Thursday, May 19, 2011

नीच, धूप बीचोंबीच..



जीवन ओब्‍लॉमोव के उनींदे अंधेरों में रह-रहकर जागता होगा
कलास्‍सो की लहरदार सुरमई पर सन्‍नाता, मुंदी आंखों भागता
चिलचिलाती धूप में पटखनियां खाती होगी पीठ, सिर खौराता
बाल नुचते होंगे (हिमानी नवरत्‍न 100% ठंडा आयुर्वेदिक, तेल
थरथराता), टुंड्रा प्रदेश के छोर पर ‘खाने का अंत’ के किस्‍से
चुपचाप अधरात दरवाज़ा खटखटाते, दूसरे और कई किस्‍सों
की गांठ बनाते, अचक्‍के एकदम कहीं कौवा ककर्श चिंचियाता
’वर्ल्‍ड वीयरी, आर यू, मेट? आर यू आर यू, वर्ल्‍ड वीयरी, हं?’
मैं दहकता मुंह से सीटी छोड़ता, मुनि योगवशिष्‍ट होते, मंत्राते
‘संसार कहानी सुनाने के बाद बचे उसके प्रभाव जैसा है.’
(यह ख़ास चंद्रभूषण के लिए)

1 comment:

  1. मुनि की बात पागल कर देने वाली है।

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