Thursday, May 5, 2011

मैप ऑफ द ह्यूमन हार्ट इन चमकदार गरमी..

रहते-रहते कहीं किसी फ़ि‍ल्‍म‍ का टुकड़ा दीख जाता है, सन्‍न करता, आत्‍मा की काई में ताज़ा हरे पत्‍तों सा ज़ि‍द में उगा आता. किसी किताब के पन्‍नों से सरकता चला आता है, मुट्ठी में दाबे गर्म रेत-सा जलता (हिंदुस्‍तानी शहरों के बारे में- पचास के दशक के ठीक शुरु में कभी लिखा- एक फ्रांसीसी समाजशास्‍त्री का एक पैरे का क्‍वोट फुटनोट की शक्‍ल में पोस्‍ट के आखिर में है[1]). पैर ज़मीन से तीन इंच ऊपर कांपते, ‘अमेरिकन ब्‍यूटी’ के किशोर, इंटेंस, खब्‍ती नायक की तरह सघन, मलिन उदासियों के बीच भावघन के बीहड़ों में उतरते, डूबते फिरते हैं कि हाऊ टेंडर, हाऊ अमेजिंग अवर लाइफ ऑन अर्थ इज़? व्‍हॉट एन ऑसम, टेरिबल ब्‍यूटी? उस गाढ़े, गहरे सौंदर्य के नशे में तबीयत होती है आदमी छत की मुंडेर से कूदकर अपनी जान ले ले! या बाप की बंदूक से भूनकर पूरी दुनिया खत्‍म कर दे..

मगर दुनिया जस की तस चलती रहती है. रोज़. मैं अख़बार के पन्‍ने एक ओर सरकाकर सिगरेट जला लेता हूं, आप फेसबुक के पन्‍ने पर राजनीतिक प्रचार और साहित्यिक जुमलेबाजी के भदेस में दिन का लतीफ़ा ढूंढ़ते उत्‍फुल्लित होने लगते हैं. मैं सिगरेट के धुएं में संवलाते उंगलियां, हथेली की त्‍वचा निरखता फिर याद करता हूं कि देह की संगत में सिगरेट का धुआं चढ़ा रहता है, फ़ि‍ल्‍म की रील और किताब के पन्‍ने की कील कहीं चुपके से पीछे छूट जाते हैं. उंगलियों के बीच मोबाइल का सिम कार्ड फंसाये, किसी शरारती किशोर का तर्जनी व बाजू की उंगली के बीच उसे सरकाने, सरकाते रहने का ‘अनॉइंग’ खेल ‘रीयल’ बना रहता है, मगर मन में ठंडे पानी की धार सी भीतर तक चली आई फ़ि‍ल्‍म के दृश्‍यबंध एक बार कौंध में चमककर फिर एफेमेरल हुए, चमकती धूप के अंधेरों में हमेशा के लिए गुम हो जाते हैं. किताब की उस खास पृष्‍ठ पर छपे अक्षर भी काले छापों का धुंधला जाल बने रहते हैं, मन के जगमग का वास्‍तविक भौतिक यथार्थ बने रहने से कन्‍नी काट लिये जाते हैं. साईकिल रिक्‍शे की पीठ के पीछे छूटा अपने गुलाबी में झुलसा कोई बोगनवेलिया, उमरदराज़ बंद होंठों की दबी हंसी में राग-दुपहरिया सजाता, चुपके गाता गुलमोहर पुरुलिया के हाड़खोर साईकिल रिक्‍शेवाले की पीठ के पीछे छूटते, तपते दिन के कारखाने में रीतते चलते हैं. मेरा मित्र जुसेप्‍पे इंटरनेट पर किसी जापानी कन्‍या को समझाता तहजीब में फुसफुसायेगा, ‘लो साई, बेल्लिना, ला कासा पियु बेल्‍ला सरा सेम्‍प्रे ज्‍या पस्‍साता? (जानती हो, सुंदरी, दुनिया की सबसे हसीन चीज़ हमेशा बीती बात होगी?)

पता नहीं जुसेप्‍पे ऐसी बातें क्‍यों करता है जो सामने बैठी जापानी कन्‍या को पशोपेश में डालती हैं. या मैं ही ऐसी पंक्तियां क्‍यों लिखता हूं जो ठीक-ठीक मेरी पकड़ से भी बाहर पड़ी रहती हैं, आपको अस्थिर बनाती हैं. हमेशा नज़र के सामने गुलमोहर बना रहे के बेहुदे ज़ि‍द का यूं भी क्‍या मतलब है? गुलमोहर के टिकाने, या बिछौने पर बोगनवेलिया सजाने जितनी जगह कब थी और कभी कहां रहेगी? ललाट और कनपटी पर धूप बजता रहता है, हर्र-हर्र घन्‍नाते पंखे के शोर के बीच पैर के नाखून चौंककर कांप जाते हैं (मानो सवाल पूछते हों कि तुम्‍हारी संगत में हमारी जगह बनी रहती है? हमेशा? आर वी द सोर्ट ऑफ सौंदर्य यू केयर एंड यर्न फॉर? हलो?).

मैं चुप रहता हूं. पंखे के नीचे ढही देह को धीमे उंगलियों से पेट पर बाजा बजाना सुनता हूं, वंडरिंग वेदर दैट टू टेक फॉर रीयल ऑर नो. गरदन के चाम पर, उंगलियों की त्‍वचा पर गरमी अपने खेल खेलता रहता है.


[1]. “Whether we are considering the mummified towns of the Old World or the foetal cities of the New, we are accustomed to associate our highest values, both material and spiritual, with urban life. But the large towns of India are slum areas. What we are ashamed of as if it were a disgrace, and regard as a kind of leprosy, is, in India, the urban phenomenon, reduced to its ultimate expression: the herding together of individuals whose only reason for living is to herd together in millions, whatever the conditions of life may be. Filth, chaos, promiscuity, congestion; ruins, huts, mud, dirt; dung, urine, pus, humours, secretions and running sores: all the things against which we expect urban life to give us organized protection, all the things we hate and guard against at such great cost, all these by-products of cohabitation do not set any limitation on it in India. They are more like a natural environment which the Indian town needs in order to prosper..”

2 comments:

  1. आपको पढना एक ऐसा अनुभव है जिस से गुजरने को बार बार दिल करता है...
    नीरज

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