
बबीता भी जानती है मेरे मन के भीतर कुछ दरका हुआ है, रहते-रहते बेचैन होकर, लौटकर उसके बाल सूंघने भले चले आता रहूं, उससे प्यार नहीं करता. बबीता जानती है प्यार सिर्फ़ दारा से करता था, दारा जो पिछले तीन सालों से हमारे बीच नहीं है. बबीता की मौसेरी दीदी के हस्बैंड की वन-विभाग की अस्थायी पोस्टिंग के ठिकाने के बाहर, पलामू के जंगलों की एक अंधेरी रात में कभी गायब हो गया और फिर उसकी कभी खबर नहीं मिली. कुछ लोगों ने कहा बच्चा कुत्ते को भेड़िये टांगकर ले गये, यहां आम बात है, पिल्ले का नरम मांस उन्हें बड़ा माफिक आता है, मैंने कुछ नहीं कहा. बबीता बोली दारा एक दिन लौटकर आयेगा तुम देखना, फिर मुंह पर साड़ी रखकर लकड़ी का गेट ठेलती भीतर क्वार्टर के अंदर भाग गई थी. भेड़ियों की बाबत लोग और किस्से सुनाते रहे, गेट थामे मैं बिना कहीं भागे सुनता रहा. सिगरेटें पी, बीच-बीच में हंसता रहा. एक कुत्ते की ज़िंदगी का क्या ग़म करना?
रात भर बस की छत पर किसी तरह देह साटे सोने की कोशिश करता और बंजारे सड़क की दया से हर बारहवें मिनट उछल-उछलकर थकते हुए तापस अंतत: चिढ़कर उठ गया था, चीख़कर आवाज़ लगाई थी दादा, सच्ची बोलना ये मानुस की जिन्दगी है कि कुत्ते की? इस डेढ़ टंके की दुनिया में मैं अब साल भर नहीं टिकने वाला, तुम लिख लो मेरी बात!
बस की छत पर सफर करने के दिन खत्म हुए तापस के, मुंबई की अच्छी नौकरी में है, अपनी कार में घूमता है, और बीच-बीच में गाड़ी सड़क पर कहीं फंसी हो तो सेल से नंबर घुमाकर कहने से बाज नहीं आता, ‘दादा, जो भी कहो, जिन्दगी कुत्ते की ही है!’
बबीता से पूछता हूं वह क्या पढ़ रही है. खुली किताब के बीच कंघी फंसाकर वह कहती है कुछ नहीं, ऐसे ही ध्यान कर रही थी. उसके हाथ का किताब लेकर देखता हूं ‘श्रीरामकृष्ण वचनामृत’ है, बिना सोचे मुंह से निकलता है, ‘बड़ा दार्शनिक जवाब देती हो, कहां से सीखा? इसको पढ़ते सीख लीं? और दो!’
‘और क्या दूं? मज़ाक मत बनाओ मेरा, ठीक से जान जाऊंगी उस दिन देखोगे फिर!’
‘वह तो मैं अभी ही देखकर दंग हो रहा हूं. परसों देखा तकिये में माथा गड़ाये ‘दि फिमेल यूनक’ में डूबी थीं, वहां से देख रहा हूं आज ‘वचनामृत’ का लॉंग जम्प ली हो, अब और क्या बचा है देखने को?’
‘मुझे सताओ मत. जाके और काम करो अपने, रूस का वीडियो देखो, स्पेनी कविताएं पढ़ो, मेरी जान छोड़ो,’ मुंह पर साड़ी का पल्लू खींचकर बबीता चोर नज़रों से मुझे ताड़ती रही.
‘रूस के वीडियो में कितनी हिंसा है इसका तुम्हें अंदाज़ा नहीं इसीलिए ऐसा कह रही हो,’ बिछौने के सिरहाने चोरी से चुप्पे बैठते मैंने कहा.
ताज्जुब से मुंह बनाये बबीता बोली, ‘और स्पेनी कविताएं?’
‘उसका तो मत ही पूछो, जिस भी पन्ने पर हाथ रखो, प्रेम के स्वांग में दु:खों की नदियां हैं!’
‘इससे तो अच्छा है तुम मत ही पढ़ो. मेरे बाल सूंघोगे?’ बिछौने में सरककर अपना सर मेरे गोद में गिराती बबीता बोली, ‘लो, सूंघो! अब क्या हुआ? मुझे मालूम है तुम मुझे प्यार नहीं करते, मगर मेरे बालों को तो करते हो न, फिर? और हां, पहले बता दो संझा को तरकारी क्या खाओगे? बैंगन, या बरबट्टी?’
बबीता की कनपटी पर झुके, नाक सटाये मैं फुसफुसाया, ‘ओहो, क्या कुत्ते की ज़िंदगी है.’