Monday, May 9, 2011

डेथ इन द टाईम ऑफ़ सर्वेइंग..

पहिला बात, दुनिया में आने की मेरी (झूठी) कहानी से कवनो तरीका से इसको कन्‍फ़ूज़ मत कीजिएगा. डैरक्‍टेली (या गोपनो तरीके से) ये हमरी कहानी हइयो नहीं है. कवनो रहल रहे राबर्ट[1], उनकी है. उनके दुर्भाग की है. ओह, जीबन का सर्बे का माया भी कइसन-कइसन खेल खेलता है, जइसन चंदरीका मौसा बोलते-बोलते जीवन के ओ पार चहुंप गए. अजब बात है हम अभी येहीये पार हैं, लीजिए, राबर्ट जी का कथा संभालिये, हम पीछा का तरफ हटते हुए पृष्‍ठभूमि में जाता हूं.

माथा पर बड़कन फैमिली-बोझा था तब्‍बो जवान सुखी था. बिना उस संपूरन के कहीं डेग नहीं भरते. नौ बरिस में नौ बच्‍चा का महतारी-महत्‍त मुकुट सुसोभित, शारलोट (अपनी बुड़बकी में अब इनके हारलोट न समझे लगियेगा) और दुनो बड़का बुतरु को लिये यात्रा पर निकले राबर्ट साहब. जब नाव का सुबिस्‍ता के राह में रुकावट पड़ जाती और जमीने-जमीन जाये के सिवा और आसरा न बचता, तब काफिला चार हथियन के हवाले होती. नाव के सहज सुबिस्‍ता-बि‍हीन इस मुश्किलात परिस्थिति में सब बेचारे और बेदम हुए जाते, और क्‍यों हो जाते इसका डिटेलिन सुनिये. दो तंबू, छौ कनात, पांच असबाबधारी ऊंट, एक पालकी, एक मियाना, एक डोली, बारह भंगी, बारह कुली, बारह लश्‍कर (तंबू छावेवाला) और ई पूरी पल्‍टन की सुरक्षा बास्‍ते पचास गो सिपाही. ऐसे में कवनो आश्‍चर्ज नहीं था कोलब्रूक साहेब काहे इतना नाव के मोहब्‍बत में रहते थे.

घरौआ बतकुच्‍चन, कामकाजी टीप और तुरंतु तस्‍वीर उकेरने में कोलब्रूक साहब के जवाब नहीं था, पूरा महारती रखते. मगर भूलिये मत, कांटा गहीन बखत था. रात भर सर्बेयर जनरल साहब बाघ का दहाड़ में जग्‍गल रहते, और दिन का बखत दलदल-फंसल नाव ऊपरियाने का चिंता में बझ्झल बीतता. गोरा साहेब, मेमीन और कचकड़ा माफिक बुतरुअन के नदी किनारे ठाड़े, पूरा जवार जिला का जनता औंचक-भौंचक नजारा लेती. कि कवन दुनिया का ई कइसन मेला-तमाशा उतरा है जमीन पर! भलमानस कोलब्रूक साहब ई सारा किचाईन खुशमिजाजी से न सिरिफ बर्दाश्‍त किये जाते, सुबह-सकारे बरसात बाद के फ्रेशियल एयर नथुना में ‘स्‍टोरिन’ किये मनमोहिनी सोचते यहीये तो लाइफ है न जी? नाश्‍ता में चाहा-बघेरी, चाय पर नबाब, उपनिवेश-पूर्व हिन्‍दुस्‍तान की यहीये सुच्‍चल बालसुलभ सरलता थी. इससे बेह‍तर कौनो मुलाज़मत नहीं था, न इससे अच्‍छा कवनो दूसरा ठौर.

1860 में कोलब्रूक बाबू गंगा की सहायक नदी राप्‍ती और गोगरा की पीठे सवार पहाड़ के नजीक पहुंचे. बर्फोच्‍छादित हिमश्रृंग का पहिलका नजारा गोरखपुर पहुंचने पर हुआ! बड़ा दिन लखनऊ में साथी गोरा बाबू लोगों के साथ फरियाकर, परिवार पीछे छोड़ते, उत्‍तर-पच्छिम को कूच किये.

पहाड़ की तराई पर पहुंचते उनका साबका बाघ-बहुल दलदलिया जंगल से पड़ा. हाथीघास और बीहड़ अंधारबन का ये वहीये बदनाम तराई था जिसने इससे पहले जाने कितना पैमाईशदारों को बिना डकार लिये हजम किया था! कोलब्रूक बाबू पहुंचते ही बुखार में घिरे, बावजूद इसके जवान पीलीभीत के आसपास का बर्फानी चोटियों का पैमाईश करने में जुट्टल रहा. मगर जल्दिये ढेर भी हुआ. उससे आगे का कार्जभार मातहत विलियम वेब के सुपुर्द करके हाथ पीछे खींच लिये. और चारा नहीं था.

अप्रिल तक कोलब्रूक बाबू इतना कमज़ोर हुए कि नाव में गिरल पड़े रहे से अलग और कवनो काम लायक बचे नहीं. बुखार मलेरिया निकला, उसका ऊपर पेचिश का फांस. साहेब का दैनन्दिनी लिखाई बंद नहीं हुआ लेकिन इंदराज़ का, क्षमा कीजिएगा, हवा निकल चुका था. नदी की उतराई में, लिस्‍टलैस, बहल-बहल भादो तक जब कानपुर पहुंचे, तबीयत तबाही के कगार पर थी. सन्निपात में बौराहट चढ़ जाता. सब कहीं बरसाती काला मेघे दीखता. आनेवाला तूफान का आशंका में बारह सितम्‍बर को चमकती बिजली और कड़कते बादल-गर्जना के बीच दैनन्दिनी में दर्ज किये, “तेरह तारीख- मौसम बहुतै खराब है. तूफानी रात में सारा दिन जंगीरा में फंसल रहे. चौदह तारीख- ” तारीख और डैश के इसी संगीन मुहाने पर दैनन्दिनी समाप्‍त हुई. इक्‍कीस तारीख के सुबही, झुटपुटी बेला में राबर्ट कोलब्रूक मृत्‍यु को प्राप्‍त हुए. ए बिक्टिम टू हिज़ एक्‍जर्सन इन द कॉज़ ऑफ साइंस. अभी जवान पैंतालिसो तक नहीं पहुंचा था!

(बाकी)


[1]. सर्बेयर जनरल, सूबा बंगाल, श्री राबर्ट कोलब्रूक (1807-1808)

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