
आने-जाने में निकल जाते हैं
फिर मालूम नहीं नये ऑफिस में क्या है
दिन भर हंसता रहता हूं मगर
वहां कोई मुझे पसन्द नहीं करता
साथ बैठकर लंच करना
जी का जंजाल हो जाता है
रोज़ लगता है आज आखिरी दिन है
फूल सजाने की फुरसत कहां बनती है
तुम्हीं को मुंह दिखाने की बोलो बनती है?
तुम्हारे सिवा कोई दोस्‍ती जैसी दोस्ती भी नहीं है सच
और स्साले मिले हो इतने महीनों बाद नंदू
तो पूछते हो क्या है दिल में
कुछ नहीं बांस का जला जंगल है नंदू
तुम सुनाओ आजकल किधर रहते हो.


(ऊपर रेनातो गत्‍तुसो की चित्रकारी)

Monday, May 9, 2011

डेथ इन द टाईम ऑफ़ सर्वेइंग..

पहिला बात, दुनिया में आने की मेरी (झूठी) कहानी से कवनो तरीका से इसको कन्‍फ़ूज़ मत कीजिएगा. डैरक्‍टेली (या गोपनो तरीके से) ये हमरी कहानी हइयो नहीं है. कवनो रहल रहे राबर्ट[1], उनकी है. उनके दुर्भाग की है. ओह, जीबन का सर्बे का माया भी कइसन-कइसन खेल खेलता है, जइसन चंदरीका मौसा बोलते-बोलते जीवन के ओ पार चहुंप गए. अजब बात है हम अभी येहीये पार हैं, लीजिए, राबर्ट जी का कथा संभालिये, हम पीछा का तरफ हटते हुए पृष्‍ठभूमि में जाता हूं.

माथा पर बड़कन फैमिली-बोझा था तब्‍बो जवान सुखी था. बिना उस संपूरन के कहीं डेग नहीं भरते. नौ बरिस में नौ बच्‍चा का महतारी-महत्‍त मुकुट सुसोभित, शारलोट (अपनी बुड़बकी में अब इनके हारलोट न समझे लगियेगा) और दुनो बड़का बुतरु को लिये यात्रा पर निकले राबर्ट साहब. जब नाव का सुबिस्‍ता के राह में रुकावट पड़ जाती और जमीने-जमीन जाये के सिवा और आसरा न बचता, तब काफिला चार हथियन के हवाले होती. नाव के सहज सुबिस्‍ता-बि‍हीन इस मुश्किलात परिस्थिति में सब बेचारे और बेदम हुए जाते, और क्‍यों हो जाते इसका डिटेलिन सुनिये. दो तंबू, छौ कनात, पांच असबाबधारी ऊंट, एक पालकी, एक मियाना, एक डोली, बारह भंगी, बारह कुली, बारह लश्‍कर (तंबू छावेवाला) और ई पूरी पल्‍टन की सुरक्षा बास्‍ते पचास गो सिपाही. ऐसे में कवनो आश्‍चर्ज नहीं था कोलब्रूक साहेब काहे इतना नाव के मोहब्‍बत में रहते थे.

घरौआ बतकुच्‍चन, कामकाजी टीप और तुरंतु तस्‍वीर उकेरने में कोलब्रूक साहब के जवाब नहीं था, पूरा महारती रखते. मगर भूलिये मत, कांटा गहीन बखत था. रात भर सर्बेयर जनरल साहब बाघ का दहाड़ में जग्‍गल रहते, और दिन का बखत दलदल-फंसल नाव ऊपरियाने का चिंता में बझ्झल बीतता. गोरा साहेब, मेमीन और कचकड़ा माफिक बुतरुअन के नदी किनारे ठाड़े, पूरा जवार जिला का जनता औंचक-भौंचक नजारा लेती. कि कवन दुनिया का ई कइसन मेला-तमाशा उतरा है जमीन पर! भलमानस कोलब्रूक साहब ई सारा किचाईन खुशमिजाजी से न सिरिफ बर्दाश्‍त किये जाते, सुबह-सकारे बरसात बाद के फ्रेशियल एयर नथुना में ‘स्‍टोरिन’ किये मनमोहिनी सोचते यहीये तो लाइफ है न जी? नाश्‍ता में चाहा-बघेरी, चाय पर नबाब, उपनिवेश-पूर्व हिन्‍दुस्‍तान की यहीये सुच्‍चल बालसुलभ सरलता थी. इससे बेह‍तर कौनो मुलाज़मत नहीं था, न इससे अच्‍छा कवनो दूसरा ठौर.

