May 7, 2011

बुढ़ाई दोपहर में गुफ़्तगू..



थिरकती चली आती, गाल पर थमकर चौंका जाती
ढलते चाम की त्वचा सहलाती, बुढ़ि‍या मुस्कराकर बुदबुदाती हवा है
बेमतलब है, किसी जवान जोड़े को आलसमन तकता बूढ़ा बुदबुदाता
बुढ़ि‍या गाल की हवा सहेजती बाल का रेशमीपन, हल्की कांपती
हथेलियों में फूल के नन्हें फल, सूखे पैरों के नीचे की सूखी घास
सहेजती, अकड़ी गरदन में दुलार का हिलोर, चुप्पै बेहया मुस्कियाती
बेमतलब है बेमतलब है बूढ़ा अविश्वास में मूड़ी हिलाता, थरथराता
मन में भोले कुछ ख़याल हैं, पान-बीड़ी की गुमटी-सा भावसघन की एक जंगखाई दुकान
अधरात रोने लगना और जागे रहने की लंबी राते हैं, तुम्हारी खामख़याली है
सुबह की ताज़ी हवा में मेंहदी की खुश्बू, बूढ़ी, सिर्फ़ और और दु:खी करती हो
दोपहर की धूप की चैन में ढंग से बेचैन रहने नहीं देती बूढ़ी
क्यों नहीं दिखता सब कितना बेमतलब है.
बुढ़ि‍या बूढ़े की मुरझाई हथेली सींक से छुआकर हटा लेती
एक बार उदासी में मुस्कराकर फिर मुंह फिरा लेती
बताती या न बताती इससे क्या फर्क़ पड़ता
कि एक घबराये, उससे भी ज्यादा इस कदर पराये
बूढ़े की संगत में उसने जीवन कितना व्यर्थ क्यों किया.