Wednesday, July 6, 2011

अंधेरों में की बारात..

अब कुछ नहीं हो सकता. कुछ हो सकने की संभावना का सुनहला संसार और अर्थ सब सारे अब व्‍यर्थ होकर कहीं बहुत पीछे छूट चले. अब सामने सिर्फ़ शून्‍य है. शून्‍य का प्रवहमान अनन्‍त. और सारे चुपचाप चले जा रहे हैं. परिड़ा, प्रसून, बरेजा, बोगोई, बारदोलोई, चिंचालकर, चेंडा, चौहान, चंडी, रेड्डी, थंपु, वेलियार, वाण्णा, थोरा, थपलियाल, थूरन प्रसाद. अगाड़ी, पिछाड़ी, गाड़ी, बेगाड़ी, जात, रेस, ट्राइब किसी फ़र्क का अब कोई मतलब नहीं. सिर्फ़ शून्‍य और समय का है. जो हर क्षण बीतते हुए भी अनन्‍त के कालातीत विस्‍तार तक पसरा होगा. ‘ओह,’ एक बूढ़ी पैर घसीटती बुदबुदाती है, ‘कोई बतायेगा और कितना चलना है? मैं थक गई! समय क्‍या हुआ है, बेटे?’

बूढ़ी ने जीवन में बेटे से बहुत दुख पाया है, मगर आदत और उम्‍मीद की मारी है, अब भी मुंह से बेटे का सम्‍बोधन छूटता नहीं.

खड़खड़ गाड़ी में ईख के सूखे छिलकों के बाजू पुराने बोरों पर लेटे एक बुजूर्ग हैं, भौं के रुखे बालों को दुलराते फुसफुसाते हैं, ‘बस एक बार बेटे का चेहरा देखना चाहता हूं, एक बार. मुझे और किसी बात की शिकायत नहीं है. तब तीन साल की उमर होगी उसकी, अमर सिंह राठौर रोड पर बाटा की दुकान हुआ करती थी, गोद में लिटाये उसे पहली मर्तबा जूता पहनाया था! मेंहदीरत्‍ता ने तब नया-नया कैमरा खरीदा था, जिद करके हम बाप-बेटे की तस्‍वीर उतारी थी, घबराये हुआ पसलियों से मैंने बंटु का थामा हुआ है, और कैमरे को तकता वह पाजी हंस रहा है!..’

खड़खड़ गाड़ी के पीछे तीन आदिवासी हैं. छत्‍तीसगढ़, झारखण्‍ड, महाराष्‍ट्र, आंध्र के हैं कि पुरुलिया के हैं, कि त्रिपुरा के जंगलों में बांस काटकर गुजारा करते थे का अब मतलब नहीं. किस झमेले में तीनों की एक ही वक्त हत्‍या हुई उस वज़ह का भी नहीं. और लोगों के साथ शून्‍य की अनन्‍त-यात्रा के हमसफ़र हैं बस इसका है. अलबत्‍ता उनके पीछे अगरतला की एक लड़की है, लुटुल, आदिवासियों के पीछे चली जाती से ऐतराज़ नहीं, मगर यह सोचकर बेचारी का दिल बैठा जाता है कि बैंक की नौकरी से बचाकर रखे पैसे व्‍यर्थ गए, काश कि मौली के सुझाव पर वह पिछले दिसम्‍बर कोडाइकनाल की छुट्टी पर निकल गई होती! जीवन के सारे अवसर अब अंधेरे के अनन्‍त के हवाले हुए.

लोगों की भीड़ में गुंथा, बदहवास एक पगलेट चीख़ रहा है, ‘प्‍लीज़, मैं मां से नहीं मिलना चाहता! वह औरत मुझे पहचानेगी नहीं. कभी नहीं पहचानी! अब इस उम्र में मैं ऐसे अपमान नहीं झेल सकता, आप समझ रहे हो? भाई साब, प्‍लीज़ मुझे यहां से बाहर करो!’ नज़दीक जाकर दीखता है वह हास्‍यास्‍पद पगलेट मैं हूं, घबराया, तन्‍नाया, तिलमिलाया, कभी गुस्‍से में, कभी गिड़गिड़ाकर गुज़ारिश करता, ‘किसी के पास सिगरेट है? एक सिगरेट, किसी के पास? अबे, आई कांट बी‍लीव इट, जुसेप्‍पे, व्‍हेयर आर यू?’ जुसेप्‍पे कहीं नहीं है. आंखों पर हाथ धरे चुपचाप चलते लोग हैं. दिन और रात से परे समय के सियाह-सलेटी रंगों में रंगे. जुसेप्‍पे कहीं नहीं है. एक बेआवाज़ रोता बच्‍चा है. सन् बानबे का ‘ईल मेनिफेस्‍तो’ का मुखपृष्‍ठ फड़फड़ाता. रोस्‍साना रोसांदा की फीकी याद और इसकी मरोड़ती तक़लीफ़ कि अब रोस्‍साना की कहानी कभी नहीं पढ़ूंगा? अमालिया रोद्रिगेस और दे अंद्रे को, कायेतानो को दुबारा नहीं सुनूंगा?