1860 में कोलब्रूक बाबू गंगा की सहायक नदी राप्‍ती और गोगरा की पीठे सवार पहाड़ के नजीक पहुंचे. बर्फोच्‍छादित हिमश्रृंग का पहिलका नजारा गोरखपुर पहुंचने पर हुआ! बड़ा दिन लखनऊ में साथी गोरा बाबू लोगों के साथ फरियाकर, परिवार पीछे छोड़ते, उत्‍तर-पच्छिम को कूच किये.

पहाड़ की तराई पर पहुंचते उनका साबका बाघ-बहुल दलदलिया जंगल से पड़ा. हाथीघास और बीहड़ अंधारबन का ये वहीये बदनाम तराई था जिसने इससे पहले जाने कितना पैमाईशदारों को बिना डकार लिये हजम किया था! कोलब्रूक बाबू पहुंचते ही बुखार में घिरे, बावजूद इसके जवान पीलीभीत के आसपास का बर्फानी चोटियों का पैमाईश करने में जुट्टल रहा. मगर जल्दिये ढेर भी हुआ. उससे आगे का कार्जभार मातहत विलियम वेब के सुपुर्द करके हाथ पीछे खींच लिये. और चारा नहीं था.

अप्रिल तक कोलब्रूक बाबू इतना कमज़ोर हुए कि नाव में गिरल पड़े रहे से अलग और कवनो काम लायक बचे नहीं. बुखार मलेरिया निकला, उसका ऊपर पेचिश का फांस. साहेब का दैनन्दिनी लिखाई बंद नहीं हुआ लेकिन इंदराज़ का, क्षमा कीजिएगा, हवा निकल चुका था. नदी की उतराई में, लिस्‍टलैस, बहल-बहल भादो तक जब कानपुर पहुंचे, तबीयत तबाही के कगार पर थी. सन्निपात में बौराहट चढ़ जाता. सब कहीं बरसाती काला मेघे दीखता. आनेवाला तूफान का आशंका में बारह सितम्‍बर को चमकती बिजली और कड़कते बादल-गर्जना के बीच दैनन्दिनी में दर्ज किये, “तेरह तारीख- मौसम बहुतै खराब है. तूफानी रात में सारा दिन जंगीरा में फंसल रहे. चौदह तारीख- ” तारीख और डैश के इसी संगीन मुहाने पर दैनन्दिनी समाप्‍त हुई. इक्‍कीस तारीख के सुबही, झुटपुटी बेला में राबर्ट कोलब्रूक मृत्‍यु को प्राप्‍त हुए. ए बिक्टिम टू हिज़ एक्‍जर्सन इन द कॉज़ ऑफ साइंस. अभी जवान पैंतालिसो तक नहीं पहुंचा था!

(बाकी)


[1]. सर्बेयर जनरल, सूबा बंगाल, श्री राबर्ट कोलब्रूक (1807-1808)

Saturday, May 7, 2011

बुढ़ाई दोपहर में गुफ़्तगू..



