Jul 13, 2011

सूना, बारीश के भहराये शोर में..



उंगलियों के पोर पर कुछ नहीं उतरता, सांसों के ज़ोर पर, प्रिय, कभी कुछ नहीं
क्यूं, पसलियों के छोर पर.. दिखते हो तुम, कुछ ज़रा-से पलों को सकपकाये हुए
हाथ बांधे कांधा गिराये हुए, एक सूनी उदास हंसी बजती है, कुम्हलाई कांपती
फिर एकबारगी दमसाधे की ख़ामोशी का स्वर दूर तक खिंचा चला जाता है
पसलियां खड़खड़ाती जगती हैं तब बूझता है, प्रिय, आभास के चिनके रेशे थे
बारीश के भहराये शोर में उपस्थिति का आभास था तुम नहीं थे
पानी और शीशों के पार किन्हीं और शहर की परछाइयों में
तुम चल रहे जल रहे थे, मेरी उंगलियों की पोरों
तक क्यूं फिर सिर्फ़ एक सूना उतर रहा था.