मेरे बाजू चलती एक कश्‍मीरी औरत उत्‍साह से बता रही है, ‘वकालत की नौकरी क्‍या थी, लोगों की मदद का घर में वसीम ने दफ्तर खोल रखा था, मगर मैं शिकायत नहीं कर रही, भाई साब! मुझे अपने शौहर का सब कुछ अच्‍छा लगता था, जिस तरह खुले मुंह वसीम हैरत से लोगों की कहानियां सुनते. आधे में नाश्‍ता छोड़कर कोट पहनने लगते कि आज पेशी है तुम दोपहर फोन मत करना. उनके सारे मोज़े एड़ी की ओर फटे होते, बच्‍चों के लिए खरीदारी करते उनकी आंखों में जिस तरह खुशी उतर आती, नेशे की बीमारी के बखत जिस तरह वह रात-रात भर अस्‍पताल में हाजिरी बजाते उसकी अम्‍मी को समझाते नहीं थकते कि उनके बच्‍चे को कुछ नहीं होगा, भाई साब, ऐसे नेकबंद शौहर से दूर होने का ग़म मुझ बेपढ़ी की जबान क्‍या बतायेगी..’

दर्द के तनाव में औरत चेहरे पर का दुपट्टा खींचकर मुंह फेर लेती है. पीछे कोई बंगाली लड़का है (हालांकि क्‍या फर्क पड़ता है वह रुमानियन, बल्‍गारियन अज़रबैजानी कुछ भी होता) उत्‍साह में भागा हमारे साथ होता है, ‘आमी जानी आपनी की बोल्‍छेन, तरुणार सोंगे थेके सेई रकोम आमियो त फ़ील कोरताम! कभी उसका आफिस में अच्‍छा मोतुन दिन बीता, कोब भाट्टाचार्जागेर सोंगे झागड़ा-टांटी केया, शोब आमी उसका बिना बोले सेंस कोरते पारताम, रियल लब एटा परशेप्‍शन आपना के देये, ना की?

मैं सिर हिलाता हूं, ‘जानी ना, बोंधु, रियल लॉव टा की, कोनो सिकरेट धोरेछो की?’

लड़का मेरी बात समझता नहीं. शिकायत की वज़ह नहीं, मैंने भी रियल लव कब समझा. सब चले जाते इतने लोगों में ही जीवन कितनों ने समझा? अब कभी समझेंगे?

जुसेप्‍पे कहीं नहीं है. उसकी हंसी की गुम होती आवाज़ है. सिर नवाये सब चुपचाप चले जा रहे हैं. किस तरह की मौत है जिसमें मुंह सिये चले जा रहे हैं? अब?

अचानक चढ़ता खुमार/ अचानक कौंधते इंद्रधनुष/ अचानक झरते सपने/ अचानक तिरती उम्‍मीद

भारी पोंपलों औ’ हुमसती सांसों/ से फिर धीरे-धीरे उतरता बुखार.

फिर घिरती रात फूलों की/ फिर कसती रात शूलों की.

2 comments:

  1. जो आज पढ़ा उसने छुआ. लेकिन आपके कुल कहे का मतलब क्या है शायद तब समझ में आएगा जब एक साथ सारी कड़ियाँ पढ़ी जाएँ. और ये तभी होगा जब सब एक जिल्द में बंधा के आएँगी.

    आज तक आपको जितना पढ़ा उसके आधार पर कह सकता हूं कि आपने एक निजी भाषा अर्जित कर ली है.

    जब जिल्द आ जायेगी तो एक नजर डाली जरुर जायेगी.

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  2. आपको पढ़ते हुए मुझे अक्सर रूसी साहित्य की छायायें दिखती हैं। पिछले 40 सालों की कम्युनिस्ट प्रकृति के लोगों ने कथनी-करनी में अन्तर रखा इसलिए वे अब विश्वस्त से नहीं लगते। यह बात कुछ कचोटती है जब आप भी उस छाया से अलग नहीं हो पातीं।

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