थिरकती चली आती, गाल पर थमकर चौंका जाती
ढलते चाम की त्वचा सहलाती, बुढ़ि‍या मुस्कराकर बुदबुदाती हवा है
बेमतलब है, किसी जवान जोड़े को आलसमन तकता बूढ़ा बुदबुदाता
बुढ़ि‍या गाल की हवा सहेजती बाल का रेशमीपन, हल्की कांपती
हथेलियों में फूल के नन्हें फल, सूखे पैरों के नीचे की सूखी घास
सहेजती, अकड़ी गरदन में दुलार का हिलोर, चुप्पै बेहया मुस्कियाती
बेमतलब है बेमतलब है बूढ़ा अविश्वास में मूड़ी हिलाता, थरथराता
मन में भोले कुछ ख़याल हैं, पान-बीड़ी की गुमटी-सा भावसघन की एक जंगखाई दुकान
अधरात रोने लगना और जागे रहने की लंबी राते हैं, तुम्हारी खामख़याली है
सुबह की ताज़ी हवा में मेंहदी की खुश्बू, बूढ़ी, सिर्फ़ और और दु:खी करती हो
दोपहर की धूप की चैन में ढंग से बेचैन रहने नहीं देती बूढ़ी
क्यों नहीं दिखता सब कितना बेमतलब है.
बुढ़ि‍या बूढ़े की मुरझाई हथेली सींक से छुआकर हटा लेती
एक बार उदासी में मुस्कराकर फिर मुंह फिरा लेती
बताती या न बताती इससे क्या फर्क़ पड़ता
कि एक घबराये, उससे भी ज्यादा इस कदर पराये
बूढ़े की संगत में उसने जीवन कितना व्यर्थ क्यों किया.

Thursday, May 5, 2011

मैप ऑफ द ह्यूमन हार्ट इन चमकदार गरमी..

रहते-रहते कहीं किसी फ़ि‍ल्‍म‍ का टुकड़ा दीख जाता है, सन्‍न करता, आत्‍मा की काई में ताज़ा हरे पत्‍तों सा ज़ि‍द में उगा आता. किसी किताब के पन्‍नों से सरकता चला आता है, मुट्ठी में दाबे गर्म रेत-सा जलता (हिंदुस्‍तानी शहरों के बारे में- पचास के दशक के ठीक शुरु में कभी लिखा- एक फ्रांसीसी समाजशास्‍त्री का एक पैरे का क्‍वोट फुटनोट की शक्‍ल में पोस्‍ट के आखिर में है[1]). पैर ज़मीन से तीन इंच ऊपर कांपते, ‘अमेरिकन ब्‍यूटी’ के किशोर, इंटेंस, खब्‍ती नायक की तरह सघन, मलिन उदासियों के बीच भावघन के बीहड़ों में उतरते, डूबते फिरते हैं कि हाऊ टेंडर, हाऊ अमेजिंग अवर लाइफ ऑन अर्थ इज़? व्‍हॉट एन ऑसम, टेरिबल ब्‍यूटी? उस गाढ़े, गहरे सौंदर्य के नशे में तबीयत होती है आदमी छत की मुंडेर से कूदकर अपनी जान ले ले! या बाप की बंदूक से भूनकर पूरी दुनिया खत्‍म कर दे..

