Tuesday, May 10, 2011

नंदू से बातचीत..



फिर दिल में कुछ नहीं है नंदू
दारु की खास ब्रांड की एक बोतल है कहीं पिये थे
जी रहे जैसा कुछ उस रात हम भी जिये थे
किसी के पैर में अच्छा कोई जूता था, समूचा
गाढ़ी नीली कमीज़ पर गाढ़े लाल छोटे फूल
वैसा ही कुछ मैं भी कहीं पहनना चाह रहा था
कोई लड़़की थी क्या तो नाम था उसके साथ हंसना
हाथ थामे सीढ़ि‍यां उतरकर तेज़ी से भागते सड़क लांघ ली थी
इलैक्ट्रॉनिक अप्लायेंसेस के किसी लकदक शो-रुम
किसी चकमक गजेट की कीमत पूछता
लड़की भौंचक मुझे देखती रही, भींचकर
उंगलियां दबा ली दिल में, पाकिस्तानी या फिलीस्तीनी
शायर था कोई उसके नज़्म की चार लाइनें
गुनगुनाकर मैंने भी गा लिया था दिल में
कुल सतरह से उन्नीस हज़ार
के आसपास का हिसाब है नंदू, इससे ज़्यादा
का हिसाब बनाकर रक्तचाप चढ़ाना
और हृदयाघात पाने का पॉलिसी पाना है दोस्त
इससे आगे दिल में कुछ नहीं है नंदू
बांस का जला जंगल है झींगुर की कोरस सिंगिंग है
फुआ का भुला फोन नंबर है, मौसा की मातमी में
तत्कांल से टिकट निकलवाने की मेरी हारी कोशिशें
गांव न लौटने की करुण सिफ़ारिशें हैं
इस बस से उतरकर उस बस चढ़ना
रहता है, साढ़े तीन घंटे रोज़ इसी
आने-जाने में निकल जाते हैं
फिर मालूम नहीं नये ऑफिस में क्या है
दिन भर हंसता रहता हूं मगर
वहां कोई मुझे पसन्द नहीं करता
साथ बैठकर लंच करना
जी का जंजाल हो जाता है
रोज़ लगता है आज आखिरी दिन है
फूल सजाने की फुरसत कहां बनती है
तुम्हीं को मुंह दिखाने की बोलो बनती है?
तुम्हारे सिवा कोई दोस्‍ती जैसी दोस्ती भी नहीं है सच
और स्साले मिले हो इतने महीनों बाद नंदू
तो पूछते हो क्या है दिल में
कुछ नहीं बांस का जला जंगल है नंदू
तुम सुनाओ आजकल किधर रहते हो.


(ऊपर रेनातो गत्‍तुसो की चित्रकारी)

4 comments:

  1. दिन भर हंसता रहता हूं मगर
    वहां कोई मुझे पसन्द नहीं करता ...

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  2. बस नंदू के ही आने का इंतज़ार रहा.. है न?

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  3. कुछ नहीं बांस का जला जंगल है नंदू .....!!! चाहतों का, हसरतों का, ज़रूरतों का जंगल...

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  4. "रोज़ लगता है आज आखिरी दिन है
    फूल सजाने की फुरसत कहां बनती है
    तुम्हीं को मुंह दिखाने की बोलो बनती है?
    तुम्हारे सिवा कोई दोस्‍ती जैसी दोस्ती भी नहीं है सच
    और स्साले मिले हो इतने महीनों बाद नंदू
    तो पूछते हो क्या है दिल में
    कुछ नहीं बांस का जला जंगल है नंदू
    तुम सुनाओ आजकल किधर रहते हो."

    मेलांक्लिक बादलों में चहुँपाती कविता और नहीं जाना चाहने पर धक्का लगाती कविता.. :-।

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