Wednesday, July 13, 2011

सूना, बारीश के भहराये शोर में..



उंगलियों के पोर पर कुछ नहीं उतरता, सांसों के ज़ोर पर, प्रिय, कभी कुछ नहीं
क्यूं, पसलियों के छोर पर.. दिखते हो तुम, कुछ ज़रा-से पलों को सकपकाये हुए
हाथ बांधे कांधा गिराये हुए, एक सूनी उदास हंसी बजती है, कुम्हलाई कांपती
फिर एकबारगी दमसाधे की ख़ामोशी का स्वर दूर तक खिंचा चला जाता है
पसलियां खड़खड़ाती जगती हैं तब बूझता है, प्रिय, आभास के चिनके रेशे थे
बारीश के भहराये शोर में उपस्थिति का आभास था तुम नहीं थे
पानी और शीशों के पार किन्हीं और शहर की परछाइयों में
तुम चल रहे जल रहे थे, मेरी उंगलियों की पोरों
तक क्यूं फिर सिर्फ़ एक सूना उतर रहा था.

11 comments:

  1. अरसे बाद आया ...वही जादू कायम है

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  2. इन ५-६ लाइन गहरे पानी मे ही डूबता सा दिल गिरफ़्फ़ हुआ जाता है पढते पढ़ते..पता नही इतने मोटे ग्रंथ क्यों रचे जाते हैं जब इतने हर्फ़ों मे बात दिल के आर-पार हो जाती है 9MM बरेटा की स्पीड से..प्रभु हैं आप..ऑसम, अद्भुत सब ओवरयूज्ड शब्द हैं..पिटे हुए इसके आगे..दंडवत है!

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  3. kabhi kbhi aap bhi kamaal ka likh jate hain :-)

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  4. @अपूर्व, नाम पाये हो, बाबू, ज़रा संभालकर शब्‍द खर्चा करो, नहीं ?

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  5. एक सिफारिश है...बहुत दिन से पॉडकास्ट सुनने को नहीं मिला है...प्लीज एक पॉडकास्ट पोस्ट कीजिये.
    खास तौर से ये वाली पोस्ट आपकी आवाज़ में बहुत अच्छी लगेगी.

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  6. पॉडकास्ट...पॉडकास्ट...:)

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  7. पॉडकास्ट...पॉडकास्ट...पॉडकास्ट... :-|

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  8. आपके लेखन का कायल हूँ भाई.

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  9. हम भी हैं..सर जी..थोड़ा सा जापान हो जाये..बारिश मे भीगती आवाज के सोंधेपन मे उतराता हुआ..थोड़ा सा और जानने की ख्वाहिश दबाये हुए हैं कब से...प्लीज्ज!

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  10. @अच्‍छे भलके लोगों, आएगा आएगा..
    आएगा आनेवाला.. अब से अलग बात है कमालजी अमरोहीजी के धीमियाये ठसक में आये, कि मधुबालाश्री के सुहानेपने के संगे आये.. मगर आएगा तो ही ही, जावेगा किहां ?

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  11. इस मोटे दीमाग में आपके लेख से ज्यादा कविता बिना पैर पटकाए उतर आती है और एंटीना खड़े हो गए आधी रात को भी ...

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