मगर दुनिया जस की तस चलती रहती है. रोज़. मैं अख़बार के पन्‍ने एक ओर सरकाकर सिगरेट जला लेता हूं, आप फेसबुक के पन्‍ने पर राजनीतिक प्रचार और साहित्यिक जुमलेबाजी के भदेस में दिन का लतीफ़ा ढूंढ़ते उत्‍फुल्लित होने लगते हैं. मैं सिगरेट के धुएं में संवलाते उंगलियां, हथेली की त्‍वचा निरखता फिर याद करता हूं कि देह की संगत में सिगरेट का धुआं चढ़ा रहता है, फ़ि‍ल्‍म की रील और किताब के पन्‍ने की कील कहीं चुपके से पीछे छूट जाते हैं. उंगलियों के बीच मोबाइल का सिम कार्ड फंसाये, किसी शरारती किशोर का तर्जनी व बाजू की उंगली के बीच उसे सरकाने, सरकाते रहने का ‘अनॉइंग’ खेल ‘रीयल’ बना रहता है, मगर मन में ठंडे पानी की धार सी भीतर तक चली आई फ़ि‍ल्‍म के दृश्‍यबंध एक बार कौंध में चमककर फिर एफेमेरल हुए, चमकती धूप के अंधेरों में हमेशा के लिए गुम हो जाते हैं. किताब की उस खास पृष्‍ठ पर छपे अक्षर भी काले छापों का धुंधला जाल बने रहते हैं, मन के जगमग का वास्‍तविक भौतिक यथार्थ बने रहने से कन्‍नी काट लिये जाते हैं. साईकिल रिक्‍शे की पीठ के पीछे छूटा अपने गुलाबी में झुलसा कोई बोगनवेलिया, उमरदराज़ बंद होंठों की दबी हंसी में राग-दुपहरिया सजाता, चुपके गाता गुलमोहर पुरुलिया के हाड़खोर साईकिल रिक्‍शेवाले की पीठ के पीछे छूटते, तपते दिन के कारखाने में रीतते चलते हैं. मेरा मित्र जुसेप्‍पे इंटरनेट पर किसी जापानी कन्‍या को समझाता तहजीब में फुसफुसायेगा, ‘लो साई, बेल्लिना, ला कासा पियु बेल्‍ला सरा सेम्‍प्रे ज्‍या पस्‍साता? (जानती हो, सुंदरी, दुनिया की सबसे हसीन चीज़ हमेशा बीती बात होगी?)

पता नहीं जुसेप्‍पे ऐसी बातें क्‍यों करता है जो सामने बैठी जापानी कन्‍या को पशोपेश में डालती हैं. या मैं ही ऐसी पंक्तियां क्‍यों लिखता हूं जो ठीक-ठीक मेरी पकड़ से भी बाहर पड़ी रहती हैं, आपको अस्थिर बनाती हैं. हमेशा नज़र के सामने गुलमोहर बना रहे के बेहुदे ज़ि‍द का यूं भी क्‍या मतलब है? गुलमोहर के टिकाने, या बिछौने पर बोगनवेलिया सजाने जितनी जगह कब थी और कभी कहां रहेगी? ललाट और कनपटी पर धूप बजता रहता है, हर्र-हर्र घन्‍नाते पंखे के शोर के बीच पैर के नाखून चौंककर कांप जाते हैं (मानो सवाल पूछते हों कि तुम्‍हारी संगत में हमारी जगह बनी रहती है? हमेशा? आर वी द सोर्ट ऑफ सौंदर्य यू केयर एंड यर्न फॉर? हलो?).

मैं चुप रहता हूं. पंखे के नीचे ढही देह को धीमे उंगलियों से पेट पर बाजा बजाना सुनता हूं, वंडरिंग वेदर दैट टू टेक फॉर रीयल ऑर नो. गरदन के चाम पर, उंगलियों की त्‍वचा पर गरमी अपने खेल खेलता रहता है.


[1]. “Whether we are considering the mummified towns of the Old World or the foetal cities of the New, we are accustomed to associate our highest values, both material and spiritual, with urban life. But the large towns of India are slum areas. What we are ashamed of as if it were a disgrace, and regard as a kind of leprosy, is, in India, the urban phenomenon, reduced to its ultimate expression: the herding together of individuals whose only reason for living is to herd together in millions, whatever the conditions of life may be. Filth, chaos, promiscuity, congestion; ruins, huts, mud, dirt; dung, urine, pus, humours, secretions and running sores: all the things against which we expect urban life to give us organized protection, all the things we hate and guard against at such great cost, all these by-products of cohabitation do not set any limitation on it in India. They are more like a natural environment which the Indian town needs in order to prosper..”