Wednesday, May 11, 2011

बड़ी धूप है मगर..


धीमी आवाज़ में लड़की शिकायत करती दिख रही थी. लड़का गुमसुम सुनता, फिर अचानक वो कहने लगता लड़की मुंह फेर सड़क के दूसरे ओर देखने लगती. ज़रा देर को वहम होता लड़का लड़की को मनाने की कोशिश करेगा, जबकि बाद में फिर ऐसा कुछ होता नहीं. लड़का जेब से तहा रुमाल निकालकर उसे कनपटी और गरदन के पीछे फेरने लगता. हैरान गरमी क्‍या आफत कर रही है जैसी बेमौज़ूं बात करने लगता. लड़की दुखी हो जाती कि इतना कम समय है उसके पास फिर ये गरमी की बात क्‍यों कर रहा है. हालांकि इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि गरमी खासी थी. गरदन और हाथ पर धूप कांटे की तरह चुभती. रहते-रहते माथा सुन्‍न हो जाता, पैर बेकाबू होने लगते. मगर कुछ-कुछ कुपोषण की शिकार पतली-दुबली सांवली लड़की के लिए इस वक्‍त गरमी नहीं, कितना कम समय है उन दोनों के पास का सवाल था. शायद इसीलिए वह इतने गुस्‍से में थी. हालांकि बाहर से देखने पर लगता वह चिलकती धूप के असर में हांफ रही है. एक पानी के ठेलेवाले के बगल से गुज़रते लड़के ने सुझाव दिया वो चाहे तो जीरा या पुदीना मिला एक गिलास पानी पी सकती है.
लड़की ने कहा शटअप, मुझे प्‍यास नहीं है.
लड़के की जेब में घंटी बजी. लड़के ने मोबाइल निकालकर देखा फेसबुक पर प्रधान सर के स्‍टेटस की सूचना थी: “पाँचों विधान सभा चुनावों में अगर कांग्रेस घुमाफिराकर भी जीत जाती है तो ये सब नंगा नाचेंगे. सबूत पेट्रोल का दाम बढ़ाने की बात करके अभी से दे रहे हैं. चिदंबरम एंड कंपनी सर चढ़कर बोलेंगे कि जनता हमारे साथ है. माकपा के कुकर्मों की सजा समूचे वाम और जनता को भुगतनी पड़ रही है.” लड़के ने मोबाइल जेब में रखकर उसी हाथ से लड़की का कंधा छू लिया, लड़की से कहा, “प्‍लीज़, तुम इस तरह बिहेव मत करो. हर चीज़ के लिए मैं रेस्‍पॉंसिबल नहीं हूं.”
लड़की चुपचाप धूप में चलती रही. लड़की के बाल पसीना या जाने किसके असर में सब उसके माथे से चिपक रहे थे. लड़की के ठीक पीछे आगरा या राजस्‍थान का कोई रंग-बिरंगा कबीलाई बंजारों का परिवार चल रहा था. एक सात-आठ साल की बच्‍ची थी जिसके माथे पर चिकट बाल और बायें पैर में बड़ा सा घाव था. बच्‍ची कुछ लंगड़ाकर चल रही थी. डॉक्‍टरी ईलाज के अभाव में शायद वह आगे का पूरा जीवन इसी तरह लंगड़ाती चलती रहे. मगर लड़की का उधर ध्‍यान नहीं था. लड़के ने फिर कोशिश की, “तुम्‍हें आइडिया है मैं कितने टेंशन में हूं? बत्रा ने प्रॉमिस किया था कि मैं ज्‍यादा दिन खाली नहीं बैठूंगा, मगर चार महीने तो गए न?”
“और तुम अभी भी खाली बैठे हो,” लड़की ने चिढ़कर कहा, “सिर्फ मुझसे मिलने के लिए तुम्‍हारे पास टाईम नहीं रहता.”
“तुम भी ऐसे बात करती हो जैसे जानती नहीं. नौकरी के समय नौकरी थी, अभी नौकरी नहीं होने की नौकरी है, तुम्‍हें दिखता नहीं कितना फंसा रहता हूं?”
धूप में लड़की का माथा चल रहा था, उसे लड़के से रुपये भर की सहानुभूति नहीं थी. शायद उसे लड़के से प्‍यार था भी नहीं और बेमतलब ही वह परेशान होकर खाना स्किप कर रही थी कि लड़का नौकरी के चक्‍कर में किसी दूसरे शहर चला गया तो वह नींद की गोलियां खा लेगी या कुछ कर लेगी एटसेट्रा. भौं का पसीना पोंछती लड़की ने इतमीनान से कहा, “मेरी अपनी नौकरी है. कब फंसे हो और कब फ्री हो का हिसाब लगाते रहने का टाईम नहीं मेरे पास. वो जकारिया तुम्‍हें नौकरी दिलवा रहा था न, तुम जाओ कोलकाता! तुम्‍हारी वो बंगाली लड़की भी है उधर, खुश रहना उसके साथ! मुझे फिर फोन करने की ज़रुरत नहीं.”
लड़के की तबीयत हुई हाथ बढ़ाकर जोरों से लड़की के एक तमाचा जड़ दे, मगर बढ़े हाथ से फिर वह गरदन का पसीना पोंछने लगा, कातरता में मुस्‍कराने. लड़की ने तपाक से चेहरा फेर लिया. कहना मुश्किल है उसके गाल पर गिरी आई वो आंसू की धार थी, या सिर्फ पसीना था. वैसे भी लड़की किसी वक्‍त बेहोश हो जाये जैसी अच्‍छी-खासी धूप थी. लड़की का ललाट गरमी में चमक रहा था. लड़का अचानक हंसने लगा था.

2 comments:

  1. बच्‍ची कुछ लंगड़ाकर चल रही थी. डॉक्‍टरी ईलाज के अभाव में शायद वह आगे का पूरा जीवन इसी तरह लंगड़ाती चलती रहे ---- इस तेज़ धूप में क्या कोई उसकी महरम पट्टी करवाएगा ??????

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